राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० राजतरंगिणी
प्राचीन काल मे मिलता रहा होगा। उस स्थान का
नाम मूलस्थान रख दिया गया। मुस्लिम काल मे
प्रथम बार काशी का मंदिर जहाँ तोड़ा गया था
उसी के समीप मे 'आदि विश्वेश्वर' की स्थापना
हो गयो। दूसरे विश्वनाथजी के मंदिर का निर्माण
अकबर काल मे हुआ था। आदि विश्वेश्वर के नाम
से काशी मे एक मुहल्ला भी है। मथुरा में भगवान्
श्रीकृष्ण का जिस स्थान पर जन्म हुआ था उसे
जन्मभूमि कहते है। वहाँ पर इस समय मस्जिद
है। मस्जिद के पृष्ठभाग मे जन्मस्थान का स्मारक
निर्माण कर दिया गया है।
यही बात मुलतान के विषय मे हुई होगी।
आदि अर्थात् मूल मंदिर जिस स्थान पर रहा होगा
उसे 'मूलस्थान' कहा गया। तीर्थस्थान होने के कारण
नाम प्रचलित हो गया। हिंदू काल मे मूलस्थान
तथा मुसलिम काल मे अपभ्रंश होकर मुलतान नाम
पड़ गया।
पुरासंस्कृत साहित्य मे मूलस्थान का उल्लेख
मिलता है। रावी नदी के मध्य दो द्वीपों पर उसके
बसने का वर्णन किया गया है। प्रसिद्ध चीनी पर्यटक
युवान च्वांग ने इस नगर की यात्रा की थी। उसने
मूलस्थान का स्थान सिंध के पूर्व ९० मील बताया
है। जनरल कनिंघमने उसे मुलतान माना है।
सौवीर सिंधु नदी के पूर्व तथा सिंधु और
वितस्ता के मध्यवर्ती भाग को माना गया है। यह
देश, प्रदेश किंवा क्षेत्र मुलतान तक विस्तृत था।
सिंधु देश को युवान चांग ने सिंध नदी के पश्चिम
का भूखंड बताया है।
मार्कंडेय, ब्रह्मांड, वायु तथा मत्स्य पुराण के
अनुसार सौवीर में मुलतान तथा झरावार क्षेत्र
सम्मिलित थे । झरावार क्षेत्र वितस्ता (झेलम)
तथा चंद्रभागा (चेनाव) के संगम से ५० मील
अधोभाग पर स्थित था। मुलतान सौवीर प्रदेश के
उत्तर मे था।
स्कंदपुराण ने भारत को ९ खंड तथा ७१
विभेदों में बाँटा है। किंतु नाम ७५ का दिया है।
मूलस्थान क्षेत्र की क्रमसंख्या तालिका मे ७वीं है।
उसमें २५ हजार ग्राम थे। ग्रामों की संख्या स्वल्प
होने के कारण अनुमान लगाया जा सकता है।
मुलतान क्षेत्र बहुत बड़ा नहीं था।
वाराह क्षेत्र—सोमदेव भट्ट 'कथासरित-
सागर' में उल्लेख करता है कि भगवान् विष्णु ने
स्वयं वाराह क्षेत्र को पवित्र किया था।—'वाराहं
यच्च क्षेत्रं ये पूताश्चक्रपाणिना—।'(७.५ : ३७)
क्षेमेंद्र ने लोक प्रकाश मे वाराह क्षेत्र का उल्लेख
करते लिखता है 'वाराह क्षेत्र—कोट विहार समीपे—'
मैं यहाँ दो शब्द वाराह क्षेत्र माहात्म्य के विषय मे
लिखना चाहता हूँ। बारहकूला के 'खादनयार' गाँव
के आगे से वितस्ता की धारा में तेजी आ जाती है।
इसके पश्चात् वितस्ता मे नाव चलना संभव नहीं
होता। इस स्थान पर दोनो पार्श्व में पर्वत हैं।
पर्वतों के मध्य मध्ये अधिक संकुचित यह स्थान है।
यहाँ मे वितस्ता वेगवती हो जाती है। स्पष्ट प्रतीत
होता है। जल दौड़ता नीचे की ओर भागा जा रहा
है। यहाँ यदि पानी रोक दिया जाय तो समस्त
काश्मीर उपत्यका के पानी का स्तर ऊपर उठ
जायेगा। समस्त काश्मीर मंडल पूर्वकालीन वर्णित
सतीसर तुल्य हो जायगा। केवल सारिका पर्वत
तथा उसका स्थान जल मे द्वीप के समान प्रकट
होगा।
यही पर पर्वत काटकर संकीर्ण जल मार्ग
विस्तृत किया गया था। नदी की सतह की चट्टानो
को खोदकर नदी का पेटा गहरा किया गया था।
यही वितस्ता द्वारा पानी निकालकर काश्मीर उपत्यका
सूखी भूमि बनाई गई थी। इस स्थान तथा उपत्यका
का भूगोल समझ लेने पर प्राचीन कथा की सत्यता
सिद्ध हो जाती है।
मैने इस स्थान को देखा है। वितस्ता नदी में
इस समय भी एक चट्टान जल मे टकराती, तटीय