राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग
५१
[बायाँ स्तम्भ]
पर्वत के वाम पार्श्व मे लगी खड़ी है। इससे कुछ आगे
चलकर द्रंगबल नाला वितस्ता के दक्षिणी तट पर
आकर मिलता है। नाले की दो शाखाएं हो जाती
हैं। मूलत एक ही स्थान पर उनका उद्गम है।
यह नाला पहाड़ से शिलाखंड, रेत तथा पंकराशि
लाकर नदी के गर्त को पाटता रहता है। नदी का
गर्त किंवा पेटा साफ करने के लिए यहीं पर बाढ़
विभाग की तरफ से इस समय कार्य हो रहा है।
दो बुलडोजर काम कर रहे थे। नदी से पंकराशि
निकाल कर बाहर फेंक रहे थे।
वारहमूला में दो श्मशान भूमियां हैं। मैने यहाँ
की चार बार यात्राएँ की हैं। सन् १९६० में आया
था तो चिता पर शव जल रहे थे। एक सिखो का
श्मशान है दूसरा हिन्दुओ का है। यदि इस संकुचित
स्थान पर शिलाखंड, रेत तथा पंकराशि भर जाय
तो वितस्ता की जलधारा अनायास रुक जायेगी।
काश्मीर उपत्यका का जल वेग से बाहर नही निकल
पायेगा। काश्मीर उपत्यका मे जल रुककर काश्मीर
उपत्यका का जलस्तर ऊपर उठा देगा । वूलर
तथा डल आदि सरों का जल उठकर उपत्यका को
एक विशाल सर मे परिणत कर देगा। उसे आप्ला-
वित करने लगेगा। एतदर्थ प्राचीन काल से इस
स्थान पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। नदी
का जल वेग से बाहर निकलता जाय। इसके लिए
समय समय पर योजनाएँ बनाई गई हैं। उनका
यथास्थान वर्णन किया गया है।
यहीं पर एक पुराना 'द्रंग' अर्थात् चौकी था।
• स्थान इतना संकुचित है कि काश्मीर मंडल प्रवेश
द्वार का कार्य करता है। सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्व
रखता है। प्राचीन द्रंग के कारण नाला का नाम
द्रंगबल पड़ गया है। इस स्थान पर हिन्दू काल में
द्वारपति अर्थात् उच्च सेनाधिकारी की नियुक्ति की
जाती थी। काश्मीर के सैनिक इतिहास में द्वारपति
का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान तथा योगदान रहा है।
इसका पद सेनापति के समान समझा जाता था।
[दायाँ स्तम्भ]
नारायण स्थान :
इस नाला से नदी के अधोभाग की ओर बढने
पर नारायण मंदिर मिलता है। इसे नीलमत में
नारायण स्थान कहा गया है। यह मंदिर वितस्ता
के दक्षिण तट पर स्थित है। बारहमूला से एक
मील दूर होगा। पुरानी बारहमूला मुजफ्फराबाद
रोड पर है। यह पहाड़ा के मूल में है। वर्तमान
यारहमूला सडक के निर्माण के पूर्व यह सड़क खूब
चलती थी।
मंदिर सवा तेरह वर्ग फुट में है। मंदिर में
केवल एक द्वार तीन फुट चौड़ा है। मंदिर के समीप
एक नाग अर्थात् जलस्रोत है। नारायण मंदिर पूर्व
काल में एक सुन्दर निर्मल सरोवर के मध्य मे स्थित
था। इस समय मंदिर के पृष्ठभाग का सरोवर स्थान
रेत तथा पंक से पट गया है। मंदिर पूर्णतया खंडहर
की हालत मे है। मंदिर का एक भाग भूमि के अंदर
है। मंदिर द्वार के सम्मुख कुछ सरोवर का भाग
अपनी पूर्व स्थिति का स्मरण कराता है। करुण
गाथा सुनाता है। यात्रियो से अपनी दशा पर सहानु-
भूति के लिए याचना करता है। जलस्रोत आँसुओं
की तरह निकलता रहता है।
मंदिर के पृष्ठ भाग में एक कब्रिस्तान है। कुछ
दिनो में सरोवर का शेष भाग रेत और पंक से पट
जायगा। मंदिर का अस्तित्व केवल पुस्तको मे शेष
रहेगा। मंदिर में मूर्ति नही है। शायद कोई उठा
ले गया है। किंवा कब्रिस्तान के किसी कब्र में लगी
होगी। अथवा किसी के मकान की नींव में पड़ी सो
रही होगी। मंदिर में लगे कुछ पत्थर ९ १/२ फुट लम्बे
तथा १३ इंच मोटे हैं। मंदिर के भग्नावशेष यत्र-तत्र
पड़े दिखाई देते हैं।
मैं अन्तिम बार यहाँ आया था सन् १९६४ में।
उस समय यहाँ के बहुत वृक्ष कट चुके थे। स्थान की
अभिरामता नष्ट हो रही थी। दो, तीन सहतूत के
पेड़ सरोवर के तीर पर लगे थे। उन्हे भी काटा जा
रहा था। किसी समय का सुरम्य देवस्थान कब्रि-