पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ बीसलदेवजी का रणावास में पधारकर विश्राम करना और उन की एक अप्रिय रानी का उन को नपुंसक कराना ॥
कवित्त ॥ सुरँग धाम अभिराम । तहां विश्राम राज किय ॥
राग रंग नाटक । विनोद सुष महल बोल लिय ॥
पट रागिनि पांवार । रूप रंभा गुन जुब्बन ॥
प्रमुदा प्रान समान । नहीं विसरत्त इक्क छिन ॥
रति भोग सुरति तिन सैं सदा । कबहु आन न दिच्छ चिय ॥
षिन्नि सौंति सकल एकच भय । पुरुषातन तिन बंध किय ॥
कूं० ॥ ३७० ॥ रू० ॥ १८० ॥
पद्धरी ॥ तब सकल भय एकच नारि । पुरुषातन तिन बंध्यौ विचार ॥
प्रचार सचर दूतिका च्यार । लै षवरि सचर पहुची मझार ॥ ३७१ ॥
प्रसताव भाव तिन कहि उच्चार । जोगिनिय बोल आदीतवार ॥
पचराइ वेस बदलाय भेस । इम कियो राजदारच प्रवेस ॥ ३७२ ॥
लै अत्थ दई दरवान हथ्थ । इम किय प्रवेस सच्चरिय सध्य ॥
जोगिनिय गई रागिनी मद्धि । सब बोलि कह्यौ है सिद्ध सिद्ध ॥ ३७३ ॥
आदेस कियौ सब पाडू लग्गि । आसन जोरि कर उभ्भ अग्ग ॥
किंचि काज आज हूं बोलि लीन । किंचि नारि तुमचि इच्छ सीष दीन ॥ ३७४ ॥
सब सौति कह्यौ दुष सुनहु तुम्म । राजन तनय हम सौं न क्रम्म ॥
को जानि मात बिंझनी पीर । सौति कौसाल सांझै सरीर ॥ ३७५ ॥
तुम कहौ करूं जीव तैं बद्ध । तुम कहौ करौं नारी विरुद्ध ॥
तुम कहौ करौं काम तैं भंग । ज्यौं नारि च्रंग त्यौं पुरुष अंग ॥ ३७६ ॥
सब चित्त बसी इच्छ सौति बात । अब ची इच्छ कारज करो मात ॥
मंगाय अगिनि तब कियौ होम । षर स्वान मांस प्रति वास घोम ॥ ३७७ ॥
उच्चरौ मंच आराधि इष्ट । तत काल भयौ काम तैं नष्ट ॥
दस दिसा लग्गि इच्छ करी विद्धि । गत भौ पुरुषातन रचि न सिद्धि ॥ ३७८ ॥
दै द्रव्य कह्यौ माता सिधाव । इच्छ सचर कुंडि अनि सचर जांव ॥
१८० पाठान्तर :- सुरँग । मुष ताम । विश्रामं । मुष । पंवार । जुवन । प्रांन । समांन । इक्क । स्यैं । नि । दरस । सौर्कि । भई ॥