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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७६
॥ बीसलदेवजी से गोकर्णेश्वर के सिद्ध का उन का नाम
ग्रामादि पूछना ॥
दूहा ॥ इति अस्तुति राजन मुषच । पढि पुज्जिव पग वंदि ॥
देषि सिद्ध चकित भयौ । भाजन बुद्धि नरिंदि ॥
छं० ॥ ३८५ ॥ रु० ॥ १८६ ॥*
कहत सिद्ध किच्छि पुरहुं तैं । कौंन गोत किच्छि नाम ॥
इहि तीरथ आये हुते । कै आगैं कोइ काम ॥
छं० ॥ ३८६ ॥ रु० ॥ १८७ ॥
बीसलदेवजी का अपना नाम गाम आदि बताना ॥
दूहा ॥ पुर अजमेर सु वास हम । गोत ग्याति चहुआन ॥
बीसल दे मो नाम सिध । आयौ करन सनान ॥
छं० ॥ ३८७ ॥ रु० ॥ १८८ ॥
॥ सिद्ध का गोकर्णेश्वर के तीर्थ की महिमा वर्णन करना ॥
अरिल्ल ॥ सिद्ध कहत सुन राजन वत्तिय । जो तू तजि आयौ निज घत्तिय ॥
इह गोपेसुर थान अपूरब । नित प्रति निसा उतरै सौ रंभ ॥
छं० ॥ ३८८ ॥ रु० ॥ १८८ ॥
इन थानक चारन वर पाए । तिनके नाम कहि रु समझाए ॥
भसमाकर रावन मधु कीटक । तिन उपास निराचर षट टक ॥
छं० ॥ ३८९ ॥ रु० ॥ १८० ॥
इहै तिथ की महिमा गाए । धेनु दुग्धतैं आनि हवाए ॥
जैसैं ध्याए तैसैं पाए । इतनी कहि सिध उठि सिधाए ॥
छं० ॥ ४०० ॥ रु० ॥ १८१ ॥
१८६ पाठान्तर :-भयौ ॥
*यह रूपक सं० १६४७ और १७७० की लिखी पुस्तकों में नहीं है जो इन से भी पुरानी
पुस्तकों में यह न मिले तो इस को क्षेपक मानना चाहिये । किन्तु अभी तो हम इस को क्षेपक
संज्ञा प्रदान नहीं कर सक्ते ॥
१८७ पाठान्तर :-परहुं । तैं । क्यौंन । नांम । आगैं । कांम ॥
१८८ पाठान्तर :-नांम । सनांन ॥ बीसल दे शब्द में जो दे है वह देव शब्द का संक्षिप्त
रूप है इसी तरह समरसी में सी सिंघ वा सिंह का संक्षिप्त है ॥
१८८ से १८१ पाठान्तर :-वत्तीय । इह । घरत्तीय । इहां । गामेसद्र । थांन । प्रतै । यांनक ।
च्यारंन वर । च्यार नर । नांम । उपवास । टंक ॥ ए हैं । धैनु । तैं । आंनि । जैसैं । तैसैं ॥