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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 984 में से

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पृष्ठ 241

१५६ राजतरंगिणी
तरफ मन्दिर की नीव से प्रांगण ९२ फीट है। किन्तु
दक्षिण तरफ केवल ३५ फीट है। कोई भी मन्दिर
इस प्रकार अपने मूल रूप में जब कि भारतीय
स्थापत्य, वास्तु तथा मूर्तिकला इतनी विकसित हो
चुकी थी, त्रुटि नही उपस्थित कर सकता। कश्मीर
के प्रायः सब मन्दिर प्रांगण की मध्य रेखा पर ही
मिलेंगे। भूतेश्वर का मन्दिर भी ऐसा ही है।
परन्तु ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर उत्तर-दक्षिण के प्रांगण
खण्ड के मध्य मे नही है। अतएव निश्चय ही दक्षिण
मन्दिर का भाग कंकणी नदी के गर्त मे चला
गया है।
मेरा निश्चित मत है। दक्षिण का भाग कंकणी
नदी मे गिर कर नष्ट हो गया है। ज्येष्ठेश्वर के
उत्तर दिशावर्ती लघु मन्दिर किसी सिधायी मे नही
बने हैं। अतएव मुख्य मन्दिर के निर्माण के पश्चात्
समय-समय पर काश्मीर के राजाओं ने यहाँ मन्दिर
निर्माण कराया था। यह प्रथा प्रायः समस्त भारत में
आज भी प्रचलित है। लोग विशाल मन्दिरों के प्रांगण
में अपने नामो से लघु मन्दिरो का निर्माण कर उसमें
मूर्तियो किंवा लिंगो की प्रतिष्ठा करते हैं।
जनरल श्री कनिंघम के मतानुसार इस मन्दिर
का निर्माण ईसापूर्व २५० वर्ष मे हुआ होगा।
कर्नल कोल इसका निर्माण काल सन् ईसवी का
हो आरम्भिक काल मानते हैं।
ज्येष्ठेश्वर ने मन्दिर के पृष्ठ भाग में तथा
विश्राम अथवा पाठ, किंवा कथा स्थान या वर्तमान
लम्बे चौड़े चबूतरे के ध्वंसावशेष के मध्य मुझे
ने दो ढूंढे तुल्य स्थान मिले। उनमे लम्बे-चौड़े विशाल
भाग शिलाखण्ड लगे हैं। ये भी मन्दिर ही रहे होंगे।
आट का वर्णन किसी अन्य पर्यटक तथा यात्री ने नही
के आ या है।
निरापद वहाँ ध्वंसावशेष होने का सरल अर्थ है। मन्दिर
गये हैं। वे टूटे। उनके मलवा का ढूढ़ा बना जो अब
सन् १८ पात से ढका पड़ा है। यह धारणा मेरी
कोल ने (सुपुर् दृढ़ हो गयी कि वहाँ पर अलंकृत
उत्तर पश्चिम १. णी मन्दिरो में लगाये जाते थे। बिखरे
पड़े थे। वे इस मन्दिर के ही रहे होंगे अन्यथा यहाँ
पर उनके अस्तित्व का कोई अर्थ मालूम नहीं होता।
इस मन्दिर तथा भूतेश्वर के मध्य उक्त चबूतरा
है। यह पूजा पाठ करने तथा विश्राम निमित्त
बरामदा किंवा अलिन्द था। मण्डप शिला स्तम्भों की
अवलियो पर निर्मित था। दोनों मन्दिरों के मध्य
में होने के कारण दोनों मन्दिरो के उपासक, पुजारी
तथा भक्त उससे लाभ उठा सकते थे।
कर्नल कोल को यहाँ बहुत नकाशीदार किंवा
अलंकृत स्तम्भ मिले थे। स्तम्भों के अधिष्ठाने भी अपने
स्थानों पर मिले थे। मुझे इस समय दो चार स्तम्भ
तथा दो ही चार अधिष्ठान मिल सके। उनका व्यास
दो फीट था। शेष गायब थे। इससे २० फीट पूर्व
भूतेश्वर के मन्दिर का प्राकार है।
नागबल किंवा पूर्वीय या द्वितीय मन्दिर समूह
का नाम भूतेश किंवा भूतेश्वर मन्दिर समूह दिया
गया है। इसके प्रांगण का पता दिवाल पर
स्तम्भावली के अधिष्ठान के चिन्हों द्वारा लगाया जा
सकता है। यह १५५ फीट वर्गाकार है। इसका
कोई भाग कंकणी नदी की धारा में ध्वस्त होकर
नही गिरा है। चहार दिवारो का आकार तथा उनकी
नीव मे लगे पत्थर वर्तमान हैं।
मेजर कोल ने मन्दिर के प्रांगण में भूतेश्वर के
विशाल मन्दिर को लेकर केवल सात मन्दिरों की
गणना की है। उन्होंने अपने प्लान में पृष्ठ ६:६६
पर इसे प्रदर्शित किया है। उसमें मन्दिर की उत्तर
दिशा में मन्दिर के मुख्य द्वार के समीप रखी टंकी
किंवा एक ही पत्थर में खोदा हौज है। यह वास्तव
में एक ही पत्थर की आश्चर्यजनक रचना है। यह
२२ फीट लम्बा तथा ७ फीट चौड़ा है। लगभग
इतना ही मोटा है। मानव बुद्धि इस विशालकाय
शिला मे खुदी टंकी को देखकर चकित हो जाती है।
इस दुर्गम स्थान में इतना विशाल शिलाखण्ड किस
प्रकार उठा कर लाया गया होगा सरल मानव बुद्धि
में कौतूहल उत्पन्न करता है।