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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 984 में से

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पृष्ठ 236

प्रथम तरंग
१५१

एक जाति रूप में जीवित जागृत प्राणी माना गया
है । पुराण इसका स्पष्ट निर्देश करते हैं ।
वह एक जाति थी । किन्तु अशिक्षित थी । नाग
तथा पिशाच जाति से गये गुजरे थे । उनका कोई
साहित्य तथा इतिहास नहीं मिलता । केवल पुराणों
के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता
है ।
पुराणों के अनुसार भूत प्राचीन भारतीय मानव
जातियों में एक जाति थी । पुराण मानव जाति के
चार वर्ग करते हैं : (१) धर्म प्रजा (२) ईश्वर प्रजा
(३) काश्यपीय प्रजा तथा (४) पुलह प्रजा ।
धर्म प्रजा की उत्पत्ति धर्म ऋषि से हुई थी ।
ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति ईश्वर से हुई थी । काश्यपी
प्रजा की उत्पत्ति काश्यप ऋषि में हुई थी । पुलह
प्रजा की उत्पत्ति पुलह ऋषि से हुई थी । भूत योनि
प्राप्त प्राणियों की पुलह प्रजा में गणना होती है ।
(ब्रह्माण्ड पुराण १·३२·८८, २·३·३-३५ तथा २·७)
पुराणों में भूतों के राजा की संज्ञा रुद्र वैदिक
देवता है । रुद्र को भूतनायक तथा गणनायक कहा
गया है । भूतों को रुद्र का अनुचर एवं भव परिषद्
कहा गया है ।
रुद्र प्रतीत होता है । कोई एक व्यक्ति नही
थे । भूतों के राजा की सामूहिक संज्ञा थी । अनेक
स्थानों पर इनके राजा को गणपति भी कहा गया
है । यह गणपति आर्य कालीन गण राज्य के अध्यक्ष
एवं सभापति से भिन्न थे ।
उनमें जो सबसे शक्तिशाली किंवा बलवान
व्यक्ति होता था वह राजा निर्वाचित किया जाता
था । उसका नाम रुद्र रखा जाता था । पुराणों में
इस प्रकार के दो रुद्रों का उल्लेख मिलता है ।
वीरभद्र सिंहमुख नामक भूतगणों का प्रमुख था ।
(वामन पुराण : ४:१७) दूसरे रुद्र का नाम
नन्दिकेश्वर था । शैलादि नायक भूत गणों का
नेता था । (मत्स्य पुराण : १८१:२)
वामन पुराण भूतगणों की जनसंख्या ग्यारह
करोड़ देता है । उनमें स्पंद, शास्त्र एवं भैरवादि
प्रमुख थे । इसी पुराण में भूतों के रूप एवं अस्त्रों
का विस्तृत वर्णन किया गया है ।
उक्त पुराण में भूतों की आकृति का भी वर्णन
किया गया है । जिस प्रकार किन्नरों को 'अश्वमुख'
कहा गया है । उसी प्रकार भूतों को 'वानरास्य'
एवं 'मृगेन्द्र वदन' कहा गया है । भस्म, खट्वांग
आदि उनके आयुध थे । इनकी ध्वजा पर किसी
पशु या पक्षी की आकृति बनी रहती है । प्रत्येक
गण ध्वजा के नाम पर 'मयूरध्वज' आदि नाम
से सम्बोधित किया जाता था । (वामन पुराण :
६७:१-२३)
भूतों को ऊर्ध्वरेतस् कहा गया है । अर्थात्
वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । उनमें विवाह
पद्धति मालूम नही पड़ती । किन्तु रुद्राणी आदि
कतिपय भूत स्त्रियों का उल्लेख मिलता है । इनका
वर्णन मार्कण्डेय, वामन पुराणों तथा देवी माहात्म्य
में मिलता है । इनके आकृति का जो वर्णन किया
गया है वह आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के जंगली
जातियों से मिलता है ।
बौद्ध ग्रन्थों में भूत-प्रेत शब्द आता है । प्रेत
को वे एक योनि मानते हैं । परन्तु भूत को दिवंगत
व्यक्ति की आत्मा किंवा शरीर विहीन प्राणी नही
मानते । 'भूत गाम' शब्द का प्रयोग किया गया है ।
वृक्षों आदि को काटने तथा गिराने पर प्रायश्चित्त
करने का विधान है उसे 'भूत गाम' की संज्ञा दी
गयी है । भूत से प्रेत अलग माने गये हैं। प्रेतों को
पेच्च किंवा पेत आस अर्थात् प्रेत कहते हैं । प्रेत
वत्थु तथा बम्हजाल सुत्त में इस प्रकार का उल्लेख
मिलता है ।
मैं समझता हूँ । कश्मीर में नाग तथा पिशाचों
के पूर्व भूत जाति पर्वतीय क्षेत्रों में रहती थी । वह
पूरे आदिवासी थे । भारत तथा कश्मीर के सबसे
प्राचीन मानव असभ्य असंस्कृत प्राणी थे । एक समय