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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 984 में से

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पृष्ठ 226

प्रथम तरंग १४३

हैं। बागों की यह श्रृंखला पामपूर तक मिलती चली
जाती है। बनिहाल श्रीनगर मार्ग पर है। आगे जाने
पर पामपुर पड़ता है। केसर की खेती के लिए
प्रसिद्ध है। वहाँ की उपजाऊ भूमि, फलदार वृक्षादि
के कारण इस स्थान का चयन अशोक ने किया
होगा।
इस समय मैदान में भारतीय सैनिक छावनी का
कैम्प गत सन् १९४७ ई० से पड़ा है। सैनिक एवं
सुरक्षा की दृष्टि से स्थान श्रेष्ठ माना जायगा। इसके
दक्षिण-पश्चिम वितस्ता तथा पूर्व ओर ऊँची पर्वत-
मालाएँ हैं। दक्षिण में पाण्डु चक पर वितस्ता तथा
पर्वत के मध्य अत्यन्त संकीर्ण मार्ग है। पश्चिम
हस्तम गढ़ी जिस पर इस समय कश्मीर राजा का
प्रासाद बना है। उस पर्वत तथा वितस्ता के मध्य का
स्थान हवाखातून की मज़ार के समीप का मार्ग
४० फीट संकीर्ण हो जाता है। यहाँ महासरित
वितस्ता पर्वत मूल तक खाई का काम करती है।
इस प्रकार यह स्थान प्राकृतिक सुरक्षा वेष्ठित—एक
ओर वितस्ता तथा तीन ओर पर्वत से घिर जाता
है। यही कारण है कि इस समय भारतीय सेना
यहाँ बड़े पैमाने पर रखी गयी है। उसका पूर्ति तथा
सम्भरण केन्द्र है। डोगरा काल में यहाँ कैण्टोनमेण्ट
था। अर्थात् सेना की छावनी थी। अशोक उत्तर-
पश्चिम भारत में रह चुका था। स्वयं युद्ध विद्या में
निपुण था। एक सैनिक होने के नाते उसने इस
स्थान का सैनिक महत्त्व समझा। अतएव इस स्थान
को राजधानी के लिए चुना।
अफगानिस्तान में जिस प्रकार भगवान् की बड़ी
मूर्ति खण्डित की गयी थी उसी प्रकार इस मूर्ति का
हाथ जो सम्भवतः अभय मुद्रा में था खण्डित कर
दिया गया। बामियान मूर्ति की मुखाकृति ललाट
से नीचे बिल्कुल छील दी गयी है। भगवान् त्रिचीवर
धारण किये हुए हैं। इस मूर्ति पर दृष्टि पड़ते ही मुझे
अपनी आँखों देखी बामियान की दोनों मूर्तियां स्मरण
हो आयीं। मैंने उक्त दोनों बामियान की मूर्तियों का
वर्णन विस्तार से अपनी पुस्तक 'आर्याना' में
किया है।
भगवान् की अभय मुद्रा में एक और मूर्ति है।
मूर्ति भव्य है। अनायास मन पर अभय भावना
स्थापित करती है। बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर की
मूर्ति है। यज्ञोपवीत, धोती, वाम कर में मृणाल
सहित पद्म, तथा दायें कर में माला और मूर्धा
पर केश के ऊपर मुकुट है। इस मूर्ति की मुद्रा मुझे
बहुत अच्छी लगी।
मूर्ति की मुखाकृति बड़ी सरल है। मालूम
पड़ता है मूर्ति जैसे कुछ कहना चाहती है। देखकर
मन अनायास मूर्ति की ओर आकर्षित हो जाता है।
संग्रहालय में यहाँ से प्राप्त गगन में गमनशील
गन्धर्व यक्षादि की भी मूर्तियाँ प्रदर्शित की गयी हैं।
यहाँ से प्राप्त दो और मूर्तियाँ दर्शनीय हैं।
एक की संख्या 'ए' १०४ है। यह लुम्बिनी वन में
भगवान् के जन्म की घटना प्रदर्शित करती है।
देवी महामाया शाल वृक्ष की एक शाखा पकड़े खड़ी
हैं। उनका बायाँ हाथ एक महिला के स्कन्ध पर है।
कहते हैं यह महा प्रजापति गौतमी देवी महामाया की
कनिष्ठ बहन थीं। उनका विवाह उनके पति शुद्धो-
दन के साथ हुआ था। भगवान् के जन्म के सातवें
दिन देवी महामाया दिवंगत हो गयी थीं। अतएव
विमाता प्रजापति गौतमी ने भगवान् बुद्ध का लालन-
पालन किया था। भगवान् के बुद्धत्व प्राप्त होने
पर महाप्रजापति गौतमी ने स्वयं प्रव्रज्या ले ली
और अपने ही पुत्र की शिष्या हुईं। पुत्र को शास्ता
स्वीकार किया। देवी ने प्रव्रज्या के पश्चात् यह
मार्मिक शब्द कहा था—मैं तुम्हारी माता हूँ और
आप मेरे शास्ता हो। किन्तु किसी बुद्ध ग्रन्थ में मुझे
नहीं मिला कि प्रजापति गौतमी देवी महामाया के
देवदह जाते समय साथ थीं। सम्भव है कालान्तर में
इस प्रकार की कहानी प्रचलित हो गयी हो। अथवा
किसी लेखक के ग्रन्थ में इसका उल्लेख किया गया
है। जिसके आधार पर यह मूर्ति बनायी गयी है।