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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 470 में से

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पृष्ठ 77

६४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ अन्य उपलक्ष्यों के द्वारा आना का संभारि की पूर्व कथा संभारना ॥
कवित्त ॥ घर मुक्किय वलि राय । सात खम्यौ न कित्ति रस ॥
घर मुक्किय सुअ पंड । सुष्प मुक्यौ सु दुष्प वसि ॥
घर मुक्किय श्रीराम । सिया छोड़य बल गोइय ॥
घर मुक्की नल राय ॥ सिरचि कलंकित जोइय ॥
घर मुक्कि वीर हर चंद नृप । नीच घरह घट जऊ भयौ ॥
ढंकन सु इला नृप जानियै । नृप ढंकन इलचर कयौ ॥
॥ छं० ॥ ३२७ ॥ रु० ॥ १५६ ॥
नृप ढंकन इल होइ । इलह्र ढंकन सु राज भर ॥
एह्र ढंकन वर देव । देव ढंकन वर अंवर ॥
अपजस ढंकन कित्ति । कित्ति ढंकन जस धारिय ॥
औगुन ढंकन विद्य । सुगुन विद्या उच्चारिय ॥
ढंकनह्र काल वर भ्रंमको । भ्रंम कांह्र ढंकन करिय ॥
सावित्त गुरु ढंकै जु सिसु । सिसु ढंकन पित उच्चरिय ॥
॥ छं० ॥ ३२८ ॥ रु० ॥ १५७ ॥
अरिल्ल ॥ इच्चि विधि आनल्ल बत्त उच्चारिय । पुहु कथा संभरि संभारिय ॥
किच्चि विधि राषस ढुंढ उपन्ना । सारंगदे कैसे जुद्ध किन्ना ॥
छं० ॥ ३२९. ॥ रु० ॥ १५८ ॥
॥ आना का माता से पूछना कि नर अर्थात् वीसलदेव
दानव कैसे हुआ ॥
दूहा ॥ एक बत्त तुम सम कहौं । मात कथा समझाइ ॥
नर किच्चि विधि दानव भयौ । इह अचरज मो आइ ॥
छं० ॥ ३३० ॥ रु० ॥ १५९ ॥
१५६-१५७ पाठान्तरः-वल । राइ । लिन्यौ । रिस । मुकीय । श्री । सुष । दुष । मुकीय ।
सीया । षोईय । गोईय । मुक्किय । सिरां । सिरह । कलंक । तज्यौ । जोइय । मुंकि । घरहिं ।
भयौ । इल । भूमि । इल वर । कयै । अप । जस । किर्ति । किर्ति । धारीय । औगन । सगुन ।
उच्चारीय । को । मा । वित्त ॥ १५७ ॥ बत । उच्चारीय । किहिं । अपंन्नौ । कींनौ ॥
१५८-१५९ पाठान्तरः-वत । सो । समझाय । अचरिज ॥ १५६ ॥ नौ । सो । हूं । जानियौ ।
नव निहचे नि संदेह ॥