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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

६४ राजतरंगिणी
नीलेन सहितः प्रायान्नागराजमहात्मना।
तौ गत्वा ब्रह्मसदनं ववन्दतुररिन्दम॥
—143।१९०
देवं कमलयोनिं च संगत्यासनमास्थितौ।
वासुदेवेश्वरौ देवावनन्तं च महामतिम्॥
144।१९१, १९२
तैस्तु संपूजितौ तत्र जलोद्भवविचेष्टितम्।
कथयामासतुर्भो ततो देवः पितामहः॥
145।१९४
संचीयमाने सरसस्तु तोये
चकार मायां स जलोद्भवोऽद्यः।
अथान्धकारं ससृजे समन्ता-
दृष्ट्टयमसीद्भुवनं नृवीर॥
—170।२२२ : २२३
जलोद्भवासृजा मत्तस्तदा चक्रः सुदर्शनः।
वभ्राम देशं शून्यं तं सं च जग्राह शंकरः॥
188।२४२
ऋषयो देवता नागा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।
द्रष्टुं सर्वे समाजग्मुर्जलोद्भवसररथ॥
197।२५९
जलोद्भव भयंकर क्रूरकर्मा हो गया था। प्रजा-
पति कश्यप तीर्थयात्रा पर निकले थे। कश्यप से
कनखल मे आकर नील नाग मिला। उनकी पूजा की।
काश्मीर की तीर्थयात्रा निमित्त निवेदन किया।
जलोद्भव के अत्याचार की करुण कथा सुनाई।
सतीसर के विमल सरोवर की तीर्थयात्रा निमित्त
कश्यप उद्यत हो गये। नीलमत पुराण मे निम्न-
लिखित उल्लेख इस सम्बन्ध में आता है।
कश्यप महर्षि ब्रह्मलोक में नील नाग के साथ
गये। वहाँ से ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सराबित
नौबंधन तीर्थ की ओर प्रस्थान किये। उनका अनुकरण
देवताओं ने किया। असुरो ने किया। वें अपने-अपने
वाहनों के साथ चले। नौबंधन पहुंचे। केशव
दृढ़तापूर्वक वहाँ स्थित हो गये। सुर और असुर
दोनों की सेना नौबंधन पहुँची। इस महान् वाहिनी
की तुमुल ध्वनि जलोद्भव दैत्य ने सुनी, व दहल
गया। सुरक्षा निमित्त जल मे छिप गया। शत्रु दैत्य
जल से बाहर नही निकल रहा था। उसे जल से
बाहर निकलता नही देखकर मधुसूदन नौबंधन में
प्रवेश किये। नौबंधन पहुँचकर (कासर नाग
अथवा क्रमशसर के) तीनों शिखरों के मध्य मे शिव,
दक्षिण हरि तथा उत्तर शिखर पर ब्रह्मा ने स्थान
ग्रहण किया।
नौबन्धनमथासाद्य केशवो वै व्यवस्थितः॥
देवानुयात्रनिनदं श्रुत्वा दैत्योऽपि दुर्मतिः।
जले त्वव्यथ्यमानं भानं विदित्वा न विनिर्गतः॥
—162।२१३. २१४
अनिर्गतं तं च तदा विज्ञाय मधुसूदनः।
नौबंध एवमुदितो विवेशाथ सुरैः सह॥
—163।२१५,
नौबन्धशिखरे रुद्रो दक्षिणे शिखरे हरिः।
उत्तरे शिखरे ब्रह्मा देषामनुसुरासुरः॥
—164।२१६
एवं ते विविशुः शैले ततो देवो जनार्दनः।
अनन्तमाह धर्मात्मा वधार्थं दानवस्य तु॥
—165।२१७
जलोद्भव जल में था। विचलित नही हुआ।
बिना जल निकले दैत्य दृष्टिगत नही हो सकता था।
अतएव भगवान् अनन्त ने पर्वतराज को विदारित
कर दिया। जल वेग से निकलने लगा। जल
निकल जाने पर जल स्थित सभी भूत संज्ञाहीन
हो गये।
जलोद्भव ने अंधकार का सृजन किया। घोर
अंधकार में नौबंधन आवृत हो गया। शंभु ने अपने
दोनो करों में सूर्य तथा चन्द्रमा को लिया। अंधकार
तिरोहित हो गया। विष्णु ने दैत्य को देखा।
विष्णु और जलोद्भव का युद्ध आरम्भ हुआ। भीषण

प्रथम तरंग ४७
युद्ध के पश्चात् भगवान् के चक्र द्वारा जलोद्भव का
मुंड छिन्न हो गया ।
नीलमत पुराण में वारहमूला के पास जल
निकालने की तरफ संकेत किया गया है ।
नीलाम्बरः काञ्चनबद्धमौलिः संपूज्यमानस्त्रिदशैः समेतैः।
विदारयामास स लाङ्गलेन हिमाचलं शैलवरं पृथिव्याम् ॥
—168।२२०
विदारिते पर्वतराजराजे विनिर्ययौ तज्जलमाशुवेगात् ।
वेगेन शब्देन च सर्वभूतान् सन्त्रासयानं कुटिलैस्तरंगैः॥
२२१
हिमाचलाभैर्गगनम् स्पृशद्भिः सम्प्लावमानम्
गिरिमस्तकानि ॥ —161।२२१, २२२
अस्मिन्वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल ।
मारीचाय ददौ दक्षः कश्यपाय त्रयोदश ॥
—46।६७-७०
एतस्मिन्नेव काले तु कश्यपो भगवान् ऋषिः ।
तीर्थयात्राप्रसंगेन चचार सकलां महीं ॥
—81।१२३-१२४
तीर्थयात्रागतं श्रुत्वा कश्यपं पन्नगाधिपः ।
नीलो जगाम तं द्रष्टुं तीर्थे कनखले तथा ॥
—96।१३९
उपविष्टस्तदा नागो व्यज्ञापयत कश्यपम् ।
पितरं तपसां स्थानं यत्तच्छृणु नराधिप ॥
—99।१४२
उत्तीर्य च महाभागो विपाशां पापनाशिनीम् ।
दृष्टवान् सकलं देशं तदा शून्यं स कश्यपः ॥
—133।१७६
द्रष्टव्यैष कश्यपः प्रायाच्छ्रुत्वास्तान् पुरन्दरः ।
ततो देवगणैः सार्धं यान्यस्मिन्केशवान्तिकम् ॥
—149।२०१
तस्योदगाश्रमं चक्रे ब्रह्मा देववरः स्वयम् ।
पश्चार्धे चाश्रमं चक्रे कश्यपो भगवानृषिः ॥
—180।२३३-२३४
देवर्षिनागमुख्येष्वथितिष्ठत्स्वेव च कश्यपः ।
उवाच वरदं विष्णुं हस्तौ बद्ध्वा पुरः स्थितः ॥
—198।२६०
वसतां रमणीयश्च पुण्यश्च भविता तथा ।
कश्यपे ब्रुवतीत्येवं नागा वचनमब्रुवन् ॥
—199।२६३-२६४
न वय मानुषैः सार्धं वसामो मुनिपुंगव ।
तानुवाच तथा क्रुद्धः कश्यपो वै प्रजापतिः ॥
— 201।२६६-२६
एवं उक्ते कश्यपेन नीलः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
एते क्रोधवशा ब्रह्मन्नाभिजानन्ति किंचन ॥
—202।२६८-२६९
कश्यपस्तमुवाचाथ ऋषिः परमधार्मिकः ।
वालुकार्णवमध्ये तु द्वीपः षड्योजनायतः ॥
—203।२७६-२७७
कः प्रजापतिरद्दिष्टः कश्यपश्च प्रजापतिः ।
तेनेदं निर्मितं देशं काश्मीराख्यं भविष्यति ॥
—218।२९१-२९२
एवं निष्पिष्टान् काश्मीरान्दृष्ट्वा हृष्टस्तु कश्यपः ।
आराध्य शंकरं देवमुमां देवीमचोदयत् ॥
—228।३०५
अदितिर्देवमाता च कश्यपेन प्रचोदिता ।
त्रिकोटीनांमतो भूत्वा नदीदेशे प्रपर्पति ॥
—231।३०८
शक्रपत्नी शची या च सा च कश्यपचोदिता ।
नाम्ना इयं यथा याता देशेऽस्मिन् पापसूदनी ॥
—232।३०९
एवं कश्यपवाक्येन देयदानवमातरः ।
देवपत्न्यस्तथा पुण्याः सरिद्रूपत्वमागताः ॥
—234।३११
तत्र कश्यपवाक्येन तीर्थसागरनिम्नगाः ।
काश्मीराय तदा जग्मुः सान्निध्यं पुण्यवृद्धये ॥
—235।३१२

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-वार पाठ (लिप्यंतरण) दिया गया है:

४८ राजतरंगिणी
कदाचित्कश्यपं द्रष्टुं ययुर्देव्यः प्रकीर्तिताः ।
तास्तत्र चोदयामास कश्यपो भगवानृषिः ॥
—239।३१६-३१७
आराधयामास तदा सम्यर्थेन तु शंकरम् ।
तदोवाच हरो भार्या कुरु कश्यपभाषितम् ।
—242।३२३-३२४
रसातलं जगामासौ पुनस्तामेव कश्यपः ।
प्रसाद्योन्माजयामास पञ्चहस्त समीपतः ॥
—255,३४५-३४६
सा च दृष्ट्वा कृतघ्नेन तिरोधानं गता पुनः ।
भूयः कश्यपवाक्येन चोदिता निम्नगोत्तमा ॥
—257।३४७-३४८
भूयः कश्यपवाक्येन नरसिंहाश्रमे शुभा ।
उन्मज्जिता नदी विप्रैस्तूयमाना सहस्रशः ॥
—259।३४९-३५०
क्रोशमात्रे ततो दृष्ट्वा द्वाद्गभेन महानदी ।
अन्तर्द्धानं जगामासौ ततस्तामाह कश्यपः ॥
—260।३५०-३५१
एवं प्रसादिता भक्त्या कश्यपेन महात्मना ।
उवाच कश्यपं देवी तं तथावादिनं तदा ॥
—-266।३५७
एवं मशांकां विज्ञाय कश्यपस्त्वब्रवीत् पुनः ।
त्वमेव परमा शक्तिर्वसुभिर्मरुद्भिः स्तुता ।
क्षीरोदकन्ये विरजे पवित्रे मङ्गलास्पदे ॥
—273।३६७-३६८
पुनस्तां तु महाभागां ऋषिः प्रोवाच कश्यपः ।
अवश्यं हलमार्गेण गन्तव्यं सुभगे त्वया ॥
—300।३९९-४००
अन्यथा देश एवायं सरस्त्वमुपयास्यति ।
भूयो भूयश्चोद्यमाना कश्यपेन सरिद्वरा ॥
—301।४००-४०१
एषा हि पापशमनी वितस्ता निम्नगोत्तमा ।
कश्यपस्य तु वाक्येन लक्ष्म्या महगता क्षितिम् ॥
—321।४२२
प्रजापतिः कश्यपो हि सर्वभूतपिता प्रभो ।
त्वया तु शोभतेऽत्यर्थं पुत्रेणात्यन्तधार्मिकः ॥
—352।४५५
कार्त्तिक्यां समतीतायां संप्राप्ते प्रथमेऽहनि ।
कश्मीरा निर्मिता पूर्वं कश्यपेन महात्मना ॥
—450।५६१
ब्राह्मयं कश्यपं वह्निं धातुं गगनमेव च ।
माल्यैर्गन्धैस्तथा धूपैर्नैवेद्यैश्च पृथक् पृथक् ॥
—542।६६४
ऋषयो बालखिल्याश्च कश्यपास्त्यनारदाः ।
तथैवाप्सरसः पुण्याः पूज्या देवाश्च सोमपाः ॥
—605।७२७
आषाढ्यां समतीतायां यदा स्याद् द्विजरोहिणी ।
तदा तु कश्यपः पूज्यो देशस्यास्य प्रवर्तकः ॥
—710।८४७
दिवाकरेण सौम्येन वह्निना पवनेन च ।
कश्यपेनाथ भृगुना पुलस्त्येन तथात्रिणा ॥
—1155।१३६६-१३६७
रामोऽपि तपसा दीप्तो वाजिमेधे महाक्रतौ ॥
दत्वा महीं कश्यपाय महेन्द्रं पर्वतं गतः ॥
—-1225।१४३८-१४३९
नीलमत पुराण से मालूम होता है कि वारमौर
मे कश्यप स्वामी, कश्यपेशा तथा कश्यपेश्वर के देव-
स्थान थे ।
कश्यपस्वामी :
कार्त्तवीर्यार्जुनस्वामी दृष्ट्वा तं च दिवाकरम् ।
मार्तण्डं कश्यपस्वामि विश्वगाङ्गरुतं रविम् ॥
—1017।११९८९
ब्रह्माखं वरदं दृष्ट्वा शैलरूपधरं स्वयम् ।
विष्णुस्वामि हरस्वामि कश्यपस्वामिनस्तथा ॥
—1019।११९१
कश्यपेशाः
चक्रेश्वरं सचन्द्रेशं कश्यपेशां विलोहितम् ।
कामेशां स चमिष्टेशां भूतेशं सगडेश्वरम् ॥
—1023।११९४-९५

प्रथम तरङ्ग
४९

[बायाँ स्तम्भ]
कश्यपेश्वरः
हिमाचलेशं शंखेशं देशं चैवसिलेश्वरम् ।
महानन्दीश्वरं शम्भुं वरदं कश्यपेश्वरम् ॥
—1025।१९९७
शम्भुंस्तथा चन्द्रदिवाकरौ द्वौ जग्राह देवोऽथ करद्वयेन।
प्रकाशमासीज्जगतो निमेषाद्ध्वस्तं तथा सर्वमथान्धकारम् ॥ 171।२२३-२२४
ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयः योगेन कृत्वा स्वपरं शरीरम्
दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं देहेन चान्येन स युद्धमैक्षत् ॥—172।२२४
विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च
युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ 173।२२५-२२६
जल निकल जाने के कारण सतीसर सुंदर आनंद
कानन में परिणत हो गया । अबुल फजल आइने
अकबरी में लिखता है—'जब जल घट गया, तो
कश्यप जो अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे, ब्राह्मणो
को इस देश मे आबाद करने के लिए लाये । आद-
मियो की तादाद बहुत बढ गयी, तो शासन करना
आवश्यक हो गया ।
'सभा में एक मत से लोगो ने जो उनमें गुणी
था, राजा चुन लिया । उस समय से काश्मीर में
राजतंत्र स्थापित हो गया । राजा गोनन्द के समय
तक चलता रहा । उसे आज अर्थात् १४ वर्ष अकबर
के शासन काल से ४४४४ वर्ष हो चुके हैं ।'
कश्यपपुर ( मुलतान ) मुलतान का प्राचीन
नाम था । तत्पश्चात् हंसपुर, वेगपुर, शांबपुर तथा
अंत में इसका नाम मूलस्थान हुआ । वर्तमान मुलतान
शब्द मूलस्थान का अपभ्रंश है ।
लगभग ३००० वर्ष ईसा पूर्व मुलतान का निश्चित
नाम क्या था, कहना कठिन है महेनजोदारो तथा
हरप्पा से इस नगर का संबंध जल और स्थल दोनों
मार्गों से था । यह निर्विवाद है । मुलतान का नाम
ई० पू० ६०० वर्ष मे प्रकाश में आया है ।
७

[दायाँ स्तम्भ]
ऊपर लिख चुका हूँ, मुलतान का प्राचीन भार-
तीय नाम कश्यपपुर था । फारसी तथा प्राकृत भाषा
में मुलतान को कश्यपपुर नाम से संबोधित किया
गया है । हेकालोरस ने इसका यूनानी नाम 'कश-
पापैरोम' दिया है । यह यूनानी शब्द निसंदेह कश्य-
पुर का अपभ्रंश है ।
प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने 'कश-
पतेरोस' नाम का उल्लेख किया है । अलकझेंद्र
अर्थात् सिकंदर के ऐतिहासिको ने मुलतान को
'मोल्लियों' की राजधानी बताया है । प्तोलेमी ने
'कसपुर' नाम दिया है । यह शब्द कश्यपपुर का
अपभ्रंश है ।
सन् ६४१ ई० में व्हेनसांग भारत आया था ।
पर्यटन काल में इस स्थान की यात्रा की थी । मुल-
तान के विशाल सूर्य मंदिर तथा नगर का अद्भुत
वर्णन करता है ।
आठवी शताब्दी के पश्चात् मूलस्थान का अप-
भ्रंश मुलतान हो गया । एक प्राचीन गाथा है ।
भगवान् नरसिंह ने यहाँ अवतार लिया था । नरसिंह
भगवान् ने हिरण्यकश्यप राक्षस का वध किया था ।
हिरण्यकश्यप राक्षसो का राजा था । हिरण्य शब्द
के साथ कश्यप शब्द इस बात का बोध कराता है
कि हिरण्यकश्यप का संबंध कश्यप वंश तथा कश्यप-
पुर से था ।
कश्यप राक्षसों के आद्य पुरुष थे । हिरण्य-
कश्यप का पुत्र विष्णु का उपासक था । राक्षस,
पिशाच तथा नाग जाति शिव की उपासक थी ।
हिरण्यकश्यप संभवतः विष्णु पूजा का विरोधी था ।
उसका यह विरोध विष्णु भक्ति की ओर आकर्षित
प्रह्लाद के प्रति उग्र हो उठा । अनुमान किया जा
सकता है । नरसिंहावतार की कथा शैव तथा वैष्णव
मत के संघर्ष का एक रूपक है ।
कश्यपपुर का नाम मूलस्थान किस प्रकार पड़
गया । विचारणीय विषय है । मैं समझता हूँ, ।
जहाँ भगवान् के अवतार लेने के स्थान का संकेत

५० राजतरंगिणी
प्राचीन काल मे मिलता रहा होगा। उस स्थान का
नाम मूलस्थान रख दिया गया। मुस्लिम काल मे
प्रथम बार काशी का मंदिर जहाँ तोड़ा गया था
उसी के समीप मे 'आदि विश्वेश्वर' की स्थापना
हो गयो। दूसरे विश्वनाथजी के मंदिर का निर्माण
अकबर काल मे हुआ था। आदि विश्वेश्वर के नाम
से काशी मे एक मुहल्ला भी है। मथुरा में भगवान्
श्रीकृष्ण का जिस स्थान पर जन्म हुआ था उसे
जन्मभूमि कहते है। वहाँ पर इस समय मस्जिद
है। मस्जिद के पृष्ठभाग मे जन्मस्थान का स्मारक
निर्माण कर दिया गया है।
यही बात मुलतान के विषय मे हुई होगी।
आदि अर्थात् मूल मंदिर जिस स्थान पर रहा होगा
उसे 'मूलस्थान' कहा गया। तीर्थस्थान होने के कारण
नाम प्रचलित हो गया। हिंदू काल मे मूलस्थान
तथा मुसलिम काल मे अपभ्रंश होकर मुलतान नाम
पड़ गया।
पुरासंस्कृत साहित्य मे मूलस्थान का उल्लेख
मिलता है। रावी नदी के मध्य दो द्वीपों पर उसके
बसने का वर्णन किया गया है। प्रसिद्ध चीनी पर्यटक
युवान च्वांग ने इस नगर की यात्रा की थी। उसने
मूलस्थान का स्थान सिंध के पूर्व ९० मील बताया
है। जनरल कनिंघमने उसे मुलतान माना है।
सौवीर सिंधु नदी के पूर्व तथा सिंधु और
वितस्ता के मध्यवर्ती भाग को माना गया है। यह
देश, प्रदेश किंवा क्षेत्र मुलतान तक विस्तृत था।
सिंधु देश को युवान चांग ने सिंध नदी के पश्चिम
का भूखंड बताया है।
मार्कंडेय, ब्रह्मांड, वायु तथा मत्स्य पुराण के
अनुसार सौवीर में मुलतान तथा झरावार क्षेत्र
सम्मिलित थे । झरावार क्षेत्र वितस्ता (झेलम)
तथा चंद्रभागा (चेनाव) के संगम से ५० मील
अधोभाग पर स्थित था। मुलतान सौवीर प्रदेश के
उत्तर मे था।
स्कंदपुराण ने भारत को ९ खंड तथा ७१
विभेदों में बाँटा है। किंतु नाम ७५ का दिया है।
मूलस्थान क्षेत्र की क्रमसंख्या तालिका मे ७वीं है।
उसमें २५ हजार ग्राम थे। ग्रामों की संख्या स्वल्प
होने के कारण अनुमान लगाया जा सकता है।
मुलतान क्षेत्र बहुत बड़ा नहीं था।
वाराह क्षेत्र—सोमदेव भट्ट 'कथासरित-
सागर' में उल्लेख करता है कि भगवान् विष्णु ने
स्वयं वाराह क्षेत्र को पवित्र किया था।—'वाराहं
यच्च क्षेत्रं ये पूताश्चक्रपाणिना—।'(७.५ : ३७)
क्षेमेंद्र ने लोक प्रकाश मे वाराह क्षेत्र का उल्लेख
करते लिखता है 'वाराह क्षेत्र—कोट विहार समीपे—'
मैं यहाँ दो शब्द वाराह क्षेत्र माहात्म्य के विषय मे
लिखना चाहता हूँ। बारहकूला के 'खादनयार' गाँव
के आगे से वितस्ता की धारा में तेजी आ जाती है।
इसके पश्चात् वितस्ता मे नाव चलना संभव नहीं
होता। इस स्थान पर दोनो पार्श्व में पर्वत हैं।
पर्वतों के मध्य मध्ये अधिक संकुचित यह स्थान है।
यहाँ मे वितस्ता वेगवती हो जाती है। स्पष्ट प्रतीत
होता है। जल दौड़ता नीचे की ओर भागा जा रहा
है। यहाँ यदि पानी रोक दिया जाय तो समस्त
काश्मीर उपत्यका के पानी का स्तर ऊपर उठ
जायेगा। समस्त काश्मीर मंडल पूर्वकालीन वर्णित
सतीसर तुल्य हो जायगा। केवल सारिका पर्वत
तथा उसका स्थान जल मे द्वीप के समान प्रकट
होगा।
यही पर पर्वत काटकर संकीर्ण जल मार्ग
विस्तृत किया गया था। नदी की सतह की चट्टानो
को खोदकर नदी का पेटा गहरा किया गया था।
यही वितस्ता द्वारा पानी निकालकर काश्मीर उपत्यका
सूखी भूमि बनाई गई थी। इस स्थान तथा उपत्यका
का भूगोल समझ लेने पर प्राचीन कथा की सत्यता
सिद्ध हो जाती है।
मैने इस स्थान को देखा है। वितस्ता नदी में
इस समय भी एक चट्टान जल मे टकराती, तटीय

प्रथम तरंग
५१


[बायाँ स्तम्भ]

पर्वत के वाम पार्श्व मे लगी खड़ी है। इससे कुछ आगे
चलकर द्रंगबल नाला वितस्ता के दक्षिणी तट पर
आकर मिलता है। नाले की दो शाखाएं हो जाती
हैं। मूलत एक ही स्थान पर उनका उद्गम है।
यह नाला पहाड़ से शिलाखंड, रेत तथा पंकराशि
लाकर नदी के गर्त को पाटता रहता है। नदी का
गर्त किंवा पेटा साफ करने के लिए यहीं पर बाढ़
विभाग की तरफ से इस समय कार्य हो रहा है।
दो बुलडोजर काम कर रहे थे। नदी से पंकराशि
निकाल कर बाहर फेंक रहे थे।
वारहमूला में दो श्मशान भूमियां हैं। मैने यहाँ
की चार बार यात्राएँ की हैं। सन् १९६० में आया
था तो चिता पर शव जल रहे थे। एक सिखो का
श्मशान है दूसरा हिन्दुओ का है। यदि इस संकुचित
स्थान पर शिलाखंड, रेत तथा पंकराशि भर जाय
तो वितस्ता की जलधारा अनायास रुक जायेगी।
काश्मीर उपत्यका का जल वेग से बाहर नही निकल
पायेगा। काश्मीर उपत्यका मे जल रुककर काश्मीर
उपत्यका का जलस्तर ऊपर उठा देगा । वूलर
तथा डल आदि सरों का जल उठकर उपत्यका को
एक विशाल सर मे परिणत कर देगा। उसे आप्ला-
वित करने लगेगा। एतदर्थ प्राचीन काल से इस
स्थान पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। नदी
का जल वेग से बाहर निकलता जाय। इसके लिए
समय समय पर योजनाएँ बनाई गई हैं। उनका
यथास्थान वर्णन किया गया है।
यहीं पर एक पुराना 'द्रंग' अर्थात् चौकी था।
• स्थान इतना संकुचित है कि काश्मीर मंडल प्रवेश
द्वार का कार्य करता है। सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्व
रखता है। प्राचीन द्रंग के कारण नाला का नाम
द्रंगबल पड़ गया है। इस स्थान पर हिन्दू काल में
द्वारपति अर्थात् उच्च सेनाधिकारी की नियुक्ति की
जाती थी। काश्मीर के सैनिक इतिहास में द्वारपति
का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान तथा योगदान रहा है।
इसका पद सेनापति के समान समझा जाता था।


[दायाँ स्तम्भ]

नारायण स्थान :
इस नाला से नदी के अधोभाग की ओर बढने
पर नारायण मंदिर मिलता है। इसे नीलमत में
नारायण स्थान कहा गया है। यह मंदिर वितस्ता
के दक्षिण तट पर स्थित है। बारहमूला से एक
मील दूर होगा। पुरानी बारहमूला मुजफ्फराबाद
रोड पर है। यह पहाड़ा के मूल में है। वर्तमान
यारहमूला सडक के निर्माण के पूर्व यह सड़क खूब
चलती थी।
मंदिर सवा तेरह वर्ग फुट में है। मंदिर में
केवल एक द्वार तीन फुट चौड़ा है। मंदिर के समीप
एक नाग अर्थात् जलस्रोत है। नारायण मंदिर पूर्व
काल में एक सुन्दर निर्मल सरोवर के मध्य मे स्थित
था। इस समय मंदिर के पृष्ठभाग का सरोवर स्थान
रेत तथा पंक से पट गया है। मंदिर पूर्णतया खंडहर
की हालत मे है। मंदिर का एक भाग भूमि के अंदर
है। मंदिर द्वार के सम्मुख कुछ सरोवर का भाग
अपनी पूर्व स्थिति का स्मरण कराता है। करुण
गाथा सुनाता है। यात्रियो से अपनी दशा पर सहानु-
भूति के लिए याचना करता है। जलस्रोत आँसुओं
की तरह निकलता रहता है।
मंदिर के पृष्ठ भाग में एक कब्रिस्तान है। कुछ
दिनो में सरोवर का शेष भाग रेत और पंक से पट
जायगा। मंदिर का अस्तित्व केवल पुस्तको मे शेष
रहेगा। मंदिर में मूर्ति नही है। शायद कोई उठा
ले गया है। किंवा कब्रिस्तान के किसी कब्र में लगी
होगी। अथवा किसी के मकान की नींव में पड़ी सो
रही होगी। मंदिर में लगे कुछ पत्थर ९ १/२ फुट लम्बे
तथा १३ इंच मोटे हैं। मंदिर के भग्नावशेष यत्र-तत्र
पड़े दिखाई देते हैं।
मैं अन्तिम बार यहाँ आया था सन् १९६४ में।
उस समय यहाँ के बहुत वृक्ष कट चुके थे। स्थान की
अभिरामता नष्ट हो रही थी। दो, तीन सहतूत के
पेड़ सरोवर के तीर पर लगे थे। उन्हे भी काटा जा
रहा था। किसी समय का सुरम्य देवस्थान कब्रि-

द्वितीय तरङ्ग: प्रतापसिंह व अन्य शासक

५२ राजतरंगिणी

स्थान के सम्पर्क में रहने के कारण सचमुच श्मशान [L3_col2] वाराह अवतार—वाराह भगवान् का अवतार
हो गया है। [L4_col2] मालूम होता है। इसी क्षेत्र में हुआ था। कल्हण ने
इस स्थान से वितस्ता की धारा में वेग आ [L5_col2] तरंग २ के श्लोक १९२ में वराह वर्त शब्द का प्रयोग
जाता है। एक मील और धारा के साथ जाने के [L6_col2] किया है। यह स्थान वर्तमान वराहगाम के समीप
पश्चात् वितस्ता नदी अपना शांत स्थिर रूप त्याग [L7_col2] होना चाहिए। वराह ग्राम वोरु परगना में है। द्रंग
कर हर-हर करती गर्त में प्रवेश करती है। चट्टानों [L8_col2] में तीन मील पूर्व होगा। आदिवराह का यहाँ अवतार
और ढोकों से टकराती उगे तक चली जाती है। [L9_col2] लेना कहा जाता है। वारहमूला अर्थात् मूल वाराह
नीलमत पुराण में नारायण स्थान का उल्लेख [L10_col2] किंवा वराह नाम से इसीलिए संबोधित किया
आता है। [L11_col2] गया है।
नारायणस्य च स्थानं सपुण्यं बदराश्रमम् । [L12_col2] बर्नियर का अभिभावक दानिशमंदखाँ था जिसके साथ
सुगन्धां शतकुम्भां च कालिकाश्रममेव च ॥ [L13_col2] वह कश्मीर गया था। वह एक रोचक कहानी उपस्थित
—४7 : १२८, १२९ [L14_col2] करता है—'दानिशमंद खाँ ने मुझे वारहमूला जाकर
देवं नारायणं स्थाने पश्चिमे तु वरप्रदम् । [L15_col2] एक अलौकिक घटना देखने के लिए कहा। तात्पर्य
गजेन्द्रमोक्षणं देवं वराहस्य समीपगम् ॥ [L16_col2] यह था कि मैं इस दैवी चमत्कार को देखकर अपना
—1158 : १३६९, १३७० [L17_col2] धर्म परिवर्तन कर दूँ और मुसलमान हो जाऊँ। यहाँ
स्नात्वा नारायणस्थाने विष्णुलोके महीयते । [L18_col2] पर एक मसजिद है। एक दरवेश की कब्र है। यह
रामतीर्थे भवाब्धौ च फलमेतद् प्रकीर्तितम् ॥ [L19_col2] कब्र एक मसजिद में है। यद्यपि दरवेश मर चुके हैं।
—1312 : १५२६ [L20_col2] अलौकिक ढंग से बीमार तथा पशुओं को अच्छा करते
स्नात्वा नारायणस्थाने वितस्ताम्भसि पार्थिव । [L21_col2] हैं। चाहे मैं इस चमत्कार पर विश्वास न करूँ
विष्णुलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ [L22_col2] परंतु यहाँ एक दूसरी चीज और है। उस दरवेश
—1345 : १५६० [L23_col2] के कारण यह चमत्कार होता है। यहाँ एक गोल
नीलमत पुराण में नारायण स्थल का दो स्थानों [L24_col2] पत्थर है। उसे मजबूत से मजबूत आदमी नहीं उठा
पर तीर्थरूप में वर्णन किया गया है। मालूम होता [L25_col2] सकता। यदि ११ आदमी दरवेश की प्रार्थना कर
है, दो नारायण स्थान थे। श्लोक संख्या १३४५, [L26_col2] अपनी एक-एक उंगली इसमे लगाकर उठाएँ तो
१५६० तथा १५९८ में वाराह क्षेत्र का उल्लेख [L27_col2] वह सूखे तिनके की तरह हल्का उठ जाता है।
है। परन्तु श्लोक संख्या १३१२, १५२६ में वाराह [L28_col2] 'मुझे वारहमूला अच्छा लगा। दरवेश की
क्षेत्र का उल्लेख नहीं है। [L29_col2] ज़ियारत और कब्र कीमती सामान से सजी थी। उसे
महाभारत वन पर्व (८३ १८-१९) में वराहा- [L30_col2] घेर कर बहुत से लोग बैठे थे। वे कहते थे कि
वतार स्थान के विषय में उल्लेख मिलता है। [L31_col2] वे बीमार थे। अच्छे होने के लिए आये थे। मसजिद
कुरुक्षेत्र सीमा के अन्तर्गत यह एक तीर्थ है। भगवान् [L32_col2] की बगल में एक बावर्ची खाना था। वहाँ देग चढ़ा
विष्णु ने यहाँ वाराह रूप में अवतार लिया था। इस [L33_col2] था। उसमें चावल तथा गोश्त पक रहा था। मैं
तीर्थ में स्नान करने पर स्नानार्थी को अग्निष्टोम यज्ञ [L34_col2] समझ गया। इस देग के चुम्बकीय भांति पदार्थ के
करने का फल प्राप्त होता है। वाराह क्षेत्र के विषय [L35_col2] आकर्षण के कारण गरीब तथा बीमार एकत्र हो गये
में यथा स्थानपर वर्णन किया गया है। [L36_col2] थे। मसजिद की दूसरी तरफ मुल्ला का मकान था।
[L37_col2] बाग था। यहाँ में पामदानी बगता था। उसकी तारीफ

करने में लोग होड़ लगाए थे । जब तक में वहाँ था,
एक भी बीमार आदमी अच्छा होते नहीं देखा ।
'वह पत्थर जो मुझे मुसलमान धर्म में दीक्षित
करने के लिए वहाँ पड़ा था, उसे ११ मुल्ला घेर
कर खड़े थे । वे इस प्रकार उसे घेर कर खड़े थे कि
मैं कठिनता से अन्दर देख सकता था। मैंने इस धोखे
की बात को किसी प्रकार देख लिया । मुल्ला लोग
एक उँगली की जगह अपना अंगूठा तथा उँगलियाँ
पत्थर से लगाए थे । वे उसे उठाये । वहाँ खड़े लोग
चिल्लाने लगे—करामात-करामात । मैंने उन्हें एक
रुपया देकर कहा । क्या ग्यारह उठाने वालों में वे
मुझे भी एक शामिल कर लेंगे। उन्होंने अनिच्छा
प्रकट की । परन्तु मैंने श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए एक
रुपया और दिया तो एक मुल्ला हट गया । मैंने
उसमें अपनी केवल एक उँगली लगाई थी । अतएव
पत्थर उठाते समय मेरी तरफ झुका जाता था । मुल्ला
मेरी ओर बुरी निगाह से देखने लगे । अंत में मैंने
इसमें बुद्धिमानी समझी कि उँगली तथा अँगूठा दोनों
लगाया जाय । पत्थर मुश्किल से उठा । मैं भी
करामात करामात कहने लगा । मैं एक रुपया और
फेंककर चुपचाप वहाँ से चल दिया । मैंने कुछ जल-
पान नहीं किया था। दरवेश को नर्मदा के लिए
नमस्कार किया। मैंने बारहमूला का वह स्थान
देखा । जहाँ तंग रास्ते से पानी बहता चला जा रहा
था (पृष्ठ ५५-२१२-४१६) ।" बर्नियर ने यहाँ
किसी मन्दिर आदि का वर्णन नहीं किया है । संभव
है। वैरी नाग की तरह औरंगजेब के समय मन्दिर नष्ट
कर दिए गये हों ।
संदर्भ : वाराह वैदिक देवता तथा पौराणिक
अवतार है । उनका उल्लेख ऋ० १:६१:७, १:८८:५;
१:२१:११; १:१४४:५; १०:८६.४' ८:७७:१०,
९:९७:७; ११०:२८:४; १०:८६:४; १०:९९:६;
काठक संहिता ८:२'२५:२; मैत्रायणी संहिता
३:१४:१९, तैत्तिरीय संहिता ६:२.४:१; ७.२:५:१,
तैत्तिरीय आरण्यक १:९:४; शतपथ ब्राह्मण
५.४:३:; तैत्तिरीय ब्राह्मण १:१:३; १:१:१६;
१:७.९:४, में मिलता है ।
पुराण : मत्स्य : ४७:४७ भागवत : १:३:२७;
३:१३, लिग १.९४, वायु २:३५, हरिवंश १:४१,
पद्म. उ०: ६९,२३७, वराह १३७:१४० मत्स्य
१७३, तथा महाभारत : सभापर्व : २८.२९, वनपर्व
८३: ८-१९ में उल्लेख मिलता है ।
बारहमूला—वारिमूल : वारिमूल शब्द का
अपभ्रंश बारहमूला हो सकता है । वारिमूल चाक्षुष
मन्वंतर काल के एक देवता है। वारि किंवा वारि
शब्द का अर्थ जल होता है । मूल शब्द का अर्थ
उदगम् स्थान अर्थात् जड़ होता है । जहाँ से कोई
चीज उत्पन्न होती है । काश्मीर जिस समय सतीसर
के रूप में जलमय रहा होगा, उस समय इसी स्थान
से जल स्रोत के रूप में जल निकाला गया होगा ।
उसका उद्गम अर्थात् मूल यही स्थान था । देवता
तथा अलंकार दोनों दृष्टियों से इसका नाम आज से
सहस्त्रों वर्ष पूर्व 'वारिमूल' दिया गया होगा ।
कालांतर में वारि शब्द वार हो गया। उसमें मूल
शब्द जोड़ देने में उसका पूर्ण नाम वारमूल हो
गया । वराह अवतार का नाम कालांतर में वहीं
वारिमूल के साथ जोड़ दिया गया। वारिमूल वारह-
मूला हो गया होगा । इसी को उलटने पर मूलवाराह
नाम पकड़ लिया होगा । यह मेरा अनुमान मात्र है ।
इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है।
बारहमूला शब्द का सर्व प्रथम प्रयोग शुक ने
चौथी राजतरंगिणी में किया है। उस समय काश्मीर
का बादशाह फतह शाह (सन् १४८६-१५१४ई०)
था । बारहमूला में मार्गश इबराहीम अपने साथी
महमूद शाह के साथ सेना लेकर आया था । ( दत्त
३४५ )
बारहमूला शब्द का दूसरी बार उल्लेख भी शुक
ने चक्रेश के बारहमूला से श्रीनगर जाने के प्रसंग
में किया है। (दत्त ३६२) इसके पूर्व सब स्थानों
पर वाराह क्षेत्र शब्द का प्रयोग किया गया है।

५४ राजतरंगिणी
अबु रिहान ने उप्कर को बारहमूला का नगर
कहा है जो नदी के दोनों तटों पर बना आबाद था।
(फ्रेगमेन्ट्स आफ अरब्स पृष्ठ ११६)
बारहमूला पहले वितस्ता नदी के दक्षिण तट
पर आबाद था। इस समय दोनों तटों पर आबाद
है। उप्कर (हुष्कर) का स्थान वितस्ता के वाम
तट पर है। बारहमूला के वर्तमान नगर विकास
की सीमा में उप्कर आ गया है। प्राचीन काल से ही
बारहमूला नगर तथा हुष्कपुर को जोड़ने के लिए
वितस्ता पर पुल बँधा है। इस समय वह पुल और
विशाल तथा आधुनिक शैली का बना दिया गया है।
वह पुल हिन्दुओं के तीर्थ वाराह क्षेत्र तथा बौद्धों
के तीर्थ हुष्कपुर दोनो को मिलाता था। यात्री एक
साथ दोनो तीर्थों की यात्रा कर सकते थे।
काश्मीर में शिव, विष्णु, तथा बुद्ध तीनों की
पूजा एक साथ चलती थी। इससे प्रकट होता है।
बारहमूला के दक्षिण तट पर हिन्दुओं को विशेष और
उत्तर तट पर बौद्धों की आबादी थी। बारहमूला
का इसलिए और महत्त्व बढ़ गया था कि वह बौद्ध
तथा हिन्दू दोनों का समान रूप से तीर्थ स्थान था।
(जोनराज ३५६-६७)
वाराह क्षेत्र माहात्म्य में वाराह क्षेत्र तथा उससे
सम्बन्धित अनेक तीर्थस्थानों का उल्लेख मिलता
है। कल्हण ने वाराह मन्दिर का कई बार वर्णन
किया है। जनश्रुति के अनुसार बारहमूला नगर के
पश्चिम, वितस्ता तटपर, कोटि तीर्थ के समीप वाराह
का मन्दिर था। कोटि तीर्थ में प्राचीन काल की
मूर्तियां तथा शिव लिंग मिला है। यह सब खण्डित
मूर्तियां वाराह मन्दिर की रही होंगी।
वाराह का मन्दिर काश्मीर के सुलतान सिकन्दर
बुत शिकन (सन् १३८६-१४११ ई०) ने तुड़वाया
था। उस समय इस मन्दिर के साथ ही साथ काश्मीर
में मार्तण्ड, विजयेश, ईशान, चक्रभृत (चक्रधर)
त्रिपुरेश्वर, शैष, सुरेश्र्वरी, के प्रसिद्ध मन्दिर भी
तोडे गये थे। (जोनराज · श्लोक ६००; दत्त
पृष्ठ ६०)
श्री जोनराज (सन् १४४६ ई०) वाराह क्षेत्र
में बडशाह जैनुल आवदीन द्वारा दान सत्र खोलने
का उल्लेख करता है। (दत्त ८८) बादशाह ने
वाराह क्षेत्र में इतने चावल का दान किया था कि
उसके भार से अनन्त नाग का मस्तक झुक गया था।
इन्द्र का मस्तक भी इस दान को देखकर लज्जा से
नत हो गया था। (दत्त १३९)
श्री शुक अन्तिम और चौथी राजतरंगिणी में
एक अद्भुत घटना का वर्णन करता है—
'आश्विन मास लौकिक संवत् ४६३० (सन्
१५५२ ई०) सुलतान इस्माइल शाह के समय में
भयंकर भूकम्प आया था। लोग इतने भयभीत
हो गये थे कि पुत्र, स्त्री, सज्जनों, दयालुओं तथा
किसी के लिए सहानुभूति नही रह गयी थी। तथापि
वाराह क्षेत्र के नागरिकों में किसी प्रकार की चिन्ता
व्याप्त नहीं थी। वहाँ पर लोगों ने भूकम्प का
अनुभव किया ही नहीं।' (दत्त : १८१) राज-
तरंगिणी में अन्तिम बार बारहमूला का उल्लेख
सम्राट् अकबर की सेना के अभियान के समय आता
है। काश्मीर के सुलतान यूसुफ शाह ने मन्दिर में
शरण ली थी।
वितस्ता : गंगा नदी का वर्णन वेदों के केवल
दो बार आया है। वितस्ता का नाम ऋग्वेद में
एक बार आया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के प्रसंग
(१०,७५,५) तथा निरुक्त (९,२६, ) में वितस्ता
का उल्लेख किया गया है।
वितस्ता नदी का ज्ञान वैदिक पुरुषों को था।
गंगा की पूर्व दिशावर्ती नदियों का नाम वेद मे
नही मिलता है। उनका ज्ञान वैदिक रचनाकारों को
नहीं था। उनके वितस्ता ज्ञान तथा वर्णन से प्रकट
होता है। वितस्ता का महत्त्व वैदिक युग में था।
भागवत पुराण (५.१९:१८) में वितस्ता का
उल्लेख मिलता है। पाणिनि की काशिका वृत्ति

प्रथम तरंग ५५
( १:४.३१ ) में वितस्ता का वर्णन किया गया है।
अलकसुन्दर अर्थात् सिकन्दर के इतिहासकारों ने
इसका नाम हदसपेश और प्तोलेमों ने इसका विदस-
पेस नाम दिया है। काश्मीर में इसको विरंग,
अदपल, मंदरन तथा झेलम कहते है।
पाली साहित्य में वितस्ता को वितमसा की संज्ञा
दी गयी है। उसकी गणना उत्तरापथ की नदियों में
की गयी है। (धम्मपदट्ठकथा भाग २, पृष्ठ ११६,
मिलिंद प्रश्न हि०, पृष्ठ १४४, अवदान, पृष्ठ २७७,
तथा २९१ )
महाभारत कर्ण पर्व (अ० ४४) में वितस्ता
का उल्लेख मिलता है।
चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुरुच्चा बहिर्गिरेः ।
आरट्टा नाम ते देशा नष्टधर्मा न तान्त्रजेत् ॥
सभा पर्व ( ९:१९ ) में उल्लेख है कि वितस्ता
वरुण की सभा में उपस्थित रहती हैं। उनकी उपा-
सना करती हैं। वन पर्व ( ८२: ८६-६१ ) के
अनुसार वितस्ता में स्नान करने से वाजपेय यज्ञ की
फलप्राप्ति होती है। कश्मीर में नागराज तक्षक का
प्रसिद्ध भवन हैं।
उद्योग पर्व में वर्णन मिलता है। इसकी धारा
में ब्राह्मणों के ४०० श्यामकण्ठ अश्व वह गये थे।
भीष्म पर्व ( ९:१६ ) में उल्लेख मिलता है कि
इसका जल भारतीय पान करते हैं। अर्थात् वह
भारत में बहती है। अनुशासन पर्व ( २५: ७८ )
तथा ( १४६: १८ ) के अनुसार सात दिन इसमें
स्नान करनेवाला मुनितुल्य निर्मल हो जाता है।
पार्वती ने वितस्ता के संदर्भ में शंकर से स्त्री धर्म की
चर्चा की थी। इसी पर्व में ( ८: ६) एक वितस्त्य
ऋषि का वर्णन है। वह सार्वनस ऋषि के पुत्र थे।
सोमदेव भट्ट ने कथासरित्सागर में वितस्ता
को जाह्नवी के समकक्ष माना है :—"धत्ते नाम
वितस्तेति वहन्ति यत्र जाह्नवी" ७:५:३७
बनिहाल गिरिथय से कश्मीर उपत्यका का सुन्दर
मनोहारी, अभिराम दृश्य मिलता है। वहाँ से
धुंधला बेरी नाग का अंचल दृष्टिगत होता है।
बनिहाल से काश्मीर उपत्यका में उतरते ही एक
पक्का अलकतरा का सुन्दर राजपथ श्रीनगर के मुख्य
मार्ग को छोड़ता है। पूर्व दिशा में वेरीनाग की
तरफ बढ़ना है। तिमुहानी से उतरने पर वीर नाग
ग्राम पड़ता है। गांव का नाम यहाँ के निर्झर वार
या बेरी के नाम पर पड़ा। 'वीर नाग' शब्द 'विरह
नाग' का अपभ्रंश है। नाग का अर्थ जलस्रोत,
निर्झर, झरना, चश्मा तथा सोता है। विरह का
अर्थ वियोग, बिछुडना अथवा छोड़कर चले जाना
हैं। विरह नाग शब्द का अपभ्रंश वीरनाग या वेरी-
नाग हो गया है।
वितस्ता देवी इस स्थान में जन्म लेना चाहती
थीं। वहाँ शंकर विराजमान थे। उन्हें वहाँ देखकर
देवी ने संतास्विनी का रूप वितस्तारा (विठवत्तुर )
ग्राम मे लिया। यह ग्राम वेरीनाग से एक मील
उत्तर-पश्चिम स्थित है। इस स्थान को वितस्ता
वार्तिक नाम की भी संज्ञा दी गई है। कल्हण के
समय यह स्थान वितस्तारा नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ
पर अशोक ने स्तूपों का निर्माण कराया था।
वर्तमान कुंड अठपहला है। प्रत्येक पहल का
विस्तार ४७ फुट है। मैं यहाँ चौथी बार
१९६४ में आया था। प्रथम यात्रा मैने सन् १९५६
ई० मे की थी। आज तथा उस समय के वातावरण
तथा स्थिति में बहुत अन्तर हो गया है। सन् १९५७
ई० में तोरणद्वार, सन् १९६० ई० में डाक बंगला
तथा अब एक प्रकार से समस्त स्थान का जीर्णोद्धार
कर दिया गया है। भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा
जीर्णोद्धार का कार्य उसके मूल रूप को अक्षुण्ण रखते
हुए, किया गया है।
संवत् १६९९ विक्रमी में कुंड के ऊपर बाम पार्श्व
में खननकार्य किया गया था। यह स्थान वर्तमान
प्रवेश द्वार के दक्षिण पार्श्व में ऊँचाई पर है। यहाँ
प्राचीन मूर्तियाँ एक के ऊपर एक रखी और गड़ी हुई
मिली थी। मूर्तियाँ पत्थर की हैं। विष्णु भगवान्

५६ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ]

भ्रादि की हैं। इस समय श्रीनगर के राज्य संग्रहालय
में रखी हैं। मैं इन्हें कितनी ही बार ध्यानपूर्वक देख
चुका हूँ। उन्हें देखकर न जाने क्यो मुझे रुलाई आने
लगी। उनसे जैसे अपना निकटतम संबंध मालूम
होता था। सोचता था। उनका क्या अपराध था !
ये खंडित कर गाड़ दी गई। केवल इसलिए कि
उनकी कभी हिंदू पूजा करते थे। ये मूर्तिपूजक हिंदू
अब मुसलमान हो गये हैं। मूर्तियों के शत्रु बन गये
हैं। जिनको कभी पूजा करते थे। उन्हें खंडित करने
लगे। धर्म की यह विचित्र विडंबना देखकर,
वे किस प्रकार कभी राजकीय सम्मान पाती रही
होंगी, स्मरणकर, मन अनायास भर आया। यद्यपि
मूर्ति पूजा का मै कायल नही हूँ तथापि मनुष्यों की
गति पर, उनकी दुर्बलता पर, मुझे ग्लानि अवश्य
उत्पन्न हुई।
आठपहले कुंड के आठपहल अर्थात् जलतट के
पश्चात् समतल चबूतरा काफी चौड़ा है। उसके
पश्चात् सन् १६२० ई० में जहाँगीर द्वारा छोटे-
छोटे कोठरीनुमा बरामदे निर्माण कराये गये थे।
चबूतरे से बरामदे की ऊँचाई काफी है। मध्यवर्ती
महराबो पर हिंदू शैलो की पाषाण की नक्काशीदार
धुडियां लगी हैं। सन् १६२७ ई० में शाहजहाँ ने
यहाँ बाग लगवाया था। नहर दिका निर्माण कराया
था। इस बाग में चिनार के हरे-भरे काफी ऊँचे
वृक्ष लगे हैं। अनेक तरुवर अपनी अपनी हरियाली
तथा छाया से स्थान की अभिरामता बढ़ाते हैं। कुंड
से बाहर बाग में नहर सीधी निकलती है।
नहर के दक्षिण पार्श्व में कुछ पुराना शिवालय
है। कुंड स्थल में प्रवेश करते ही वाम पार्श्व में एक
मिहराबदार कोठरी में देवो तथा देवताओ की
मूर्तियां रखी गयी हैं। यहाँ एक पुजारी रहता है।
देवी को देवी वितस्ता कहा जाता है।
मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में कुछ दूर आगे चलने
पर भूमि से पानी वेगपूर्वक निकलता दिखाई पड़ता
है। यह जलस्रोत मुख्य नहरवाले जलस्रोत में जाकर
मिल जाता है।


[दायाँ स्तम्भ]

नीलनाग अर्थात् वैरीनाग कुंड का जल स्थिर
है। उसमे जल निकलने का उस समय तक अनुभव
नही होता है, जब तक कि कुंड के बाहर नहर में
वेग से जल गिरता न देख लिया जाय। कुंड के जल
की स्थिरता का मुख्य कारण कुंड की गहराई है।
कुंड की गहराई के तीन खंड हैं। कुंड चौवन
फुट गहरा है। कुंड की पहली सीढ़ी का चबूतराकुमा
घेरा १८ फुट गहराई के बाद मिलता है। पुनः
दूसरी गहराई पहले खंड के पश्चात् अट्ठारह फुट
बाद मिलती है। वहाँ भी चारो ओर चबूतरा बना
हैं। अट्ठारह फुट गहरा और जाने के पश्चात् कुंड
का तीसरा खंड अर्थात् धरातल मिलता है। यही
से पानी कई स्रोतो द्वारा भूमि से निकलता है।
कुंड में ५४ फुट ऊँचाई का जल भार होने के कारण
जलस्रोत का उफान तथा वेग दिखाई नही पड़ता।
जल की गहराई के कारण जल का रंग गहरा
नीला दिखाई देता है। जल जहाँ जितना गहरा
होगा वहाँ उसमें उतना ही नीलापन अधिक होगा।
कुंड की गहराई का कारण क्या है। विचारणीय
है। मैने अभी तक कही भी इतने गहरे कुण्ड से जल
निकलते नही देखा है। सभी निर्झर तथा स्रोत भूमि
की सतह से निकलते दिखाई देते हैं। जहाँ जल कम
निकलता है, वहाँ जल एकत्र करने के लिये तथा
उपयोग निमित्त कुंड बनाकर संग्रह कर लिया
जाता है। चश्मा शाही तथा अन्य पर्वतीय स्थानों
के निर्झरों, स्रोतों के समीप इस प्रकार के कुंड की
रचना नही की जा सकी है। काश्मीर मे एक दूसरा
स्थान है। जहाँ इसी प्रकार के कुंड बने मैने देखे
हैं। उसका यथा स्थान वर्णन करूँगा।
पूर्व काल में किसी हिन्दू राजा ने इस कुंड
का निर्माण कराया था। जहाँगीर के समय भग्ना-
वस्था में था। उसका धार्मिक महत्त्व लोगों के
मुसलमान हो जाने के कारण सुप्त हो गया था।

प्रथम तरंग ५७
उद्गतास्तनिष्यन्ददण्डकुण्डाऽऽतपत्रिणा ।
यत् सर्वनागाऽधीशेन नीलेन परिपाल्यते ॥ २८ ॥
२८. पवित्र वितस्ता १ मृणाल दंड तथा विशालकुंड २ कमल पत्र तुल्य था । उसके ३ कमल
पत्र छत्र तथा मृणाल दंड धारी नागाधीश नील द्वारा वह मंडल परिपालित हुआ ।
अबुल फजल ने आइने अकबरी में इसका वर्णन
किया है । उस समय इसकी गणना पवित्र स्थानों में
की जाती थी । कुंड की पूर्व दिशामें स्थित वह पत्थर
के बने हिंदू मन्दिरों का होना लिखता है। जहाँगीर
ने अपनी आत्मकथा में नवीन निर्माण करने के पूर्व
कुंड का चौकोर तथा उसके ऊपर आथभों का होना
लिखा है ।
सन् १३३६ ई० के पश्चात् काश्मीर में मुस्लिम
शासन स्थापित हुआ । मुगल सम्राट् अकबर के पूर्व
काश्मीर में गैर काश्मीरी मुसलिमों का शासन नहीं
हुआ था । काश्मीरी मुस्लिम शासन में कश्मीर लग-
भग ३०० वर्षों तक रह चुका था । काश्मीरी जनता
इस्लाम धर्म ग्रहण कर चुकी थी । हिंदुओं की
आबादी नगण्य थी । सभी तीर्थस्थान एवं मंदिर नष्ट
भ्रष्ट हो चुके थे । मंदिरों के स्थान पर जियारतें तथा
मस्जिदें बन चुकी थी । नील कुंड इसका अपवाद
नहीं था ।
संवत् १९९९ विक्रमीयमें खनन द्वारा यहाँ से
प्राप्त मूर्तियां इस बात की प्रमाण हैं कि यह स्थान
महत्त्वपूर्ण तीर्थ था । कुंड अत्यंत प्राचीन काल से
वर्तमान था । जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने उसका
मुगल शैली पर जीर्णोद्धार किया था । इस स्थान पर
हिंदू शैली का किस प्रकार का मंदिर अथवा निर्माण
था अनुमान लगाना कठिन है । मूर्तियाँ यहाँ से प्राप्त
जो हुई हैं उस पर गांधार शैली की अपेक्षा भारतीय
मूर्तिकला शैली का अधिक प्रभाव है । वितस्ता नदी
को बरनियर फ्रान्स की सीन नदी से और काश्मीर के
पर्वतों की तुलना अलाइम्पस से करता है ।
पाठभेद :
'निष्यद' शब्द का पाठभेद 'निष्यन्द' तथा
'निःस्यन्द' मिलता है । इसी प्रकार 'धीगेन' का पाठ-
भेद 'देवेन' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ.
२८ ( १ ) वितस्ता : वर्तमान झेलम नदी ।
अनुशासन पर्व महाभारत के २५वें अध्याय में
पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को अंगिरा ऋषि के
वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि चन्द्रभागा
और वितस्ता में स्नान करने से लोग पापमुक्त हो
जाते हैं । वितस्ता का दूसरा नाम पार्वती है ।
भादों शुक्ल त्रयोदशी को वितस्ता जन्मोत्सव मनाया
जाता है ।
( २ ) कुंड : वीर नाग, बैरी नाग, नील
नाग, किंवा नील कुंड से यहाँ तात्पर्य है । नील कुंड
का उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है ।
नीलकुण्डे वितस्ताख्यं शूलघातं तथैव च ।
तीर्थं त्रिनामकं दृष्ट्वा स्वर्गलोके महीयते ॥
१२८४ : १५००
तथा विनशनं प्राप्तं फले वाजपेयफलं लभेत् ।
ब्राह्मणेकुण्डिकायां च नीलकुण्डे च पार्थिव ॥
१२८९ : १२८९
( ३ ) कमल पत्र और मृणाल दण्ड : कल्हण
की यह उपमा उपत्यका का प्राकृतिक सुरम्य दृश्य उप-
स्थित करती है । शंकराचार्य शिखर से उपत्यका देखी
जाय तो वह भूमि पर रखे मृणाल-युक्त पद्म पत्र
तुल्य सुशोभित दिखाई देगी । कल्हण ने कुंड शब्द
का प्रयोग किया है । डल लेक को कुंड मान लिया
जाय तो उपमा ठीक बैठती है । छत्र मंत्रपात्र नाग

५८ राजतरंगिणी
का चिह्न है। कमल पद्मनाग का चिह्न है। कल्हण
इन चिन्हो की उपमा देकर कश्मीर में नागों के
महत्त्व की ओर संकेत करता है।
राजधानी अहिच्छत्र नगर के संबंध में शंका
की जाती है। विदेशी विद्वानो ने नाना प्रकार की
कल्पना इस संबंध में की है। मेरा विचार है—'अहि'
शब्द नाग के लिए प्रयुक्त किया गया है। शंखपाल
नाग का छत्र चिह्न है। अहिच्छत्र नाग राजा की
राजधानी था। 'छत्र' का अर्थ छाता है। परंतु यह
प्रतीक भी है। 'अहिच्छत्र' का शाब्दिक अर्थ नाग
का छत्र होता है। यहाँ एक किला है। उसे आदिछोट
कहते हैं। यह पांचाल देश का एक नगर था।
नीलमत के अनुसार द्वीपो का निम्नांकित विभा-
जन किया गया है।
इन्द्रद्युम्नः कशेरुश्च ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वो वारुणस्तथा ॥
591 : ७१२
अयं च मानवो द्वीपस्तथा सागरसम्भृतः ।
चत्वारः सागराः पूज्यास्तथा पातालसप्तकम् ॥
-512 : ७१३
नीलमत पुराण के अनुसार ९ द्वीप, ४ सागर
तथा ७ पाताल है। द्वीप—इन्द्रद्युम्न, कशेरुमान्,
ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गंधर्व,
वरुण तथा मानव हैं। सात पाताल—एवम भौम,
शिला भौम, नील मृत्तिका, समभोम, पीतभौम,
श्वेत तथा कृष्णक्षिति है।
४ नीलनाग : जनश्रुति है। काश्मीर की
जनता का विश्वास है। काश्मीर के नागों, अर्थात्
जलस्रोतो, प्रपातो एवं निर्झरो के इष्टदेव नाग हैं।
वे किसी न किसी रूप में जीवित हैं। नीलमत पुराण
उनको विशेष पूजा का उल्लेख करता है।
एतेषां पूजनं कृत्वा पूजनीया विशेषतः।
ग्रहो नागस्तथा मासः यः स्यात्संवत्सरः प्रभुः ।
ग्रहो भविष्यद्दर्पज्ञश्च तथा मासस्य वारकः ॥
625 : ७४६,७४७
नील नाग पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रजा-
पति कश्यप' का पुत्र है। उसका निवास स्थान
समीपस्थ वेरी नाग ग्राम स्थित नील कुंड है। यह
वितस्ता का मूल स्रोत है। यह कुंड बनिहाल पास के
पर्वत मूलमें है। शाहाबाद परगना में है। वितस्ता
का उद्गम है। पर्यटकों का पर्यटन, यात्रियो की
यात्रा बिना इस क्षेत्र के दर्शन के अधूरी रहेगी।
जहाँगीर ने कुंड को अठपहला पक्का निर्माण
कराया था। कुंड का जल स्थिर है। वेग से उद्यान
में नहर के द्वारा निकलता है। जल का रंग नीला
प्रतीत होता है। किंतु नहर में जहाँ गिरता है
यहाँ उज्ज्वल तथा निर्मल दिखाई देता है। यह
जल की गंभीरता तथा स्थान की हरियाली का
प्रभाव है। कुंड पर बनी इमारत की छत पर देखने
पर प्रतीत होता है, जैसे अष्टकोणीय नीलम का
एक बडा टुकड़ा भूमि पर पड़ा है।
काश्मीर उपत्यका से सतीसर का जल बाहर
निकालने के लिए नीलमत पुराण के अनुसार
भगवान् विष्णु ने सर्वप्रथम हल का प्रयोग किया
था। भगवान् शिव के त्रिशूल के आघात से भगवती
पार्वती सरिता वितस्ता के रूप में प्रकट हुई थी।
नीलमत में वितस्ता के उद्भव का सुंदर वर्णन
मिलता है :
रसातलेनादिरूपं करिष्यामि जगद्गुरो ।
कुरु शूलप्रहारं त्वं नीलवेश्मसमीपतः ॥
248 : ३३६,३३७
यत्रासील्लांगलमुखं प्राग्प्रभो शैलदारणे ।
तेन शूलप्रहारेण निष्क्रम्याहं रसातलम् ॥
249 : ३३६,३३८
शूलमार्गेण यास्यामि यावत्सिन्धुर्महानदः ।
तत्र चक्रे हरो देवस्तथा चक्रे सती शुभा ॥
250 : ३३८,३३९
तस्या नाम वितस्तेति कृतवान् शंकरः स्वयम् ।
वितस्तिमात्रं गतं तु शूलेन कृतवान् हरः ।
251 : ३३९,३४०

प्रथम तरंग ५९
रसातलंगता येन निष्क्रान्ता सा सरिद्वरा ।
तस्माद्वितस्तेति कृतं नामैतस्याः स्वयंभुवा ॥
252 : ३४०,३४१
हरिचरितामृत अध्याय १२ में वितस्ता अव-
तरण का वर्णन किया गया है। इस तीर्थ का तीन
नाम नील कुंड, वितस्ता तथा शूलघाट प्रसिद्ध हैं।
वितस्ता माहात्म्य इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश
डालता है। नीलमत पुराण इसके माहात्म्य के
विषय में उल्लेख करता है।
अक्षयं सर्वमुद्दिष्टं दानं श्राद्धं तथा तपः ।
वितस्तोन्मज्जने स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥
1290 : १५०१,५१०२
ततस्तु सर्वदेशेषु जनः शुश्राव पार्थिव ।
सती देवी नदी भूत्वा काश्मीराया विनिर्गता ॥
253 : ३४२,३४३,
महापातकसंयुक्तस्तस्यां स्नातुं तदा जनः ।
आजगाम भयात्तेषां शूलघातनियोजनात् ॥
254 : ३४४,३४५
मैं जिस समय प्रथम बार यहाँ आया तो इसकी
अनुपम भव्य सुंदरता देखकर स्तब्ध हो गया था।
निर्देशक जहाँगीर तथा शाहजहाँ का नाम लेकर
उनके निर्माण की प्रशंसा कर रहा था। मेरी धारणा
हो रही थी। कुंड का पुरा काल में अवश्य अस्तित्व
रहा होगा। जीर्ण हो जाने पर जहाँगीर ने उसे
मुगल स्थापत्य का जामा पहना दिया है। नीलमत
के कुंड शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है। इसमे पक्का घाट
या पक्का पहल बना था। हिंदुओं का तीर्थ था। हिंदू
मुसलमान हो गये। उनके लिए स्थान महत्त्वहीन हो
गया। बिना मरम्मत गिरता पड़ता खँडहर बन
गया। जहाँगीर सहिष्णु था। कट्टर मुस्लिम धर्मा-
नुयायी नहीं था। उसने यहाँ की शोभा देख हिंदुओं
का तीर्थ होने पर भी जीर्णोद्धार कराया।
आइने अकबरी में अबुलफजल, जिसने जहाँगीर
के वर्तमान इमारत बनाने के पूर्व वीर नाग को देखा
था, वर्णन करता है, वीर सर बेहत अर्थात् वितस्ता
का उद्गम स्थान है। इसके कुंड का क्षेत्रफल एक
जरीब होगा। बहुत गहरा है। इससे जल जोर
से आवाज के साथ निकलता है। इसका नाम
वीरसर है। इसमें पत्थर के बार्डर लगे हैं। इसके
पूर्व दिशा में मन्दिर है।
जिस समय इस कुंड पर मैं आया था, उस
समय कश्मीर के इतिहास लिखने की कल्पना मैंने
नहीं की थी। इस ओर अभिरुचि नहीं थी। नील
कुंड के प्रथम दर्शन से प्रथम प्रतिक्रिया जो हुई उसका
वर्णन किया है। कश्मीर के इतिहास के संबन्ध में
गवेषणा करना प्रारम्भ किया तो मेरी धारणा को
बल मिलता गया। इसी स्थान के विषय में नहीं
अन्य स्थानों को देखकर प्रथम प्रतिक्रियाएँ जो होती
रहीं वे प्रायः ठीक उतरती हैं।
बर्नियर यहाँ आया था। जहाँगीर ने यहाँ का
बाग सन् १६१२-१६१६ ई० के बीच में बनवाया
था। वह लिखता है :-
'कहा जाता है कि नूर महल अर्थात नूरजहाँ
के इच्छानुसार यह बाग बनवाया था। यहाँ के कुंड
की पाली गई मछलियाँ इतनी सोधी हैं। पुकारने
पर अथवा रोटी का टुकड़ा कुंड में छोड़ देने पर
पास आ जाती हैं।'
औरंगजेब के समय जैसा बर्नियर के लेख से प्रकट
होता है वहाँ किसी प्रकार का मन्दिर अथवा उसका
ध्वंसावशेष नहीं रह गया था। किंतु जहाँगीर
अपने पिता के साथ कश्मीर आया था। उस समय
उसने कश्मीर के दर्शनीय स्थानों को देखा था।
द्वितीय जुलूस वर्ष अर्थात् सन् १६०७ ई० में यहाँ
जहाँगीर आया था। वह अपनी आत्मकथा में
लिखता है-
'झेलम नदी का स्रोत काश्मीर में वीर नाग
नामक एक चश्मा है। हिंदीभाषा में नाग सर्प को
कहते हैं। ज्ञात होता है उस स्थान में पहले सर्प रहा

६० राजतरंगिणी

होगा। अपने पिता के जीवन काल मे हम दो बार
उस चश्मे तक गये थे। काश्मीर नगर से बीस कोस
पर है। यह चश्मा चौकोर है पर २० गज लम्बा
और २२ गज चौड़ा है। इसके आस पास तपस्वियों
के बहुत से आश्रम अवशेष हैं। पत्थरों की अनेक
गुफायें हैं। इसका जल अत्यन्त निर्मल है। यद्यपि
इसकी गहराई का हम अनुमान नहीं कर सके
पर यदि एक पोस्ते का दाना उसमें छोड़ा जाय तो
वह जब तक तह तक नहीं पहुँच जाता तब तक
दिखलाई पड़ता है। इसमे मछलियाँ बहुत हैं। हमने
सुना है कि इसकी गहराई अगाध है। पत्थर बाँध
कर डोरी डालने की आज्ञा दी। डोरी के नापने पर
केवल डेढ़ पूरसा निकला। अपनी गजनशीं के अनन्तर
हमने आज्ञा दी कि उस चश्मे के किनारो को पत्थर
से बाँध दिया जाय। इसके चारों ओर उद्यान लगाकर
नहर निकालें। साथ ही उसके आस पास प्रासाद
तथा गृह निर्माण कर उसे ऐसा स्थान बना दें जैसा
सायंकाल संसार भर घूमने पर भी उसके जैसा
दूसरा न बतला सकें।" पृष्ठ १६९।
'गहराई चौदह गज था। इसका जल पहाड़ की
हरियाई तथा पौधों की छाया से हरित रंग का ज्ञात
होता था। इसमें मछलियां बहुत थी। इसके चारों
ओर दालान बुर्जियां सहित बन थे। इसके आगे
उद्यान निर्मित किया गया था। तालाब के किनारे
से उद्यान के फाटक तक एक नहर चार गज चौड़ी,
एक सो अस्सी गज लम्बी तथा दो गज गहरी बनाई
गई। इस तालाब के चारों ओर प्रस्तर निर्मित मार्ग
बना था। इस नहर का जल इतना साफ था कि
चार गज की गहराई होने भी अगर एक दाना गिरे
तो दिखाई पड़े। पानी के नीचे उगी हुई घास आदि
से वह ऐसा सुशोभित था कि क्या लिखा जाय। यहाँ
अनेक प्रकार की सुगन्धित जड़ी बूटियाँ तथा पौधे
... हुए थे। और इसमें एक बूटा ऐसा दिखलाई
पड़ता था जो ठीक मोर की पूँछ की तरह रंजित
न ही धारा में दिखता था। फूल भी स्थान
स्थान पर खिले हुए थे। संक्षेप में सारे कश्मीर में
ऐसा रमणीक तथा चित्ताकर्षक स्थान दूसरा नहीं
था। हमें ऐसा प्रतीत होता है। कश्मीर के ऊपरी
भाग का दृश्य निम्न भाग की तुलना में बढ़कर है।
हर एक को इस देश में कुछ दिन ठहरकर तथा
चारों ओर भ्रमण कर यहाँ का दृश्य देखकर खूब
आनंद लेना चाहिए।
'हमने आज्ञा दी कि नहर के दोनों तरफ चिनार
के वृक्ष लगाए जायें।'-पृष्ठ ६७७, ६८२, ६८३।
जहाँगीर पन्द्रहवें जलूसी वर्ष में पुनः कश्मीर
गया।
उसने वीर नाग के विषय में दिनांक सोमवार
१२ को लिखा है-
'इसका (वितस्ता) स्रोत बोर नाग कहलाता
है। जो चौदह कोस (श्रीनगर से) दक्षिण है।
हमारी आज्ञा से सोते के पास एक इमारत तथा
उद्यान निर्मित हुआ है।'-पृष्ठ ६५२
उसने दिनांक शुक्रवार २७ को बीर नाग की
यात्रा के लिए प्रस्थान किया था। उसके संदर्भ में
लिखता है-
'पाँच कोस ऊपर (नदी से) जाकर हम नाव से
पामपुर में उतरे। शनिवार २८ को को हमने साढ़े
चार कोस कूच किया। कानापुर से आगे बढ़कर
हम नदी के तट पर पहुँचे। कानापुर की भांग
प्रसिद्ध है। वह नदी के किनारे स्वतः पैदा होती
रहती है। रविवार २९ को प्रजबरोर (विजयेश्वर)
पहुँचे। सोमवार ३० को दूध का जलप्रपात देखा।
यह ग्राम हमारे पिता (अकबर) ने रामदास
कछवाहा को दिया था। उसने यहाँ इमारत और
जलाशय बनवाया है। गुरुवार २८ को मिल को
बार नाग के जलाशय के किनारे पड़ाव डाला।
गुरुवार २ को इसी जलाशय के तट पर मदिरात्सव
मनाया गया। यह सोता झेलम नदी का स्रोत है।
यह एक पहाड़ के नीचे है। जिसकी भूमि वृक्षों थी

अधिकता, हरियाली तथा घास होने कारण दिखाई
नहीं देती। जब हम शाहजादा थे तभी हमने आज्ञा
दी थी कि इस स्थान के उपयुक्त यहाँ एक इमारत
बने। वह अब पूरी हो गयी है। इसमे एक अठपहला
तालाब बना था।'
कद्रू : दक्ष प्रजापति की एक कन्या का नाम
कद्रू था। वे नाग जाति को जननी थी। प्रजापति
कश्यप की पत्नी थी। कथा है। कश्यप के वरदान
के कारण कद्रू ने एक सहस्र नाग पुत्रों को जन्म
दिया था। वर प्राप्ति के लगभग पाँच सौ वर्ष के
पश्चात् कद्रू को एक पुत्र प्राप्त हुआ। कश्यप की
दूसरी पत्नी विनता को अरुण तथा गरुड दो
पुत्र हुए।
सूर्य के रथ का अश्व किस रंग का है? इस प्रश्न
पर कद्रू तथा विनता में विवाद हो गया। विनता ने
अश्व का रंग श्वेत बताया। कद्रू ने अश्व की पूँछ
काले रंग की बतायी। दोनो ने एक दूसरी की
दासी होने का शर्त लगाया। कद्रू ने अपने नाग पुत्रो
को आदेश दिया। वे अश्व की पूँछ में लिपट जाएं।
पूँछ का रंग काला दिखाई पड़े। कुछ नागो ने माता
का आज्ञा स्वीकार नही की। उन्हें जनमेजय के
नागयज्ञ में भस्म होने का माँ ने शाप दिया। भुजंग
कर्कोट ने माता को आश्वासन दिया। वह पूँछ में
लिपट जायगा। रंग काला प्रतीत होगा। माता
जीतेंगी। विमाता को हारकर दासत्वव्रत स्वीकार
करना होगा।
काश्मीर के कर्कोट वंश के राज्य का यथास्थान
वर्णन किया जायेगा। महाभारत आदिसर्व के ३५ वें
अध्याय में कद्रू के प्रमुख नाग संतानों की नामावली
दी गयी है।
कपटाचार के कारण कद्रू की विजय हुई।
विनता ने दासी वृत्ति स्वीकार की। छल द्वारा
विजय प्राप्त करने तथा माता को सपत्नी अर्थात् सौत
की दासी होने के कारण विनता का यशस्वी पुत्र
गरुड क्रुद्ध हो गया। कद्रू संतान नाग तथा विनता
के संतान गरुड में संघर्ष आरंभ हो गया।
इस संघर्ष की मेरी समझ में धार्मिक पृष्ठभूमि
और है। कश्यप की कद्रू से उत्पन्न नाग जाति शिव
की उपासक थी। विनता की संतान गरुड विष्णु के
उपासक थे। शिव मंदिर में नाग पूजा तथा विष्णु
मन्दिर में गरुड़ पूजा होती थी। उनको मूर्तियाँ
मंडप अथवा गर्भगृह के बाहर प्रतिमा के सम्मुख रखी
जाने लगी। शैव तथा वैष्णव संप्रदायो के संघर्ष का
वह एक कारण बन गया। कालान्तर में एक पिता
की सन्तान होने पर भी वे विभिन्न शाखाओ में
विभाजित हो गये।
नील एक पर्वत है। यह पर्वत उत्तर दिशा में
गंधमादन तथा मदराचल पर्वतो के वाद पडता है।
नील नाग इन्हीं नागों में से एक था। (वनपर्व
१८८.११३)
नील पर्वत का उल्लेख नीलमत पुराण में
मिलता है।
एकार्णवं जगत् सर्वं तदा भवति भूपते।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः॥
३४: ५५, ५६
गंगाद्वारं कुशावर्त्तं विल्वकं नीलपर्वतम् ।
तथा कनखलं तीर्थं तीर्थान्यन्यानि पार्थिव ।
१५,१३
श्वेतश्च शृङ्गवांनेष माल्यवान् गन्धमादनः।
महेन्द्रो मलयः सह्यः शक्तिमान् ऋक्षवानपि ॥
३५ : ५६,५७
पुण्यं च नैमिषारण्यं गंगाद्वारमतः परम्।
स्थानेश्वरात्कुरुक्षेत्रं ततो विष्णुपदं शुभम् ॥
1054 : १२३८
विष्णुपद—
दिल्ली की कुतुबमीनार एक पहाड़ी पर बनी
है। उस पहाड़ी का नाम विष्णुपद था। वहाँ पर
विष्णु का मंदिर था। विष्णुपद पर स्थित विष्णु

६२ राजतरंगिणी
गुहोन्मुखा नागमुखापोतभूपिया रुचिम् ।
गौरा यत्र वितस्तात्वं याताऽप्युज्झति नोचिताम् ॥ २६ ॥
२६. उसका छत्र नीलकुण्ड तथा दंड वितस्ता नदी है। १ गुहाश्रिता देवी गुहोन्मुखी नागों
को जलपान करानेवाली नागपीत पयःस्वरूप गौरी ने अपने दोनों कार्य गुणों तथा नागपीत
पय को त्यागकर गुहोन्मुखत्व तथा नागपीत पयत्व दोनों धर्मों का पालन करती है।

मंदिर तोड़कर मस्जिद कुव्वते इस्लाम कुतुबुद्दीन
ऐबक के समय बनाई गई थी। उसे अल्तमश ने और
बढ़ाया था। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को
और बड़ा रूप देने का प्रयास किया था। उसके ठीक
दूसरी तरफ मस्जिद के वाम पार्श्व में कुतुबमीनार
जैसी मीनार बनाना चाहता था। उसका नाम अलाई
मीनार है। यह पूरी बन नहीं सकी। ध्वंसावस्था
में आज भी देखी जा सकती है। अलाउद्दीन ने यहाँ
पर अलाई दरवाजा भी बनवाया है। यह आज तक
सुरक्षित है। अलाउद्दीन खिलजी तथा अल्तमश दोनों
की मज़ारें यहाँ पर बनी हैं।
चंद्रगुप्त के लौहस्तम्भ पर खुदे अभिलेख से पता
लगा है कि वही स्थान नीलमतवर्णित विष्णुपद है।
यहाँ गंगाद्वार का उल्लेख हरिद्वार के समीप-
वर्ती क्षेत्र के लिये किया गया है। कनखल का
उल्लेख नील पर्वत तथा गंगाद्वार का स्थान स्पष्ट
कर देता है।
गंगाद्वार में एक नील पर्वत का वर्णन मिलता
है। कहा गया है कि वहाँ स्नान करने पर मनुष्यों
के पाप नष्ट हो जाते हैं
गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलपर्वते ।
तथा कनखले स्नात्वा धूतपाप्मा दिवं व्रजेत् ॥
—म० अनुशासन पर्व २५:१३
जैन उत्तराध्ययन सूत्र (११:२८.४९) के
अनुसार सीता नदी का उद्गम स्थान नील पर्वत
है। नील पर्वत के दक्षिण में हिमालय पर्वत का
स्थान माना गया है। इस नदी को गंभीर अर्थात्
गहरी तथा दुरतिक्रम मार्कंडेय पुराण ने बताया
है। कुछ विद्वान् सीता नदी को क्षारमंद किंवा
अरफया नदी बताते हैं। सीता नदी वास्तव में सीर
दरया है। सीता नदी का प्राचीन भौगोलिक वर्णन
सीर दरया से मिलता है। आधुनिक विद्वानों ने
सीर दरया को सीता नदी माना है।
विष्णु पुराण (२:२:१०) के अनुसार नील
पर्वत की गणना वर्ष पर्वत में की गई है। उसकी
स्थिति सुमेरु के उत्तर में है। उत्तर में ही श्वेत
शृंगी वर्ष को बताया गया है।
तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना भावेन विष्णोः मतिम् ।
प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वजः स्थापितः ॥
आश्चर्य है कि नीलमत पुराण में मुझे इंद्रप्रस्थ
तथा हस्तिनापुर का नाम नहीं मिला। विष्णुपद
पर्वत के वर्णन से प्रतीत होता है कि नीलमत पुराण-
कार को इंद्रप्रस्थ किंवा दिल्ली का ज्ञान था।
पांडवों का वर्णन, कृष्ण का वर्णन, मथुरा आदि का
नाम आने पर भी इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर का न
होना इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली का महत्त्व
केवल विष्णुपद पर्वत के कारण था। द्वितीय चंद्र-
गुप्त के कुतुबमीनार किंवा महरौली के विष्णो-
ध्वज स्तम्भ में इन्द्रप्रस्थ आदि का नाम नहीं
दिया गया है।
पाठभेद :
श्लोक २६ में 'नागमुखा' का नागमुखी'
पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२६ : १) छत्र और दंड : कल्हण ने यहाँ पुनः
सुंदर तथ्यपूर्ण उपमा दी है। यदि नीलकुण्ड की
इमारत के ऊपर खड़ा होकर प्राकृतिक दृश्य देखें
तो अठपहला नीलकुण्ड वास्तव में छत्र तुल्य तथा

प्रथम तरंग ६३
शङ्खपद्ममुखैर्नागैर्नानारत्नावभासिभिः ।
नगरं धनदस्येव निधिभिर्यन्निषेव्यते ॥ ३० ॥
३०. विविध रत्नभांडों से विभूषित शंख पद्मादि नागों का कश्मीर मंडल कुबेर पुरी तुल्य
आश्रय स्थान है ।
उससे समुद्रयात्रा निमित्त निकली जल स्रोत रेखा
छत्रदंड तुल्य लगेगी । इस समय नील कुंड किंवा
वेरीनाग का जल जहाँगीर तथा शाहजहाँ द्वारा
निर्मित सोधी नहर जैसा बहता निकलता है । प्राचीन
काल में जल निकलने की अवश्य कोई नहर किंवा
प्रणाली रही होगी । कल्हण उसी जल रेखा का
दंड तथा अष्टको णों में नील कुंड की उपमा छत्र से
यहाँ देता है ।
( २ ) नाग : कश्मीर में नाग जलस्रोत तथा
जलप्रपात को कहते हैं । कश्मीर के जलस्रोतों
तथा सरोवरों का देवता नाग तथा नागी है । ये
देवता जलाशयों तथा जलस्रोतों में निवास करते हैं ।
बड़े जल स्रोत को नाग तथा छोटे को नागी कहा
जाता है । नीलमत पुराण में अत्यधिक देवस्थानों
तथा तीर्थों का स्थान जलस्रोतों तथा जलाशयों के
समीप है । उनसे संबंधित है । नामरूप से उनकी पूजा
अनादि काल से होती आई है । कश्मीर उपत्यका की
मुस्लिम जनता में विश्वास व्याप्त है। नाग जलस्थानों
में रहते हैं । मुसलमान होने पर भी वे नागों के
प्रति आदर प्रकट करते हैं । चाहे उसकी पूजा करने
से विरत भले ही हो गये हैं । निर्झरों तथा चश्मों से
निकलती टेढी मेढी उज्ज्वल जल धारा नागों के रेंगने
की तरह लगती है । अतएव उनके देखने से अनायास
नागकी कल्पना मन में उठ जाती है ।
आइने अकबरी से प्रकट होता है कि जिस
समय अकबर १६ वीं शताब्दी में आया था कश्मीर
में ७०० स्थानों में नागपूजा होती थी । इस समय
तक यह विश्वास तथा संस्कार लोगों में जमा है
कि नाग सर्प के रूपमें निवास करते हैं। वे जल-
स्रोतों अथवा जलाशयों में रहते हैं । जलाशयों की
रक्षा करते हैं । राजतरंगिणी के वर्णन ( ४:६०१,
७:१७१ ) से प्रकट होता है कि हजारों वर्षों से
इस प्रकार का संस्कार लोगों के हृदयो में बैठ
गया था ।
यह भी धारणा व्याप्त थी । नाग मानवरूप
धारण कर प्रकट होते थे । राजतरंगिणी में नाग
सुश्रुवा तथा उसकी कन्या के कथानक से यह बात
सिद्ध होती है । वे मेघ, महाशिला किंवा हिमवृष्टि
का रूप ( रा० त० १.१७९, २२९, २.१६ ) धारण
कर लेते थे । लोगों को त्रस्त करते थे । भयभीत
करते थे ।
पादटिप्पणियाँ :
३० ( १ ) शंख तथा पद्म नाग का वर्णन नील-
मत पुराण में किया गया है । कश्मीर के नागानों
की महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रखते हैं । परम्परा से
नीलमत पुराण में नागाओं की तालिका के क्रम में
उनका १२ वाँ स्थान आता है ।
शंखाक्षः कमलाक्षश्च मणिनागो वहैवकाः ॥
९१४ : १०९१
पद्म नाग का नीलमत पुराण ( श्लोक 884:
१०५४ ) में दो बार उल्लेख आया है । दो महापद्म
नागों के अतिरिक्त इनकी क्रमसंख्या २६ वीं
आती है ।
शंख नाग का स्थान कश्मीर में कहाँ पर है
उसका वर्तमान परिवर्तित नाम क्या है ? अभी तक
पता नहीं चल पाया है । शंखपाल नाग शंखनाग
से भिन्न है । पद्म नाग को प्रोफेसर बह्लर महा-
पद्म नाग मानते हैं । यह ऊलर लेक का नामधारी
देवता है । इसका उल्लेख राजतरंगिणी ( ४:५९३ )

६४ राजतरंगिणी
में आया है। श्रीकण्ठचरित (३.६) तथा जोन-
राज ने महापद्म नाम से ही ऊलर लेक का सम्बो-
धन किया है।
स्टीन ने पद्म नाग को महापद्म नाग माना
है। वह प्रमाण देते हैं। श्रीवर ने (१ ३३५)
क्रमराज के बाढ़ के समय पद्मनगर से पानी प्राप्त
करने का उल्लेख किया है। यह पद्मनगर ऊलर
लेक के अतिरिक्त दूसरा कोई भिन्न सर नहीं हो
सकता है। राजतरंगिणी, तरंग ४, श्लोक ८५ में
पद्मनाग का उल्लेख भवतुंग के समीप हुए युद्ध के
प्रसंग मे आया है। भवतुंग ग्राम बोतुंग गाँव है।
जैनगिर परगना मे ऊलर लेकके पश्चिमी तट पर
स्थित है। वितस्ता माहात्म्य (१४ ३५) में
रत्नचूड़ नाग का उल्लेख है। पद्म सर के समीप
आर्येस के पास है। यह सुक्रहोम परगना में
अलुस ग्राम से ऊलर लेक के उत्तर-पश्चिम स्थित
है। ऊलर लेक को महापद्म सर कहते हैं। भविष्य
पुराण के ब्राह्म खण्ड मे नाग जाति का उल्लेख है।
महापद्म नाग तथा पद्मनाग दो भिन्न नाग हैं।
दोनो के रंग, दृष्टि, दशा तथा चिह्नों मे भिन्नता
है। उनके कारण दोनो को पहचाना जा सकता है।
महापद्म नाग का वर्ण वैश्य है। रंग पीत है।
दृष्टि खाली है। दिशा वायव्य है। उसका चिह्न
शूल है।
पद्म नाग का वर्ण शूद्र है। रंग कृष्ण है।
दृष्टि चंचल है। दिशा पश्चिम है। चिह्न पद्म है।
शंखपाल किंवा शंखनाग का वर्ण क्षत्रिय है।
रंग श्यामल है। दृष्टि निश्चेष्ट है। दिशा उत्तर
है। चिह्न छत्र है। महापद्म तथा पद्म सर दोनों
शब्दो का प्रयोग कालांतर में ऊलर लेक के लिये
किया जाने लगा।
कद्रू तथा विनता के पारस्परिक संघर्ष के कारण
कद्रू की नाग संतानों ने विनता के पुत्र गरुड़ के भय
से सतीसर में जाकर शरण ली। भगवान् विष्णु ने
उन्हें शरण दी। काश्मीर उपत्यका के उत्तरी तथा
दक्षिणी पर्वतमालाओं को उपमा नागो के बाहुओं
से दी गई है। विशेष विवरण परिशिष्ट में द्रष्टव्य है।
शंख नाग :
फणिं वृश्चिं तथा निद्रां धनेशां नदकृद्वगम् ।
शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥
—585 : ७०६
पुत्निका शंखसख्यो च पालाशः रोदिमो यदिः ।
—889
हिलिहालः शंखपालो नागो चन्दननन्दनौ ॥
—883 : १०५३
शंख, शंखपाल तथा शंखाक्ष तीनो नाग भिन्न हैं।
द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालो द्वौ च कर्कोटकौ ।
द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गर्तो द्वौ च तक्षकौ ॥
—884 : १०५४, १०५५
कश्यप तथा कद्रू द्वारा शंख नाग की उत्पत्ति
हुई थी।
सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः ।
आप्तः करोटिरुद्दैश्च शंखः कालशिरस्तथा ॥
—आदिपर्व ३५ : ८
भगवान् नारद ने मातलि को शंख नाग का
परिचय दिया था।
सुमनो मुखो दधिमुखः शंखो नन्दोपनन्दकौ ।
आप्तः कोटरकश्चैव शिखि निष्ठुरिकस्तथा ॥
—उद्योगपर्व १०३ : १२
बलराम के स्वर्ग गमन के अवसर पर शंख नाग
के आने का उल्लेख मिलता है।
कर्कोटको वासुकिस्तक्षकश्च पृथुश्रवा अरुणः कुंजरश्च ।
मिश्रीशंखकुमुदः पुण्डरीकस्तथा नागो धृतराष्ट्रो महात्मा॥
—म० मौसलपर्व ४ : १७५
शंख तीर्थ : सरस्वती नदी के तट पर एक
प्राचीन तीर्थ था। कश्मीर मे लार परगना के
धरिन्छ लेक के समीप शंख नाग का स्थान माना
गया है।

प्रथम तरंग ६५
उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः ।
नीलवासास्तथा गच्छेदृक्षलतीर्थं महायशाः ॥१९
तत्रायच्छन्महाशंखं महामेरुमिवोच्छ्रितम् ।
श्वेतपर्वतसंकाशं ऋषिगन्धैर्निषेवितम् ॥२०
सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली ।
यक्ष विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चाभितौजसः ॥२१
—म० शल्यपर्व ३७ : १९-२६
योगवासिष्ठ रामायण में महापद्म सर का उल्लेख
कश्मीर के संदर्भ में किया गया है। कल्हण ने
महापद्मसर अर्थात् उलर लेक का उतना सुन्दर
वर्णन नहीं किया है जितना योगवासिष्ठ जैसे महान्
ग्रन्थ में उपलब्ध है । जिन लोगों ने महापद्मसर को
देखा है, यदि वे योगवासिष्ठ का वर्णन पढ़ें तो उन्हे
प्रतीत होगा, जैसे कोई लेखक आज के लेक का
आँखों देखा वर्णन लिख रहा है । वर्णन किया गया
है : 'महापद्मसर कमल दल द्वारा पूर्ण रहता है।
उसमें मछलियाँ होती हैं । ग्रीष्म काल में सारस
विहार करते हैं ।'
योगवासिष्ठ में महापद्म के साथ ही साथ पद्मसर
की भी संज्ञा महापद्म के लिये दी गयी है । महापद्म
तथा पद्मसर दोनों एक ही हैं ।
स्टीन का अनुमान सत्य है महापद्म सर पद्मसर
है । स्टीन योगवासिष्ठ नही देखा था । 'अन्यथा
उसका उल्लेख करता । स्टीन ने कितना गहन अध्य-
यन कश्मीर के सम्बन्ध में किया था । यह इसी एक
बात से अनुमान लगाया जा सकता है ।
महर्षि वाल्मीकि योगवासिष्ठ में महापद्मसर का
वर्णन करते हैं, "पद्मसर श्वेत कमल पंक्तियों की
माला से युक्त है । शेवाल, तरंगों से अत्यन्त सुशो-
भित है। नील कमल की लताओं से पूर्ण है। आश्चर्य
शीतल है ।" ( योगवासिष्ठ स्थिति प्रकरण ३२ :
५०१० ) निस्संदेह यह वर्णन आज भी महापद्मसर
का जीता जागता रूप उपस्थित करता है। पद्मसर
में सारस, नील कमल, उज्ज्वल कमल तथा पर्वती
९
शीतल मंद मंद समीरण में, हल्की लहरें, कश्मीर
की अभिरामता बढ़ा देती हैं जिसे कोई पर्यटक भूल
नहीं सकता ।
नाग एक जाति थी । वे मनुष्य थे । उनका
यथास्थान विस्तृत वर्णन परिशिष्ट में किया गया है।
भारतवर्ष में नागों के दो राज्य थे । मथुरा में सात
नाग राजाओं ने राज्य किया था । इसी प्रकार
चम्पावती में नव नाग राजाओं ने राज्य किया था ।
—वायु पुराण: ९८ : ४५३, ९९ : ३८२;
ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७४ : १९४-५ २६७ ।
नवद्वीपों में इंद्रद्वीप, कसेरुमान, ताम्रवर्णी,
गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य द्वीप, गन्धर्व द्वीप तथा
कुमारी द्वीप हैं। इसमें नाग द्वीप का उल्लेख किया
गया है । इससे प्रकट होता है। नाग जाति का एक
देश था। वहाँ उनकी आबादी थी ।
राजशेखर ने काव्य मीमांसा में सम्राट् तथा
चक्रवर्ती के अवधारणा के संदर्भ में विचार करते
हुए नाग द्वीप का उल्लेख किया है ।
नागद्वीप का उल्लेख महाभारत ( भीष्मपर्व
६ : ५५ ) में है । उसे सुदर्शन द्वीप के अन्तर्गत एक
द्वीप माना गया है । वह शशिमंडल की शशाकृति में
कानस्वरूप दृष्टिगोचर होता है। नागद्वीप का उल्लेख
पुराणों में विस्तृत रूप से देखा जा सकता है।
( भागवत ५:१६:२६; पद्मपुराण, सृष्टिखंड ३१ )
विष्णुपुराण अंश ४६३ में पद्मवतीपुरी में नाग
लोगों के उपभोग करने का वर्णन किया गया है।
अमरकोशकार ने नाग शब्द की परिभाषा की
है—'अधो भुवनं पाताल-बलिसद्म-रसातलम् । नाग-
लोकोऽथ कुहरं सुषिरं विवरं बिलम् ।' पाताल,
रसातल और बलि का घर नाग लोकांतर्गत हैं ।
अमेरिका को कुछ लेखक पाताल देश मानते हैं ।
इस विवाद में न पड़कर यही कहना अलम् होगा ।
अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों में नाग
पूजा प्रचलित थी । नाग की आकृतियाँ शिलाओं
पर उत्कीर्ण मिली हैं ।