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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

आदि पर्व ] पृथ्थीराजरासौ । ६१
॥ आना राजा का जन्म होना और उन का बालपन ॥
भुजंगी ॥ धरै गौर जन्मं आनल्ल राजं । बसे देव गामं दुनी कुच बाजं ॥
नवं वृत्त नित्तं नवं वृत्त सिष्यै । नरं तार तारं नवं स्रत्त भिष्यै ॥ छं० ॥ ३१० ॥
चरं संभरी वात पुच्छंत मित्तं । धरै ध्यान दिष्यै अजमेर चित्तं ॥
कला स्त्रव्व सिष्यंमछा मल्ल वीरं । गिनै मग्ग ओसं पढै मंच धीरं ॥ छं० ॥ ३११ ॥
दिनं सीह अण्वीह आखेट षिखै । ननं नेह निद्रा सुरं सिद्ध मिंखै ॥
करं पाइकं विह्न साइक्क नष्य । भरं भै अभैनं सुयं सव्व रख्यै ॥ छं० ॥ ३१२ ॥
वधै काम कामं अलीहो न भष्यै । सुमै राजसं तामसं सत्त चष्यै ॥
रवै जम्म सेना ग्रहै जम्म भारी। सुई संभरी वात दिष्यै करारी ॥ छं० ॥ ३१३ ॥
कव्है काल कालं अकालं ति बंधै । द्रुतं जोर मा वित्त सौं चित्त संधै ॥
दुच्चं वाच परचंड दुग्गं सरूपं । इसो दिष्यियै राज आना अनूपं ॥
छं० ॥ ३१४ ॥ रू० ॥ १४५ ॥
कवित्त ॥ अति बल बंड प्रचंड । हिंड आखेटक षिखै ॥
घिरन रोज वाराह । बंधि वागुव वर मिखै ॥
वन परवत्त झिरना । निवान (राइ *) राजन सँग हिँडै ॥
राग रंग (भाषा *) कवित्त । दिव्य वानी चित्त संडै ॥
हय हत्थिय देय संकै न मन । षग्ग मग्ग पूनी चढै ॥
चहुआन वंस अवतंस दूम । रंग अनेक आना रचै ॥
॥ छं० ॥ ३१५ ॥ रू० ॥ १४६ ॥
१४५ पाठान्तर :-आनल्ल । वृत्त । नितं । बूत । भृत । बान । पुछंत । सेतं । चितं । सब ।
सिषं । सिपं । महामल्ल । गिनी मंगि आमें । औमें । अवीह । सिद्धं । पायकं । साइकं । नंष्ये ।
भरंभे अभैन सोई सब्व रख्यै । भरं भय भैनं सोई सब्वं रप्ये । भरं भेअभैनं सोयं सब्ब रख्यै । वधे ।
लीहो । होन । सत्तं । चषै । जमं । ग्रहे । जम । सोई । साई । सोइ । संभरि । तिबंधे । जो ।
रभावित्त । सों । दुर्गा । दिंषियै । अनूप ॥
इस रूपक से कविने आना राजा के जन्मादि की कथा वर्णन करना प्रारंभ किया हैं ॥
१४६ पाठान्तर :-राहू । संगे । हिंड़े । कवित्तं । संपै । रंगा । (राइ *) (भाषा *) विशेष हैं ॥

६२ · पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ आना का बालपन व्यतीत होना और वीरत्व को प्राप्त हो
माता से पूछना ॥
दूहा ॥ तन मंडी मचि अप्पनी । छंडी बालक बुद्धि ॥
रोस रम्यौ अरि अंग में । तब पुच्छि मातच सुद्धि ॥
कूं०॥ ३१६ ॥ रू० ॥ १४७ ॥
॥ आना की माता का उसको सर तर और अब्बर
विद्या का उपदेश करना ॥
गाथा ॥ सर तर अब्बर विद्या । सा विद्या अन्य सारसी नथ्थी ॥
सो आना अन भंगं । संचनं प्रिय यो सष्षि ॥
कूं० ॥ ३१७ ॥ रू० ॥ १४८ ॥
जा सिसु वीरं पतनी । बीरं होइ बीर भज्जार्यं ॥
नवं तीन बत्त तरंगं । सा माग्गं वीरया पुत्तं ॥
कूं० ॥ ३१८ ॥ रू० ॥ १४६ ॥
॥ आना का माता से पूछना कि मैं किस वंश में उत्पन्न हुआ हूं ॥
दूहा ॥ बीर पुत्त मातुल सुमति । गर्वार सपनो जाइ ॥
को किच्छि बंसहि उपज्यौ । तूं मुझ जंपहि माइ ॥
कूं० ॥ ३१६ ॥ रू० ॥ १५० ॥
॥ गौरी माता का कहना कि यह बात न पूछो उसके
कहते मुझे भय और करुणा होती है ॥
दूहा ॥ गौरि मात कहै पुत्त सौं । पुत्त न पुच्छहु बत्त ॥
जिच्छि भय जल लोचन भरहि । बर पूछन पर तत्त ॥
कूं० ॥ ३२० ॥ रू० ॥ १५१ ॥
१४७ पाठान्तर :-मत । मही । बुद्धि । पुकिय ॥
१४८-१४६ पाठान्तर :-अरकर । मंत्रनं । अनभंग । साखि ॥ १४६ ॥ धीर । भजाइं ॥ नवती
नवल तरंगं । नव तीन बत्त तरंगं । नवती नव सत रंगं ॥ यह तीन प्रकार के पदच्छेद कोई २
कवि करते हैं ॥
१५० पाठान्तर :-पुत्ति । संपत्रौ । जाई । जाइं । किहिं । ऊपनौ । मांइ । भाइ ॥
१५१ पाठान्तर :-गौरी । सौ । पुत । पुछहु । जिन । भरहिं । पूछत । परतत ॥

आदि पर्ब ]  '       पृथ्वीराजरासो ।        ६३
॥ आना का माता से अपने बंश की कथा हठ करके पूछना ॥
पद्धरी ॥ उच्चर्यौ मात सो पुत्त सचि । जानों न वंस औ पिता बचि ॥
मैं तात नाम बंदी न लेचि । नन करों श्राद्ध कबहू न गेह ॥ कुं० ॥ ३२१ ॥
अप्यौ न चंव अंजुलिय तात । उप्यौ वेद हूं किण सु गान ॥
के नाम लेय मातुलह वंस । पित बैर लेउं बर बीर हंस ॥ कुं० ॥ ३२२ ॥
छंडौं कि प्रान मुक्कूं व देह । संसार भार अप्यौं कि छह ॥
आना नरिंद यह कहिय बात । सुनि श्रवण अप्प धर परिय मात ॥
'   कुं० ॥ ३२३ ॥ रु० ॥ १५२ ॥
॥ आना की माता का उसे कथा प्रगट न करने को
कहना और ढंक करके संक्षेप में कहना ॥
दूहा ॥ पुत्र प्रगह न कीजिये । मो तिय इय अंदेह ॥
आदि हुते दानव प्रबल । घर घुंमी असुरेह ॥
कुं० ॥ ३२४ ॥ रु० ॥ १५३ ॥
भिरन कहत दानव सरिस । मानव मनुषी देह ॥
मो गंधारि निच्चारि मुझ । पुत्त विलासनि गेह ॥
कुं० ॥ ३२५ ॥ रु० ॥ १५४ ॥
अरिल्ल ॥ इह मातुल बंस प्रधानह मान । भये दस पुत्त सु मानिक थान ॥
विचारि कयौ तहां संभरि गाम । बस्यौ अजमेर सुमंत विश्राम ॥
कुं० ॥ ३२६ ॥ रू० ॥ १५५ ॥
१५२ पाठान्तर :- उच्चयै । उच्चस्यौ । रूच्च । जानौ । मुझ । बच्छ । लैहि । कस्यौ । सु ।
वेदहु । किंनसु । कै । लेइ । लैऊं । लेऊ । छंडों । कै प्रांनं । मुक्कौं । ब । अकेलेह । आनां । इह ।
इम । कहीय । अप । वरिय ॥
१५३-५५ पाठान्तर :- पुत्र । पुत्त । प्रगट । कीजोइ । जिय । अंदेस । हुंते । असुरेस ॥ १५३ ॥
विलासन । विलास । न ॥ १५४ ॥ प्रधानह । मांन । मांनिक । थांन । गाम । सुमंत्र । विश्रांम ॥-१५५ ॥

६४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ अन्य उपलक्ष्यों के द्वारा आना का संभारि की पूर्व कथा संभारना ॥
कवित्त ॥ घर मुक्किय वलि राय । सात खम्यौ न कित्ति रस ॥
घर मुक्किय सुअ पंड । सुष्प मुक्यौ सु दुष्प वसि ॥
घर मुक्किय श्रीराम । सिया छोड़य बल गोइय ॥
घर मुक्की नल राय ॥ सिरचि कलंकित जोइय ॥
घर मुक्कि वीर हर चंद नृप । नीच घरह घट जऊ भयौ ॥
ढंकन सु इला नृप जानियै । नृप ढंकन इलचर कयौ ॥
॥ छं० ॥ ३२७ ॥ रु० ॥ १५६ ॥
नृप ढंकन इल होइ । इलह्र ढंकन सु राज भर ॥
एह्र ढंकन वर देव । देव ढंकन वर अंवर ॥
अपजस ढंकन कित्ति । कित्ति ढंकन जस धारिय ॥
औगुन ढंकन विद्य । सुगुन विद्या उच्चारिय ॥
ढंकनह्र काल वर भ्रंमको । भ्रंम कांह्र ढंकन करिय ॥
सावित्त गुरु ढंकै जु सिसु । सिसु ढंकन पित उच्चरिय ॥
॥ छं० ॥ ३२८ ॥ रु० ॥ १५७ ॥
अरिल्ल ॥ इच्चि विधि आनल्ल बत्त उच्चारिय । पुहु कथा संभरि संभारिय ॥
किच्चि विधि राषस ढुंढ उपन्ना । सारंगदे कैसे जुद्ध किन्ना ॥
छं० ॥ ३२९. ॥ रु० ॥ १५८ ॥
॥ आना का माता से पूछना कि नर अर्थात् वीसलदेव
दानव कैसे हुआ ॥
दूहा ॥ एक बत्त तुम सम कहौं । मात कथा समझाइ ॥
नर किच्चि विधि दानव भयौ । इह अचरज मो आइ ॥
छं० ॥ ३३० ॥ रु० ॥ १५९ ॥
१५६-१५७ पाठान्तरः-वल । राइ । लिन्यौ । रिस । मुकीय । श्री । सुष । दुष । मुकीय ।
सीया । षोईय । गोईय । मुक्किय । सिरां । सिरह । कलंक । तज्यौ । जोइय । मुंकि । घरहिं ।
भयौ । इल । भूमि । इल वर । कयै । अप । जस । किर्ति । किर्ति । धारीय । औगन । सगुन ।
उच्चारीय । को । मा । वित्त ॥ १५७ ॥ बत । उच्चारीय । किहिं । अपंन्नौ । कींनौ ॥
१५८-१५९ पाठान्तरः-वत । सो । समझाय । अचरिज ॥ १५६ ॥ नौ । सो । हूं । जानियौ ।
नव निहचे नि संदेह ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६७
आये बंस छतीस । विप्र बंदी जन सारे ॥
दियौ छत्र सिर तिलक । वेद संचच्च उच्चारे ॥
आधार है वह यह है कि इस ग्रन्थ में लिखे हुए संवत् संप्रत शोध हुए और मुसलमानी तवा-
रीखों में लिखे हुए संवतों से नहीं मिलते । अतएव इस संवत् विषयिक झगड़े का प्रारंभ इस
रूपक १६८ और छन्द ३३९ से समझना चाहिये क्योंकि रासे के जितने छन्दों में संवत् मिती
कहे गये हैं उनमें से प्रथम छन्द यही है । इस से हम को विदित होता है कि संवत् ८२१
वैशाख सुदी १ शुक्रवार को बीसलदेवजी राज-गद्दी पर विराजे किन्तु इसी आदि पर्व में इस
रूपक से थोड़े से ही और आगे बढ़‌कर हम को बीसलदेवजी के पट्टन द्विज्य करने के संवत्
सूचन करनेवाले नीचे लिखे रूपक मिलेंगे:-
(संवत् १८५९ की पुस्तक में)
दोहा ॥ सो संवत् नव सत अटु । वरस तीस छह अग्ग ॥
पुर पट्टन बीसल नृपति । राजत सयलह जग्ग ॥
कवित्त ॥ संवत् नव सत अटु । वरस दस * तीय सत अग्ग ॥
पुर प्रविष्ट बीसल नरिंद । राजंत सयल जग्ग ॥
( संवत् १७७० की पुस्तक में )
दोहा ॥ सो संवत् नव सत अध । वरस तीस छह अग्गि ॥
पुर पट्टन बीसल नृपति । राजत सयलह जन्नि ॥
कवित्त ॥ सर संवत् नव सत्त । वरस दस * पंच सत अग ॥
पुर प्रविष्ट बीसाल । नृपति राजंत सयल जग ॥
( गुजरात देश की पुस्तक में )
दोहा ॥ सो संवत् नव शत अधिक । वर्ष तीस छह अग्ग ॥
पुर प्रतिष्ठ विशल नृपति । राजत सकले जग्गं ॥
जितनी पुस्तक हम इस टिप्पण के लिखते समय देख सके उन सब में ऊपर लिखे पाठ
पाये अर्थात् किसी में हमारी सं० १८५९ का पाठ मिलता है तो किसी में संवत् १७७० वाली का ।
शोक की बात है कि हमारी १६३१ तथा १६३२ वाली पुस्तक में तो यह पर्व्व ही नहीं है और संवत्
१६४७ वाली में यह पृष्ट नहीं है कि जिसमें इन छन्दों का होना सम्भव है । यह तो जानने में
ही है कि पिछले रूपक १४० में चंद कह आया है कि "चौसट्टि बरस बर राज कीन" चौंसठ

  • हिन्दी भाषा के ऐसे प्राचीन काव्यों में चंद जैसे महाकवियों को गूढ़ बातों को खोलने की कुंजियों में से
    हम एक का यहां प्रकाश करते हैं कि दश दस और दृशि दसि शब्दों का अर्थ जहां वे कुछ संख्या प्रकाश करने को
    प्रयोग हुए हों वहां सूक्ष्मता रखते हैं अर्थात् दश अथवा दस = १० का वाचक और दृशि अथवा दसि = शून्य ०
    अर्थात् केवल दहाई का वाचक होता है और जहां लेखक दोष से इन शब्दों के लिखने में गड़बड़ हो जाती है वहां
    संख्या में भी गड़बड़ पड़ जाती है कि इस के उदाहरण इस महाकाव्य में यहां से लेकर अनेक स्थलों में आवेंगे ॥

६८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
आनंद अग्गवर इंद्र सम । अंग नंद जस उड्डरै ॥
अजमेर नयर अरि जेर करि । विमल राज बीसल करै ॥
कुं० ॥ ३३८ ॥ रू० ॥ १६८ ॥
बरस बीसलदेवजी ने राज्य किया । अब विद्वानों के विचार देखने जैसी बात है कि इस रूपक
के संवत् को इसी प्रकरण के दूसरे रूपकों में कहे संवतों से मिलाने से एक सौ वर्ष का फरक
पड़ता है और जो ९१ वर्ष का एकसा अंतर रासो में लिखे सब संवतों को संप्रत शोध से मिलाने
और जो पखाने हमने पृथ्वीराजजी के शोध किये हैं उन से पड़ता है वह इस से सिवाय है ।
जगत का एक यह सर्व साधारण नियम है और उसका भार सब पक्षपात रहित विद्वानों पर है
कि प्रत्येक समय के विद्यमान बड़े २ विद्वान सब परम पद-प्राप्त ग्रन्थकर्त्ताओं के ऊपर जो कोई
व्यर्थ आक्षेप करै उस को खण्डन कर के छिन्न भिन्न कर दें क्योंकि यदि यह भार विद्वानों पर स्वतः
सिद्ध न रहा होता तो सब कीट क्रिकिट सब अमूल्य ग्रन्थों को खंड कर खाजांय और बड़े २
कवियों के नामों पर पोता फेर दें। अतएव ऐसी जिम्मेदारी को शुद्ध अंतःकरण से समझने
वाला कोई विद्वान क्या यह कहेगा कि भिन्न २ पुस्तकों में यह भिन्न २ अशुद्ध पाठ चंद कवि
जैसा महाकवि बीसलदेवजी की तरह दानव होकर लिख गया है ? क्या इन भूलों का अपराधी
चन्द है ? नहीं-नहीं-कभी नहीं । हम क्या एक छोटा सा बालक भी कह सकता है कि यह
सब भूलें अयोग्य लेखक और कवियों ने जान कर अथवा अनजाने कियी हैं। अब हमारी
सम्मति इस विषय में चन्द की शैली और ख्यातियों की पुस्तकों में लिखे सं० ९३१ को देखते
हुए ऐसी है कि यहां ऐसा पाठ था कि “नौ सें अरु इकतीस” और इस हमारे अनुमान की
पट्टन विजय करने के संवत् वाले रूपक पुष्टि करते हैं। देखो :-
बीसलदेवजी का पाट बैठना ... ... ... ... ९३१ वर्ष
उनका राज्य करना जोड़ो ... ... ... ... ६४ वर्ष
रासो के संवतों और विक्रमी में जो सर्वत्र एकसा अन्तर है वह जोड़ो-९१ वर्ष
विक्रमी संवत् = १०८६
रासो के रूपकों के जो मूल पाठ अशुद्ध हैं उनको अभी हम जैसे लिखित पुस्तकों में हैं वैसे
ही रक्खेंगे क्योंकि जब तक सब विद्वान एक मत न हो जांय तब तक उनको हम पुरातत्त्व विद्या
के नियमों के अनुसार बदल नहीं सक्त हैं। इस के अतिरिक्त हम पुरातत्त्व वेत्ताओं को चेत कराते
हैं कि फीरोज़शाह की लाटपर की प्रशस्तियों को जब एक बार प्रथम बीसलदेवजी के और
पृथ्वीराजजी के चरित्रों को भले प्रकार ग्रंथान्तरों में पढ़कर उन आशयों के सहारे से फिर विचारें
तौ उन को मालूम हो सकेगा कि पहिली प्रशस्ती जिस में का नीचे लिखा अनुवाद है उस को
बीसलदेवजी को नहीं समझना चाहिये किन्तु पृथ्वीराजजी की समझना उचित है और केवल
यही विशेष समझना होगा कि बीसलदेवजी के उपलक्ष्य का संबन्ध उस में इतना ही है कि जिस
मिती को वह प्रशस्ती निर्माण हुई है वह मिती बीसलदेवजी के पाट बैठने की है अर्थात्
वैशाख शुदी १ और पृथ्वीराजजी को बीसलदेवजी का अवतार होना लोग मानते हैं अतएव इन
प्रशस्तियों के लिखने वालों ने अपने इस गूढ़ भाव को प्रकाश करने में उन दोनों का सादृश्य दिखाया

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ६६
॥ बीसलदेवजी का अंत समय पट्टन विजय करने को
छत्र धारणा करना ॥
दूहा ॥ वर पहन अहन अमित । समित वेद फुनि राज ॥
समय अंत बीसल सिरह । धस्यौ छत्र सम साज ॥
॥ कूं० ॥ ३४० ॥ रू० ॥ १६६ ॥
पद्धरी ॥ सिर धारि छत्र वीसल नरिंद । आसनह सिंघ वर वरन इंद ॥
भूदेव मंडि वेदी विसाल । रस पंच मेधि मेलेँ ति काल ॥ कूं० ॥ ३४१ ॥
वर बढी ज्वाल खंडन विभाग । जमि रहे जमत्त पुट पञ्जति लाग ॥
मष समुष दिष्व परस्पर वैन । तिन पुटह बीच तन धूम औन ॥ कूं० ॥ ३४२ ॥
जानीत वेद मुख रहै मैंान । सुभ समय असुभ उच्चार कौंन ॥
संपूर् वेद किन्ने भिषेक । दुज दय वंदि आसिष अषेष ॥ कूं० ॥ ३४३ ॥
बिधि औन राज दिय सु जप माल । जै जया सबद बीसल भुच्चाल ॥
॥ कूं० ॥ ३४४ ॥ रू० ॥ १७० ॥
है कि जिस से निर्णय करने में यह झगड़ा पड़ जाता है कि अमुक प्रशस्ती पृथ्वीराजजी की है अथवा
बीसलदेवजी की । हमारे पास इन प्रशस्तियों संबन्धी सन्न संज प्रस्तुत नहीं है और न इतना
अवकाश है नहीं तो हम ही परिश्रम करके कुछ विशेष सारांश प्रकाश करते । इस के अतिरिक्त
जो सं० १२३० जैसी प्रशस्तियों को वीसलदेवजी की मानें तो फिर पृ थ्वीराजजी को तेरहवें शतक
में मानना पड़ेगा कि उस दशा में भी पृथ्वोराज जी चितोड़ की और आबू की प्रशस्तियों के
अनुसार रावल समरसीजो के समकालीन होंगे और मुसलमानी तवारीखों के सन झूठे ठहर कर
संशत प्रसूत हुई तर्क के अनुसार मुसलमानी तारीख जालीं सिद्ध होंगी ॥ '
Om.
In the year 1230, on the first day of the bright half of the month Vaishakh.
(a monument) of the Fortunate-Visal-Deva,-son-of-the-Fortunate-Amilla-Deva-
King-of-Sacumbhari,
Popular Ed. of the Asiatic Researches, page 315.
पाठान्तर :-पाठ । बर । वर । प्रतिपादा । प्रतीपदौ । छत्तीस । सारै । दीयौ । उच्चारे । नैर ॥
१६६ पाठान्तर :-पुनि । समैं । सरह । धैयौ । जास ॥
१७० पाठान्तर :-मंडि । छत्रधारि । घंवरन । इंद्र । मधि । मेले । मले । मेलिय । वढिय ।
वटी । दिपिं । बेन । पुट । हबी । चतन । औन । रहे । मोंन । शुभ । अशुभ । कोंन । कीनो । बंध ।
बंधि । एन । शद्द । भूवाल ॥

९० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व
॥ बीसलदेवजी पाट बैठकर कैसे राज करते थे ॥
दूहा ॥ लसय पाट बीसल नृपति । विकल दूच्छ घन सार ॥
पंडन चिय दंडन करै । बिन अपराध अनार ॥
॥ छं० ॥ ३४५ ॥ रू० ॥ १७१ ॥
कवित्त ॥ दूसौ बीर बीसल । नरिंद अजमेर नैर पर ॥
रचि रचना पुर दिव्य । मनौं विसक्रम कीय कर ॥
अध्रम भ्रम उपेरै । क्रम दुक्ति मन इच्छै ॥
हक्क द्रव्य संग्रहै । विना हक लोभन वंछै ॥
चव बरन सरन चहुआन कै । वंस छत्तिस सेवंत छी ॥
बीसल नरिंद अंमाधिधरि । देव कला देवत्त ही ॥
॥ छं० ॥ ३४६ ॥ रू० ॥ १७२ ॥
॥ बीसलदेवजी का अपने पुत्र सारंगदेवजी को उपदेश करके
सांभर भेजना कि जो अपनी धा-बैन के पति के
विनाश से दुचित हो गये थे ॥
कवित्त ॥ पट रागिनि परिच्छार । ग्रभ्य सारंग उपन्नौ ॥
पुत्र होत भइ मृत्य । बाल बानिक कौं दिन्नौ ॥
१७१ यह रूपक संवत् १७१० और १६४७ की पुस्तकों में तो नहीं है किन्तु सं० १८५९ तथा
सोसाईटी की छापी हुई पुस्तकों में है । जब कि इन से भी बहुत पुरानी पुस्तकों में यह न
मिले तब तक उस को क्षेपक संज्ञा हम नहीं दे सक्ते यहां यह भी समझ लेने योग्य बात है कि
१६९ रूपक से १७० रूपक तक बीसलदेवजी की पाटन की चढ़ाई के लिये छत्र धारण करने का
वर्णन है । प्राचीन समय में जब कि राजा किसी पर चढ़ाई करते थे तौ छत्र धारण विधि का वैदिक
कर्म करके प्रस्थान करते थे । पाठकों को यह बीसलदेवजी की कथा बहुत सावधानता से पढ़ना
चाहिये क्योंकि इस के बीच २ में उन के लड़के सारंगदेवजी आदि के भी वृत्त आते जाते हैं परंतु
उन सब को कवि ने बीसलदेवजी के वृत्तों में मिलाकर वर्णन किये हैं ॥
पाठान्तर :—इछ ।
१७२ पाठान्तर :—बीसल । नेर । मनौं । विश्वक्रम्म । विसकम्म । विसकर्म । करि ।
अधर्म । भ्रम । ऊपरै । श्रम । दुक्ति । नन । इछै । विनां । हक्क । लोभ । न । चकौच । चहुवांन ।
छतीस । छत्तीस । अधाधिधार । देव । तही ॥
१७३ पाठान्तर :—पाट । रानि । ग्रभ । उपनौ । भय । मृत्ति । कां । दीनों । वनिकं ।
दि नौ । सम । पै । इक्क । लगैं । कीयौ । वीना । हुवे । गये । बिनस्सयौ ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ७५
ता वानिक नंदिनिय । नाम गौरी सारँग सन * ॥
इक्क थांन पय पान । इक्क सिज्या इक आसन ॥
नव वरस लगिग कन्या रच्ची । व्याह राज बीसल कियौ ॥
वीवाह हुओ वर वन गयो । तहां सिंघ वर विनसयौ ॥
छं० ॥ ३४७ ॥ रु० ॥ १७३ ॥
दूहां ॥ सिंघ विनासौ वनिक सुत । कन्या किया अंदोह ॥
वृत्त धस्यौ ब्रह्मचर्य को । तप पहुकर तजि मोह ॥
छं० ॥ ३४८ ॥ रु० ॥ १७४ ॥
पद्धरी ॥ अति दुचित्त भयौ सारंग देव । नित प्रत्ति करै अरहंत सेव ॥
बुध अम्म लियौ बंधै न तेग † । सुनि श्रवन राज मन भौ उदेग ॥ छं० ॥ ३४९ ॥
बुझाइ कुंच्अर सनमान कीन । किचि काज तुम्झ हूद्द अम्म लीन ॥
तुम इंडि सरम हम कछौ वत्त । वांनिक पुत्त इन तैं दुचित्त ॥ छं० ॥ ३५० ॥
दूह नष्ट ग्यांन सुनियै न कान । पुरपातन भज्जै कित्ति छान ॥
तुम राज बंस राजनह संग । मृगया सर खेलौ वन दुरंग ॥ छं० ॥ ३५१ ॥
परबोध तजो बोधक पुरान । रामाइन सुन भारथ निदान ॥
अभिमान दान रिन सरन अम्म । चास्यौ प्रकार सुनि राज क्रम्म ॥ छं० ॥ ३५२ ॥
परबोध मानि राजन कुमार । तत काल मंगि वंधे हथ्यार ॥
भय प्रसन राज कीनौ पसाव । संभरि रजधानी करहु जाव ॥ छं० ॥ ३५३ ॥
गजराज पाट हैं वर उतंग । सिंघासन दीनो जटिल नंग ॥
तुम जाहु कुंच्अर संभरिय थान । किरपाल करिय कायथ प्रधानं ॥ छं० ॥ ३५४ ॥
प्रोचित मुकंद ‡ सारँग चुहान । साचौर धनी नरसिंघ भान ॥
धंधार जार वच्चवल बलोच । दिय बहुत हसम कौयौ न सोच ॥ छं० ॥ ३५५ ॥

  • यह पाठ हम ने सं० १६४७ तथा १७१० की पुस्तकों से रक्खा है इधर की सब पुस्तकों
    में सम पाठ है । सनोतिषणुदाने तथा चि० अखपिंडते ॥ अथवा सं० सून वा सूनु का अपभ्रंश है ॥
    १७४ पाठान्तर :- कंन्या । कीयौ । वृत । धर्यो । पुहुकर ॥
    † हिं० तेग from Sk. (तैग्म-(तिग to assail, to seek, to injure, to attempt to kill)
    or तिग्म = sharp as a weapon) इसी तरह हिं० तेज is not from the A. Tayz or P. Tez, but
    from the Sk. तेज m. Sharpness, pungency sharpness of a weapon. Brilliance. Spirit.
    ‡ यह नागर जाति का ब्राह्मण था ॥
    १७५ पाठान्तर :- प्रति । ध्रम । कीयौ । बंधे । स्रवनं । भयं । बुलाय । कुवर । तुम ।
    ध्रम । धर्मै । वृत । बानिकं । तैं । दुचित्तं । ग्यांन । सुनियें । सुनीयेँ । कानं । भैं । छित्ति ।

७२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
अनेक जाति उमराव सध्य । द्वै गौ नर बाचन सुतर रथ्थ ॥
तिन्हि बार धाय बानिक बुलाय । जिन जाहु कुँअर की सध्य काय ॥ छं० ॥ ३५६ ॥
तुम कियौ पुच सौं सेक मुंड । षिखि बैन कयौ कहा देहुँ दंड ॥
अजमेर मेल्हि संभरि दिसान । जो जाहु तब्ब षंडौ परान ॥ छं० ॥ ३५७ ॥
इतनी कथिय नृप चल्यौ सध्य । रथ च्यार भरे मिन वार अध्य ॥
जोजनह एक कीनौ मिलान । अनेक अष तहां षान पान ॥ छं० ॥ ३५८ ॥
भय प्रात प्रसन पग लग्गि पुत्त । चलि सीष अंगि संभरि पहुत्त ॥
सर जाय पहूचिय संभ राय । मन वच सुद्ध करि क्रम नाय ॥ छं० ॥ ३५८ ॥
दस मछिष भँजि तहां बन्नि सु दीन । जज होम धोम सुर प्रसन कीन ॥
कीनौ प्रवेस सुर मच्छिम मैलि । तोरन कलस बंधि राज पौलि ॥
छं० ॥ ३६० ॥ रु० ॥ १७५ ॥
कवित्त ॥ किय प्रवेश सारंग । देव संभरिय थान थिर ॥
आयेहु वैश्य षिचिथ । अनेक पग लग्गि नम्सि नर ॥
तब कायथ किरपाछ । सबन कौं आग्या दीनी ॥
सस्त्र वस्त्र दत वित्त । देय दिह्लासा कीनी ॥
जद्दवनि गौरि आइय जबहि । पाइ लगी परमार कै ॥
नव सगुन भए सगुनी कह्यौ । कुँअर होइ कुम्मार कै ॥
छं० ॥ ३६१ ॥ रु० ॥ १७६ ॥
दूहा ॥ देवराज रावत सुता । देवत्तनि जहौंन ॥
गौरि नाम सारंग वर । मनरति म्वरति जौन ॥
छं० ॥ ३६२ ॥ रु० ॥ १७७ ॥


पेलो । सुनहुं । रिण । श्रम । चाल्यों क्रम । कुंआर । बंधे । हथ्यार । हुब । प्रसत्र । रजधान
संभरिय करह जाव । हैं । कुमार । यांन । करीय । प्रधांन । सारंग । चुहांन । चैहान । धनीय ।
भांन । दिये । हसंम । कियौ । वांनिक । बुलाई । सथ । सों । मूठ । षन । कह्यो । दिसांन ।
खरांन । कथ । सथ । मध्य । सथि । जोजन । अरक । लगि । पहुंच । बच । नादू । भंजि । बली ।
प्रसन्न । तोरंन कलस बंधेति पोल ॥
१७६ पाठान्तर :-थांन । आय । आइ । षित्रि । कों । आथा । ससत्र । शस्त्र । चित्त ।
दिलासा । किनो । जदवनि । पाय । कुंअर । कुंमार ॥
१७७ पाठान्तर :-देवर्तनि । जदौन । मनो । रनि । मनोरति ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७३
॥ बीसलदेवजी का मृगया से बाहुरना एक तलाव
बनाने की आज्ञा देना और दरबार करना ॥
दूहा ॥ तब बाहुरि बीसल नृपति । मृगया खेलत बन्न ॥
देखि थान सर * उद्धरन । मतौ उपान्यौ मन्न ॥ छं० ॥ ३६३ ॥ रू० ॥ १७८ ॥
पद्धरी ॥ तब देखि नरिन्द अनूप ठाम । निर्झर गिरिन्द वन अभिराम ॥
बुद्धाय लिए मंची प्रधान । सर * रचै इहां पहुकर समान ॥ छं० ३६४ ॥
फरमाय † काम अप आय गेह । आनंद अंग उपज्यों अछेद ॥
बैठौ सिंहासन धम्म नंद । बीसल नरिन्द नर लोक इंद ॥ छं० ॥ ३६५ ॥
सिर छत्र पास दुय चमर ढार । अति रूप जानि अस्वनि कुमार ॥
आईय सु कुलि छत्तीस नाम । पावासर तोवर गौर राम ॥ छं० ॥ ३६६ ॥
हजूर लए राजन बुलाइ । तंबोलि दियो सनमुख्य चाइ ॥
पढि बंदि छंद बोले विरद । मुसकाय सीस नायौ नरिन्द ॥ छं० ॥ ३६७ ॥
सब सभा पूरि जैसैं नखित्त । चहुआन बीच जनु चंद रत्त ॥
सनमान करे सब दइय सीष । फिरि बंदी जन दीनी असीष ॥ छं० ॥ ३६८ ॥
निसि गई पंच पल ण्क जाम । राजन महल्ल ‡ प्रवेस ताम ॥
करपूर अगर मृगमद सु वास । सैंधे छिरकिक उत्तिम अवास ॥
छं० ॥ ३६६ ॥ रू० ॥ १७८ ॥
* यह बीसल का तालाब अब तक अजमेर के पास विद्यमान है । उस के किनारे पर जहांगीर
बादशाह ने एक महल बनाया था कि जिस में उस ने इंगलिस्तान के बादशाह जेम्स पहिले के एलची
से मुलाक़ात कियी थी । इस टिप्पण को हमने इस तालाब के किनारे पर खड़े होकर लिखी है । यदि
कोई पुरातत्ववेत्ता इस तड़ाग की वर्त्तमान दशा अपनी आंख से देखे तो उस को बड़ा शोक और आश्चर्य
होगा कि अंग्रेज सरकार के राज्य समय में ऐसे प्राचीन स्थलों के जीर्णोद्धार राज-कोष के द्रव्य से होता है
परंतु रेलवाले अपनी रेल इस पर दौड़ा २ कर उस को छिन्न भिन्न कर डालते हैं कि पांच सात वर्ष पीछे वह
समूल नष्ट हो जायगा। हमारी सम्मति में यह विषय पुरातत्ववेत्ता विद्वानों और समस्त भारतप्रजा को
सरकार हिन्द की सेवा में मिमोरियल करने जैसा है कि जिस से यह ऐतिहासिक चिन्ह यथास्थित बना रहे।
† यह भी हिन्दी शब्द है संस्कृत स्फुरितम् अथवा स्फूर्तिः = स्फुरणे, मनसः कल्पनायाम् से ॥
‡ यह भी हिन्दी है संस्कृत महल्ल = अंतःपुर inner appartments, palace. और मह-
ल्लिकः = अंतःपुर रक्षक से ॥ १७८ पाठान्तरः-नृपति । वन । यांन । मतौ । मन ॥
१७९ पाठान्तर :-नरिंद । निझर । नर्झरन । गिरंद । अभिराम । बुलाय । लये । रचो । समानं ।
बैठो । सुसिंघासन । धर्म । नरिंद । समीप । दोय । जानि । अश्वनि । आदय । कुली । छतीस । ताम । पावा-
सिर । तूंवरं । बुलाय । बुलाहि । दीयो । सनमुख । चाहि । चाय । छंद । वंदि । विरद । नाम्यो ।
जैसें । चहुवान । सनमान । दईय । जांम । राजन । धाम । कर्पूर । सोंधे । छिरकि । उत्तम ॥

७४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ बीसलदेवजी का रणावास में पधारकर विश्राम करना और उन की एक अप्रिय रानी का उन को नपुंसक कराना ॥
कवित्त ॥ सुरँग धाम अभिराम । तहां विश्राम राज किय ॥
राग रंग नाटक । विनोद सुष महल बोल लिय ॥
पट रागिनि पांवार । रूप रंभा गुन जुब्बन ॥
प्रमुदा प्रान समान । नहीं विसरत्त इक्क छिन ॥
रति भोग सुरति तिन सैं सदा । कबहु आन न दिच्छ चिय ॥
षिन्नि सौंति सकल एकच भय । पुरुषातन तिन बंध किय ॥
कूं० ॥ ३७० ॥ रू० ॥ १८० ॥
पद्धरी ॥ तब सकल भय एकच नारि । पुरुषातन तिन बंध्यौ विचार ॥
प्रचार सचर दूतिका च्यार । लै षवरि सचर पहुची मझार ॥ ३७१ ॥
प्रसताव भाव तिन कहि उच्चार । जोगिनिय बोल आदीतवार ॥
पचराइ वेस बदलाय भेस । इम कियो राजदारच प्रवेस ॥ ३७२ ॥
लै अत्थ दई दरवान हथ्थ । इम किय प्रवेस सच्चरिय सध्य ॥
जोगिनिय गई रागिनी मद्धि । सब बोलि कह्यौ है सिद्ध सिद्ध ॥ ३७३ ॥
आदेस कियौ सब पाडू लग्गि । आसन जोरि कर उभ्भ अग्ग ॥
किंचि काज आज हूं बोलि लीन । किंचि नारि तुमचि इच्छ सीष दीन ॥ ३७४ ॥
सब सौति कह्यौ दुष सुनहु तुम्म । राजन तनय हम सौं न क्रम्म ॥
को जानि मात बिंझनी पीर । सौति कौसाल सांझै सरीर ॥ ३७५ ॥
तुम कहौ करूं जीव तैं बद्ध । तुम कहौ करौं नारी विरुद्ध ॥
तुम कहौ करौं काम तैं भंग । ज्यौं नारि च्रंग त्यौं पुरुष अंग ॥ ३७६ ॥
सब चित्त बसी इच्छ सौति बात । अब ची इच्छ कारज करो मात ॥
मंगाय अगिनि तब कियौ होम । षर स्वान मांस प्रति वास घोम ॥ ३७७ ॥
उच्चरौ मंच आराधि इष्ट । तत काल भयौ काम तैं नष्ट ॥
दस दिसा लग्गि इच्छ करी विद्धि । गत भौ पुरुषातन रचि न सिद्धि ॥ ३७८ ॥
दै द्रव्य कह्यौ माता सिधाव । इच्छ सचर कुंडि अनि सचर जांव ॥
१८० पाठान्तर :- सुरँग । मुष ताम । विश्रामं । मुष । पंवार । जुवन । प्रांन । समांन । इक्क । स्यैं । नि । दरस । सौर्कि । भई ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७५
॥ बीसलदेवजी का पुरुषत्व नाश होने से दुचित्त हो गोकर्णे-
श्वर की यात्रा करने को गुजरात में जाना ॥
अति दुचित्त राज भय काम नास। ब्रह्मचर्य नेम लियौ चतुरमास ॥ ३७८ ॥
कातक करत पहुकर सनान । गोक्रन्न * महातम सुनत कान ॥
बुझाय नैतसिय गोछवान् । तुम भूमि पास नागरह † चाल ॥ ३८० ॥

  • इन गोकर्णेश्वर महादेवों की उत्पत्ति-कथा स्कंध पुराणान्तर्गत जो नागर ब्राह्मणों
    का एक परमपूज्य संस्कृत भाषा में २४००० हजार श्लोकों की संख्या का नागरखंड नामक ग्रंथ है
    उस के २६ वें अध्याय में लिखी है । यह संपूर्ण ग्रंथ मेरे पुस्तकालय में है ॥
    आज जो वडनगर और बीसननगर नामक नगर गुजरात में प्रसिद्ध हैं उन का प्राचीन नाम
    चमत्कारपुर था, उस की सीमा का प्रमाण उक्त ग्रंथ के १६ वें अध्याय में नीचे लिखे प्रमाण लिखा है
    अर्थात् इन गोकर्णेश्वरों को उस की दक्षिणोत्तर सीमा पर होना प्रकाश किया है :-
    ऋषय ऊचुः ॥ चमत्कारपुरोत्पत्तिः श्रुतात्वत्तो महामते ।
    तत्क्षेत्रस्य प्रमाणं यत्तदस्माकं प्रकीर्तय ॥ १ ॥
    यानि तत्र च पुण्यानि तीर्थान्याय तनानि च ।
    सहितानि प्रभावेन तानि सर्वाणि कीर्तय ॥ २ ॥
    सूत उवांच ॥ पंचक्रोश प्रमाणेन क्षेत्रं ब्राह्मण सत्तमाः ।
    आयामव्यास तश्चैव चमत्कारपुरोद्भवं ॥ ३ ॥
    प्राच्यां तस्यां गयाशीर्षं पश्चिमेन हरेः पदं ।
    दक्षिणोत्तरयोश्चैव गोकर्णेश्वर संज्ञिकं ॥ ४ ॥
    हाटकेश्वर संज्ञं तु पूर्वमासी द्विजोत्तमाः ।
    तत्क्षेत्रं प्रथितं लोके सर्वपातक नाशनं ॥ ५ ॥
    यतः प्रभृति विप्रेभ्यो दत्तं तेन महात्मना ।
    चमत्कारेण तत्स्थानं नाम्ना ख्यातिं ततो गतं ॥
    † नागरह = उक्त नागरखंड जिस के भले प्रकार पढ़ने में आया होगा वह कह सक्ता है
    कि आनर्त देश में हाटकेश्वर क्षेत्र है उस में जो आज बड़नगर नाम से प्रख्यात है वह नगर
    यही है । इस के सत्युग में आनन्दपुर, त्रेता में चमत्कारपुर, द्वापर में मानपुर अर्थात् मनीपुर,
    और कलि में नगर अर्थात् बड़नगर नाम प्रसिद्ध हुए हैं । इस के अतिरिक्त यह भी ध्यान में
    रखने जैसी बात है कि नागर ब्राह्मणों में से जो आज बीसननगरा नामक नागर ब्राह्मण प्रसिद्ध
    हैं वह बड़नगरों में से इन ही बीसलदेवजी के समय में उन के दान लेने से पृथक हुए हैं और
    वीसननगर नामक जो नगर आज गुजरात में प्रसिद्ध है वह इस समय का इन ही बीसलदेवजी
    का प्रदान किया हुआ है । नागरखंड से यह भी ज्ञात होगा कि बीसलदेवजी के समय में जिन
    नागर ब्राह्मणों को दान दिये गये हैं उन में से कुछ उस समय पुष्कर में भी रहते थे
    और यही लोग बीसनदेवजी को पुनश्च पुंसत्व प्राप्त कराने को गोकर्णेश्वर की यात्रा जिस का

७६ | पृथ्वीराजरासौ । | [ आदि पर्व
तुम देस कहीजै गोउक्रन्न । परवत्त सरोवर नदी रन्न ॥
महाराज उहां महादेव थान । बानास नही कौमारि कान ॥ ३८१ ॥
गिर वर उतंग इक तीन कोस । निझरना झरत मन आव जोस ॥
केतीक दूर अजमेर हूंन । दिन दोय मंझ नीके पहूंत ॥ ३८२ ॥
चढ़ि चल्यौ राज गोक्रन्न दिसान । मै मंत गुरिय घूमत निसान ॥
आवाजि पहूंचिय दस दिसान । अरि भ्रमै वन्न तजि थान थान ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७७
वरन वरन पल्लव । पहुप द्रुमवेल्लि केलि-फल ॥
कीर पिक चकोर । मोर कोकिल कौतूहल ॥
वाराह सिंघ मृग जूथ जहां । दिष्पिराज अचरिज भयौ ॥
अनूप ठाम आराम अति । सिव परसत सब सुष भयौ ॥
छं० ॥ ३८५ ॥ रू० ॥ १८३ ॥
कवित्त ॥ परवत में कंदरा । तहां किन्नर सु विराजै ॥
वारि बूंद सिर झरै । पास सिंघ जूथ समाजै ॥
आनि अचानक राज । पाइ लगे करि प्रन्न पति ॥
ॐ नमो सिव सकल । नमो अकलेस अकल मति ॥
फल पहुप द्रव्य पंचा अमृत । धूप दीप अग्रें धरिय ॥
अस्नान दान चहुवान करि । तब अस्तुति सेवा करिय ॥
छं० ॥ ३८६ ॥ रू० ॥ १८४ ॥
॥ बीसलदेवजी का गोकर्णेश्वर महादेव की स्तुति करना ॥
भुजंगी ॥ नमो वाय भूताय थानं भयानं । जटा मांचि गंगा झलकै प्रमाणं ॥
चयं नेच ज्वाला जळं चंद्र भालं । विषं कंठ मालां रुलै रुंड मालं ॥ ३८७ ॥
मचा आदि मुद्रा नषं सिंगि नादं । सिधं देव देवं कथं साथ साधं ॥
धरा धूरि धूसं विभूतं घसंते । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३८८ ॥
गजं चर्म आछादितं भ्रंम नासं । रहै वीर भैरवं गनं आस पासं ॥
पदम्मासनं पुष्टि नंदी प्रचंडौ । चवं वेद आमोद चौसठि चंडी ॥ ३८६ ॥
भी देखने में आते हैं अतएव इस को कवियों की एक शैली मानना चाहिये । ऐसे स्थलों में प्रायः
शुष्क-कवि आपस में बहुत वाद विवाद कर सिर फोड़ा करते हैं अतएव हम एक और भी सूक्ष्म
कारण बताते हैं कि चंद और सूर जैसे आर्द्र-कवि गान विद्या में पारंगत होने के कारण जहां
एक ही यति में अनेक स्वर स्वरित हो गये हों वहां की एक दो मात्रा को दूसरी यति में मिला
देते हैं कि जिस में स्वर न बिगड़े देखो यहां उतंग के तुं और सरिता के ता पर स्वर स्वरित
हो गये हैं ॥
१८४ पाठान्तरः-प्रबत्त । किंनर । बुंदि । नपै । सिंध । पाय । प्रनति । उं । द्रबि । पंचै ।
दांन । चहुवांन ।
१८५ पाठान्तरः-झलकै । वंदे । सधं । दूरि । ढूसं । भैरूं । आसा । पासं । पदंमासनं ।
पुष्टी । कोद । चौसठि । डक । डौरूं । तड़कै । मेरे । धूजै । धनुंक्कं । धरें । वांम । सूलपांणी ।

An accurate line-by-line transcription of the Devanagari text on the page:

९८ | पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
बजै डक्क डोरू डसकं तडक्कै । धकै सेरु धुज्जै छके गैन छक्कैँ ॥
धनूकं पिनाकं धरै बाम हस्ते । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३८० ॥
सिधं साध आराधयं शूलपानी । सिवा भ्रंम साधेति के साध जानी ॥
नरं किंनरं गंध्रवं नग्ग जष्पं । सुरं आसुरं अच्छरी हूर रष्पं ॥ ३८१ ॥
सनक्कादिकं सप्तर्षी बाल कालं । प्रथीवायुगेनाय तेजंस लालं ॥
नभो भान चंद्रं नवं ग्रह समक्षे । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३८२ ॥
मिटै संकटं वाट घाटं विघहं । रटै नाम तो कोटि काटै कसट्टं ॥
परं बेचरं भूचरं जंच मंचं । जपै व्याधि आसाध भाजै अनंतं ॥ ३८३ ॥
मच्छादी पुरुषं मच्छीमा मुरारी । नवं क्वॉन तो सौं निपातिक परारी ॥
गिरा गौरि अर्धंग कैलास वस्ते । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥
छं० ॥ ३८४ ॥ रु० ॥ १८५ ॥
साधेंति । ज्यंनी । यंध्रधं । जखं । अच्छदी । दिखं । सनकादिकं । सपत रिषी । सप्त रिषी । प्रथो-
वायुगेनाय तेजं । भांन । मिटैं । नांम । ती । महा आदि । पुरिषं । पुरुषं । तवों । कोन । तौ ।
नपातिग । अरधंग । कयल्लास ॥
हमारे जो पाठक ऐसे हैं कि जिन को न तो कभी यह शंका हुई न अब है और न आगे
होगी कि हिन्दी भाषा का यह अति प्राचीन महाकाव्य आदि से अंत पर्यंत जाली बना है उन
को उचित है कि यूरोप देश निवासी मिस्टर यौज़, डाक्टर हार्नली, मिस्टर बीम्स और भरतखंड
निवासी डाकुर राजेन्द्रलालजी मित्र जैसे महाशयों को अनेक धन्यवाद दें कि उन के शोध और
अनेक लेखों के कारण से यह महाकाव्य सर्वसाधारण लोगों के जानने में आय गया नहीं तो कुछ
समय और व्यतीत होने पर कोई मनुष्य जैसी कि तर्क वितर्कों से अब दोष देते हैं वैसे ही इस
रूपक में “नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते” का पाठ देख करके कदाचित यह अनुमान करलेते कि
इस को स्वामी श्रीदयानन्द सरस्वतीजी के सिद्धान्तानुयायी किसी कवि ने झूठा बना दिया है
क्योंकि नमस्ते शब्द का प्रचार या तो वैदिक समय में था अथवा इन दिनों में आर्य समाजस्यों
में है और आदि के चार रूपकों से चंद के धर्म संबन्धी विचार वैदिक समय के से होना प्रतीत होते
हैं । यद्यपि आज यह महाकाव्य इतना प्रसिद्ध हो गया है परंतु भावी दोष देनेवाले के लिये वह
कुछ बाधक नहीं हो सक्ता क्योंकि जो कुछ प्रमाण इस समय की प्रसिद्धि के उस को उस समय में
मिलेंगे उन सब को वह निःशंक होकर वर्तमान समय के दोष देनेवालों की भांति जाली कह सक्ता
है जैसे कि इस समय में सब राजपूताने के राज्यों के प्राचीन संवत इस रासे के ९१ वर्ष के अंतर के संवत
के अनुसार मिलते हैं और उन सब को इसी रासें ने अशुद्ध कर दिये कहा जाता है । इसी तरह वह
भी कह सक्ता है कि इस समय में जाल ही जाल फैल गया था क्योंकि जैसे आज चंद स्वयम् साक्षी
नहीं दे सक्ता वैसे हम लोग भी उस समय में न होंगे । सारांश यह है कि एक नवा सौ दुःख हरता
है और थोथी हठ के आगे किसी की कुछ नहीं बनती ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७६
॥ बीसलदेवजी से गोकर्णेश्वर के सिद्ध का उन का नाम
ग्रामादि पूछना ॥
दूहा ॥ इति अस्तुति राजन मुषच । पढि पुज्जिव पग वंदि ॥
देषि सिद्ध चकित भयौ । भाजन बुद्धि नरिंदि ॥
छं० ॥ ३८५ ॥ रु० ॥ १८६ ॥*
कहत सिद्ध किच्छि पुरहुं तैं । कौंन गोत किच्छि नाम ॥
इहि तीरथ आये हुते । कै आगैं कोइ काम ॥
छं० ॥ ३८६ ॥ रु० ॥ १८७ ॥
बीसलदेवजी का अपना नाम गाम आदि बताना ॥
दूहा ॥ पुर अजमेर सु वास हम । गोत ग्याति चहुआन ॥
बीसल दे मो नाम सिध । आयौ करन सनान ॥
छं० ॥ ३८७ ॥ रु० ॥ १८८ ॥
॥ सिद्ध का गोकर्णेश्वर के तीर्थ की महिमा वर्णन करना ॥
अरिल्ल ॥ सिद्ध कहत सुन राजन वत्तिय । जो तू तजि आयौ निज घत्तिय ॥
इह गोपेसुर थान अपूरब । नित प्रति निसा उतरै सौ रंभ ॥
छं० ॥ ३८८ ॥ रु० ॥ १८८ ॥
इन थानक चारन वर पाए । तिनके नाम कहि रु समझाए ॥
भसमाकर रावन मधु कीटक । तिन उपास निराचर षट टक ॥
छं० ॥ ३८९ ॥ रु० ॥ १८० ॥
इहै तिथ की महिमा गाए । धेनु दुग्धतैं आनि हवाए ॥
जैसैं ध्याए तैसैं पाए । इतनी कहि सिध उठि सिधाए ॥
छं० ॥ ४०० ॥ रु० ॥ १८१ ॥
१८६ पाठान्तर :-भयौ ॥
*यह रूपक सं० १६४७ और १७७० की लिखी पुस्तकों में नहीं है जो इन से भी पुरानी
पुस्तकों में यह न मिले तो इस को क्षेपक मानना चाहिये । किन्तु अभी तो हम इस को क्षेपक
संज्ञा प्रदान नहीं कर सक्ते ॥
१८७ पाठान्तर :-परहुं । तैं । क्यौंन । नांम । आगैं । कांम ॥
१८८ पाठान्तर :-नांम । सनांन ॥ बीसल दे शब्द में जो दे है वह देव शब्द का संक्षिप्त
रूप है इसी तरह समरसी में सी सिंघ वा सिंह का संक्षिप्त है ॥
१८८ से १८१ पाठान्तर :-वत्तीय । इह । घरत्तीय । इहां । गामेसद्र । थांन । प्रतै । यांनक ।
च्यारंन वर । च्यार नर । नांम । उपवास । टंक ॥ ए हैं । धैनु । तैं । आंनि । जैसैं । तैसैं ॥

२. दिल्ली गद्दी प्राप्ति एवं अनंगपाल प्रसंग

८० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ बीसलदेवजी का तीन दिन निराहार उपवास कर गोदानादि
करना और महादेव का अपछरा को उन्हें उठाने भेजना ॥
दूहा ॥ राजन मन चक्रित भयौ । सुनि थानेक की विद्धि ॥
जे तो अभि अंतर * वसत । कहि ने तैर सिध सिद्धि ॥
छं० ॥ ४०१ ॥ रू० ॥ १८२ ॥
अरिच्छा ॥ सहसं गौ मंगाइ सवच्छिय । देइ द्रव्य नै अच्छी अच्छिय ॥
सहस घट सिव ऊपर कीनौ । तीन उपास नेम तब लीनौ ॥
छं० ॥ ४०२ ॥ रू० ॥ १८३ ॥
तीन दिवस रहै राव निराहर । जल फल तज्यौ पवन कौ आहर ॥
एक निसा इक अपछर आई । सब अपछरा नृत्ति करि गाई ॥
छं० ॥ ४०३ ॥ रू० ॥ १८४ ॥
बहुत बेर पीछै बोल्यौ हर । अपछर जाइ उठेउ वह नर ॥
सो अपछर नर देषन आई । देषति नृपति बसि नींदा माछी ॥
छं० ॥ ४०४ ॥ रू० ॥ १८५ ॥
॥ अपछरा का बीसलदेवजी को महादेव के प्रसन्न होने और
मन की कामना पूरण होने का कहना ॥
दूहा ॥ तुम कौं सिव सु प्रसन्न भय । कह्यौ सोछनि वर सोचि ॥
जाहु थान धरि थान तजि । तूठे संभर तोचि ॥
छं० ॥ ४०५ ॥ रू० ॥ १८६ ॥
तेरे मन की कामना । ऊपर शिव कौ पाइ ॥
इतनी कहि करि सोछिनी । दियौ सु नृपति उठाइ ॥
छं० ॥ ४०६ ॥ रू० १८७ ॥

  • चंद की भाषा का व्याकरण तो हम कुछ समय में बनाकर प्रकाश करेंगे परंतु एक सूत्र
    उस का यह स्मरण में रखना चाहिये कि उस में षट-भाषा-वत् संधि विकल्प करके होती है ।
    होने के उदाहरण बहुत आवेंगे परंतु न होने के उदाहरण यह अभि + अंतर और पंचा + अमृत हैं ॥
    १८२ पाठान्तर :- विधि । जि । तौक । ते । सिद्धु । सिध ॥
    १८३ से १८५ पाठान्तर :- सहसं । गज । मंगाय । सर्वछिय । देय । ते । अक्षीय । अक्षीय ।
    घट । शिव । तिन । द्यौस । रहै । निशा । एक । आईय । अपछर । नृतत । गाईय । पीछे । बोले ।
    उठाउ । वहे । आइय । देखि नृपति वसि नीद समाइय ॥
    १८६-८७ पाठान्तर :- कों । सौं । शिव । हुव । यांन । संभू ॥ को । पांय । दीयौ । नृपति ।
    उठाय ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ८१
॥ बीसलदेवजी को अपने को पूर्ण पुरुषत्व प्राप्त होना देखकर
वहां बीसलपुर बसाय महादेव का देवल बनने का हुकम देना ॥
कवित्त ॥ पहुर रात पछिली । राज आए डेरा मधि ॥
वढिय काम कामना । भई पुरिसातन की सिधि ॥
प्रातकाल करि न्हान । धेन विप्रन कौं दीनी ॥
पंचा अमृत धूप । दीप सिव सेवा कीनी ॥
तिहि बार हुकम * देवल करन । पुर † बसाइ बीसल † धरूच ॥

  • यह हिन्दी शब्द हुकॅम अथवा हुक्कम संस्कृत शब्द सूक्तम् से बना है ॥
    † चाहुवान वंश की ख्यातिओं में बीसलदेवजी का उपनाम पुष्पक होना लिखा
    है और जो आज कल गुजरात में विशन नगर अथवा विसन नगर करके प्रख्यात है वही यह बीसल-
    पुर बीसलदेवजी का बसाया हुआ है और उसी दिन से बडनगरे नागरों में के कुछ नागरों की
    विसननगरा नामक संज्ञा पड़ी है । हमारे इस अनुमान की कविराज श्रीदलपतरामजी सी० आई०
    ई० अपने ज्ञातिनिबन्ध नामक ग्रंथ में नीचे लिखे प्रमाण पुष्टि करते हैं :-
    जे रीते औदिच्यप्रकाश तथा श्रीमाली महात्म्य स्कंध पुराण मां छे, तेमज नागर ब्राह्मणोंनी
    उत्पत्ति नो ग्रंथ "नगरखंड" नामे घणो मोटो छे, ते पण स्कन्ध पुराण मां छे । ते नागरी नी उत्पत्ति
    गुजरात मां बडनगर गाम मां थई । पण ते क्यारे थई, तेनो संवत कांई ओ पुस्तक मां लख्यो नथी
    तेनुं कारण ओज जाणवुं के सवत लखवा थी तथा बनावनार नुं नाम लखवा थी ग्रंथ जूनो केहेवाय
    नही । पण नागर ब्राह्मणो नो प्रवराध्याय नामे ग्रंथ में जोयो छे तेमां लखे छे के,
    श्लोक ॥ श्रीमदानंदपुर महास्थानीय पंचदशशतगोत्राणां ।
    संवत् २८३ पूर्वतिष्ठमान गोत्राणां समानप्रवरस्य निबंधः ॥
    अर्थ ॥ शोभायमान ओवा आनंदपुर, मोटास्थानवाला पंदरसें गोत्रोमांथी संवत् २८३ थी
    पहेलां रहेलां गोत्रोना ओकज सरखा नामोवानो निबंध लखूं हूं ॥
    ओ ऊपर थी आशरे मालम पड़े छे के ओ बखत मां नांगरो नी नात बंधाई छे । अने त्यार
    पछी तेमां थी विसलनगरा नी नात जुदी पड़ी तेनुं कारण केहे छे के विसलदेव राजाओ विसल
    नगर बसावीने त्यां जगन कीधो हतो । त्यारे बडनगर थी केटलाओक नागरी त्यां जोवा गया
    हता । त्यारे राजाओ तेओ ने दक्षणा आपवा मांडी । त्यारे ओ नागर ब्राह्मणो ओ कह्यं के अमे कोई
    नी दक्षणा लेता नथी । त्यारे राजाओ कह्यूं के तमने पाननां बीडा आपी यूं । ओम कहीने पानना
    बीडा मां गाम नां नाम लखी नें ओ नागर ब्राह्मणों ने आप्यां । त्यारे ते ब्राह्मणो ओ पानना बीडां
    लीधां । तेमां जोयुं त्यारे गामनां नाम लख्या हतां । तेथी पछी तो ओ गाम लेवां कबूल कीधां ।
    ओ बात बडनगरना नागरीओ जाणी त्यारे तेओ ओ कह्यूं के ओणे राजा नुं दान लीधूं वास्ते ओओ
    ६

८२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
संगाहू हस्त असवार * हुइ। फिरयौ राज घर आतुरह ॥
कं० ॥ ४०७ ॥ रू० ॥ १८८ ॥
आपणी नातथी बाहर छे । ते दिवस 'थी विसननगरानी नात जुदी थई । कोई कहे छे के तेज
राजाओ तेज बखतमां साठोद गाम नूं नाम पान मां लखी ने जेने आप्यूं हतं ने साठोदरा नागर
थया । चित्रोड़ लखी ने जेने आप्यूं ते चित्रोड़ा नागर थया । तेमज प्रश्नोरा तथा कृष्णोरा पण
थया । ६ प्रकार ना नागरी नां नाम । बडनगरा नागर १ विसल नगरा नागर २ साठोदरा नागर ३
चित्रोडा नागर ४ प्रश्नोरा नागर ५ कृष्णोरा नागर ६ ॥ हवे विचार करो के विसलदेवे विसल नगर
सं० ९३६ वीं साल मां वसाव्यूं ए प्रथिराजरासा मां चंद कविये लखेलूं छे ॥ दोहा ॥ सो संवत
नव शत अधिक । वर्ष तीस छह अग ॥ पुर प्रतिष्ट वीसल नृपति । राजत सकले जग ॥ १ ॥
त्यार पछी विसननगरानी नात बंधाई छे । तेथी साफ जणाय छे के परमेश्वरे कांई नातो बांधी
नथी । फक्त माणसोए जुदा जुदा बाडा बांध्या छे । त्यारे ते बंधाया थी हालमां जे हरकतो
थती होय ते बंध करवा चहाय तो करी शके खरा । विसल नगराओ राजानूं दान लेवा थी जो
बदलया होय तो हाल मां बड नगराओ मुसलमाननी सेवा करे छे तेओ एनाथी पण वटल्या
कहेवाय । वास्ते एवो जूठो वेहेम छोड़ी देवो जोइये । अने जरूर समझवूं के तेओ एक बीजा थी
कांई वटलाशे नही । इत्यादि ॥ ज्ञाति निबन्ध पृष्ठ ४३ से ४५ तक ॥
नागरखंडना अध्याय २३ पछी तेमां १०८ मा अध्याय थी ४ था अध्याय मां लखे छे के आनर्त्त
देशना राजाए चमत्कारनामे शेहेर वसावी ते ७२ गोत्र ना ब्राह्मणों ने आपवा मांड्यां, तेमा ८ गोत्र
नाए लीधां नही ने ६४ गोत्रनाए लीधां । पछी त्यां कांई कारण थी नागनी उत्पत्ति घणी थई
तेओए घणां माणसोने करडी खाधां तेथी केटला ब्राह्मणो नाशी छुट्या । पछी एक अपमान
करेले ब्राह्मणे (त्रिजटाकें) मन्त्र नो उपाय कस्यो तथा ए सउ ब्राह्मणो ए मलीने लाकड़ी
पथरा वगेरे थी हजारो नागने मारी नांख्या त्यारे ए शेहेरनूं नाम नगर (भेर विनांनुं) ठन्यूं ने ते
ब्राह्मणो नागर कहेवाया । पछी १५८ मां अध्याय मां लखे छेके एक पुष्पक नामने पुरुषे पर स्त्रीनो
संग घणां वर्ष कस्यो, ते पछी पस्तावो करीने तेनूं प्रायश्चित करवा बडनगर मां आव्यो त्यारे
सउ नागरी ए कह्यूं के ए पाप मटवानो उपाय नथी । त्यारे एकं चंडशर्मा नामने नागरे कांई
प्रायश्चित करायूं, तेथी नागरीए चंडशर्माने नात बाहर मुक्यो तेथी बाह्य नगरानी वात जुदी
बन्‍याई ॥
पृथ्वीराजरासा मां लख्यूं छेके बीसलनगर बसावनार बीसलदेव राजा पुष्कर क्षेत्रमां
परस्त्रीनो सङ्ग कर्यो हतो, तेथी ते स्त्रीए श्राप दीधो हतो ने तूं असुर थईश । पछी ए पाप
मटवानो उपाय बीसलदेव शोधतो हतो । वास्ते पुष्पक नामनो पुरुष नगर खण्ड मां लख्यो छे ते
बीसलदेव सम्भवे छे । ने बाह्य नगरा जेोध्या छे. ते बीसलनगरा, साठोदरां वगेरे सम्भवे छे ।
इत्यादि० ज्ञात निबंध पृष्ठ ७५-७६ ॥

  • यह हिन्दी शब्द संस्कृत अश्ववार अथवा, अश्व + आर अथवा अश्व + आर से बना है
    अरबी अथवा फारसी से अनुमान करना व्यर्थ है ॥
    १८८ पाठान्तर :-पडुर । काकन । हुई । न्हांत । विप्र । को । वसाय । वीसल पुरह ।
    मंगाय । छोड़ ॥