राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग
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[बायाँ स्तम्भ]
कश्यपेश्वरः
हिमाचलेशं शंखेशं देशं चैवसिलेश्वरम् ।
महानन्दीश्वरं शम्भुं वरदं कश्यपेश्वरम् ॥
—1025।१९९७
शम्भुंस्तथा चन्द्रदिवाकरौ द्वौ जग्राह देवोऽथ करद्वयेन।
प्रकाशमासीज्जगतो निमेषाद्ध्वस्तं तथा सर्वमथान्धकारम् ॥ 171।२२३-२२४
ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयः योगेन कृत्वा स्वपरं शरीरम्
दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं देहेन चान्येन स युद्धमैक्षत् ॥—172।२२४
विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च
युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ 173।२२५-२२६
जल निकल जाने के कारण सतीसर सुंदर आनंद
कानन में परिणत हो गया । अबुल फजल आइने
अकबरी में लिखता है—'जब जल घट गया, तो
कश्यप जो अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे, ब्राह्मणो
को इस देश मे आबाद करने के लिए लाये । आद-
मियो की तादाद बहुत बढ गयी, तो शासन करना
आवश्यक हो गया ।
'सभा में एक मत से लोगो ने जो उनमें गुणी
था, राजा चुन लिया । उस समय से काश्मीर में
राजतंत्र स्थापित हो गया । राजा गोनन्द के समय
तक चलता रहा । उसे आज अर्थात् १४ वर्ष अकबर
के शासन काल से ४४४४ वर्ष हो चुके हैं ।'
कश्यपपुर ( मुलतान ) मुलतान का प्राचीन
नाम था । तत्पश्चात् हंसपुर, वेगपुर, शांबपुर तथा
अंत में इसका नाम मूलस्थान हुआ । वर्तमान मुलतान
शब्द मूलस्थान का अपभ्रंश है ।
लगभग ३००० वर्ष ईसा पूर्व मुलतान का निश्चित
नाम क्या था, कहना कठिन है महेनजोदारो तथा
हरप्पा से इस नगर का संबंध जल और स्थल दोनों
मार्गों से था । यह निर्विवाद है । मुलतान का नाम
ई० पू० ६०० वर्ष मे प्रकाश में आया है ।
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[दायाँ स्तम्भ]
ऊपर लिख चुका हूँ, मुलतान का प्राचीन भार-
तीय नाम कश्यपपुर था । फारसी तथा प्राकृत भाषा
में मुलतान को कश्यपपुर नाम से संबोधित किया
गया है । हेकालोरस ने इसका यूनानी नाम 'कश-
पापैरोम' दिया है । यह यूनानी शब्द निसंदेह कश्य-
पुर का अपभ्रंश है ।
प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने 'कश-
पतेरोस' नाम का उल्लेख किया है । अलकझेंद्र
अर्थात् सिकंदर के ऐतिहासिको ने मुलतान को
'मोल्लियों' की राजधानी बताया है । प्तोलेमी ने
'कसपुर' नाम दिया है । यह शब्द कश्यपपुर का
अपभ्रंश है ।
सन् ६४१ ई० में व्हेनसांग भारत आया था ।
पर्यटन काल में इस स्थान की यात्रा की थी । मुल-
तान के विशाल सूर्य मंदिर तथा नगर का अद्भुत
वर्णन करता है ।
आठवी शताब्दी के पश्चात् मूलस्थान का अप-
भ्रंश मुलतान हो गया । एक प्राचीन गाथा है ।
भगवान् नरसिंह ने यहाँ अवतार लिया था । नरसिंह
भगवान् ने हिरण्यकश्यप राक्षस का वध किया था ।
हिरण्यकश्यप राक्षसो का राजा था । हिरण्य शब्द
के साथ कश्यप शब्द इस बात का बोध कराता है
कि हिरण्यकश्यप का संबंध कश्यप वंश तथा कश्यप-
पुर से था ।
कश्यप राक्षसों के आद्य पुरुष थे । हिरण्य-
कश्यप का पुत्र विष्णु का उपासक था । राक्षस,
पिशाच तथा नाग जाति शिव की उपासक थी ।
हिरण्यकश्यप संभवतः विष्णु पूजा का विरोधी था ।
उसका यह विरोध विष्णु भक्ति की ओर आकर्षित
प्रह्लाद के प्रति उग्र हो उठा । अनुमान किया जा
सकता है । नरसिंहावतार की कथा शैव तथा वैष्णव
मत के संघर्ष का एक रूपक है ।
कश्यपपुर का नाम मूलस्थान किस प्रकार पड़
गया । विचारणीय विषय है । मैं समझता हूँ, ।
जहाँ भगवान् के अवतार लेने के स्थान का संकेत