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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 984 में से

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पृष्ठ 225

'१४२ राजतरंगिणी

टूट कर गिर गया है। आमलक शेष है। मन्दिर
सिकन्दर बुतशिकन द्वारा पूर्णतया नष्ट न किये जाने
का कारण यह मालूम होता है कि मन्दिर सरोवर
के मध्य में है। मन्दिर का आधार भूमि की सतह से
नीचा है। मन्दिर तोडने की अपेक्षा सरोवर को
मिट्टी से पाट देने पर सरोवर तथा मन्दिर दोनों
का अस्तित्व लोप हो जाता है। सम्भव है यही यहाँ
किया गया होगा। अन्यथा सिकन्दर बुतशिकन के
छापों के सम्मुख बचा रह जाना अनहोनी बात है।
अथवा मिट्टी से सरोवर भर गया होगा। मन्दिर
दृष्टिगत नही हो सका होगा। मैने स्वयं देखा कि
वितस्ता के बाढ के कारण सरोवर पूरा भर गया
था। जल में मन्दिर की पूरी भीत डूब गयी थी।
मन्दिर उपेक्षित पडा था। उसमे वितस्ता जल से
लाई मिट्टी जो शताब्दियो तक जमती रही। मन्दिर
सरोवर मे पड़ने के कारण स्वयं आँखों से लोप हो गया
होगा। काशी मे घाटो पर बने मन्दिर बरसात में गंगा
की मिट्टी जमने के कारण भर जाते है !
मन्दिर के द्वार की ऊपरी देहली पर मूर्तियाँ
बनी है। किन्तु ये कुरूप कर दी गयी है। स्थानीय
लोग इस मन्दिर को पंचमुखी महादेव का मन्दिर
कहते है। मन्दिर के भीतर अलंकृत तथा मूर्तिमय
शिलाखण्ड है। यह मेरुवर्धन स्वामी का मन्दिर
कहा जाता है। मेरुवर्धन राजा पार्थ का प्रधान
मन्त्री था।
अशोक द्वारा निर्मित यही प्राचीन श्रीनगर था।
राजा प्रवरसेन द्वितीय (११०-७० ई० पू०) ने
उक्त मन्दिर निर्माण होने के पूर्व प्रवरपुर अर्थात्
वर्तमान श्रीनगर बसाया था। उसे अपनी राजधानी
बनाया था।
पुराधिष्ठानपुर राजा अभिमन्यु द्वितीय (९६०
ई० पू०) के समय आग लगने के कारण भस्म हो
गया था। इतनी भयंकर आग लगी थी कि इस
मन्दिर के अतिरिक्त जो जल के मध्य मे था और जहाँ
आग नहीं पहुँच सकती थी, सब कुछ जल गया।
मन्दिर की उत्तर दिशा में कुछ खनन कार्य
हुआ था। उसमें पुराने मन्दिरो के पत्थर बिखरे
मिले थे। वहाँ एक ६ फीट ऊँचा शिवलिंग तथा
लगभग १६ फीट ऊँचा टूटा लिंग मिला था। इन
दोनो लिंगो के मध्य एक आसीन मूर्ति का पद तथा
पाँव जो ठेहुनी भर ऊँचा था, मिला था। बैरन
हुगेल ने इसे बुद्ध की प्रतिमा का अवशेष माना है।
ह्यूम ने लिखा है कि पाद तथा पैर २० फिट
ऊँची मूर्ति के अवशेष थे। वह बैठी मूर्ति थी।
उस सरोवर मे एक छोटी नाव बँधी रहती थी।
उससे दर्शक स्वयं नाव लेकर मन्दिर तक पहुँच
जाता था। वहाँ बहुत कम लोग आते थे।
सरोवर बडे नरकुल से भरा लगभग ४० वर्ग गज
मे है। पुराधिष्ठान के अन्य मन्दिरो के ध्वंसावशेषों
के कुछ पत्थर समीपस्थ मस्जिद के निर्माण में
लगाये गये हैं।
प्रश्न उपस्थित होता है ! अशोक ने इस स्थान
को अपनी राजधानी के लिए क्यों चुना ? अशोक
ने यह स्थान दो कारणों से राजधानी निमित्त चुना
होगा। प्रथम कारण यह मालूम होता है कि वितस्ता
का जल इस स्थान को डुबा नही सकता। यह
ऊँचा है। पृष्ठभाग मे पर्वतमाला है। पर्वत के ढाल
के पश्चात् पथरीली ऊँची भूमि है। पर्वत कच्चा
नही पक्का है। पत्थर गया जी के पत्थर की तरह
सख्त है। मैने स्वयं देखा सडक बनाने के लिए
गिट्टी पहाड़ तोड़कर बनाई जा रही थी। बाढ़ आने
पर लोग पीछे पर्वत के ढाल पर जाकर अपनी
रक्षा कर सकते थे। पर्वत के खिसकने का—भूभ्रंश
का भय नही था। इस बात का वितस्ता के बाढ़ तथा
अत्यन्त वर्षा के समय यहाँ रहकर मैने अनुभव
कर लिया।
दूसरा कारण यह मालूम होता है कि वर्तमान
पण्डरेथन ग्राम तथा शंकराचार्य पर्वत तक का भूखण्ड
वितस्ता तथा पर्वतमाला के मध्य समतल तथा
उपजाऊ है। विस्तृत भूखंड है। इस स्थान को
बादामो बाग कहते हैं। यहाँ बादाम के बहुत बगीचे