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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

छठां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो ३२५
सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों
का वश में न आना ॥
दूहा ॥ दौरि सकल सामन्त मिलि, करे अनन्त उपाहू ॥
रोस लगे छुटै नहीं, भई सुहायो चाहू ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७५ ॥
चिहूं ओर हरषी छुटै, परै अगड सुमार ॥
गोना लगे गिलोल्ल गुरु, छुटै न तो इसरार ॥
छं० ॥ १६० ॥ रु० ॥ ७६ ॥
गाथा ॥ वर वावंन सु वीरं । कौतिग लषन्त सूर सामन्तं ॥
करे अनन्त कळापं । नह छुटन्त गज गरुं च्यारू ॥
छं० ॥ १६१ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
चन्द का बावन बीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन
हाथियों को छुड़ाकर बाँध दीजिए ॥
दूहा ॥ तब कर जोरिय चन्द कवि, अग्गे वांवन वीर ॥
तुम सु छुडावहु मन्त कछु, बहुरि जरहु जञ्जीर ॥
छं० ॥ १६२ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
भैरव की आज्ञा से बीरों का हाथियों को ज़ंजीर से बाँध देना ॥
अरिल्ल ॥ तब भैरव भूवाल वीर वर । कीन हुकम कालीय ऊंच कर ॥
छोरावहु गजराज पांनि गछि । बहुरि जरौ जञ्जोर थान कहि ॥
छं० ॥ १६३ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
दूहा ॥ तब काली दोखौ तलपि । गज्ज कुराइ समत्थ ॥
उभै पांनि सौं रद उभै । गहै उभै वरहत्थ ॥
छं० ॥ १६४ ॥ रु० ॥ ८० ॥
७५ पाठान्तर-दोरि । सामंत । करै । उपाय । लगैं । छुटै । नही । स ॥
७६ पाठान्तर-चिहुं । उर । परे सुगड पर मार । लगें । गुरु । छुटै । तो । अस ॥
७७ पाठान्तर-बांधन । । सामंतं । करै । गुरुयादं । गरुआई ॥
७८ पाठान्तर-बावन । बांबंन । स ॥
७९ पाठान्तर-भुवाल । किंन । उंच । छोरावौ । पांनि । जरौ । यांनि । कहिं ।
८० पाठान्तर-गज । छोराय । समय । पांनि । सो । सं । हथ ॥

३२६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २८
यह कौतुक देखकर सरदारों का आश्चर्य में होना और
सब का दर्बार में आकर बैठना ॥
गाथा ॥. बंधन दीन सु पाइं । कौतिगं दिष्ययं सब्ब सूरं ॥
मंनिय मन आचिज्जं । बैठे फेरि आइ दिवानं ॥
छं० ॥ १६५ ॥ रु० ॥ ८१ ॥
पृथ्वीराज का सब बीरों को प्रणाम करना, चन्द का नाम
लेकर सब बीरों को पहिचनवाना ॥
परसे बीर सु सब्बं । करी प्रथिराज पांइं परिनामं ॥
प्रथक चन्द कथि नामं । पच्चिचांने बीर बीरायं ॥
छं० ॥ १६६ ॥ रु० ॥ ८२ ॥
चन्द का पृथ्वीराज से कहना कि बिना कारण इन को
बुलाया है इस से इन की बलि दो पृथ्वीराज का
बावन घड़ा मदिरा बावन बकरे मँगाकर बलि
देना और भैरव आदि की पूजा करना ।
छंद पद्धरी ॥ पहिचांनि राज प्रथिराज बीर । भयौ उदित मन आनंद धीर ॥
कविचंद कथिय प्रथिराज राज । इन देहु सुबल व्याकुल समाज ॥ १६७ ॥
विन कज्ज अप्प आराध कीन । नवि विछत कुसज्ज खब्भो सुईन ॥
बावन घट वारुनि मँगाइ । बावन बीर प्रति घट पाइ ॥ १६८ ॥
बावन अजासुत भष आंनि । दीने सु आदि भैरव निदांन ॥
सिंदूर तेल पुहपनि अरचि । सन्तोष पोषि सब तन चरचि ॥
छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ ८३ ॥
८१ पाठान्तर-दीय । सु पायं । पाई । सब्ब देषीयं । दिषय सब । मनियं । आचिजं ।
फिरि । आय । दीवांनं ४
८२ पाठान्तर-कर । करि । पाय । पृथुक । करि ॥ -
८३ पाठान्तर-पहिचानि । प्रथीराज । भयो । श्रीर । कहीय । प्रथीराज । स । बाकुल ॥
१६७ ॥, कज । कुशल । लभौं । बावन । घट । मंगाई । घट । पान ॥ १६८ ॥ भष । आंनि ।
निदान । ओरचि । चरचि ॥ १६९ ॥

छठां समय = ६] पृथ्‍वीराजरासौ । ३२७
वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर माँगों सो
हम दें और अब हमको विदा करो ॥
दूहा ॥ भये त्रिपत वीराधिवर, पूरन डक्क डकार ॥
अनि आनन्दत उल्हसंत, बोले वयन वकार ॥
छं० ॥ १७० ॥ रु० ॥ ८४ ॥
मङ्गि मङ्गि महिपत्ति तुअ । सोइ समर्प्पै आज ॥
दै सुविहा न विलम्ब करि । जु बाकु चित्त तुअ काज ॥
छं० ॥ १७१ ॥ रु० ॥ ८५ ॥
पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय
हमारी सहायता कीजिएगा ॥
गाथा ! जंपे वर बरदाई । तुम वरं वीरं देव देवाधिं ॥
औ प्रथिराज सहाई । जुद्धं जय राज जुहाईं ॥
छं० ॥ १७२ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा
समय आवै तब हम को याद करना ॥
गाथा ॥ तब वर भैरव वीरं । उच्चारीगं संसुप्पं चन्दं ॥
जं तुंम वंकट ठारं । तं सँभारं विचित्त अम्हाएं ॥
छं० ॥ १७३ ॥ रु० ॥ ८७ ॥
गाथा ॥ परतिषि अम्ह सुपुह्वं । करयं जुद्धं तव्व साहस्सं ॥
जथ्यं चडिउन चन्दं । तथ्यं करै न हम आगमं ॥
छं० ॥ १७४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥
८४ पाठान्तर-नृपति । डंक । डक । आनन्द तन । बैन ॥
८५ पाठान्तर-महिपति । समर्प्यै । दैह । तूं कछु चिंतत काज ॥
८६ पाठान्तर-जंपै । वर । बीर । देवधि । वीर देवाधि । जुटाई ॥
८७ पाठान्तर-उच्चारिग चंद संमुषं । तुंम । वंकठ । ठौरैं । संभारै । संभारे । विचित्र ।
अम्हाई ॥
८८ पाठान्तर-अंम्ह । जुहु । तब । साहसं । जयं । तथं । हंम्म । आगमं ॥
९०

३२८ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ३०
बचन देकर बीरों का बिदा होना, सरदारों का चन्द की
बात पर प्रतीत करना और पृथ्वीराज का चन्द
पर अधिक प्रेम बढ़ना ॥
दूहा ॥ दइय वाच सब बीर नै, बहुराए कवि चन्द ॥
सब सामंत अनन्द भौ । दरसत नट्ठे दन्द ॥
छं० ॥ १७५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
सत्य करै मान्यौ सकल । हरषित भय प्रथिराज ॥
प्रेम बढ्यौ अति चन्द सौं । साचस रीत समाज ॥
छं० ॥ १७६ ॥ रु० ॥ ६० ॥
पृथ्वीराज का चन्द से कहना कि सब सरदारों को मन्त्र
बतला दो, चन्द का सब को मन्त्र बतलाना ॥
गाथा ॥ तब कूंअर कहि चन्दं । देहुं मन्त्रं सव्वं सामन्तं ॥
तब कहि मन्त्रं चन्दं । कीन अप्प अप्पं सहायं ॥
छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ ६१ ॥*
चन्द को बीस गाँव और एक घोड़ा पृथ्वीराज ने दिया ॥
दूहा ॥ बीस गांव कविचन्द प्रति, करी कुँअर बगसीस ॥
एक बाजि साजति सजहि । दियौ सु सम्भरि ईस ॥
छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ६२ ॥
इति श्रीकविचन्द विरचिते प्रथिराजरासके आखेटक
बीरबरदान वर्णनं नाम षष्ठ प्रस्ताव
सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
८६ पाठान्तर-बीरनैं । सामंत । नठै ॥
६० पाठान्तर-सति । करे । मंन्यौ । हरषत । प्रथौराजं । समाजं ॥
६१ पाठान्तर-देहु । मंत्र । सब । अप्प । अप ॥ * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में
नहीं है ॥
६२ पाठान्तर-गांम । कुअर । कुंअर । सजि । दीयौ ॥

अथ नाहर राय कथा वर्णनं लिख्यते ॥
—❖—
( सातवां समय )
सोमेस्वर देव का शिवरात्रि का व्रत जागरण करके सोने की
तुला दान करना और उसे बांट देना ॥
दूहा ॥ ग्यारह सौ गुन तीस वदि, फागुन चवदसि सोम ॥
सिवरत्ती सोमेस नृप, निसा मण्डि जप होम ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
पञ्च गव्व अस्नान करि, सीस सहस घट मण्डि ॥
दीपदान घृत सहस शिव, कुसुमंजलि सिर व्हंडि ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
शिव उपास सोमेस वर, पञ्च उपासि सुराज ॥
सदा मोह भक्ती सुगुर, करिय कित्ति कविराज् ॥
छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
श्लोक ॥ शिवशिवा उपास्य राजन्, वीर्य देवन कामयम् ॥
कविचन्द महावाणी, प्रगट रूपेण विस्मितम् ॥
छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥
दूहा ॥ चतुर जाम जग्गिय नृपति, कनक तुला तहँ कीन ॥
प्रात समै वर दुजन कहुँ, बंटि अप्प कर दीन ॥
छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥
१ पाठान्तर—दोहा । सैं । सैं । सुनि । चवदिसि । सिवरती । नृप ॥ इस रूपक में
संवत् ११२६ अनन्द साक वा पृथ्वीराज का तृतीय साक है । इस का वर्णन कवि ने आदि पर्व्व के
रूपक ३५५ । ३५६, पृष्ठ १३८ में किया है । तदनुसार इसमें अन्तर के ९० । ९१ वर्ष जोड़ने से
११२६ + ६० । ९१=१२१६ । १२२० वर्त्तमान विक्रमी होगा ॥
२ पाठान्तर—पचगव्य । अस्नानं । सहस्र । दान । सहस्र । कुसुमांजलि । शिर ॥
३ पाठान्तर—शिव । स राज । स गुर ॥
४ पाठान्तर—शिवसिवा । राजं । राज्यं । धीर्यं । कामयं । वांनी । रूपेन । विस्मितं. ॥
५ पाठान्तर—जाम । तहां । समे । कहौं ॥

३३० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २
अन्न अमार अपार उठि, जिन्हि लीनौ दिय ताहि ॥
करस भोग भोजन भले, रची न मनसा काहि ॥
छं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥
उभय ईस अग सोम पुनि, अस्तुति मंडिड समुष्ष ॥
तब चिनेन तन ताप हर, संचन सेवक सुष्ष ॥
छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥
शिव जी की स्तुति करना ॥
कवित्त ॥ विदित सरन अति चपल । विमल मति कञ्ज निचक्खिनि ॥
गीत राग रस रटित । सती लंपट विस भच्छिन ॥
भुगति दैन जन विभव । भूर भूक्षित तन सोभित ॥
त्रिपुर दहन कविचन्द । केन कारन कृत लोक्कित ॥
श्रीविश्वनाथ संमित गवन । गरल त्रिलोचन रस कुसल ॥
मुष अमल कमल परिमल बहुत । भुगति चारु चर्मेन असन ॥
छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥
छन्द पद्धरी ॥ जत गरल कंठ दीसद्दति वोय । जिम चित प्रगट संसार नीय ॥
सारङ्ग उल्ह तृन पान पानि । दिव तुङ्ग जाल जब जवनि मानि ॥ ९ ॥*
जट मुकुट गंग दीसद्दि उतङ्ग । सोभन्त चन्द लिल्लाट रङ्ग ॥
सारङ्ग सूल सादूल चर्म । सेवक सहाय अघ हरत कर्म ॥ १० ॥
कटि विकट निकट नटवत चिभङ्ग । गनभूत लेय विभूत अङ्ग ॥
बुन्द जा काम जा आप झूल । जैजै सुईस माया अभूल ॥
छं० ॥ ११ ॥ रु० ॥ ९ ॥
साटक ॥ कल्याणी कपञ्चाल बाहु गह्यौ, गिरज्जाइ सारङ्गनौ ॥
बीभच्छौ रस तव्य नित्य रतयौ, मुब्वौ सदा तुङ्गयौ ॥
६ पाठान्तर-अमरअच । उठि । जिहिं । नहीं ॥
७ पाठान्तर-मंडिय मुष । म stir समुष्ष ॥
८ पाठान्तर-विन्नछन । विन्नच्छिनि । वियमक्षिन । विभौ । कृत । गवन । कुषल । चांद । चर्म्मन । भसल ॥
९ पाठान्तर-जुत । दीसहिति । जम । पांनि पांनि । * "दिव तुंग जाल दिव दिव न मांन" संवत १६४७ की पुस्तक में पाठ है ॥ ९ ॥ लिलाट । सादूल । चर्म । कर्म । विभूत । अभूल ॥

सातवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ३३१
रुद्दो रुद्ररि पाय नग्नि उरतो, हास्यं हसं सुक्खरं ॥
जामतं गिरिज्ञानिनं विरचयौ, कर्नोय कालं चयं ॥
छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ १० ॥
साटक ॥ वासं गौरि श्रृंगार हास्य नगनं, कर्नोय कामं चयं ॥
रौद्रं रौद्ररि पाय मार दमनं, वीरं चिनेचं ज्वलं ॥
भै भीतं द्विषि अङ्ग भङ्ग अद्दितं, वीभच्छ नहव्वतं ॥
सान्तं संमित जोग दीन अदभू, नौ रस्त रस्सं शिवं ॥
छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ११ ॥
शिवजी की स्तुति करके सोमेश्वर देव का अपने कुमार
के विवाह के लिये नाहर राय के पास दूत भेजना ॥
दूहा ॥ सा देवह करि अस्तुतो, वर सोमेस कुमार ॥
नाहरराइ नरिंदं कौं, दूत संपते वार ॥
छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १२ ॥
सामदामादि में निपुण दूत का पत्र दरखाना ॥
गाथा ॥ सामं दामं भेवं । वेदं गुनं विग्यं अंगाई ॥
जानं पनं सलीहं । ते पत्तं दूत दरसायं ॥
छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १३ ॥*
कवि का सनीचरी दृष्टि के योग घर से भविष्य में बैर दोष
होने का कथन करना ॥
साटक ॥ दिट्ठी दिष्ट सनीचरो वसथिनो, इंनोपि दुज्जं घरं ।
पावारं परिचार बैर गुरयं, जहोस्र चैक्षानयं ॥
१० पाठान्तर-कप्पाल । यहयो । गिरिजाई । गिरजाई । नो । बीभछो । तप । रतयो ।
मुखीं । तुंगयो । उरयो । गिरिजां । कहनाय । काम ॥
११ पाठान्तर-श्रृंगार । कहनाय । काम । त्रियं । त्रिनेत्र । भय । बीभछ । नटवर्त्तनं ।
नटवत्तनं । अदभूत । अदभुत । नौ रस । नौ रस्स । रसितं ॥
१२ पाठान्तर-अस्तुति । नाहरराय । के । कें । संपत्ते ॥
१३ पाठान्तर-दानय । गुन । विग्य ॥ * यह रूपक सं० १६४७ और १८४८ की लिखी
पुस्तकों में नहीं है ॥

३३२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ४
भोगिनांरि समस्त संजुत कन्ना, भारय्यनो द्रिष्टयं ।
सावाजा बर वैर ग्रेच त्रिगुना, के के नगे राजयं ॥
कं० ॥ १६ ॥ छ० ॥ १४ ॥
कवि का कहना कि स्त्री के कारण से बैर दोष आगे रामादि
बड़े बड़ों को हो चुका है ॥
कवित्त ॥ गयौ चन्द तारिका । पुच लज्जा बिन आन्यौ ॥
घेच वीर्य सम्भवै । वीर्य लब्भवै न पान्यौ ॥
बैर दोष श्रीराम । बैर दोषहू दुर्याधं ॥
बैर दोष नघुराई । बैर दोषह मुचकन्यं ॥
सा बैर दोष पण्डव बलिय । मात बचन ग्रह दोष सचि ॥
कूक दिनह समय सुन्दरि सचिय । संझ समय इह चरित जद्धि ॥
कं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १५ ॥
कामधेनु का चरित्र ॥
कवित्त ॥ कामधेन पच्छै प्रचण्ड । त्रिषभयं चह अधिकारिय ॥
एक एक उत्तरै । एक चढ्दै रस भारिय ॥
हसी सची दिषि निजर । दीन सराप सुधेनह ॥
हैां पसु तुअ सुमनुच्छ । होइ पञ्चाल ग्रेह मह ॥
लम्भी सुपच्छ जननी बचन । बंटि लई क्रम क्रम सुसुर ॥
तिह ग्रेह और जो सम्भवै । तौ बनहिं डेबर सबर ॥
कं० ॥ १८ ॥ ६० ॥ १६ ॥
प्रात समय जगते ही दूत का पत्र पढ़ना ॥
१४ पाठान्तर-हननोपि । दुजन । दुज्जन । घनं । परिहारं । पाथार । घेर । जदोह । चहुवांन । गिरनारि । भारथ ॥
१५ पाठान्तर-वीरज । लभवै । श्रीराम । दुर्जाधं । नघुराय । मचकत्यं । दिन । सुन्दर । रूह ॥
१६ पाठान्तर-कांधेनु । पक्कै । पक्खें । प्रछण्ड । वृषभ । चधिकारीय । उतरै' । चढै भारीय । साराय । हां । तूं । मनुष्य । भनुक्त । लभी । सुपक्क । बटि । जौर । हीबढै ॥

सातवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३३३
दूहा ॥ भयौ प्रात जगात द्वितिय, वंचि सुकग्गह पानि ।
आबू रा सळषान लिखि, बर गिर नारी बानि ॥
छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १७ ॥
उक्त पत्र में बीर रूप देवस्थान हिंगुलाज के प्रभाव से
पृथ्वीराज के बलवान होने और नाहरराय के बल
प्रताप का वर्णन ॥
कवित्त ॥ पूना कर पर वत्तह । कोरि दृह नीज सवायौ ॥
बीर रूप इक रुद्र । थांन हिंगुलाज बनायौ ॥
देवल एक अचम्भ । हेम जुत्तत्ति इक मंडी ॥
धूप दीप साषा* सूरङ्ग । धजा पत्ताकह ठण्डी ॥
दिषन सुथांन आचम्म वर । ज्यौ कवि मंची होइ कज ॥
कवि कहै चन्द वरदाइ बर । जौ चहुआन सुहोइ बज ॥
छं० ॥ २० ॥ रु० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ बर गिरनारि नरेस । सिंधु वही सुर तानं ॥
तेज तुज्झ तप तेज । बैर भंजै अरि पानं ॥
वर गुज्जर बैसाचि । जगत अड्डौ सुस्त्र बज ॥
तिन मुक्कत्ति दिय दूत । राज सम्भरिय षित्ति षल ॥
परिहार नाथ नाहर नृपति । दुह बळ्यो इक इक अग ॥
जानें कि जरा जुब्बन दुवन । सामन्तां संतोष भग ॥
छं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ दूत सामन्तन नाथ । बाथ बडवानल घल्लै ॥
सण्डल घल्लै नाथ । सार अग्गी षल जल्लै ॥
अकह कहांनी करन । सरन रषन असरन बज ॥
सुथिर अस्थिर करि थपन । अंग जग जन दारुन दज ॥
१७ पाठान्तर—पांनि । पांन । बांनि ॥
१८ पाठान्तर—परवत्तह । प्रबतह । घांन । घांनि । हिंगुंलाज । फुत्तरि । पुतलि । * अधिक
पाठ है । सुरङ्गु । पताकह । दिपिन । सु यांन । ज्यो । कहैं । जो । चहुवांन । चहुआंन ॥
१८ पाठान्तर—बटी । पांनं । गुजर । अडौ । मुकलि । पित्त । पल । जाने । जुबन । सांमन्तां ॥

३३४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ६
भुन्न लोक सोक चर सुक्षित तन । पन अप्पन सोमेस सुच्च ॥
छत्त धने कलिमल मलन । तिहिन ओर पिक्खिय सुदुच्च ॥
छंदं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २० ॥
कवित्त ॥ चल्लत पंखि पिखि बाज । पिक्षि मृगराज मृगनि गन ॥
गोधन धरत गुवाल । हुंकि वै चल्लत वननि बन ॥
महु तजि चल्लत सुछाल । अन्य तरु साष लगन कहुँ ॥
बहल बिसद बिसाल । चलत र्वसि पवन गगन महुँ ॥
तिम नाहर राइ नरिन्द पिखि । समर सचिन सक्कहि सकज ॥
गिरि लङ्क सङ्घ सम गढ़ गरुअ । गिरद पारि किज्जै अजक ॥
छंदं० ॥ २३ ॥ रू० ॥ २१ ॥
पट्टन में चौलुक्य भीमदेव, आक पर जैत (सलख ?) पंवार,
मेवाड में समरसिंह, दिल्ली में अनङ्गपाल जैसे
बलवानों में मण्डोवर में नाहरराय के
राज्य करने का वर्णन ॥
कवित्त ॥ उत पह्न भीमंग । ब्रह्म चालुक्क जोध जुच्च ॥
अब्बू जैत पवार । लोए लरि जांनि अचल धुच्च ॥
समर सिंघ मेवार । दण्ड देवार अजर जर ॥
दीली पत्ति अनंग । चरन अड्डौ सुलोच लरि ॥
परिहार नाह नाहर नृपति । इतन बीच अप बल रहै ॥
मण्डोवराइ मारू मरद । बर विरह बंकै बहै ॥
छंदं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ २२ ॥
पृथ्वीराज का आठ वर्ष की अवस्था में दिल्ली ननिहाल में
आना, दिल्लीश अनंगपाल के आधीन राजओं का वर्णन ॥
२० पाठान्तर-छलन । जलन । कहांनी । रषन । अगं । जगंन । जगं । कलिमल कलि मलन । पिषिय । सुच्चय ॥
२१ पाठान्तर-पंख । वाज । पिषि । मृगनी । बनन बन । महुवाल । शाष । कहों । कहु । महु । नाहरराय । सकहि ॥
२२ पाठान्तर-चालुक । अबू । जांनि । दिल्लीषति । अड्ढो । बींच । बिरद । बहें ॥

सातवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ३३५
कवित्त ॥ वरष अठ्ठ प्रथिराज । गयौ मुसान दिल्लीं ग्रह ॥
राज करै अनँगेस । सेव मरुधरा करै सह ॥
मंडोवर नागौर । सिंधु जलवट सुपट्टै ॥
पेसौरां लाहोर । धरा कंगुर लगि कंठै ॥
कासी प्रयाग गढ देवगिर । इते सेव अग्या धरै ॥
सीमाडवियां संकै सुपछु । श्रित अनंग सेवा करै ॥
छं० ॥ २५ ॥ रू० ॥ २३ ॥
मंडोवर के नाहर राय का दिल्लीश्वर की भेंट को दिल्ली
आना, पृथ्वीराज का रूप देखकर प्रसन्न होना और
माला पहिरा कर कहना कि जब पृथ्वीराज
सोलह वर्ष का होगा तब मैं अपनी
कन्या इसको विवाह दूंगा ॥
कवित्त ॥ आयौ नाहर राइ । सेव आदरिय दिलेसर ।
दिष्पि कुँवर प्रथिराज । नूर अदभूत नरेसर ॥
अंबर माला इक्क । अंक पहिराइ कह्यौ इह ॥
मैं दिह्मी रूपसंगि । सबै उछाह कियौ ग्रह ॥
आनंद तेज राजा अनँग । प्रथीराज आयौ घरह ॥
दुइ अठ्ठ वरस जब बीति गय । व्याहूँ कह्यो देव गिरह ॥
छं० ॥ २६ ॥ रू० ॥ २४ ॥
नाहर राय का मत पलट जाना अर्थात् कन्या
देना अस्वीकार करना ॥
२३ पाठान्तर—प्रथीराज । मूर । संध । बट । पुट्ठै । पैसोरा । कंठै । इतै । पह । क्षत ॥
२४ पाठान्तर—नाहरराय । आदरी । दिल्लेस्र । देखि । कुंअर । प्रथीराज । अदभुत्त । एक ।
पहिराय । दीधी । सवै । उछाह । कीयौ । सह । अभंग । अनंग । प्रथिराज । आयो । अठ ।
बीतिगा । ब्याहयुं । व्याहयु । देवगिर ॥
११

३३६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ८
दूहा ॥ बालपनै प्रथिराज नें, दिय कंचन वैमान ॥
मतौ फिरि दिन्नौ अक्रम, नाहर राइ विसान ॥
छं० ॥ २७ ॥ रु० ॥ २५ ॥
नाहर राय का उत्तर लिखना कि तुम्हारा कुल
आदि हमारे योग्य नहीं है ॥
कवित्त ॥ लिखि कग्गद परिमांन । यांन अजमेर पठाइय ॥
दूत पंथ अविखंब । पास संभरि वै आइय ॥
चिंति सत्त आरंभ । सेन पारंभ विचारिय ॥
बाल वीर प्रथिराज । देइ नांची परिचारिय ॥
सग पन सुआदि सम वर नृपति । समर जुद्ध साधै समर
कुल ढुंढ नाम दिज्जै नहीं । इह कलंक लग्गै सुघर ॥
छं० ॥ २८ ॥ रु० ॥ २६ ॥
अरिल्ल ॥ खेतरपाल कौं पूजैं कौंनं । जो परहरि गौ विंदह मौनं ।
परहरि सिव उमया गुन तचं । को मंडै चंडालो संचं ॥
छं० ॥ २९ ॥ रु० ॥ २७ ॥
दूत का यह पत्र लाकर पृथ्वीराज के हाथ में देना ॥
दूहा ॥ लिखि कग्गद परिचार पर, विवरि विवर करि दूत ॥
लै दीनौ प्रथिराज कर, समी संझ सपहूंत्त ॥
छं० ॥ ३० ॥ रु० ॥ २८ ॥
पृथ्वीराज का क्रोध करना, सोमेश्वरदेव का समझाना ॥
कवित्त ॥ बढि अवाज* अजमेर । बंचि कग्गद चौरासिम ॥
परिचारह सब सेन । धर्म परिहरि बढ्यौ भ्रम ॥
२५ पाठान्तर-बालपनैं । पृथ्वीराजनैं । फिर । कीनौ । नाहर राय ॥
२६ पाठान्तर-परिमांन । यांन । चित्तिं । मतः । विचारैय । पृथ्वीराज । देत । नांही ।
परिहारीय । नृपति । जुध । साधैं । नांम । दिजै । नही । लगैं ॥
२७ पाठान्तर-क्षेत्रपालकूं । पूजै । गे। । मोंन ॥
२८ पाठान्तर-पृथ्वीराज । पहूत ॥

सातवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । ३३०
सूर दूर तिन तेज । मध्य अँधियन यौं बाजे ॥
प्रात ओस जिम बूंद । जबह अयछ अनु लाजै ॥
संगन अनेक जंपत करन । नान वरज्यौ पुन फिरि ॥
मंजाव साह सिसु बत्त सुनि । करहि जुद्ध भुम्मिय सु जुरि ॥
छं० ॥ ३१ ॥ रु० ॥ २९ ॥
सरदारों का पत्त्र सुनकर क्रोध करना ॥
कवित्त ॥ सुनिय बत्त सामंत । बँचे कग्गद परिचारौ ॥
सीस लग्गि असमान । पिथ्यौ खंगा बंजारौ ॥
सिंघाने करि हन्यौ । केन जबू कंवर पड्डौ ॥
केन छीन सनि राह । जुद्ध तारा ससि वध्यौ ॥
वर कन्ह वीर सोमेस पहु । चाहुवान वक्कारियै ॥
बाहंत वीर अरि नीर विच । दत्त चौहाना तारियै ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ ३० ॥
कवित्त ॥ मुक्कै दूत सुद्दूत । रत्त गुन अरिन विरत्ता ॥
चिंत ननौ सिर भार । सार काग्ज सो रत्ता ॥
वर अपन जानही । प्रमान न्मान लुग्धै ॥
द्विग राजान प्रमान । देस विद्देस परष्षै ॥
ते दूत सपत मंडौवरह । चर चरिच अनुसरि परे ॥
भय प्रात राज दरबार गय । दिष्पि धार घर घर डरे ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
पृथ्वीराज का चढ़ाई के लिये सेना सजना ॥
२९ पाठान्तर-आवाज । धूम । मधि । अंधिन । राजे । उस । बुंद । अयन । मंजाह
माह । भूमीय ॥ * यह शब्द अर्थात् "आवाजि और अवाज" आदिपर्व्व के रूपक १८१ तथा
१८२ पृष्ठ ७६ में भी आया है । उस पर की टिप्पण देखो । संस्कृत “वाज” और “वाद” शब्द
Sound, Sounding, discourse, speech, and prayer आदि के अर्थों में प्रयोग होते हैं उन से यह
हिन्दी अपभ्रष्ट शब्द बने दीखते हैं ॥
३० पाठान्तर-सुनीय । सांमंत । बंचे । बचे । कगद । असमांन । लगा । कर । पद्धै ।
छीनं । वधौ । कन्ह । चाहुत्रांन । चाहुवांन । वकारीयै । बाहत । विचि । चौहांनां । तारीयै ॥
३१ पाठान्तर-मूके । कारिज । जांन हि । प्रमांन । न्मिमांन । प्रमांन । राजन । विदेस ।
परषै । संपंत । चर चरित्र । दिषि ॥

३३८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १०
दूहा ॥ तात बरज्यौ बत्त बहु, एक न आवै दाइ ॥
उत पृथिराज नरिंद ने, सज्ज्यो सेन सुभाइ ॥
छं० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ ३२ ॥
सेना का वर्णन ॥
लघुनाराच ॥ हय ग्गयं सजे अरं । निसांन बज्जि दूभरं ॥
नफेरि बीर बज्जई । मृदंग झंझरी गई ॥ छं० ॥ ३५ ॥
सुनंत ईस रज्जई । तनीस राग सज्जई ॥
सुभेरि झुंकयं घनं । श्रवन्न फुट्टि झंरूनं ॥ छं० ॥ ३६ ॥
नरह नाद रिक्कयं । चुसट्ठ ताल दिज्जयं* ॥
तुरंग पंति चल्लयं । मनौं जलद्द हल्लयं ॥ छं० ॥ ३७ ॥
तरप्पि तेज तामसी । मनौं कि नह वामसी ॥
झलक्कि मंत दंतयं । मनौं किं बीज पंतयं ॥ छं० ॥ ३८ ॥
जेर जरायं बंगरी । मनौं चमक विज्जुरी* ॥
सिरीसु खोभ जग्गयं । कि भान मेघ उग्गयं ॥ छं० ॥ ३९ ॥
श्रवंत खोभ दानयं । झरंत मेघ जानयं ॥
उपंम और दुत्तियं । षिलाव राहु पुत्तयं ॥ छं० ॥ ४० ॥
उपंम तीय उड्डरं । कि मिच कज्जलं गिरं ॥
जु बैरषं विराजची । वसंत वृष लाजची ॥ छं० ॥ ४१ ॥
दुरंत चौर सीसयं । गिरं कि गंग दीसयं ॥
दुती उपंम लग्गयं । कि बह्लं कि बग्गयं ॥ छं० ॥ ४२ ॥
जु घूघरं घमक्कयं । कि दादुरं सु भद्यं ॥
दुती उपंम खेलयं । सुचाग वाम केलयं ॥ छं० ॥ ४३ ॥
३२ पाठान्तर—दाय । पृथीराजनें । सुभाय ॥
३३ पाठान्तर-छंद लघुनाराज वा नराजा । हयगयं । निसांन । दुभरं । बजई ॥ ३५ ॥
रजई । सजई । बजई । नफेरि । श्रवन ॥ ३६ ॥ नारद नरद रिक्षयं । चौसट्ट । * यह दूसरा पाद
सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है । चुलयं । मनों । जलद । हलयं ॥ ३७ ॥ तरपि । तांमसी ।
मनों । वांमसी । भालकि । मनों । लभयंतयं ॥ ३८ ॥ * ये दोनों पाद सं० १६४७ की पुस्तक
में नहीं हैं । ससोभ । जगयं । भांन । उगियं ॥ ३९ ॥ दानयं । जानयं । दुतीयं बिलावै । पुत्तियं ॥
४० ॥ उपंम । कजलं । बृछ ॥ ४१ ॥ चोंर ॥ ४२ ॥ घुघरं । घमघमं । ददुरं । भदयं । उपम ॥ ४३ ॥

सातवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३३६
सुघंट घोर सोरयं सुनंत श्रोन फोरयं ॥
तिलक्क चंद साजच्ची । मनौं गनेस राजच्ची ॥ * कुं० ॥ ४४ ॥
दुती उपंम जग्गयं । दवंकि लग्गि पव्वयं ॥
गह्व गर्ज सद्दयं । मनौं किं मास भद्दयं ॥ कुं० ॥ ४५ ॥
सु पीलवांन चंदयं । अरापती कि इंदयं ॥
सुअस्सवार राजच्ची । कि जंम जोर साजच्ची ॥ कुं० ॥ ४६ ॥
मिलंत मुंक नैनयं । तिलग्गि सीस गैनयं ॥
ते रूप भूप मारखे । कि अश्वनी कुमार खे ॥ कुं० ॥ ४७ ॥
चिगुंन तेज तंतनं । तिनंक कंक मंमनं ॥
सनाह रूप अंगमं । मनौं कि जोग जंगमं ॥ कुं० ॥ ४८ ॥
सणाह जोति दिप्पयं । मरीच भान भिप्पयं ॥
सुभह छंद वद्दयं । कि वीर वान सद्दयं ॥ कुं० ॥ ४९ ॥
आगंम विप्र बोलयं । हुलास रूचि चोलयं ॥
सु पाइ कंपनं षनं । दुखंत ते झनं झनं ॥ कुं० ॥ ५० ॥
जुरंत जाम मल्लयं । प्रभा प्रसाद बुद्धयं ॥
तिमध्य राज पिष्ययं । सु अंग गंग तिष्ययं ॥ कुं० ॥ ५१ ॥
सामंत मध्य सोभयं । कि इंद देव लोभयं ॥
कि पञ्च पंडवं दलं । धनुक्क वान सब्बलं ॥ कुं० ॥ ५२ ॥
चढंत राज प्रातयं । ते दूत देषि जातयं ॥
कहंत अब्ब घाटयं । भई समुद्र पाटयं ॥ कुं० ॥ ५३ ॥
उषाह मध्य ते चलं । सगुन्न बंदि जे भलं ॥
*ससूर सूरयं कलं । दिनं सु अष्टमी चखं ॥ कुं० ॥ ५४ ॥ रू० ॥ ३३ ॥
सुघट्ट । तिलक । मनौ । गनेंस । * यह चौथा पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ४४ ॥
गह्र । मनौ ॥ ४५ ॥ पीलवांन । औदापती । जु दासवार ॥ ४६ ॥ मुद्ध । नैनयं । गैनयं ॥ ४७ ॥
त्रिगुन । तिनंन । मनौ ॥ ४८ ॥ दिपयं । मरीचि । भानं । भिषयं । बदयं । बांन ॥ ४९ ॥ पाय ।
झननं झनं ॥ ५० ॥ पिथयं । तिद्ययं ॥ ५१ पद्य । बांन संबलं ॥ ५२ ॥ अब । भयौ ॥ ५३ ॥
उपाह । मधि । सगुन । जै । * अंत के ये दोनों पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ ५४ ॥

३४० पृथ्वीराजरासो । [सातवां समय १२
पिता की आज्ञा लेकर अष्टमी को पृथ्वीराज का लड़ाई
के लिये यात्रा करना ॥
कवित्त ॥ दिन अष्टमि रवि वार । राज सुभ मँडि प्रस्थानं ॥
अष्ट दिसा जोगनी । भई साचाय सुध्यानं ॥
अष्ट च्यारि अय भान । राजदै अर्ध बघाइय ॥
इन सें भौम अनिष्ट । चंद चौथे ग्रह आइय ॥
चले नरिंद धायि दूत तब । मन आनंद सु चंद हुअ ॥
प्रथिराज तात अग्या सगुन । चरन बंदि चलि वज्र भुअ ॥
कूं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥ *तात मात अग्या परमानहि । ता समान नह भ्रंम प्रमानहि ॥
गुरु द्रोही पति द्रोही जानं । सो निच्चै नर नर कहि थानं ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३५ ॥
नाहर राय के दूतों का पृथ्वीराज की चढ़ई और सेना
बल का समाचार नाहर राय को देना ॥
छंद पद्धरी ॥ नाहर नरिंदं जे दूत आइ । समाचार सबै कहिते सुनाइ ॥
दिसि जीत सत्त चहुवान सूर । लषियै चरिच मन मन्झ काफ़र छं० ॥ ५५ ॥
इक सहस स्वान सँग नाम धार । देसान देस बल पंग अपार ॥
तिन संझ पंच सै पवन पात । पित मात असल्ल लाधौर जात ॥ छं०॥५६॥
पांभरी अंग जिन पसम होत । दिषि दीप जोति तिन नैन होत ॥
रातब्ब मंस घृत दुग्ध पान । आजान बाह दिषियै बलान ॥ छं० ॥ ५७ ॥
रेसमी डोरि पट्टी नरमं । रहै सीत क्रांच दुषित गरंम ॥
तिन सथ्य पंच सै और डोरि । ते रषिक बिन को सकै छोरि ॥छं०॥५८॥
३४ पाठान्तर-शुभ । मंडि । भांन । मै । भोम । अरिष्ट । चौथैं । गृह । नरिंद्र । धसि । प्रथौराज । आग्या ॥
३५ पाठान्तर-आग्या । परमानाय । परमांनहि । समान । ध्रुम्म । प्रमांन्नाय । जांनं । निश्चै । नरकन । यांनं ॥ * सं० १६४९ की पुस्तक में इसे अरिल्ल करके लिखा है ॥
३६ पाठान्तर-समचार । सब । जित्त । सत । चहुवांन । मनमैं । स्वान । ॥ ५५ ॥ संग । नांमधार । देसान । मल्ल । से । असिल ॥ ५६ ॥ नयन । रातब । पांन । आजानंबाह । बलांन ॥ ५७ ॥ नरमं । शीत । दुखित । सय । होर । ति । रक्षिक । बिना ॥ ५८ ॥

सातवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो । ३४१
इक आइ पेस इक अश्व सोन । बज्वांन अंग चष रहत षोन ॥
सिक्कार नाम जहंतह तिक्कान । आरंभ जुद्ध सब रूपि विनान ॥ छं० ५८॥
इक सत्त उंट भरी जीन साल । तिन धरै अंग छिप्यै न काह ॥
भेदैन वज्र वर नीर धार । तिन धरैं अंग जे दृढ पगार ॥ छं० ॥ ६० ॥
सन्नाह महिम वरनी न जाइ । जिप्पनि कि देव दनुजनि उपाइ ।
जनु ब्रह्म होम कढि मंच जोर । कै इंदं अग्नि अप्पे अकोर ॥छं ॥६१॥
कै वरुण अप्पि पाताल ईस । कै पवन प्रसन परसाद दीस ॥
वाचिष्ट कढि कै कुंड होम । दीनी कि प्रसन व्है मात भौम ॥ छं०॥६२॥
आंस सिक्ख सध्य तीन नरेस । जितनह समर सज सचुदेस ॥
छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ ३६ ॥
पृथ्वीराज का प्रताप सुनकर नाहरराय का चौकन्ना होना ॥
दूहा ॥ सुनी पवर जब दूत मुख । चमक्यौ नाहरराव ॥
ए अप्पन गनियै नहीं । वैरी बिस हर घाव ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
अपने सरदारों से नाहर राय का कहना कि अब क्या
करना चाहिए पहिले चौहानों से हम से और बात
थी पर अब तो बिगड़ गई ॥
कवित्त ॥ सुक्षित सकल लिय बोलि । पुच्छि परिहार तिनहि मत ॥
चाहु आन पाषान । कहत आषेट जुद्ध बत ॥
तनक भनक सी कान । दूत इत्तह सुनि आए ॥
अप्प अचे तन रह्यौ । धरौ धर भूमि सदाए ॥


पाठान्तर-पेसि । बलवांन । सिकार । नांम । जहां । कांन । बिनांन ॥ ५८ ॥ सत ।
उंट । धरै । छिपै । भैदैन । घरैं ॥ ६० ॥ स्रनाह । महिम । जिपन । उपाय । ब्रम्हन । इंद्र । आपे ॥
६१ ॥ कैं । प्रासाद । कढि । प्रसंन । भोम । भौंम ॥ ६२ ॥ सद्य । जितनह । शत्रु ॥ ६३ ॥
३७ पाठान्तर-प्रवरि । चमक्यौँ । अपने । गिनियै । नही ॥

३४२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १४
सोमेस हमह कछु द्वै नहीं । तिन सुचित्त माना लई ॥
तब तौ सनेह कछु और हौ । अब तौ कछु औरै भई ॥
छंदं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥
सरदारों का कहना कि लड़ना चाहिए ॥
दूहा ॥ कहत सुभट परिहार के । दध्य चढी क्यों देइ ॥
सस्त्र मारि दल भंजि कैं । षग्ग धार धर लेइ ॥
छं० ॥ ६६ ॥ रू० ॥ ३९ ॥
नाहर राय का कहना कि आगे से बढ़कर एक बारगी उन
पर चढ़ाई करना चाहिए नहीं तो जीत न होगी ॥
कवित्त ॥ सुनि मंडोवर राइ । कहन बलवंत सुभट सह ॥
द्रव्य उनह कर चह्यौ । कहहि सुतौ *सति वंत यह ॥
जाइ अचानक परै । बहुरि छेत्रै। नहिँ जैहै ॥
प्रथीराज उस सबल । मारि धरती सब लैहै ॥
इह सुनत सबन बैठी सुमन । सजन सेन बेगो कह्यौ ॥
चर चरन चरचि कैं वत्त इह । खो झत्ती मारग गह्यौ ॥
छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ४० ॥
नाहर राय का सेना सजना ॥
दूहा ॥ सजी सेन मंडोवरह । नाहरराइ नरिंद ॥
संभरि संभरि राव नृप । उर उदोत आनंद ॥
छं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
३८ पाठान्तर-पुछि । चहुआन । पायांन । कांन । इतह । अचेतनह । सुदाए । हमह
कम । नही । सुहित ॥
३९ पाठान्तर-हथ । कै ॥
४० पाठान्तर-मंडोवरराई । मंडोवरराय । सुनद । कह हि सुतौ सति वत्त इह । *अधिक
पाठ है । परौं । नहिं । जैहैं । डंस । धरती लैहैं । सबल । वेगो । वल । झती ॥
४१ पाठान्तर-नाहरराय । संभरि वार । उद्योत । अनंद ॥

ग्यारहवां समय ११ ] पृथ्वीराज रासो । ३४३
पृथ्वीराज की सेना की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ सदस लेन संसारी । नरेसु मध्य सन टारि पंच सम ॥
वीर सिंगार सुभंत । कंत जनु रत्त बाम सम ॥
दन्तउभय नंचारु । सिलह सज्जी चहु आनं ॥
चंद देखि मन मगन । कविन तिन करै बषानं ॥
पंचमी सोम रितु राज गत । सूर तेज जाजुलित धुअ ॥
कर तार धय्य कित्ती कही । वज़ि निसांन चहुआन धुअ ॥
छं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४२ ॥
पृथ्वीराज का आगे से बढ़कर लड़ने के लिये
जोवनराय को आज्ञा देना ॥
तवै सुजोवन राई । सूर साह्रौ चहुवानं ॥
तुम गुज्जर बैषंड । गाम सुरधर अगिवानं ॥
पंथ पंथ परवान । धाइ अगिवानी किज्जै ॥
सगा सपन जंपियै । छमनि आरोचि सुलिज्जै ॥
वामान पंथ अंधी प्रकृति । बिन दिट्ठे दिट्ठे न कछु ॥
वन पंन अहु परवत रहे । भेद बिना जानहि न कछु ॥
छं० ॥ ७० ॥ रु० ० ४३ ॥
जोवनराय का उत्तर दे कहना कि नाहरराय का पथ
बांधा सो वह रणभूमि को तिरछी छोड़ कहीं
चला गया ॥
तब्ब सुजोबन राइ । बत्त जंपै चहुवानं ॥
अहु पंन परबत्त । सत्त गुज्जर धर मानं ॥
लोहाना आजान । पंथ बंध्यौ पालक्की ॥
नाहर राइ नरिंद । गयौ तिरछीं भुअ मुक्की ॥
४२ पाठान्तर-संभारि । * अधिक पाठ है । मधि । सिंगार । सजी । चहुआनं । पेषि ।
षषानं । रिति । हथ्थ । किती । निसांन । चहुआन ॥
४३ पाठान्तर-तवै । राय राव । चहुवानं । चहुआनं । गुजर । गांम । मुरधुर । अगिवांनं ।
परवांन । अगिवांनी । कीजै । लिजै । वामांन । दिट्ठै । हिट्ठै । अहु । अद्दु । प्रवत । जानै
१२

३४४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १६
करिघर अनेक कैंवर गहिय । ए अग्गैं कैा धाइया ॥
तिह ठाम चुक चिंत्यो हुतौ । पै नाहर राइ न पाइया ॥
छं० ॥ ७१ ॥ रु० ॥ ४४ ॥
सबेरे नाहरराय के अग जाने पर सांझ को पृथ्वीराज
का पहुँचाना और उसकी खोज करना ॥
गयौ प्रात परिचार । संझ चहुआन सपनौ ॥
बरज्यौ जीवन राइ । षोज क्रम क्रम करिणिजौ ॥
पंथवान पुच्छ्यौ । नदी उत्तरि तिन अषिय ॥
तातें पूर नरिंद । बाज नत्तौ करि नषिय ॥
आनंद सिलह सज्जिय नृपति । पंषी पारिव मोचं जिम ॥
ज्यौं गिद्द अंध पच्छो करै । चित्त दिगंबर कियौ तिम ॥
छं० ॥ ७२ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
चालुक के प्रधान ( दीवान ) के घर नाहरराय
का पता मिलना और सामन्त सहित
पृथ्वीराज का नदी उतरना ॥
कुंडलिया ॥ नदी उतरि सामंत सह । डीस संपते जाई ।
चालुक्कां परधान गृह । पहन नाहर राई ॥
पहन नाहर राइ । सेन सज्जै सथ षंच्यौ ॥
चय हजार असवार । वीर संधान जुसंच्यौ ॥
प्रात कूच उप्परै । आज मुकांम जुदुस्तर ॥
झुकि प्रथिराज नरिंद । सिलह सजी नदि उत्तरि ॥
छं० ॥ ७३ ॥ रु० ॥ ४६ ॥
४४ पाठान्तर—तवै । तवै । यौवनराय । चहुआनं । चहुवानं । अद्रु । अडु । परबत । गुजर । मानं । लोहांनी । अजानं । पालुकी । नाहरराय । भुहू । रहिय । के आगें उधाइया । तिहि । ठांम । यैं । नाहरराव ॥
४५ पाठान्तर—चहुआन । संपना । यौवनराव । लीना । पंथवांल । पुछ्यौ । नदि । उतरि । अषीय । अषीय । नंडिय । सज्जिय । पारेव । परेव । ज्यो । गट्ट । गंद । पक्खो । चित । डिगंवर । कीया ॥
४६ पाठान्तर—नदि । उतरी । उत्तरि । सामंत सब । संपत्त । जाय । चालुकां । परधांन । राय । सेन जैन । सजे ऊपरै । मुकांम । सुदुक्दूर । प्रथीराज । सजी । उतरि ॥