पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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॥ आना का माता से अपने बंश की कथा हठ करके पूछना ॥
पद्धरी ॥ उच्चर्यौ मात सो पुत्त सचि । जानों न वंस औ पिता बचि ॥
मैं तात नाम बंदी न लेचि । नन करों श्राद्ध कबहू न गेह ॥ कुं० ॥ ३२१ ॥
अप्यौ न चंव अंजुलिय तात । उप्यौ वेद हूं किण सु गान ॥
के नाम लेय मातुलह वंस । पित बैर लेउं बर बीर हंस ॥ कुं० ॥ ३२२ ॥
छंडौं कि प्रान मुक्कूं व देह । संसार भार अप्यौं कि छह ॥
आना नरिंद यह कहिय बात । सुनि श्रवण अप्प धर परिय मात ॥
' कुं० ॥ ३२३ ॥ रु० ॥ १५२ ॥
॥ आना की माता का उसे कथा प्रगट न करने को
कहना और ढंक करके संक्षेप में कहना ॥
दूहा ॥ पुत्र प्रगह न कीजिये । मो तिय इय अंदेह ॥
आदि हुते दानव प्रबल । घर घुंमी असुरेह ॥
कुं० ॥ ३२४ ॥ रु० ॥ १५३ ॥
भिरन कहत दानव सरिस । मानव मनुषी देह ॥
मो गंधारि निच्चारि मुझ । पुत्त विलासनि गेह ॥
कुं० ॥ ३२५ ॥ रु० ॥ १५४ ॥
अरिल्ल ॥ इह मातुल बंस प्रधानह मान । भये दस पुत्त सु मानिक थान ॥
विचारि कयौ तहां संभरि गाम । बस्यौ अजमेर सुमंत विश्राम ॥
कुं० ॥ ३२६ ॥ रू० ॥ १५५ ॥
१५२ पाठान्तर :- उच्चयै । उच्चस्यौ । रूच्च । जानौ । मुझ । बच्छ । लैहि । कस्यौ । सु ।
वेदहु । किंनसु । कै । लेइ । लैऊं । लेऊ । छंडों । कै प्रांनं । मुक्कौं । ब । अकेलेह । आनां । इह ।
इम । कहीय । अप । वरिय ॥
१५३-५५ पाठान्तर :- पुत्र । पुत्त । प्रगट । कीजोइ । जिय । अंदेस । हुंते । असुरेस ॥ १५३ ॥
विलासन । विलास । न ॥ १५४ ॥ प्रधानह । मांन । मांनिक । थांन । गाम । सुमंत्र । विश्रांम ॥-१५५ ॥