राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग
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१५ मील पर डाला था। आज से १०० वर्ष हो
गये। उस समय वेगथ का मार्ग इतना संकीर्ण था
कि यात्रा कठिनता से हो सकती थी। मार्ग में चीड़
तथा फर के इतने वृक्ष थे कि उन्हें काट कर श्री
कोल यहाँ तक पहुँच सके थे।
ज्येष्ठेश्वर तथा भूतेश्वर के मन्दिरों के मध्य
लगभग २०० गज का अन्तर है। ज्येष्ठेश्वर मन्दिर
के पृष्ठ भाग में सर्व प्रथम आयताकार एक चबूतरा
१०० फीट लम्बा तथा ६७ फीट चौड़ा मिलता है।
उसके पश्चात् भूतेश मन्दिर का ध्वंसावशेष
पड़ता है।
वेगथ की ओर से पहुँचने पर प्रथम ध्वंसावशेष
ज्येष्ठेश्वर किंवा राजदेन बल समूह का मन्दिर पड़ता
है। इसका मुख्य मन्दिर श्री कोल के समय आज ही
जैसा खड़ा था। उसका प्राकार १७६ फीट लम्बा
उत्तर-दक्षिण तथा १३० फीट चौड़ा पूरब-पश्चिम
है। प्राकार की नींव का आकार आज भी अक्षुण्ण है।
यद्यपि पत्थर लोग उठा ले गये हैं। नींव के पत्थर
शेष रह गये हैं। उनसे प्राकार के आकार का
अनुमान होता है।
ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर २४ वर्ग फीट में है।
इसका बहिर्वेदान चारों तरफ ३ x १५ फीट ६ इंच
है। मन्दिर चौकोर है। मन्दिर के पूरब तथा
पश्चिम दोनों ओर आमने सामने दो द्वार हैं। द्वार
अलंकृत हैं। उनमें देवी तथा देवताओं के चित्र
खोदे गये थे। इस समय उन मूर्तियों की एक प्रकार
से छाया मात्र ही रह गयी हैं।
मन्दिर के दक्षिण तथा उत्तर की दिवालें बन्द
हैं। बन्द दीवारों के बाहरी तरफ बड़े गवाक्ष बने
हैं। उनमें पूर्व काल में मूर्तियाँ स्थापित थीं।
नागबल अर्थात् भूतेश्वर मन्दिर की अपेक्षा ज्येष्ठेश्वर
का मन्दिर अधिक अच्छी हालत में है। इसकी छत
शिखर सुरक्षित है। वह मन्दिर की रचना तथा
तत्कालीन स्थापत्य पर प्रकाश डालता है। छत
तथा शिखर पत्रकी बनी है। मन्दिर के प्रांगण में
पड़े शिलाखण्डों का रूप काल प्रभाव के कारण कुछ
विकृत हो गया है। कहना कठिन है। शिला स्तम्भ
गोले थे, अठपहले थे अथवा चौपहले थे। स्तम्भों
के अधिष्ठान यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं।
कर्नल कोल ने इस मन्दिर का प्लान पृष्ठ ७:६८
तथा मन्दिर का चित्र ८:६८ तथा ९:६८ पृष्ठों पर
दिया है। उसमें ज्येष्ठेश्वर मन्दिर को लेकर ६
मन्दिर प्रदर्शित किये गये हैं। पुस्तक के चित्र देखने
से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मन्दिरों पर वृक्षादि जम
गये थे। उनकी रक्षा तथा मरम्मत का भी प्रबन्ध
नहीं किया गया। मुद्रित चित्र देखने से मन में भय
का संचार होता है। मन्दिर वास्तव में भूतों का
निवास होगा धारणा अनायास उत्पन्न हो जाती है।
प्रांगण में घास, झाड़ियाँ तथा पेड़ लग गये हैं।
वह एक उपेक्षित वन का रूप प्रकट करता है।
सब कुछ बिखरा, अस्त-व्यस्त, टूटा-फूटा तथा भयंकर
रूप से उपेक्षित तथा विघटित है।
जिस समय मैं दूसरी बार पहुँचा तो घास-पात
वृक्षादि साफ कर दिये गये थे। बड़े मन्दिर का
उपयोग गूजर वर्षा तथा तुषारपात से रक्षा निमित्त
करते हैं। उनमें अपने पशु बाँधते हैं। मन्दिर की
मूर्ति जहाँ थी वहाँ गोबर तथा कीचड़ सड़ रहा
था। मन्दिर में किसी प्रकार की मूर्ति तथा अधिष्ठान
नहीं है। जिस समय यह मन्दिर नष्ट किया गया
होगा, उस समय लिंग किंवा मूर्ति कंकणी नदी में
या तो टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दी गयी होगी।
कर्नल कोल ने ६ मन्दिरों का उल्लेख किया
है। परन्तु मैंने यहाँ पर छोटे-बड़े मिलाकर ११
मन्दिरों का आकार देखा। श्री कोल का प्लान अधूरा
है। तत्कालीन समय में पेड़ों की झुरमुट और सघन
झाड़ियों के कारण, श्री कोल को सबका पता नहीं
लग सका था। बड़े मन्दिरों को ही वे लक्ष्य कर
सके थे।
ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की उत्तर दिशा में ६ मन्दिर
हैं। दक्षिण दिशा में एक भी मन्दिर नहीं है। उत्तर