राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिकता, हरियाली तथा घास होने कारण दिखाई
नहीं देती। जब हम शाहजादा थे तभी हमने आज्ञा
दी थी कि इस स्थान के उपयुक्त यहाँ एक इमारत
बने। वह अब पूरी हो गयी है। इसमे एक अठपहला
तालाब बना था।'
कद्रू : दक्ष प्रजापति की एक कन्या का नाम
कद्रू था। वे नाग जाति को जननी थी। प्रजापति
कश्यप की पत्नी थी। कथा है। कश्यप के वरदान
के कारण कद्रू ने एक सहस्र नाग पुत्रों को जन्म
दिया था। वर प्राप्ति के लगभग पाँच सौ वर्ष के
पश्चात् कद्रू को एक पुत्र प्राप्त हुआ। कश्यप की
दूसरी पत्नी विनता को अरुण तथा गरुड दो
पुत्र हुए।
सूर्य के रथ का अश्व किस रंग का है? इस प्रश्न
पर कद्रू तथा विनता में विवाद हो गया। विनता ने
अश्व का रंग श्वेत बताया। कद्रू ने अश्व की पूँछ
काले रंग की बतायी। दोनो ने एक दूसरी की
दासी होने का शर्त लगाया। कद्रू ने अपने नाग पुत्रो
को आदेश दिया। वे अश्व की पूँछ में लिपट जाएं।
पूँछ का रंग काला दिखाई पड़े। कुछ नागो ने माता
का आज्ञा स्वीकार नही की। उन्हें जनमेजय के
नागयज्ञ में भस्म होने का माँ ने शाप दिया। भुजंग
कर्कोट ने माता को आश्वासन दिया। वह पूँछ में
लिपट जायगा। रंग काला प्रतीत होगा। माता
जीतेंगी। विमाता को हारकर दासत्वव्रत स्वीकार
करना होगा।
काश्मीर के कर्कोट वंश के राज्य का यथास्थान
वर्णन किया जायेगा। महाभारत आदिसर्व के ३५ वें
अध्याय में कद्रू के प्रमुख नाग संतानों की नामावली
दी गयी है।
कपटाचार के कारण कद्रू की विजय हुई।
विनता ने दासी वृत्ति स्वीकार की। छल द्वारा
विजय प्राप्त करने तथा माता को सपत्नी अर्थात् सौत
की दासी होने के कारण विनता का यशस्वी पुत्र
गरुड क्रुद्ध हो गया। कद्रू संतान नाग तथा विनता
के संतान गरुड में संघर्ष आरंभ हो गया।
इस संघर्ष की मेरी समझ में धार्मिक पृष्ठभूमि
और है। कश्यप की कद्रू से उत्पन्न नाग जाति शिव
की उपासक थी। विनता की संतान गरुड विष्णु के
उपासक थे। शिव मंदिर में नाग पूजा तथा विष्णु
मन्दिर में गरुड़ पूजा होती थी। उनको मूर्तियाँ
मंडप अथवा गर्भगृह के बाहर प्रतिमा के सम्मुख रखी
जाने लगी। शैव तथा वैष्णव संप्रदायो के संघर्ष का
वह एक कारण बन गया। कालान्तर में एक पिता
की सन्तान होने पर भी वे विभिन्न शाखाओ में
विभाजित हो गये।
नील एक पर्वत है। यह पर्वत उत्तर दिशा में
गंधमादन तथा मदराचल पर्वतो के वाद पडता है।
नील नाग इन्हीं नागों में से एक था। (वनपर्व
१८८.११३)
नील पर्वत का उल्लेख नीलमत पुराण में
मिलता है।
एकार्णवं जगत् सर्वं तदा भवति भूपते।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः॥
३४: ५५, ५६
गंगाद्वारं कुशावर्त्तं विल्वकं नीलपर्वतम् ।
तथा कनखलं तीर्थं तीर्थान्यन्यानि पार्थिव ।
१५,१३
श्वेतश्च शृङ्गवांनेष माल्यवान् गन्धमादनः।
महेन्द्रो मलयः सह्यः शक्तिमान् ऋक्षवानपि ॥
३५ : ५६,५७
पुण्यं च नैमिषारण्यं गंगाद्वारमतः परम्।
स्थानेश्वरात्कुरुक्षेत्रं ततो विष्णुपदं शुभम् ॥
1054 : १२३८
विष्णुपद—
दिल्ली की कुतुबमीनार एक पहाड़ी पर बनी
है। उस पहाड़ी का नाम विष्णुपद था। वहाँ पर
विष्णु का मंदिर था। विष्णुपद पर स्थित विष्णु