राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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आया । नाग जाति ने उन्हें उद्वासित किया होगा ।
भूतों के नागो का यज्ञोपवीत पहनने का दो अर्थ
हो सकता है। एक तो मुण्डमाला के समान नागों
की हत्या का प्रतीक होगा दूसरा नागों से उनमें
किसी प्रकार सन्धि हो गयी थी । प्रतीक स्वरूप
हृदय स्थान पर यज्ञोपवीत धारण करते थे । शंकर
किंवा रुद्र दोनों का अधिपति होकर भूतेश तथा
नागेश हो गये । भूतगण नागगण उनके गण
बन गये ।
भूत शब्द शायद इसलिये प्रयोग किया गया कि
ये भूत की एक जाति थे। उनका मिश्रण पिशाच,
नाग तथा आर्यों में हो गया अतएव उनका जाति
का चाहे जो भी नाम रहा हो उसकी संज्ञा भूत की
रख दी गयी । अर्थात् वह जाति जो भूत काल में
थी । आजकल आदिवासियों में अनेक जाति तथा
भाषा-भाषियों तथा धर्मावलम्बियों का बोध होता
है । वास्तव में आदिवासी किस अनुसूचित कोई
एक वर्ग नहीं है । इसी प्रकार भूत शब्द वर्ग तथा
समष्टि वाचक है ; उससे एक वर्ग का बोध होता
है । उसमें कितनी ही जातियाँ तथा उपजातियाँ
क्यों न रही हों । नाग जाति के लोप हो जाने पर
भी जैसे नागेश्वर, पिशाच जाति के लुप्त होने पर
पिशाचमोचन तथा पिशाचेश्वर है। उसी प्रकार
भूत जाति के लुप्त हो जाने पर भी भूतेश्वर उस
लुप्त जाति का एक प्रतीक है ।
प्रचलित किवदन्ती के अनुसार व्यक्ति मरने
के पश्चात् भूत हो जाता है । शरीर विहीन प्राण
अन्तरिक्ष में विहार करता है । शिव संहारक देवता
हैं । इस शरीर के संहार के पश्चात् काया हीन
प्राण शेष रह जाता है । वह भूत है । उसके देवता
जिसके कारण शरीरस्थ प्राण अशरीरस्थ हो जाता है ।
भूत के नेता भूतेश हो जाते है। भूतेश्वर की पूजा
का प्रचलित रूप यही है । वह भूतो के देवता है ।
शिव के नाना रूपो मे यह भी एक रूप है ।
केवल हिन्दू धर्म की गाथाओ में प्रेतादि का
वर्णन नही परन्तु बौद्ध ग्रन्थों मे भी खूब वर्णन
मिलता है । बौद्ध पुनर्जन्म मानते है । कर्म के अनुसार
मनुष्य जन्म लेता है । मुगलिम कथानकों मे भी जिनों
का वर्णन मिलता है ।
भूतेश : कश्मीर में प्राचीन काल से शिव
भूतेश की पूजा प्रचलित है । उसने कश्मीर के
सामाजिक, राजनैतिक एवं ऐतिहासिक जीवन को
प्रभावित किया है ।
हिन्दू शास्त्रों में द्वादश ज्योतिलिगों और उनके
साथ उपलिंगों का उल्लेख मिलता है । भूतेश एक
ज्योतिरुपलिंग है। द्वादश ज्योतिलिंग (१) सोमेश्वर,
(२) मल्लिकार्जुन, (३) महाकालेश्वर (४)
ओंकारेश्वर (५) केदारेश्वर (६) भीम शंकर (७)
काशी विश्वनाथ (८) त्र्यम्बकेश्वर (९) वैद्यनाथ
(१०) नागेश्वर (११) रामेश्वर तथा (१२)
घुश्मेश्वर हैं ।
केदारेश्वर के उपलिंग भूतेश हैं । उनका स्थान
यमुना तट है यथा—'केदारेदारवमद्भूतं भूतेशं यमुना-
तटे ।' भूतेश ज्योतिलिंग नागेश्वर के भी उपलिंग
हैं । यह झिल्लिका सरस्वती तट पर स्थित है ।
झिल्लिकासारस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम्—'
भारतवर्ष में बावन शक्तिपीठ हैं । उनमें
शक्ति पीठ 'त्रिसन्ध्या' कश्मीर मे है । यहाँ पर देवी
सती का अंग कंठ गिरा था। देवी का यहाँ नाम
महामाया पड़ा था। कहा गया है। भैरवी त्रिसन्ध्येश्वर
है। इसी प्रकार देवी सती का केशजाल वृन्दावन
में गिरा था । देवी का नाम उमा तथा भैरव का
नाम भूतेश है ।
कंकणी नदी का संकीर्ण गर्त शैल वाह
के दक्षिण दिशा में प्रवाहित है । कंकणी के तट
पर वह वेगथ ( वसिष्ठाश्रम ) ग्राम से तीन मील
ऊर्ध्व दिशा मे भूतेश है । वहाँ पर सत्तरह मन्दिरो के
भग्नावशेष मिलेंगे । इनका उल्लेख बिशप कोवी ने
सन् १८६६ मे अपनी पुस्तक के पृष्ठ १०१ तथा
मेजर कोल ने एनसिएण्ट बिल्डिंग इन कश्मीर पृष्ठ
११ पर किया है ।