राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग १३९
पर इसका निर्धारण किया है। क्योकि जलौक ने ज्येष्ठ
रुद्र देवस्थान की स्थापना श्रीनगरो में की थी।
इस देवस्थान को शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर
से सम्बन्धित करते हैं। पर्वत मूल में दक्षिण-पूर्व
२ मील दूर पर पाण्डेरेन्यन है। किन्तु प्रोफेसर
बुहलर ने इस मत को ठीक नहीं माना है। वर्णनों
से प्रतीत होता है कि जलौक का मन्दिर या तो
पर्वत पर था अथवा उसके समीप कहीं आसपास
होना चाहिए ।
पुराधिष्ठान शब्द का अर्थ पुरानी राजधानी है।
सोदर जलस्रोत समीप होने ( रा० त० १:१२४ )
के कारण इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है।
योग वासिष्ठ में राजा यशस्कर के सन्दर्भ में अधिष्ठान
नगर का उल्लेख किया गया है। वास्तव में नगर
का नाम अधिष्ठान था। नगर प्राचीन होने पर
उसमे पुरा अर्थात् प्राचीन शब्द विशेषण की तरह
जोड़ दिया गया था। यह नगर राजा यशस्कर के
समय तक समृद्धशाली था। योग वासिष्ठ मे कहा
गया है कि वृक्षों तथा पर्वतों से सुशोभित पुराधिष्ठान
कश्मीर के मध्य में स्थित है। यह वर्णन आज की
परिस्थितियों में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ महावंश
में उल्लेख आता है। उत्कल जनपद के अधिष्ठान
नगर के तपस्सु और मल्लिक व्यापारी थे। भगवान्
को बुद्धत्व प्राप्त होने के पश्चात् उरुवेला में
राजायतन वृक्ष के नीचे प्रथम बार भोजन उन लोगों
ने दिया था। उक्त नगर कश्मीर में नही उड़ीसा
में था ।
गुप्त काल में छोटे राज्यो की राजधानियो को
अधिष्ठान कहा जाता था। उड़ीसा में अधिष्ठान
नामक एक आबादी है।
नवीन राजधानी प्रवरसेनपुर है। प्रवरसेन
द्वितीय ने उसका निर्माण कराया था। वह वर्तमान
श्रीनगर है। उसे प्रवरपुर कहा गया है। श्रीनगर
का नपुंसक लिंग में कल्हण ने सब स्थानो पर वर्णन
किया है। वह केवल इस स्थान पर उसका स्त्री
रूप में प्रयोग किया है।
हैदर मल्लिक तथा मुहम्मद अजीम आदि
इतिहास लेखक अशोक-द्वारा निर्मित राजधानी
को लिदर नदी के वाम तटपर 'शीर' स्थान को बताते
हैं जो खादरयार परगना में है। प्रोफेसर बुहलर
ने एक स्थान पर कहा है कि कुछ काश्मीरी पण्डितों
का मत है कि यह नगर इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त
नाग के समीप था ।
पण्डरेथन में खनन कार्य किया गया है। जिस
सरोवर में पण्डरेथन का मन्दिर निर्माण किया गया
था उसका जल निकाल कर उसके नींव तक खनन
कार्य किया गया था। मन्दिर १८ वर्ग फीट क्षेत्रफल
में स्थित है। मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा
पार्थ ने सन् ९२१ ई० में कराया था।
जहाँगीर अपनी आत्मकथा में लिखता है :
'नगर का नाम श्रीनगर है। झेलम नदी इसके
बीच से बहती है। इसका उद्गम वैरनाग कहलाता
है। जो चौदह कोस दक्षिण है। हमारी आज्ञा से
सोते के पास एक इमारत तथा बाग बनवाया गया
है। नगर में पत्थर तथा लकड़ी के बड़े मजबूत
चार पुल बने हुए हैं। जिनसे लोग आते जाते हैं।
इस देश की भाषा मे पुल को कदल कहते हैं।
नगर में एक बड़ी ऊँची मसजिद है। जो सुलतान
सिकन्दर के चिह्न स्वरूप वर्तमान है। और हिजरी
सन् ७९५ ई० में बनी थी। कुछ दिनों के बाद यह जल
गयी। और तब पुनः सुलतान हुसेन ने इसे बनवाया।
यह पूरी नहीं हुई थी कि उसके जीवन का प्रासाद
ढह गया। सन् ९०९ हिजरी के सुलतान के वजीर
इब्राहीम माकरी ने इसे सुंदरता के साथ पूर्ण किया।
उस समय से अब तक १२० साल से यह बनी हुई
है। मेहराब से पूर्वी दिवाल तक एक सौ पैंतालीस
गज है और चौड़ाई एक सौ चौवालीस गज है।
इसमें चार ताक हैं और चारों ओर दालान तथा
खंभे हैं। संक्षेप में कश्मीर के शासकों का इससे
अच्छा स्मारक और कोई नहीं है। मीर सैय्यद
१४० राजतरंगिणी
हमदानो कुछ दिन इस नगर में रहा था। इसका
स्मारक यहाँ एक खानकाह है। नगर के पास
दो झीलें हैं जो वर्ष भर जल से भरी रहती हैं।
इनके जल का स्वाद कभी बिगड़ता नहीं।
मनुष्यों के आने जाने और अन्न ईधन आदि
लाने के लिए नावें काम में आती हैं। नगर तथा
परगनो में सत्तावन सो नावें तथा चौहत्तर सो
नाविक हैं। कश्मीर प्रान्त में अड़तालीस परगने हैं।
यह दो भागों में विभक्त हैं। और नदी के ऊपरी भाग
को बमराज कहते हैं। यहाँ भूमि का कर या व्यापार
के लेन-देन में सोना चाँदी देने की प्रथा नहीं है।
केवल कुछ सायर कर में दिया जाता है। ये वस्तुओं
का मूल्य चावल के खरवारों से करते हैं और हर
खरवार तीन मन आठ सेर वर्तमान तोल से होता है।
कश्मीरियों में २ सेर का एक मन होता है और
चार मन अर्थात् आठ सेर का एक तर्क होता है।
कश्मीर की आय तीस लाख तिरसठ हजार
पचास खरवार ग्यारह तर्क है। यह
नगदी में सात करोड़ छियालीस लाख सत्तर
सहस्र दाम होता है। साधारणतः यहाँ आठ सहस्र
सवार रहते हैं।' (पृष्ठ ६५३)
बरनीयर लिखता है—'कश्मीर प्रदेश तथा
उसकी राजधानी दोनों का नाम कश्मीर है।'
मुसलिम काल में श्रीनगर का नाम छोड़कर श्रीनगर
को कश्मीर कहने लगे थे। सिक्खों ने सन् १८६१
ई० में जब कश्मीर विजय किया तो उन्होंने पुराना
नाम श्रीनगर कश्मीर की राजधानी का पुनः प्रचलित
किया। बरनीयर तथा उन्नीसवीं शताब्दी तक
मुसलमान लोग श्रीनगर को 'कश्मीर' या 'कशूर'
कहा करते थे।
बरनीयर श्रीनगर का वर्णन करता है—'नगर
के चारों ओर चहार दिवारी नहीं है। यह तीन
चौथाई लीग लम्बा तथा आधा लीग चौड़ा शहर है।
यह मैदान के अर्ध चन्द्राकार पर्वत से २ लीग दूर पर
बसा है। ताजे पानी वाले लेक के तटपर बसा है। यह
सरोवर ४ से ५ लीग होगा। इस लेक मे बहुत से चलते
निर्भर हैं। तथा पर्वत से स्रोतस्विनीयाँ आकर मिलती
हैं। यह वितस्ता में एक नहर द्वारा मिलती है।
उसमें नावें आगो जाती हैं। नदी नगर के बीच में
बहती है। नदी में ७ तरडो के पुल (झेलम या
वितस्ता) पर बाँधे गये हैं। नगर के मकान अधिकतर
दो तथा तिमजले लकड़ी के बने हैं। कुछ पुरानी
इमारतें तथा प्राय. पत्थरों के बने मन्दिर टूटे पड़े
हैं। पत्थर की अपेक्षा लकड़ी सस्ती होती है। उसे
नदियों द्वारा पहाड़ से लाते हैं। नदी के प्रायः सभी
किनारों के मकानों के साथ वाटिकाएँ हैं अर्थात्
नगर में वाटिका गृहों की अधिकता है। ये गर्मी तथा
वसन्त ऋतु में बहुत ही रुचिकर लगते हैं। नगर
के भीतरी भाग के बहुत मकानों में वाटिकाएं हैं।
अनेक मकानों के के समीप महरे हैं। जहाँ मकान
मालिक अपनी नावें रखते हैं। उनमें वे सम्पर्क
स्थापित करते हैं।
'नगर के समीप एक अकेला पहाड़ है। उसके
ढाल पर बड़े ही सुन्दर मकान बने हैं। मकानों में
बगीचा है। चोटी पर मसजिद तथा आश्रम हैं।
दोनों ही अच्छी इमारतें हैं। पर्वत की चोटी पर
हरित पादपों के मुकुट हैं। अपने वृक्षों तथा बागों के
कारण स्थानीय लोग उसे 'हरीपर्वत' कहते हैं।
'हरीपर्वत' के दूसरी तरफ एक और पर्वत है।
उसपर एक छोटी मसजिद है। उसमें वाटिका हैं।
वहाँ पर एक बहुत ही पुरानी इमारत है। उसके
चिन्हों के देखने से स्पष्ट मालूम होता है। वह मन्दिर
था। यद्यपि उसे तख्ते सुलेमान कहते हैं। मुसलमान
कहते हैं। राजा सुलेमान जब कश्मीर में आए थे तो
उन्होंने इसे बनवाया था। परन्तु मुझे सन्देह है।
कभी हजरत सुलेमान का यहाँ प्रवेश हुआ था।
'दल लेक द्वीपो से भरी है। वे आरामगाह हैं।
जल के बीच में वे बहुत ही हरे भरे और सुन्दर
लगते हैं। उनमें फलदार वृक्ष तथा नियमित झफ्री-
दार भ्रमण मार्ग से पूर्ण हैं। दो-दो फिट की दूरी
पर लगाए गये हैं, यह वृक्ष इतने कम मोटे हैं कि
दोनों हाथों के बीच में आ जाते हैं। किन्तु वे जहाज के
मस्तूल इतने ऊंचे है। केवल शिरोभाग पर ताड़
के वृक्ष की तरह उनमें शाखों का गुच्छा
होता है।
'लेक के तटवर्ती पर्वतों के ढालों पर मकानो
तथा फूलों के बागों की भरमार है। हवा स्वास्थ्यकर
है। इनका जलवायु बहुत ही अच्छा है।
उनमें झरने तथा स्रोतस्विनियां खूब हैं। वहाँ से
लेक, द्वीप तथा नगर का बहुत ही हृदयग्राही दृश्य
मिलता है।'
शालीमार बाग का बर्नियर ने ऐसा ही वर्णन
किया है जैसा आज भी वह मौजूद है। केवल इतना
और कहता है, 'शाहजहाँ द्वारा तोड़े गये मन्दिरों के
खम्बो तथा द्वारों से नहरों के मध्य में ग्रीष्म भवन
बनाया गया है। उनका मूल्यांकन करना
कठिन है।'
केप्टन नाइट (१८६०) श्रीनगर के विषय में
लिखता है 'पूरे शहर में कोई भी प्राचीन निर्माणों
के ध्वंसावशेषों को देख सकता है। वे विशाल
शिलालेखों में अलंकृत मिलेंगे। ये लेख सब यहाँ लिखे
मिलेंगे जो गौरवशाली प्राचीन काल की दुःखभरी
कहानी कहते है। नदी के दोनों तटोंपर लकड़ियों के
दर्शनीय मकानो की पंक्तियां मिलेगी।........बहुत से
मकान मुझे मिलें। वे अपनी नींव की ओर जैसे
'पिसा के लीनिंग टावर' को भी लज्जित करते झाँक
रहे हैं।........मकान छह मंजिलों तक ऊँचे है। इनकी
खिडकियां लकड़ी के नक्काशी के कामो से सुन्दर बनी
रहती हैं।
'पूर्व के वेनिस सदृश इस शहर की नदी में सैर
करते हुए मैंने देखा कि नदी के तटपर बने भवनो
की दीवारों में बहुत से अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे।
हम घूमते हुए एक मुसलिम कब्रिस्तान में पहुँचे। यहाँ
एक गिरी मसजिद थी। उसमें बहुत से पुराने
मन्दिरों के अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे। वे प्राचीन
मालूम होते थे। उन्होंने अपना जीवन इस मुसलिम
भूमि से कही और प्रारम्भ किया था।'
पण्डरेथन का मन्दिर सुन्दर है। में जिस
समय यहाँ अपनी यात्रा में चौथी बार १३-९-१९६२
ई० में पहुँचा तो मन्दिर का द्वार वितस्ता जल के
बाढ के कारण डूबने में केवल एक फीट ओर
बाकी रह गया था। वितस्ता में बाढ आई थी।
श्रीनगर अनन्त नाग तथा श्रीनगर-पठानकोट की
सड़कों की सतह तक पानी की धारा बह रही थी।
श्रीनगर पामपुर वाली सडक पर बाँध बँधने के
कारण जल नहीं आ सका था। पंडरेथन का कुछ
ऐसा विशद वर्णन लेखको ने किया है कि मैने
समझा था कोई बहुत बड़ा मन्दिर होगा। ध्वंसा-
वशेष तथा स्मारक अत्यधिक होंगे परन्तु यहाँ
जितनी बार आया निराशा हुई। कश्मीर में जल
प्लावन तथा वितस्ता के बाढ़ तथा उसके कारण
हुए विनाश का बहुत वर्णन किया गया है। अतएव
इस भयंकर बाढ के समय अपनी आँखों से कुछ
देख लेने के मोह के कारण यात्रा की थी।
इस समय यहाँ भारतीय सेना की छावनी पडी
है। मन्दिर के पृष्ठभाग में पाकिस्तानी आक्रमण
काल के समय वीरता प्रदर्शित करने के कारण मेजर
शोभनाथ शर्मा, कमायूँ रेजिमेण्ट का स्मारक बना
है। मन्दिर के दक्षिण मुख्य सड़क तक एक छोटा
उद्यान बनाया गया है। चिनार का पेड़ लगा है।
यहाँ पहले विलो अर्थात् बेंत के वृक्ष बहुत थे। परन्तु
उनकी संख्या कम हो गयी है।
मन्दिर का सरोवर ४० वर्ग गज होगा। मन्दिर
१८ वर्ग फीट में है। सरोवर के पूर्व तरफ २ छोटे
जलस्रोत हैं। उनका जल सरोवर में निरन्तर आता
रहता है। सरोवर का जल झेलम नदी में एक गहरी
नहर द्वारा निकल जाता है। झेलम मन्दिर से केवल
२०० फीट दूर बहती है।
मन्दिर कश्मीर के अन्य मन्दिरो तुल्य कश्मीर
शैली पर बना है। मन्दिर का कलश गायब है या
'१४२ राजतरंगिणी
टूट कर गिर गया है। आमलक शेष है। मन्दिर
सिकन्दर बुतशिकन द्वारा पूर्णतया नष्ट न किये जाने
का कारण यह मालूम होता है कि मन्दिर सरोवर
के मध्य में है। मन्दिर का आधार भूमि की सतह से
नीचा है। मन्दिर तोडने की अपेक्षा सरोवर को
मिट्टी से पाट देने पर सरोवर तथा मन्दिर दोनों
का अस्तित्व लोप हो जाता है। सम्भव है यही यहाँ
किया गया होगा। अन्यथा सिकन्दर बुतशिकन के
छापों के सम्मुख बचा रह जाना अनहोनी बात है।
अथवा मिट्टी से सरोवर भर गया होगा। मन्दिर
दृष्टिगत नही हो सका होगा। मैने स्वयं देखा कि
वितस्ता के बाढ के कारण सरोवर पूरा भर गया
था। जल में मन्दिर की पूरी भीत डूब गयी थी।
मन्दिर उपेक्षित पडा था। उसमे वितस्ता जल से
लाई मिट्टी जो शताब्दियो तक जमती रही। मन्दिर
सरोवर मे पड़ने के कारण स्वयं आँखों से लोप हो गया
होगा। काशी मे घाटो पर बने मन्दिर बरसात में गंगा
की मिट्टी जमने के कारण भर जाते है !
मन्दिर के द्वार की ऊपरी देहली पर मूर्तियाँ
बनी है। किन्तु ये कुरूप कर दी गयी है। स्थानीय
लोग इस मन्दिर को पंचमुखी महादेव का मन्दिर
कहते है। मन्दिर के भीतर अलंकृत तथा मूर्तिमय
शिलाखण्ड है। यह मेरुवर्धन स्वामी का मन्दिर
कहा जाता है। मेरुवर्धन राजा पार्थ का प्रधान
मन्त्री था।
अशोक द्वारा निर्मित यही प्राचीन श्रीनगर था।
राजा प्रवरसेन द्वितीय (११०-७० ई० पू०) ने
उक्त मन्दिर निर्माण होने के पूर्व प्रवरपुर अर्थात्
वर्तमान श्रीनगर बसाया था। उसे अपनी राजधानी
बनाया था।
पुराधिष्ठानपुर राजा अभिमन्यु द्वितीय (९६०
ई० पू०) के समय आग लगने के कारण भस्म हो
गया था। इतनी भयंकर आग लगी थी कि इस
मन्दिर के अतिरिक्त जो जल के मध्य मे था और जहाँ
आग नहीं पहुँच सकती थी, सब कुछ जल गया।
मन्दिर की उत्तर दिशा में कुछ खनन कार्य
हुआ था। उसमें पुराने मन्दिरो के पत्थर बिखरे
मिले थे। वहाँ एक ६ फीट ऊँचा शिवलिंग तथा
लगभग १६ फीट ऊँचा टूटा लिंग मिला था। इन
दोनो लिंगो के मध्य एक आसीन मूर्ति का पद तथा
पाँव जो ठेहुनी भर ऊँचा था, मिला था। बैरन
हुगेल ने इसे बुद्ध की प्रतिमा का अवशेष माना है।
ह्यूम ने लिखा है कि पाद तथा पैर २० फिट
ऊँची मूर्ति के अवशेष थे। वह बैठी मूर्ति थी।
उस सरोवर मे एक छोटी नाव बँधी रहती थी।
उससे दर्शक स्वयं नाव लेकर मन्दिर तक पहुँच
जाता था। वहाँ बहुत कम लोग आते थे।
सरोवर बडे नरकुल से भरा लगभग ४० वर्ग गज
मे है। पुराधिष्ठान के अन्य मन्दिरो के ध्वंसावशेषों
के कुछ पत्थर समीपस्थ मस्जिद के निर्माण में
लगाये गये हैं।
प्रश्न उपस्थित होता है ! अशोक ने इस स्थान
को अपनी राजधानी के लिए क्यों चुना ? अशोक
ने यह स्थान दो कारणों से राजधानी निमित्त चुना
होगा। प्रथम कारण यह मालूम होता है कि वितस्ता
का जल इस स्थान को डुबा नही सकता। यह
ऊँचा है। पृष्ठभाग मे पर्वतमाला है। पर्वत के ढाल
के पश्चात् पथरीली ऊँची भूमि है। पर्वत कच्चा
नही पक्का है। पत्थर गया जी के पत्थर की तरह
सख्त है। मैने स्वयं देखा सडक बनाने के लिए
गिट्टी पहाड़ तोड़कर बनाई जा रही थी। बाढ़ आने
पर लोग पीछे पर्वत के ढाल पर जाकर अपनी
रक्षा कर सकते थे। पर्वत के खिसकने का—भूभ्रंश
का भय नही था। इस बात का वितस्ता के बाढ़ तथा
अत्यन्त वर्षा के समय यहाँ रहकर मैने अनुभव
कर लिया।
दूसरा कारण यह मालूम होता है कि वर्तमान
पण्डरेथन ग्राम तथा शंकराचार्य पर्वत तक का भूखण्ड
वितस्ता तथा पर्वतमाला के मध्य समतल तथा
उपजाऊ है। विस्तृत भूखंड है। इस स्थान को
बादामो बाग कहते हैं। यहाँ बादाम के बहुत बगीचे
प्रथम तरंग १४३
हैं। बागों की यह श्रृंखला पामपूर तक मिलती चली
जाती है। बनिहाल श्रीनगर मार्ग पर है। आगे जाने
पर पामपुर पड़ता है। केसर की खेती के लिए
प्रसिद्ध है। वहाँ की उपजाऊ भूमि, फलदार वृक्षादि
के कारण इस स्थान का चयन अशोक ने किया
होगा।
इस समय मैदान में भारतीय सैनिक छावनी का
कैम्प गत सन् १९४७ ई० से पड़ा है। सैनिक एवं
सुरक्षा की दृष्टि से स्थान श्रेष्ठ माना जायगा। इसके
दक्षिण-पश्चिम वितस्ता तथा पूर्व ओर ऊँची पर्वत-
मालाएँ हैं। दक्षिण में पाण्डु चक पर वितस्ता तथा
पर्वत के मध्य अत्यन्त संकीर्ण मार्ग है। पश्चिम
हस्तम गढ़ी जिस पर इस समय कश्मीर राजा का
प्रासाद बना है। उस पर्वत तथा वितस्ता के मध्य का
स्थान हवाखातून की मज़ार के समीप का मार्ग
४० फीट संकीर्ण हो जाता है। यहाँ महासरित
वितस्ता पर्वत मूल तक खाई का काम करती है।
इस प्रकार यह स्थान प्राकृतिक सुरक्षा वेष्ठित—एक
ओर वितस्ता तथा तीन ओर पर्वत से घिर जाता
है। यही कारण है कि इस समय भारतीय सेना
यहाँ बड़े पैमाने पर रखी गयी है। उसका पूर्ति तथा
सम्भरण केन्द्र है। डोगरा काल में यहाँ कैण्टोनमेण्ट
था। अर्थात् सेना की छावनी थी। अशोक उत्तर-
पश्चिम भारत में रह चुका था। स्वयं युद्ध विद्या में
निपुण था। एक सैनिक होने के नाते उसने इस
स्थान का सैनिक महत्त्व समझा। अतएव इस स्थान
को राजधानी के लिए चुना।
अफगानिस्तान में जिस प्रकार भगवान् की बड़ी
मूर्ति खण्डित की गयी थी उसी प्रकार इस मूर्ति का
हाथ जो सम्भवतः अभय मुद्रा में था खण्डित कर
दिया गया। बामियान मूर्ति की मुखाकृति ललाट
से नीचे बिल्कुल छील दी गयी है। भगवान् त्रिचीवर
धारण किये हुए हैं। इस मूर्ति पर दृष्टि पड़ते ही मुझे
अपनी आँखों देखी बामियान की दोनों मूर्तियां स्मरण
हो आयीं। मैंने उक्त दोनों बामियान की मूर्तियों का
वर्णन विस्तार से अपनी पुस्तक 'आर्याना' में
किया है।
भगवान् की अभय मुद्रा में एक और मूर्ति है।
मूर्ति भव्य है। अनायास मन पर अभय भावना
स्थापित करती है। बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर की
मूर्ति है। यज्ञोपवीत, धोती, वाम कर में मृणाल
सहित पद्म, तथा दायें कर में माला और मूर्धा
पर केश के ऊपर मुकुट है। इस मूर्ति की मुद्रा मुझे
बहुत अच्छी लगी।
मूर्ति की मुखाकृति बड़ी सरल है। मालूम
पड़ता है मूर्ति जैसे कुछ कहना चाहती है। देखकर
मन अनायास मूर्ति की ओर आकर्षित हो जाता है।
संग्रहालय में यहाँ से प्राप्त गगन में गमनशील
गन्धर्व यक्षादि की भी मूर्तियाँ प्रदर्शित की गयी हैं।
यहाँ से प्राप्त दो और मूर्तियाँ दर्शनीय हैं।
एक की संख्या 'ए' १०४ है। यह लुम्बिनी वन में
भगवान् के जन्म की घटना प्रदर्शित करती है।
देवी महामाया शाल वृक्ष की एक शाखा पकड़े खड़ी
हैं। उनका बायाँ हाथ एक महिला के स्कन्ध पर है।
कहते हैं यह महा प्रजापति गौतमी देवी महामाया की
कनिष्ठ बहन थीं। उनका विवाह उनके पति शुद्धो-
दन के साथ हुआ था। भगवान् के जन्म के सातवें
दिन देवी महामाया दिवंगत हो गयी थीं। अतएव
विमाता प्रजापति गौतमी ने भगवान् बुद्ध का लालन-
पालन किया था। भगवान् के बुद्धत्व प्राप्त होने
पर महाप्रजापति गौतमी ने स्वयं प्रव्रज्या ले ली
और अपने ही पुत्र की शिष्या हुईं। पुत्र को शास्ता
स्वीकार किया। देवी ने प्रव्रज्या के पश्चात् यह
मार्मिक शब्द कहा था—मैं तुम्हारी माता हूँ और
आप मेरे शास्ता हो। किन्तु किसी बुद्ध ग्रन्थ में मुझे
नहीं मिला कि प्रजापति गौतमी देवी महामाया के
देवदह जाते समय साथ थीं। सम्भव है कालान्तर में
इस प्रकार की कहानी प्रचलित हो गयी हो। अथवा
किसी लेखक के ग्रन्थ में इसका उल्लेख किया गया
है। जिसके आधार पर यह मूर्ति बनायी गयी है।
१४४ राजतरंगिणी
मूर्ति के पृष्ठ भाग में एक चामर धारिणी युवती
है। कश्मीर में उस समय महिलाओं की क्या
वेशभूषा थी, किस प्रकार केशविन्यास, शृंगारादि
करती थी इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।
उसका वहाँ वर्णन अप्रासंगिक होगा।
एक विचित्र खण्डित मूर्ति इस संग्रहालय में
और है। मूर्ति का पाद से कटि प्रदेश तक का ही
भाग शेष रह गया है। शेष भाग खण्डित कर दिया
गया है। कही लुप्त हो गया है। यह पुरुष मूर्ति
है। सिंह वाहन है। अर्थात् सिंह पर आसीन है।
उसके पैर के अँगूठे से कटि तक, पादत्राण वस्त्रादि से
विभूषित है। यह मूर्ति किसी कुषाण वंशीय राजा
की हो सकती है। उसने अपनी शक्ति का परिचय
सिंह पर बैठ कर दिया है। सिंहवाहिनी दुर्गा या
देवी की यह मूर्ति नही है। यह किसी सैनिक राज-
पुरुष की मूर्ति है। इसके पद की जो वेशभूषा है
वह पेशावर जिला के ग्रामीण क्षेत्रों के बीसवी
शताब्दी के प्रारम्भ काल तक प्रचलित थी।
पुराधिष्ठान अर्थात् पण्डरेथन का वर्णन तथा
विस्तार के साथ उल्लेख महर्षि वाल्मीकि प्रणीत
'योग वासिष्ठ रामायण' में जैसा मै ऊपर लिख चुका
हूँ मिलता है। राजा यशस्कर के प्रसंग में मैने
इसका वर्णन किया है। योग वासिष्ठ रामायण,
पुराधिष्ठान तथा कश्मीर का सम्बन्ध है या नही।
यह प्रश्न स्वयं एक स्वतंत्र विषय है। इस प्रसंग
के लिये यहाँ इतना ही लिखना पर्याप्त प्रतीत
होता है।
योग वासिष्ठ के वर्णन और पुराधिष्ठान के
भौगोलिक आदि स्थिति का पूरा मेल खाता है।
कुछ विद्वान् कह सकते है कि योग वासिष्ठ का यह
अंश प्रक्षिप्त है। इस विवाद में यहाँ प्रवेश करना
अप्रासंगिक होगा।
पर्वत के ढाल पर लगभग एक मील से अधिक
के क्षेत्र में पुराने खिलौने, मूर्तियाँ आदि बहुत मिली
हैं। वे इस तरह तोड़ी गयी है कि खण्ड मात्र रह
गयी हैं। बादामी बाग के पास बैस्ट तथा अस्पताल
आदि सैनिकोपयोगी स्थान बने है। यहाँ के खनन में
हयग्रीव, वराह, रुद्र, पार्वती, शिव, भैरव, त्रिमूर्ति,
लक्ष्मी की मूर्तियां मिली है। ये इतनी बुरी तरह
तोड़ी गयी है कि उन्हें देखकर दया आती है।
मूर्तियां भव्य, सुन्दर तथा कलापूर्ण हैं। उनकी अपनी
शैली है।
पण्डरेथन का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल
की पुस्तक में छपा है। उसने पण्डरेथन के मन्दिर
तथा कला पर प्रकाश डाला है। मन्दिर उस समय
जिस अवस्था में था उसी अवस्था में आज है। केवल
कुछ मरम्मत कर दी गया है। सैनिक छावनी के
कारण इस स्थान पर कुछ चहल-पहल हो गयी है।
यहाँ की मूर्तियां जिस कठोरता के साथ भग्न की
गयी थी उसका प्रमाण श्रीनगर कला संग्रहालय में
संग्रहीत मूर्तियां है। यहाँ के प्राप्त वस्तुओं से कश्मीर
की तत्कालीन स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।
प्रतापसिंह संग्रहालय में कुछ मूर्तियाँ तथा
मूर्तिखण्ड संग्रहीत हैं। उनमें मूर्ति संख्या १६
गान्धार शैली की है। भगवान् बुद्ध ध्यान मुद्रा में
आसीन हैं। महीन चीवर धारण किये है।
पद्मासीन हैं। मूर्ति का हस्त नासिकादि खण्डित
कर दिया गया है। भगवान् बुद्ध की खड़ी मूर्ति
संख्या ११ मथुरा से प्राप्त भगवान् की प्रसिद्ध मूर्ति
से मिलती है।
कैप्टन सी नाइट (सन् १८६० ई०) के समय
पण्डरेथन में खनन कार्य नही हुआ था। परन्तु उनके
वर्णन से स्पष्ट होता है। वहीं यथेष्ट भग्नावशेष बिखरे
थे। कालान्तर में खनन कार्य यहाँ पर किया गया।
उससे प्रमाणित हो गया कि यह स्थान अत्यन्त प्राचीन
रहा है।
श्री नाइट ने अपनी पुस्तक में मन्दिर का जो
चित्र दिया है उससे प्रकट होता है। मन्दिर इतना
उपेक्षित एवं जीर्णावस्था में था कि शिखर पर एक
प्रथम तरंग १४५
पेड़ जम गया था। मन्दिर के चारों ओर नरकट के
लम्बे-लम्बे पेड़ उगे थे। मन्दिर का मध्य भाग दिवाल
सा लगता था। वह लिखता है—'श्रीनगर से तीन
कोस इधर हम लोग एक विस्तृत दानव सम्बन्धी
भूमि के ध्वंसावशेष पर ठहर गये। यह स्थान
पण्डेरेथन कहा जाता है। यहाँ हमने पूर्णावस्था में
एक इमारत देखी। इस प्रकार की इमारत अब तक
हम लोगों ने नहीं देखी थी। उसके चारों ओर बहुत
दूर तक इस प्रकार के चिह्न मिले जिनसे मालूम
होता था कि प्राचीन काल में यहाँ विशाल नगर
था।'
'अन्य रुचिकर अवशेषों में एक मूर्ति का ठोस
अधिष्ठान देखा। वह एक फसल कटे हुए खेत में
खड़ा था। मूर्ति की ठेहुनी से अधोभाग का शेष रह
गया था। यह शिलाखण्ड सात फिट ऊँचा था।
मूर्ति की उँगलियाँ तथा अँगूठे तोड़ डाले गये थे,
किन्तु पाँव टूटने से बच गये थे।
'यहाँ से आधा मील दूर पर एक विशाल स्तम्भ
की वेदी पड़ी थी। वह कुछ अच्छे स्थान पर थी। इसका
व्यास छहफिट था। इसे यहाँ रखने के लिये भारी
यन्त्र की आवश्यकता पड़ी होगी। कुछ दूर पर हमें
स्तम्भ का भाग मिला। वह तीन भागों में खण्डित
था। वह १२ फिट लम्बा था। उसका अधोभाग
बहु कोणीय था। मध्य भाग गोलाकार था। शिरस्
भाग नोकदार शुण्डाकार था। वह हिन्दुओं के
महादेव के मन्दिर में लगे पत्थर के समान था।
(पृष्ठ १२२)
श्री कनिंघम (सन् १८४८ ई०) पण्डेरेथन के
विषय में लिखते हैं—'इस नाम का अर्थ पुरानी
राजधानी अथवा प्राचीन मुख्य नगर होता है।
विभिन्न यात्रियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इसका
उच्चारण किया है। श्री मूर क्राफ्ट ने इसे 'पण्डेयन'
श्री वाइन ने 'पण्डरेण्टोन' तथा श्री बैरन हुगेल ने
'पण्डरीटन' लिखा है।
१९
'इस मन्दिर की इमारत का उल्लेख सन् ६१३
तथा ९२१ के बीच मिलता है। तत्पश्चात् सन्
९५८ तथा ९७२ के मध्यवर्ती कालों में मिलता है।
उस समय रोमन सम्राट् नीरो तुल्य राजा अभिमन्यु
ने अपनी राजधानी में आग लगवा दी थी। किन्तु
यह मन्दिर नष्ट होने से बच गया था।
'चूंकि यह एकमात्र मन्दिर पुरानी राजधानी
में स्थित है, अतएव इसमें सन्देह नहीं कि यह वही
मन्दिर है जो इस समय वर्तमान है। यह एक
सरोवर के मध्य में स्थित है। चारों ओर जल है।
यही स्थिति उस अग्निदाह के समय में रही होगी।
अतएव अग्निदाह से यह बच गया था। जब कि
अन्य इमारतें जलकर चूना और भस्म मात्र
रह गयीं।
'बैरन हुगेल मन्दिर को बौद्धों का मानते हैं।
कहते हैं। मन्दिर के अन्दर की मूर्तियां सुरक्षित
हैं। किन्तु उनकी यह भ्रान्ति है। मन्दिर विष्णु का
है। भीतर की मूर्तियों का कोई सम्बन्ध बौद्ध धर्म से
नहीं है।
'श्री ट्रिवेक इसके भीतर तैर कर गये। उसे
वहाँ किसी प्रकार की मूर्ति का दर्शन नहीं हुआ
था। उस समय छत तक पानी था अतएव वह
भीतर की मूर्तियां नहीं देख सके थे।
'जल के अन्दर मन्दिर बनाने का यह उद्देश्य
रहा होगा कि उन्हें नागों की संरक्षता में रखा
जाय। नागों के शरीर का ऊर्ध्व भाग मनुष्य तथा
अधोभाग सर्प का होता है। कश्मीर में उनकी पूजा
प्राचीन काल से प्रचलित थी।' जनरल एशियाटिक
सोसाइटी (भाग : १६) श्री डब्लू० वेल फोहड
(सन् १८७९ ई०) ने पण्डेरेथन को 'पण्डरिटन'
लिखा है। वह लिखते हैं—'पण्डरिटन एक समय
अत्यन्त समृद्धिशाली तथा बड़ा नगर था। प्रदेश की
की राजधानी था। कितने दुःख का विषय है। अपने
एक पुराने राजा के पागलपन के कारण यह पत्थरों
का संग्रह मात्र रह गया है।
१४६ राजतरंगिणी
जीर्णं श्रीविजयेशस्य विनिवार्य्य सुधामयम्।
निष्कल्मषेणाश्ममयः प्राकारो येन कारितः ॥१०५॥
१०५ उस निष्कल्मष राजा ने विजयेश्वर १ के पवित्र देव स्थान के जीर्ण हुए चूने आदि
से बने प्राकार के स्थान पर नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया ।
'कहा जाता है। यह नगर एक समय मीलों में
विस्तृत था। उसमें दर्शनीय भवन थे। अशोक ने
एक देवस्थान निर्माण कराया था। उसमें भगवान्
बुद्ध का एक धातु रखा गया था। इस समय उस
पवित्र देव स्थान का पता नहीं है। उस गौरवशाली
प्राचीन काल की स्मृति को जीवित रखने के लिये, इस
एक मन्दिर के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह
गया है। यह मन्दिर सरोवर के मध्य में है। इसके
चारों ओर विलों के उद्यान हैं। अतएव इसके
भीतर क्या है । बहुत लोग इसके अन्दर जाकर देख
नहीं सके हैं। (पृष्ठ २३६)
विजयेश्वर का मन्दिर राजा अनन्तदेव के समय
में भस्म हो गया था। राजा कलश ने उसका
जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ७.५२४) पुराना
आकार अथवा सुधामय सम्भवतः ईंट अथवा पत्थरों
के ढोको का बना था। अशोक ने पत्थरों से उसका
निर्माण कराया था।
नीलमत पुराण में दो स्थानों पर विजयेश का
उल्लेख मिलता है। पहला वर्णन शक्र संशय तथा
दूसरा वितस्ता माहात्म्य के वर्णन के सन्दर्भ में
मिलता है। दोनों से कल्हण की बातों की पुष्टि
होती है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०५ में 'सुधामयम्' का पाठभेद
'सोधम्' और 'प्राकारो' का पाठभेद 'प्रासादो' तथा
'कारितः' का 'निर्मितः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१०५ (१) विजयेश्वर. काल शिव विजयेश्वर का
प्रसिद्ध देवालय वर्तमान बिजवोर तथा उसके आस-
पास का क्षेत्र था। इसे विजयेश्वर क्षेत्र कहते थे।
स्थानीय पुरोहितों के अनुसार विजयेश्वर का प्राचीन
मन्दिर लगभग ४०० गज नदी तट से दूर वितस्ता
सेतु के दूसरी तरफ था। यहाँ से कश्मीर के डोगरा
राजा रणवीर सिंह ने अपने नवीन मन्दिर निर्माण
निमित्त बहुत सामग्री प्राप्त की थी। यहाँ स्टीन
सन् १८८९ में आये थे। मन्दिर के अधिष्ठान के
पास कुछ टूटे हुए पत्थर तथा मलवे मिले थे। यहाँ
पर कुछ निर्माण किया गया है। नवीन मन्दिर के
समीप कुछ मूर्तियाँ जो पुरानी नही मालूम होती,
रखी थी। यह मन्दिर नदी के ऊपर कुछ दूर पर
बना है।
विशोकां विजयेशं च वितस्तां सिन्धुसंगमम् ।
एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥
1056 : १२४०
'—विशोका, विजयेश, वितस्ता, सिन्धु संगम
पार करते हुए वह भरतगिरि पर पहुँचा ।
विजयेशाग्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते ।
रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते सुखम् ॥
1303 : १५१६,१५१७
'महीपते ! विजयेश्वर के सम्मुख वितस्ता में
स्नान करने वाला अपने कुल का उद्धार करता स्वयं
रुद्रलोक प्राप्त कर सुख भोगता है ।
उक्त उद्धरणों से दो बातें स्पष्ट होती हैं।
विजयेश्वर तीर्थ था। विजयेश्वर घाटपर स्नान करने
पर मुक्ति मिलती थी । कुल का उद्धार होता था ।
सुख की प्राप्ति होती थी । विजयेश का महत्त्व सिन्धु
संगम जैसा महत्त्वपूर्ण था । उसकी गणना पवित्र
स्थानों में थी । इन आध्यात्मिक महत्त्व के साथ
दूसरा भौगोलिक महत्त्व भी प्रकट होता है। वितस्ता
प्रथम तरंग १४७
सभायां विजयेशस्य समीपे च विनिर्ममे ।
शान्तावसादः प्रासादावशोकेश्वरसंज्ञितौ ॥१०६॥
१०६. उस शान्त एवं अवसाद रहित राजा ने विजयेश्वर के समीप दो प्रासादों¹ का
निर्माण सभा² स्थान में कराया उनका नाम अशोकेश्वर³ था।
तटपर विजयेश तीर्थ था। वर्तमान बिजन्नोर अथवा
ब्रिजवेहरा किंवा व्रजब्रारी ही पूर्वकालीन विजयेश्वर
क्षेत्र था। वहाँ के मन्दिर में एक विजयेश का
मन्दिर था। अशोकेश्वर का वर्णन नीलमत पुराण में
नहीं आता है। इस अभाव के दो कारण हो सकते
हैं। पहला कारण यह हो सकता है कि नीलमत
पुराण अशोक के पूर्व लिखा गया हो अथवा विजयेश
यहाँ के प्राचीन नगर देवता थे अतएव उनका महत्त्व
काशी के देवता काशी विश्वनाथ की तरह था।
नीलमत पुराण ने विजयेश को ही तीर्थ तथा तीर्थ
का प्रधान देवता माना होगा। अन्य देवताओं का
उल्लेख विजयेश क्षेत्र में नहीं मिलता।
बिजन्नोर अर्थात् विजयेश्वर श्रीनगर से १९
मील दूर स्थित है। कल्हण के अनुसार इस मन्दिर
की स्थापना विजयराज ने की थी। (राज० त०
२:६२) सिकन्दर बुतशिकन ने इसे नष्ट किया था।
यहाँ पर बड़ी मसजिद के समीप कुछ ध्वंसावशेष पाये
जाते हैं। इस मन्दिर का स्तम्भ रतन हाजी की
मसजिद में तथा प्रसाद चढ़ाने का बड़ा शिलाखण्ड
मसजिद के बाहर पड़ा है। कथा है कि इस मन्दिर
के नष्ट होने का समय शिलालेख पर पहले ही
लिखकर रख दिया गया था। उस पर लिखा था
'बिस्मिल्लाह मन्त्रेण भग्नन्त विजयेश्वर।'
विजयेश्वर का उल्लेख जोन आदि की राज-
तरंगिणी (दत्त पृष्ठ ११, ८८, १२०, १३२,
१४०, १४६, १४७, ३२२, ३७२, ३८१, ४०८) में
विशेष रूप से किया गया है।
१०६ (१) प्रासाद : प्रासाद शब्द से किंचित्
भ्रम उत्पन्न हो सकता है। आजकल प्रासाद शब्द
मन्दिरों के लिये प्रयोग नहीं किया जाता। संस्कृत
में प्रासाद का अर्थ—राजभवन, विशाल भवन,
देवालय एवं मन्दिर है । ‘प्रासादो देवभूभुजाम्।’
अर्थात् देवालय एवं महल दोनो का अर्थ प्रासाद है।
अमर कोष (२:२:९)
(२) सभा : आज भी यह प्रथा प्रचलित है।
बड़े मन्दिरों में राजा तथा श्रीसम्पन्न लोग
छोटे-छोटे मन्दिर अपने नाम से स्थापित करा देते
हैं। काशी विश्वनाथ के मन्दिर में इस प्रकार
कितने ही शिव लिंगों की स्थापना लोगों ने करायी
है। छोटे-छोटे मन्दिर दीवारों तथा खाली स्थानों
में बनवा दिये जाते हैं। दक्षिण भारत की यात्रा
में भी मैंने विशाल मन्दिरों में यह प्रथा प्रचलित
पायी है। अशोक ने भी इसी प्रकार पुण्यार्जन
निमित्त विजयेश्वर जैसे पवित्र धाम में उसके सभा
स्थल अर्थात् प्राकार के भीतर मन्दिर निर्माण
कराया होगा।
सभा का अर्थ यहाँ सभामण्डप तथा विशाल
मन्दिर का प्राकार दोनो लगाया जा सकता है।
सभा का अर्थ वास, कुटी, शाला, सभा, सभाभवन,
सभासद् तथा परिषद् होता है। (अमर कोष २:२.७
तथा ३:१:१३७) सभामण्डप छाया हुआ सभा
का स्थान होता है। गर्भ गृह के सम्मुख ढके स्थान
को सभामण्डप कहते हैं। यह सभी मन्दिरों में
होता है। यहाँ पर अर्थ सभा अर्थात् विस्तृत प्राकार
वेष्टित स्थान लगाना उचित प्रतीत होता है। यद्यपि
मन्दिर के सभा मण्डप में भी लोग अपने नाम से
दीवालों या किसी कोने में मूर्तियाँ स्थापित कर
देते हैं। अशोक के निर्मित मन्दिर निश्चय ही
विजयेश्वर प्राकार के अन्तर्गत भिन्न मन्दिर थे।
(३) अशोकेश्वर : विजयेश्वर के प्रसंग में
लिखा जा चुका है कि मन्दिर का पता नहीं चलता।
१४८ राजतरंगिणी
म्लेच्छैः संच्छादिते देशे स तदुच्छित्तये नृपः ।
तपस्संतोषिताल्लेभे भूतेशात्सुकृती सुतम् ॥१०७॥
१०७. म्लेच्छों से कश्मीर देश संछादित हो गया था अतएव राजा ने कठोर तपस्या कर
भूतेश से वरस्वरूप जलौक नामक पुत्र उनके संहार निमित्त प्राप्त किया ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
मूल मन्दिर नष्ट हो गया तो उससे सम्बन्धित
इमारतों आदि का नष्ट होना स्वाभाविक था । उसी
के साथ अशोकेश्वर का मन्दिर भी नष्ट हो गया ।
कश्मीर में भविष्य के सभी राजा, रानी, मन्त्री
तथा गणमान्य लोग अपने नामों से मूर्तियों की
स्थापना तथा मन्दिरों का निर्माण कराने लगे । अपने
नामों के अन्त में शिव मन्दिर के लिये ईश्वर तथा
विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द जोड़ कर मन्दिर
तथा मूर्ति का नाम रख देते थे । वह प्रथा कश्मीर
के बौद्ध विहारों के सम्बन्ध में नहीं मिली है । यदि
एकाध होंगे तो वे भी हिन्दू राजाओं द्वारा अपने
नाम से बनवा दिये गये होंगे । परन्तु सर्वमान्य
प्रथा यह नहीं हो सकी थी । मठों तथा शालाएँ
भी व्यक्ति विशेष के नाम पर निर्माण कराये जाते
थे जैसे दिड्डामठ आदि । इनका उदाहरण यथास्थान
दिया गया है ।
पण्डरेथन अर्थात् पुराधिष्ठान के दो मील ऊपर
पांडुचक में प्राप्त मन्दिर को अशोकेश्वर का मन्दिर
कहा जाता है । किन्तु यह भ्रान्ति मात्र है । पांडुचक
वास्तव में पाण्डव तीर्थ जनश्रुति के अनुसार है ।
नीलमतपुराण में पाण्डव तीर्थ का स्पष्ट वर्णन
मिलता है । (नीलमत १३२३ तथा स्टेन पृष्ठ १०७)
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
होता है । बोधायन ने म्लेच्छ शब्द की परिभाषा
दी है ।
गोमांसखादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते ।
मर्यादाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते ॥
म्लेच्छ देश में उत्पन्न लोगों को भी म्लेच्छ
कहा गया है ।
म्लेच्छः गद्देशः उत्पत्तिस्थानत्वेन अस्ति अस्य,
म्लेच्छः ... ।
अमरकोषकार परिभाषा देता है । उन्हें सीमा
प्रान्त की संज्ञा देता है ।
प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ।
कल्हण ने यूनानियों के अर्थ में ही यहाँ म्लेच्छ
शब्द का व्यवहार किया है । भारत की पश्चिम-
उत्तर की सीमा पर निवसित विदेशियों को म्लेच्छ
कहा जाता रहा है । यह शब्द अहिन्दुओं के लिये
व्यवहृत किया गया है ।
यूनानियों ने बर्बर शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग
किया है उसी अर्थ में म्लेच्छ शब्द का प्रयोग
भारतीयों ने किया है । शतपथ ब्राह्मण में म्लेच्छ
भाषा का निर्देश प्राप्त है । जहाँ उसे अनार्य लोगों
की बर्बर भाषा कहा गया है । (श० ब्रा० ३:२:१:४)
अरब वालों ने जिस समय ईरान जीता था ।
प्रथम तरंग
साधी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर
सीमा पर बस गये थे । उनका वहाँ राज्य भी
स्थापित हो गया था ।
काश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के
लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे । वे
बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म
माननेवाले थे । वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे ।
अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को
काफिरिस्तान कहते थे ।
अंग्रेजों ने काबुल फतह किया । उस समय
काफिरिस्तान के निवासियों का एक शिष्ट मण्डल
उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे
मिलने आया था ।
कालान्तर में काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान
के अमीर अब्दुलरहमान का अधिकार हो गया ।
उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित
किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में
इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये ।
जिन्होंने इसलाम धर्म स्वीकार नहीं किया वे बुरी
तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन
लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्तयु म्स
कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ )
अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत
की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण
करते थे ।
कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी ।
अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके
रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर
मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड
पर अनेक भागों मे अधिकार हो गया होगा ।
एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल
की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेशवर की पूजा कर
पुत्र रत्न प्राप्त किया था ।
कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी
बात की पुष्टि होती है । तरंग आठ में भोज के प्रसंग
में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ
जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी ।
( रा० त० ८ः२७६३, २७६६ )
मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को
म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कहीं भी
निवास करते थे । उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत
के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु
महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने
समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ
में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय
पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था ।
सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के
दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त
की थी ।
स्पष्ट प्रतीत होता है । महाभारत काल में म्लेच्छ
भारत में चारों दिशाओं में थे । महाभारत के युद्ध में
कौरवों का पक्ष म्लेच्छों ने ग्रहण किया था । अर्जुन
ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था ।
म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने
किया था । म्लेच्छहन्तू प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों
के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो :
६८ः४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७:२५-२६,
२८:४४; २९:१५, ३१:१०, म० व० १८८:२८-
२९; म० शाश्व० : ९१:२५; म० क० : १४.१४-
१७ )
स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में म्लेच्छ
जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म
मानने वाली जाति थी । कालान्तर में उन सभी
जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय
धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे ।
(२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत
चुका है । घटित है । पंच महाभूतों में पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और आकाश तत्व आते हैं । अमरकोप-
कार भूत का अर्थ करता है—लब्धं प्राप्तं विन्नं
भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्
१४८ राजतरंगिणी
म्लेच्छैः संच्छादिते देशे स तदुच्छित्तये नृपः ।
तपस्संतोषिताल्लेभे भूतेशत्सुकृती सुतम् ॥१०७॥
१०७. म्लेच्छों से कश्मीर देश संछादित हो गया था अतएव राजा ने कठोर तपस्या कर
भूतेश से वरस्वरूप जलोक नामक पुत्र उनके संहार निमित्त प्राप्त किया ।
मूल मन्दिर नष्ट हो गया तो उससे सम्बन्धित
इमारतों आदि का नष्ट होना स्वाभाविक था । उसी
के साथ अशोकेश्वर का मन्दिर भी नष्ट हो गया ।
कश्मीर में भविष्य के सभी राजा, रानी, मन्त्री
तथा गणमान्य लोग अपने नामों से मूर्तियों की
स्थापना तथा मन्दिरों का निर्माण कराने लगे। अपने
नामों के अन्त में शिव मन्दिर के लिये ईश्वर तथा
विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द जोड़ कर मन्दिर
तथा मूर्ति का नाम रख देते थे । यह प्रथा कश्मीर
के बौद्ध विहारों के सम्बन्ध में नहीं मिली है। यदि
एकाध होंगे तो वे भी हिन्दू राजाओं द्वारा अपने
नाम से बनवा दिये गये होंगे। परन्तु सर्वमान्य
प्रथा यह नहीं हो सकी थी। मठों तथा शालाएँ
भी व्यक्ति विशेष के नाम पर निर्माण कराये जाते
थे जैसे दिद्दामठ आदि । इनका उदाहरण यथास्थान
दिया गया है ।
पण्डरेथन अर्थात् पुराधिष्ठान के दो मील ऊपर
पाण्ड्रचक में प्राप्त मन्दिर को अशोकेश्वर का मन्दिर
कहा जाता है । किन्तु यह भ्रान्ति मात्र है। पाण्ड्रचक
वास्तव में पाण्डव तीर्थ जनश्रुति के अनुसार है।
नीलमतपुराण में पाण्डव तीर्थ का स्पष्ट वर्णन
मिलता है। (नीलमत १३२३ तथा स्टेन पृष्ठ १०७)
कल्हण के समय अशोकेश्वर का मन्दिर
वर्तमान था। उसने स्पष्ट उल्लेख किया है। जयसिंह
की रानी रड्डादेवी ने अशोकेश्वर मन्दिर का
जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ८:३२९१)
१०७ (१) म्लेच्छ : म्लेच्छ का अर्थ—अनार्य,
जंगली भाषा बोलने वाले, असंस्कृत भाषाभाषी,
शास्त्रों को न मानने वाले, जाति बहिष्कृत आदि
होता है। बौधायन ने म्लेच्छ शब्द की परिभाषा
दी है।
गोमांसखादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते ।
सर्वाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते ॥
म्लेच्छ देश में उत्पन्न लोगों को भी म्लेच्छ
कहा गया है ।
म्लेच्छः तद्देशः उत्पत्तिस्थानत्वेन अस्ति अस्य,
म्लेच्छ ...... ।
अमरकोषकार परिभाषा देता है। उन्हें सीमा
प्रान्त की संज्ञा देता है ।
प्रस्थन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ।
कल्हण ने यूनानियों के अर्थ में ही यहाँ म्लेच्छ
शब्द का व्यवहार किया है। भारत की पश्चिम-
उत्तर की सीमा पर निवसित विदेशियों को म्लेच्छ
कहा जाता रहा है। यह शब्द अहिन्दुओं के लिये
व्यवहृत किया गया है ।
यूनानियों ने बर्बर शब्द का जिस अर्थ में प्रयोग
किया है उसी अर्थ में म्लेच्छ शब्द का प्रयोग
भारतीयों ने किया है। शतपथ ब्राह्मण में म्लेच्छ
भाषा का निर्देश प्राप्त है। जहाँ उसे अनार्य लोगों
की बर्बर भाषा कहा गया है। (श० ब्रा. ३:२:१:४)
अरब वालों ने जिस समय ईरान जीता था ।
ऊँची सभ्यता वाले ईरानियों को भी 'अजम' अर्थात्
गूँगा अर्थात् बात न समझने वाला कहते थे।
चन्द्रगुप्त के समय भारत पर अलकसन्दर,
किंवा अलक्षेन्द्र (अलेकजेंडर), सिकन्दर, का आक्रमण
हुआ था। दार्वाभिसार के राजा आभी का सम्पर्क
सिकन्दर से था। यूनानियों के लौट जाने तथा
सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् उसने अनेक यूनानी
प्रथम तरंग
साथी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर
सीमा पर बस गये थे। उनका वहाँ राज्य भी
स्थापित हो गया था।
कश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के
लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे। वे
बीसवी शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म
माननेवाले थे। वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे।
अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को
काफिरिस्तान कहते थे ।
अंग्रेजों ने काबुल फतह किया। उस समय
काफिरिस्तान के निवासियो का एक शिष्ट मण्डल
उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे
मिलने आया था ।
कालान्तर मे काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान
के अमीर अब्बुलरहमान का अधिकार हो गया ।
उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित
किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में
इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये ।
जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार नही किया वे बुरी
तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन
लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्त्युम्स
कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ )
अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत
की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण
करते थे ।
कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी ।
अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके
रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर
मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड
पर अनेक भागों में अधिकार हो गया होगा ।
एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल
की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेश्वर की पूजा कर
पुत्र रत्न प्राप्त किया था ।
कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी
बात की पुष्टि होती है। तरंग आठ मे भोज के प्रसंग
में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ
जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी ।
( रा० त० ८:२७६३, २७६६ )
मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को
म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कही भी
निवास करते थे। उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत
के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु
महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने
समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ
में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय
पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था।
सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के
दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त
की थी ।
स्पष्ट प्रतीत होता है। महाभारत काल में म्लेच्छ
भारत मे चारो दिशाओं में थे। महाभारत के युद्ध में
कौरवों का पक्ष म्लेच्छो ने ग्रहण किया था। अर्जुन
ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था।
म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने
किया था । म्लेच्छहन्तृ प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों
के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो :
६८:४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७.२५-२६,
२८:४४; २९:१५, ३१.१०, म० व० १८८:२८-
२९; म० शास्व० : ९१:२५; म० क० : १४:१४-
१७ )
स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ मे म्लेच्छ
जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म
मानने वाली जाति थी। कालान्तर में उन सभी
जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय
धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे ।
(२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत
चुका है । घटित है । पंच महाभूतो में पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और आकाश सत्त्व आते हैं। अमरकोष-
कार भूत का अर्थ करता है—लक्ष्यं प्राप्तं वृत्तं
भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्
१५० राजतरंगिणी .
सब्य प्राप्त, विघ्न, भावित, आसादित, बोर भूत
हैं। पुनः (३:३.७७) में अर्थ किया गया है।
अत्याहितं महाभीतिः कर्म जीवानपेक्षि च।
युक्ते क्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतीते समे त्रिषु ॥
अर्थ होता है अत्याहितं —महाभय, साहसी कर्म,
व्याप्य, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, गत्य, प्राणी,
बीता समय।
ब्रह्माण्ड पुराण के मतानुसार भूतों की उत्पत्ति
भूत तत्त्व से हुई थी। इनका भोजन पिशित था।
(२८ ३९-४०) 'पिशित' का अर्थ होता है मांस-
भक्षी, राक्षस, पिशाचादि।
इनका वर्णन अद्भुत है। वे कृशांग अर्थात् छोटे
कद के थे। लंबकर्ण थे। प्रलम्बोष्ठ थे। लम्बे दाँत
युक्त थे। नखिन् अर्थात् नख रखते थे।
स्थूलपिण्डक अर्थात् स्थूल शरीर वाले थे। बभ्रु व
अर्थात् लम्बी भौ वाले थे। हरि तथा मु ज केश थे।
ठिगने थे। वर्ण नीललोहित था। पिंगल वर्ण भी
होता था।
सगोत्र विरोधी होते थे। शक्तिशाली होते थे।
सर्प यज्ञोपवीत धारण करते थे। शरीर को अनेक रंगों
के लेप द्वारा सज्जित करते थे। केशों को मुकुट तुल्य
बाँध कर रखते थे। हाथी का चमड़ा धारण करते
थे, अथवा नग्न रहते थे। इनके आयुध, शूल, धनुष,
निषंग, वरूथ तथा असि थे। यह वर्णन अफ्रीका
तथा आस्ट्रेलिया की घोर जंगली जातियों से
मिलता है।
पूर्व काल मे अत्यन्त जंगली जाति थे। किन्तु
असुर एवं देवों के सम्पर्क के कारण इनकी स्थिति
में विशेष सुधार हो गया था। असुरों के सम्पर्क के
कारण नृत्य एवं संगीत इन्होंने सीखा। एक तरह की
सामाजिक व्यवस्था में इन्होंने अपने को संघटित
किया। उनकी मूल सामाजिक व्यवस्था क्या थी।
पुराणो आदि मे विस्तार से वर्णन नही मिलता।
स्वायम्भुव मन्वन्तर के पूर्व युग में भारतवर्ष
में ये निवास करते थे। इनका निवासस्थान
हिमाचल का पर्वतीय प्रदेश था। धुर उत्तरीय
हिमालय भाग में रहते थे। भारतवर्ष के सबमे
पुराने रहनेवाले थे। मूल निवासी थे।
असुरों तथा भूत जाति में प्रायः संघर्ष होता
रहा। उत्तर से असुरों का दबाव पड़ने लगा। ये
अपनी रक्षा निमित्त विन्ध्य की पहाड़ियों में चले
आये। यही रहने लगे थे।
शंकर भगवान् तथा अन्धकासुर के युद्ध में भूतों
ने शंकर के पक्ष में रहकर युद्ध किया था। इस युद्ध
में विनायक भूत ने सर्वप्रथम अन्धकासुर पर
आक्रमण किया था। अंधक ने विनायक को परास्त
कर दिया। अनन्तर नंदी तथा विनायक दोनों ने
अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। उस युद्ध में
अन्धकासुर पराजित हो गया था। अंधक शंकर
की शरण में आ गया। शंकर ने उसे भूतगण
का गणपति बनाया। उसका नाम भृंगी पड़ा।
भूत एक जाति थी। यह पर्वतीय जाति थी।
पिशाच एवं नाग जाति की तरह उत्तर पश्चिम
भारतीय सीमा के आस-पास रहते थे।
कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के संघर्ष के कारण
आर्यों का वहाँ आगमन हुआ। उसी प्रकार प्रतीत
होता है। भूत तथा असुरों के संघर्ष के कारण
कालान्तर में दुर्बल होने पर भूत जाति उत्तर से
दक्षिण की ओर बढ़ने लगी। अन्त में विन्ध्य की
पहाड़ियों में शरण ली। वैवस्वत मन्वन्तर के
काल तक उनका स्थानान्तरण उत्तर से दक्षिण
की ओर पूर्ण हो गया था। (वायु पुराण
३०:८९-१०१, वामनपुराण ६७:१-२३;
ब्रह्माण्ड: १:३२:८८-८९; २:३:२-३४ २:८.३९-४०;
२:९:६८-७८;)
भूतों को प्रेतों की संज्ञा कालान्तर मे दे दी
गयी। उन्हे शरीरहीन मृतको के जीव रूप में मान
लिया गया। बात इसके विपरीत है। भूत को
प्रथम तरंग
१५१
एक जाति रूप में जीवित जागृत प्राणी माना गया
है । पुराण इसका स्पष्ट निर्देश करते हैं ।
वह एक जाति थी । किन्तु अशिक्षित थी । नाग
तथा पिशाच जाति से गये गुजरे थे । उनका कोई
साहित्य तथा इतिहास नहीं मिलता । केवल पुराणों
के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता
है ।
पुराणों के अनुसार भूत प्राचीन भारतीय मानव
जातियों में एक जाति थी । पुराण मानव जाति के
चार वर्ग करते हैं : (१) धर्म प्रजा (२) ईश्वर प्रजा
(३) काश्यपीय प्रजा तथा (४) पुलह प्रजा ।
धर्म प्रजा की उत्पत्ति धर्म ऋषि से हुई थी ।
ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति ईश्वर से हुई थी । काश्यपी
प्रजा की उत्पत्ति काश्यप ऋषि में हुई थी । पुलह
प्रजा की उत्पत्ति पुलह ऋषि से हुई थी । भूत योनि
प्राप्त प्राणियों की पुलह प्रजा में गणना होती है ।
(ब्रह्माण्ड पुराण १·३२·८८, २·३·३-३५ तथा २·७)
पुराणों में भूतों के राजा की संज्ञा रुद्र वैदिक
देवता है । रुद्र को भूतनायक तथा गणनायक कहा
गया है । भूतों को रुद्र का अनुचर एवं भव परिषद्
कहा गया है ।
रुद्र प्रतीत होता है । कोई एक व्यक्ति नही
थे । भूतों के राजा की सामूहिक संज्ञा थी । अनेक
स्थानों पर इनके राजा को गणपति भी कहा गया
है । यह गणपति आर्य कालीन गण राज्य के अध्यक्ष
एवं सभापति से भिन्न थे ।
उनमें जो सबसे शक्तिशाली किंवा बलवान
व्यक्ति होता था वह राजा निर्वाचित किया जाता
था । उसका नाम रुद्र रखा जाता था । पुराणों में
इस प्रकार के दो रुद्रों का उल्लेख मिलता है ।
वीरभद्र सिंहमुख नामक भूतगणों का प्रमुख था ।
(वामन पुराण : ४:१७) दूसरे रुद्र का नाम
नन्दिकेश्वर था । शैलादि नायक भूत गणों का
नेता था । (मत्स्य पुराण : १८१:२)
वामन पुराण भूतगणों की जनसंख्या ग्यारह
करोड़ देता है । उनमें स्पंद, शास्त्र एवं भैरवादि
प्रमुख थे । इसी पुराण में भूतों के रूप एवं अस्त्रों
का विस्तृत वर्णन किया गया है ।
उक्त पुराण में भूतों की आकृति का भी वर्णन
किया गया है । जिस प्रकार किन्नरों को 'अश्वमुख'
कहा गया है । उसी प्रकार भूतों को 'वानरास्य'
एवं 'मृगेन्द्र वदन' कहा गया है । भस्म, खट्वांग
आदि उनके आयुध थे । इनकी ध्वजा पर किसी
पशु या पक्षी की आकृति बनी रहती है । प्रत्येक
गण ध्वजा के नाम पर 'मयूरध्वज' आदि नाम
से सम्बोधित किया जाता था । (वामन पुराण :
६७:१-२३)
भूतों को ऊर्ध्वरेतस् कहा गया है । अर्थात्
वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । उनमें विवाह
पद्धति मालूम नही पड़ती । किन्तु रुद्राणी आदि
कतिपय भूत स्त्रियों का उल्लेख मिलता है । इनका
वर्णन मार्कण्डेय, वामन पुराणों तथा देवी माहात्म्य
में मिलता है । इनके आकृति का जो वर्णन किया
गया है वह आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के जंगली
जातियों से मिलता है ।
बौद्ध ग्रन्थों में भूत-प्रेत शब्द आता है । प्रेत
को वे एक योनि मानते हैं । परन्तु भूत को दिवंगत
व्यक्ति की आत्मा किंवा शरीर विहीन प्राणी नही
मानते । 'भूत गाम' शब्द का प्रयोग किया गया है ।
वृक्षों आदि को काटने तथा गिराने पर प्रायश्चित्त
करने का विधान है उसे 'भूत गाम' की संज्ञा दी
गयी है । भूत से प्रेत अलग माने गये हैं। प्रेतों को
पेच्च किंवा पेत आस अर्थात् प्रेत कहते हैं । प्रेत
वत्थु तथा बम्हजाल सुत्त में इस प्रकार का उल्लेख
मिलता है ।
मैं समझता हूँ । कश्मीर में नाग तथा पिशाचों
के पूर्व भूत जाति पर्वतीय क्षेत्रों में रहती थी । वह
पूरे आदिवासी थे । भारत तथा कश्मीर के सबसे
प्राचीन मानव असभ्य असंस्कृत प्राणी थे । एक समय
१५२ राजतरंगिणी
आया । नाग जाति ने उन्हें उद्वासित किया होगा ।
भूतों के नागो का यज्ञोपवीत पहनने का दो अर्थ
हो सकता है। एक तो मुण्डमाला के समान नागों
की हत्या का प्रतीक होगा दूसरा नागों से उनमें
किसी प्रकार सन्धि हो गयी थी । प्रतीक स्वरूप
हृदय स्थान पर यज्ञोपवीत धारण करते थे । शंकर
किंवा रुद्र दोनों का अधिपति होकर भूतेश तथा
नागेश हो गये । भूतगण नागगण उनके गण
बन गये ।
भूत शब्द शायद इसलिये प्रयोग किया गया कि
ये भूत की एक जाति थे। उनका मिश्रण पिशाच,
नाग तथा आर्यों में हो गया अतएव उनका जाति
का चाहे जो भी नाम रहा हो उसकी संज्ञा भूत की
रख दी गयी । अर्थात् वह जाति जो भूत काल में
थी । आजकल आदिवासियों में अनेक जाति तथा
भाषा-भाषियों तथा धर्मावलम्बियों का बोध होता
है । वास्तव में आदिवासी किस अनुसूचित कोई
एक वर्ग नहीं है । इसी प्रकार भूत शब्द वर्ग तथा
समष्टि वाचक है ; उससे एक वर्ग का बोध होता
है । उसमें कितनी ही जातियाँ तथा उपजातियाँ
क्यों न रही हों । नाग जाति के लोप हो जाने पर
भी जैसे नागेश्वर, पिशाच जाति के लुप्त होने पर
पिशाचमोचन तथा पिशाचेश्वर है। उसी प्रकार
भूत जाति के लुप्त हो जाने पर भी भूतेश्वर उस
लुप्त जाति का एक प्रतीक है ।
प्रचलित किवदन्ती के अनुसार व्यक्ति मरने
के पश्चात् भूत हो जाता है । शरीर विहीन प्राण
अन्तरिक्ष में विहार करता है । शिव संहारक देवता
हैं । इस शरीर के संहार के पश्चात् काया हीन
प्राण शेष रह जाता है । वह भूत है । उसके देवता
जिसके कारण शरीरस्थ प्राण अशरीरस्थ हो जाता है ।
भूत के नेता भूतेश हो जाते है। भूतेश्वर की पूजा
का प्रचलित रूप यही है । वह भूतो के देवता है ।
शिव के नाना रूपो मे यह भी एक रूप है ।
केवल हिन्दू धर्म की गाथाओ में प्रेतादि का
वर्णन नही परन्तु बौद्ध ग्रन्थों मे भी खूब वर्णन
मिलता है । बौद्ध पुनर्जन्म मानते है । कर्म के अनुसार
मनुष्य जन्म लेता है । मुगलिम कथानकों मे भी जिनों
का वर्णन मिलता है ।
भूतेश : कश्मीर में प्राचीन काल से शिव
भूतेश की पूजा प्रचलित है । उसने कश्मीर के
सामाजिक, राजनैतिक एवं ऐतिहासिक जीवन को
प्रभावित किया है ।
हिन्दू शास्त्रों में द्वादश ज्योतिलिगों और उनके
साथ उपलिंगों का उल्लेख मिलता है । भूतेश एक
ज्योतिरुपलिंग है। द्वादश ज्योतिलिंग (१) सोमेश्वर,
(२) मल्लिकार्जुन, (३) महाकालेश्वर (४)
ओंकारेश्वर (५) केदारेश्वर (६) भीम शंकर (७)
काशी विश्वनाथ (८) त्र्यम्बकेश्वर (९) वैद्यनाथ
(१०) नागेश्वर (११) रामेश्वर तथा (१२)
घुश्मेश्वर हैं ।
केदारेश्वर के उपलिंग भूतेश हैं । उनका स्थान
यमुना तट है यथा—'केदारेदारवमद्भूतं भूतेशं यमुना-
तटे ।' भूतेश ज्योतिलिंग नागेश्वर के भी उपलिंग
हैं । यह झिल्लिका सरस्वती तट पर स्थित है ।
झिल्लिकासारस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम्—'
भारतवर्ष में बावन शक्तिपीठ हैं । उनमें
शक्ति पीठ 'त्रिसन्ध्या' कश्मीर मे है । यहाँ पर देवी
सती का अंग कंठ गिरा था। देवी का यहाँ नाम
महामाया पड़ा था। कहा गया है। भैरवी त्रिसन्ध्येश्वर
है। इसी प्रकार देवी सती का केशजाल वृन्दावन
में गिरा था । देवी का नाम उमा तथा भैरव का
नाम भूतेश है ।
कंकणी नदी का संकीर्ण गर्त शैल वाह
के दक्षिण दिशा में प्रवाहित है । कंकणी के तट
पर वह वेगथ ( वसिष्ठाश्रम ) ग्राम से तीन मील
ऊर्ध्व दिशा मे भूतेश है । वहाँ पर सत्तरह मन्दिरो के
भग्नावशेष मिलेंगे । इनका उल्लेख बिशप कोवी ने
सन् १८६६ मे अपनी पुस्तक के पृष्ठ १०१ तथा
मेजर कोल ने एनसिएण्ट बिल्डिंग इन कश्मीर पृष्ठ
११ पर किया है ।
प्रथम तरग १५३
उक्त मन्दिर समय समय पर कश्मीर के राजाओं द्वारा निर्माण कराये गये थे। भूतेश्वर जाते समय एक ऊर्ध्व पर्वतीय खण्ड मिलता है। उसे भरतगिरि कहते हैं। यहाँ एक लघु सरोवर है। उसे ब्रह्म सर कहते हैं। नीलमत पुराण के के अनुसार हरमुकुट, नन्दिपर्वत, भरतगिरि, अमरेश्वर, महादेव गिरि, धनद तथा वैश्रवण, इन्द्र कील, गौरीशिखर, उशोरिका, पंचालधारा, बर्हिगिरी, धन्तगिरी, पर्वतों की श्रेणियों में आते हैं।
श्रीनगर सोन मार्ग राजपथ पर वूसन से एक सड़क फूटकर पर्वतीय ग्राम वांगथ की ओर जाती है। यह वांगथ नाला के पार्श्व से चलती है। स्थल सघन देवदार तथा फर पादपावली से हरित है। चारो ओर उत्तुंग पर्वतमालाएँ हैं। नरनाग का उत्तुंग शिखर जैसे इस यात्रा का अन्तिम स्थान है। सात किंवा आठ मील की यात्रा समाप्त कर यात्री नरनाग पहुँचता है। नरनाग मन्दिरों का समूह है। उसे वांगथ मन्दिर समूह की संज्ञा विदेशी पर्यटकों ने दी है। वांगथ ग्राम से तीन मील दूर मन्दिर समूह हैं।
मैंने पहली वार यहाँ की यात्रा की थी। मार्ग कष्टप्रद था। कुछ दूर तक सड़क नाम मात्र के लिये बनी थी। तत्पश्चात् पगडण्डी का आश्रय लेना पड़ा था। दूसरी बार सन् १९६४ की यात्रा में सडक नरनाग तक करीब बन चुकी थी। वहाँ ठहरने के लिये डाक बंगला बन रहा था। पहली यात्रा मैंने सन् १९५६ में की थी। उस समय कश्मीर सरकार से कहा था। इस स्थान तक पहुँचने का मार्ग सुगम बना दिया जाय। उस समय मेरे साथ पचास संसद् सदस्यों का दल कश्मीर गया था। किन्तु भूतेश्वर जाने का कोई साहस नहीं कर सका। मैने यह यात्रा श्री गुलाम बख्शी तत्कालीन कश्मीर के मुख्य मन्त्री के प्रबन्ध की सुविधा के कारण की थी। अन्यथा यात्रा असम्भव थी। अब सड़क
२०
बन गयी है। डाक बंगला तैयार हो गया है। छोटी कार अथवा जिप से सुगमता पूर्वक जाया जा सकता है।
यह स्थान मुझे कश्मीर मे बहुत ही आकर्षक, भव्य तथा जीवनमय मिला। स्थान जागृत है। जैसे जैसे व्यक्ति भूतेश्वर के समीप पहुँचता चलता है, उसके मन पर स्थान की भव्यता का गम्भीर प्रभाव पडता जाता है।
मुझे वांगथ से नरनाग तक दूसरी बार की यात्रा में पैदल चलना पड़ा था। पैदल चलने में विचित्र आनन्द का अनुभव होता है। बढ़ते चलिये उतने ही प्राकृतिक दृश्य की सुन्दरता बढ़ती मिलेगी।
नाला किंवा कंकणी नदी के तट से मार्ग चलता है। एक ओर नदी का कलकल निनादिन प्रवाह तथा दूसरी ओर देवदार तथा चीड़ के वृक्षों की सघन छाया, नदी के गर्त के दोनों ओर ऊँचे होते जाते अत्यन्त हरित पादपपूर्ण पर्वतों की श्रेणी, उनपर वृक्षों का वायु प्रवाह में झूमना, हृदय पर अपना विचित्र प्रभाव छोड़ता है। स्थान निर्जन होने पर भी मन उचटता नहीं। नदी का निनाद मन बहलाता रहता है। एकान्त का तीव्र अनुभव नहीं होने देता।
भूतेश्वर की ओर चलते रहने पर सम्मुख हिमाच्छादित हरमुकुट पर्वत जैसे ऊँचा उठता जाता है। पृष्ठ भाग में उपत्यका को घेर कर बन्द कर देता है। पहले हरित तत्पश्चात् हिमाच्छादित पर्वत मन पर सौन्दर्य मिश्रित भय उत्पन्न करता है।
मन्दिर से दो फर्लांग पहले वांगथ की ओर एक नाला पड़ता है। नाला पर लकड़ी का पुल बना है। उस पर खड़े होकर वाम पार्श्व में देखने पर एक विचित्र दृश्य मिलता है। दो हरित शिखरों के मध्य एक हिमाच्छादित पादप हीन शिखर झांकता दिखायी पड़ता है। उसके तीन छोटे छोटे शिखर त्रिमूर्ति तुल्य लगते हैं।
१५४ राजतरंगिणी
मन्दिर समूह के समीप पहुँचते ही मार्ग का
श्रम स्थान की अभिरामता के कारण तिरोहित हो
जाता है। चारों ओर उत्तुंग शिखरमाला खड़ी
मिलती है। पर्वतमालायें शिखर से मूल तक
अत्यधिक हरित हैं। उनका दृश्य मन को मुग्ध कर
देता है। विश्व में इतना सुन्दर पर्वतीय दृश्य
दुर्लभ है।
प्राचीन काल में वसिष्ठाश्रम (वैगथ) से लेकर
मन्दिर समूह तक तपस्वियों के आश्रम थे। तीर्थ
यात्रा पथ के दोनों ओर ब्राह्मण रहते थे। परन्तु
इस समय यहाँ गूजरों की आबादी है। कृषि में
मक्का यहाँ की मुख्य उपज है। गूजर हिन्दू तथा
मुसलमान दोनों होते हैं। यहाँ के आबाद गूजर
मुसलमान हैं।
यह स्थान जंगल है। सम्भव है कालान्तर में
पर्यटक-केन्द्र बन जाने पर पुष्ट और विकसित हो
जाय।
वन में भालू हैं। ये मक्का खा जाते हैं। उनसे
रक्षा का विचित्र उपाय ग्रामीणों ने निकाल रखा
है। शेर से भालू भय खाता है। शेर की आँखें
अन्धकार में चमकती हैं। अतएव ग्रामीण दो स्थानों
पर करीब-करीब आग जला देते हैं। दूर से मालूम
होता है। शेर खड़ा है। उसकी आँखें चमक रही
हैं। भालू भयभीत हो जाता है। समीप नहीं
आता।
शेर से भी सुरक्षा की तरकीब ग्रामीणों ने
ने निकाल ली है। शेर आग से डरता है। ग्रामीण
घास की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं। शेर पास नहीं
आता। भाग जाता है। सड़क निर्माण तथा पर्यटकों
के आवागमन के कारण भालू तथा शेर से स्थान
निरापद हो गया है। वे दूर जंगलों में चले
गये हैं।
सन् १८६९ में लेफ्टिनेण्ट कर्नल श्री हेनरी एच.
कोल ने (सुपरिटेण्डेण्ट आर्केयालोजिकल विभाग
उत्तर पश्चिम मंडल) अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एन
सिण्ट विल्डिङ्ग इन कश्मीर' लण्डन में प्रकाशित
करवायी थी। वह उपलब्ध है। उसमें यहाँ के
मन्दिर समूहों का चित्र दिया गया है। उस समय
मन्दिरों की क्या अवस्था थी उन चित्रों के देखने से
पता चलता है।
श्री कोल ने यहाँ के मन्दिर समूहों को दो वर्गों
में विभक्त कर उनका नामकरण किया है। एक
का नाम राजदैन बल तथा दूसरे का नाम वन मन्दिर
समूह रखा है। प्रथम मन्दिर समूह की संज्ञा राजदैन
बल तथा पीछे वाले मन्दिर समूह को संज्ञा नागबल
दिया है। बिशप कोब्री ने नागबल को पूर्वीय तथा
राजदैन बल को पश्चिमी मन्दिर समूह कहा है।
बिशप कोब्री के समय मन्दिरों पर घास, फूल बहुत
जमे थे। (जे० एम० वी० १८६६ पृष्ठ १०१) पूर्वीय
मन्दिर समूह अर्थात् नाग बल किंवा भूतेश मन्दिर
के प्राकार की उत्तर पूर्व दिशा में एक छोटा सरोवर
है। इस सरोवर को नारान नाग कहते हैं।
नीलमत पुराण तथा कल्हण के अनुसार यह
सरोवर प्रसिद्ध सोदर तीर्थ है। इस तीर्थ से बीस
गज पश्चिम बड़े मन्दिर के प्राकार के बाहर उत्तरा-
भिमुख एक और मन्दिर था। यह मन्दिर भैरव का
मन्दिर था। नागबल अर्थात् पूर्वीय मन्दिर समूह
में बड़ा मन्दिर शिव भूतेश का था। राजदैन बल
अर्थात् पश्चिमी मन्दिर समूह में बड़ा मन्दिर शिव
ज्येष्ठेश का था। इस मन्दिर के पश्चिम दक्षिण कोण
बिशप कोब्री को शिवलिंग का अधिष्ठान दिया धरथा
मिला था जिसपर शिव लिंग स्थापित किया जाता
है। वह शिव अधिष्ठान ज्येष्ठेश का था। मैंने चारों
ओर लगभग एक घण्टा तक उसे खोजा। परन्तु वह
मुझे मिला नहीं। अतएव नहीं कह सकता कि उसका
रूप क्या था। यदि वह मिल जाता तो शिव लिंग
किस स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाता है उसकी घेरे,
गहराई तथा आकार से कल्पना की जा सकती थी
कि शिवलिंग का प्रकार तथा आकार क्या था।
कर्नल श्री कोल श्रीनगर से दो पड़ाव चलकर
यहाँ पहुँचे थे। पहला पड़ाव १० मील तथा दूसरा
प्रथम तरंग
१५५
१५ मील पर डाला था। आज से १०० वर्ष हो
गये। उस समय वेगथ का मार्ग इतना संकीर्ण था
कि यात्रा कठिनता से हो सकती थी। मार्ग में चीड़
तथा फर के इतने वृक्ष थे कि उन्हें काट कर श्री
कोल यहाँ तक पहुँच सके थे।
ज्येष्ठेश्वर तथा भूतेश्वर के मन्दिरों के मध्य
लगभग २०० गज का अन्तर है। ज्येष्ठेश्वर मन्दिर
के पृष्ठ भाग में सर्व प्रथम आयताकार एक चबूतरा
१०० फीट लम्बा तथा ६७ फीट चौड़ा मिलता है।
उसके पश्चात् भूतेश मन्दिर का ध्वंसावशेष
पड़ता है।
वेगथ की ओर से पहुँचने पर प्रथम ध्वंसावशेष
ज्येष्ठेश्वर किंवा राजदेन बल समूह का मन्दिर पड़ता
है। इसका मुख्य मन्दिर श्री कोल के समय आज ही
जैसा खड़ा था। उसका प्राकार १७६ फीट लम्बा
उत्तर-दक्षिण तथा १३० फीट चौड़ा पूरब-पश्चिम
है। प्राकार की नींव का आकार आज भी अक्षुण्ण है।
यद्यपि पत्थर लोग उठा ले गये हैं। नींव के पत्थर
शेष रह गये हैं। उनसे प्राकार के आकार का
अनुमान होता है।
ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर २४ वर्ग फीट में है।
इसका बहिर्वेदान चारों तरफ ३ x १५ फीट ६ इंच
है। मन्दिर चौकोर है। मन्दिर के पूरब तथा
पश्चिम दोनों ओर आमने सामने दो द्वार हैं। द्वार
अलंकृत हैं। उनमें देवी तथा देवताओं के चित्र
खोदे गये थे। इस समय उन मूर्तियों की एक प्रकार
से छाया मात्र ही रह गयी हैं।
मन्दिर के दक्षिण तथा उत्तर की दिवालें बन्द
हैं। बन्द दीवारों के बाहरी तरफ बड़े गवाक्ष बने
हैं। उनमें पूर्व काल में मूर्तियाँ स्थापित थीं।
नागबल अर्थात् भूतेश्वर मन्दिर की अपेक्षा ज्येष्ठेश्वर
का मन्दिर अधिक अच्छी हालत में है। इसकी छत
शिखर सुरक्षित है। वह मन्दिर की रचना तथा
तत्कालीन स्थापत्य पर प्रकाश डालता है। छत
तथा शिखर पत्रकी बनी है। मन्दिर के प्रांगण में
पड़े शिलाखण्डों का रूप काल प्रभाव के कारण कुछ
विकृत हो गया है। कहना कठिन है। शिला स्तम्भ
गोले थे, अठपहले थे अथवा चौपहले थे। स्तम्भों
के अधिष्ठान यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं।
कर्नल कोल ने इस मन्दिर का प्लान पृष्ठ ७:६८
तथा मन्दिर का चित्र ८:६८ तथा ९:६८ पृष्ठों पर
दिया है। उसमें ज्येष्ठेश्वर मन्दिर को लेकर ६
मन्दिर प्रदर्शित किये गये हैं। पुस्तक के चित्र देखने
से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मन्दिरों पर वृक्षादि जम
गये थे। उनकी रक्षा तथा मरम्मत का भी प्रबन्ध
नहीं किया गया। मुद्रित चित्र देखने से मन में भय
का संचार होता है। मन्दिर वास्तव में भूतों का
निवास होगा धारणा अनायास उत्पन्न हो जाती है।
प्रांगण में घास, झाड़ियाँ तथा पेड़ लग गये हैं।
वह एक उपेक्षित वन का रूप प्रकट करता है।
सब कुछ बिखरा, अस्त-व्यस्त, टूटा-फूटा तथा भयंकर
रूप से उपेक्षित तथा विघटित है।
जिस समय मैं दूसरी बार पहुँचा तो घास-पात
वृक्षादि साफ कर दिये गये थे। बड़े मन्दिर का
उपयोग गूजर वर्षा तथा तुषारपात से रक्षा निमित्त
करते हैं। उनमें अपने पशु बाँधते हैं। मन्दिर की
मूर्ति जहाँ थी वहाँ गोबर तथा कीचड़ सड़ रहा
था। मन्दिर में किसी प्रकार की मूर्ति तथा अधिष्ठान
नहीं है। जिस समय यह मन्दिर नष्ट किया गया
होगा, उस समय लिंग किंवा मूर्ति कंकणी नदी में
या तो टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दी गयी होगी।
कर्नल कोल ने ६ मन्दिरों का उल्लेख किया
है। परन्तु मैंने यहाँ पर छोटे-बड़े मिलाकर ११
मन्दिरों का आकार देखा। श्री कोल का प्लान अधूरा
है। तत्कालीन समय में पेड़ों की झुरमुट और सघन
झाड़ियों के कारण, श्री कोल को सबका पता नहीं
लग सका था। बड़े मन्दिरों को ही वे लक्ष्य कर
सके थे।
ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की उत्तर दिशा में ६ मन्दिर
हैं। दक्षिण दिशा में एक भी मन्दिर नहीं है। उत्तर
१५६ राजतरंगिणी
तरफ मन्दिर की नीव से प्रांगण ९२ फीट है। किन्तु
दक्षिण तरफ केवल ३५ फीट है। कोई भी मन्दिर
इस प्रकार अपने मूल रूप में जब कि भारतीय
स्थापत्य, वास्तु तथा मूर्तिकला इतनी विकसित हो
चुकी थी, त्रुटि नही उपस्थित कर सकता। कश्मीर
के प्रायः सब मन्दिर प्रांगण की मध्य रेखा पर ही
मिलेंगे। भूतेश्वर का मन्दिर भी ऐसा ही है।
परन्तु ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर उत्तर-दक्षिण के प्रांगण
खण्ड के मध्य मे नही है। अतएव निश्चय ही दक्षिण
मन्दिर का भाग कंकणी नदी के गर्त मे चला
गया है।
मेरा निश्चित मत है। दक्षिण का भाग कंकणी
नदी मे गिर कर नष्ट हो गया है। ज्येष्ठेश्वर के
उत्तर दिशावर्ती लघु मन्दिर किसी सिधायी मे नही
बने हैं। अतएव मुख्य मन्दिर के निर्माण के पश्चात्
समय-समय पर काश्मीर के राजाओं ने यहाँ मन्दिर
निर्माण कराया था। यह प्रथा प्रायः समस्त भारत में
आज भी प्रचलित है। लोग विशाल मन्दिरों के प्रांगण
में अपने नामो से लघु मन्दिरो का निर्माण कर उसमें
मूर्तियो किंवा लिंगो की प्रतिष्ठा करते हैं।
जनरल श्री कनिंघम के मतानुसार इस मन्दिर
का निर्माण ईसापूर्व २५० वर्ष मे हुआ होगा।
कर्नल कोल इसका निर्माण काल सन् ईसवी का
हो आरम्भिक काल मानते हैं।
ज्येष्ठेश्वर ने मन्दिर के पृष्ठ भाग में तथा
विश्राम अथवा पाठ, किंवा कथा स्थान या वर्तमान
लम्बे चौड़े चबूतरे के ध्वंसावशेष के मध्य मुझे
ने दो ढूंढे तुल्य स्थान मिले। उनमे लम्बे-चौड़े विशाल
भाग शिलाखण्ड लगे हैं। ये भी मन्दिर ही रहे होंगे।
आट का वर्णन किसी अन्य पर्यटक तथा यात्री ने नही
के आ या है।
निरापद वहाँ ध्वंसावशेष होने का सरल अर्थ है। मन्दिर
गये हैं। वे टूटे। उनके मलवा का ढूढ़ा बना जो अब
सन् १८ पात से ढका पड़ा है। यह धारणा मेरी
कोल ने (सुपुर् दृढ़ हो गयी कि वहाँ पर अलंकृत
उत्तर पश्चिम १. णी मन्दिरो में लगाये जाते थे। बिखरे
पड़े थे। वे इस मन्दिर के ही रहे होंगे अन्यथा यहाँ
पर उनके अस्तित्व का कोई अर्थ मालूम नहीं होता।
इस मन्दिर तथा भूतेश्वर के मध्य उक्त चबूतरा
है। यह पूजा पाठ करने तथा विश्राम निमित्त
बरामदा किंवा अलिन्द था। मण्डप शिला स्तम्भों की
अवलियो पर निर्मित था। दोनों मन्दिरों के मध्य
में होने के कारण दोनों मन्दिरो के उपासक, पुजारी
तथा भक्त उससे लाभ उठा सकते थे।
कर्नल कोल को यहाँ बहुत नकाशीदार किंवा
अलंकृत स्तम्भ मिले थे। स्तम्भों के अधिष्ठाने भी अपने
स्थानों पर मिले थे। मुझे इस समय दो चार स्तम्भ
तथा दो ही चार अधिष्ठान मिल सके। उनका व्यास
दो फीट था। शेष गायब थे। इससे २० फीट पूर्व
भूतेश्वर के मन्दिर का प्राकार है।
नागबल किंवा पूर्वीय या द्वितीय मन्दिर समूह
का नाम भूतेश किंवा भूतेश्वर मन्दिर समूह दिया
गया है। इसके प्रांगण का पता दिवाल पर
स्तम्भावली के अधिष्ठान के चिन्हों द्वारा लगाया जा
सकता है। यह १५५ फीट वर्गाकार है। इसका
कोई भाग कंकणी नदी की धारा में ध्वस्त होकर
नही गिरा है। चहार दिवारो का आकार तथा उनकी
नीव मे लगे पत्थर वर्तमान हैं।
मेजर कोल ने मन्दिर के प्रांगण में भूतेश्वर के
विशाल मन्दिर को लेकर केवल सात मन्दिरों की
गणना की है। उन्होंने अपने प्लान में पृष्ठ ६:६६
पर इसे प्रदर्शित किया है। उसमें मन्दिर की उत्तर
दिशा में मन्दिर के मुख्य द्वार के समीप रखी टंकी
किंवा एक ही पत्थर में खोदा हौज है। यह वास्तव
में एक ही पत्थर की आश्चर्यजनक रचना है। यह
२२ फीट लम्बा तथा ७ फीट चौड़ा है। लगभग
इतना ही मोटा है। मानव बुद्धि इस विशालकाय
शिला मे खुदी टंकी को देखकर चकित हो जाती है।
इस दुर्गम स्थान में इतना विशाल शिलाखण्ड किस
प्रकार उठा कर लाया गया होगा सरल मानव बुद्धि
में कौतूहल उत्पन्न करता है।