पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ · पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ आना का बालपन व्यतीत होना और वीरत्व को प्राप्त हो
माता से पूछना ॥
दूहा ॥ तन मंडी मचि अप्पनी । छंडी बालक बुद्धि ॥
रोस रम्यौ अरि अंग में । तब पुच्छि मातच सुद्धि ॥
कूं०॥ ३१६ ॥ रू० ॥ १४७ ॥
॥ आना की माता का उसको सर तर और अब्बर
विद्या का उपदेश करना ॥
गाथा ॥ सर तर अब्बर विद्या । सा विद्या अन्य सारसी नथ्थी ॥
सो आना अन भंगं । संचनं प्रिय यो सष्षि ॥
कूं० ॥ ३१७ ॥ रू० ॥ १४८ ॥
जा सिसु वीरं पतनी । बीरं होइ बीर भज्जार्यं ॥
नवं तीन बत्त तरंगं । सा माग्गं वीरया पुत्तं ॥
कूं० ॥ ३१८ ॥ रू० ॥ १४६ ॥
॥ आना का माता से पूछना कि मैं किस वंश में उत्पन्न हुआ हूं ॥
दूहा ॥ बीर पुत्त मातुल सुमति । गर्वार सपनो जाइ ॥
को किच्छि बंसहि उपज्यौ । तूं मुझ जंपहि माइ ॥
कूं० ॥ ३१६ ॥ रू० ॥ १५० ॥
॥ गौरी माता का कहना कि यह बात न पूछो उसके
कहते मुझे भय और करुणा होती है ॥
दूहा ॥ गौरि मात कहै पुत्त सौं । पुत्त न पुच्छहु बत्त ॥
जिच्छि भय जल लोचन भरहि । बर पूछन पर तत्त ॥
कूं० ॥ ३२० ॥ रू० ॥ १५१ ॥
१४७ पाठान्तर :-मत । मही । बुद्धि । पुकिय ॥
१४८-१४६ पाठान्तर :-अरकर । मंत्रनं । अनभंग । साखि ॥ १४६ ॥ धीर । भजाइं ॥ नवती
नवल तरंगं । नव तीन बत्त तरंगं । नवती नव सत रंगं ॥ यह तीन प्रकार के पदच्छेद कोई २
कवि करते हैं ॥
१५० पाठान्तर :-पुत्ति । संपत्रौ । जाई । जाइं । किहिं । ऊपनौ । मांइ । भाइ ॥
१५१ पाठान्तर :-गौरी । सौ । पुत । पुछहु । जिन । भरहिं । पूछत । परतत ॥