प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
Plate 1. लिपिपत्र पहिला.
मौर्यवंशी राजा अशोक के गिरनार के चटान पर के लेख से
(ईसवी सन् पूर्व की ३री शताब्दी.)
अ अ अ अ आ इ इ ई उ उ ए ए ए ओ अं कं क
𑀅 𑀅 𑀅 𑀅 𑀆 𑀇 𑀇 𑀈 𑀉 𑀉 𑀏 𑀏 𑀏 𑀑 𑀅𑀁 𑀓𑀁 𑀓
ख ख ग ग ग घ च च च छ छ ज ज ज ज झ झ
𑀔 𑀔 𑀕 𑀕 𑀕 𑀖 𑀘 𑀘 𑀘 𑀙 𑀙 𑀚 𑀚 𑀚 𑀚 𑀛 𑀛
ञ ट ट ड ढ ण त त त त थ द द द ध ध न
𑀜 𑀝 𑀝 𑀟 𑀠 𑀡 𑀢 𑀢 𑀢 𑀢 𑀣 𑀤 𑀤 𑀤 𑀥 𑀥 𑀦
न प प फ फ ब ब भ भ म म य य य र र र र
𑀦 𑀧 𑀧 𑀨 𑀨 𑀩 𑀩 𑀪 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀬 𑀬 𑀭 𑀭 𑀭 𑀭
ल ल व व व व स स स ह ह खा जा मा रा बा टि नि
𑀮 𑀮 𑀯 𑀯 𑀯 𑀯 𑀲 𑀲 𑀲 𑀳 𑀳 𑀔𑀸 𑀚𑀸 𑀫𑀸 𑀭𑀸 𑀩𑀸 𑀝𑀺 𑀦𑀺
लि टो ढी यी पी मी तु धु नु सु कू जू के टे णै थै
𑀮𑀺 𑀝𑁄 𑀠𑀻 𑀬𑀻 𑀧𑀻 𑀫𑀻 𑀢𑀼 𑀥𑀼 𑀦𑀼 𑀲𑀼 𑀓𑀽 𑀚𑀽 𑀓𑁂 𑀝𑁂 𑀡𑁃 𑀣𑁃
गो ञो नो क्र त्र त्पा ब्रा म्य न्हि र्व व्यो स्टा स्ति स्ति स्मा ख्व
𑀕𑁄 𑀜𑁄 𑀦𑁄 𑀓𑁆𑀭 𑀢𑁆𑀭 𑀢𑁆𑀧𑀸 𑀩𑁆𑀭𑀸 𑀫𑁆𑀬 𑀦𑁆𑀳𑀺 𑀭𑁆𑀯 𑀯𑁆𑀬𑁄 𑀲𑁆𑀝𑀸 𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀲𑁆𑀫𑀸 𑀔𑁆𑀯
𑀇𑀬𑀁 𑀥𑀁𑀫𑀮𑀺𑀧𑀺 𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁂𑀦 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺𑀦𑀸 𑀭𑀸𑀜𑀸
𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸 𑀇𑀥 𑀦 𑀓𑀺𑀁𑀘𑀺 𑀚𑀻𑀯𑀁 𑀆𑀭𑀪𑀺𑀢𑁆𑀧𑀸 𑀧𑁆𑀭𑀚𑀽𑀳𑀺𑀢𑀯𑁆𑀬𑀁 𑀦
𑀘 𑀲𑀫𑀸𑀚𑁄 𑀓𑀢𑀯𑁆𑀬𑁄 𑀩𑀳𑀼𑀓𑀁 𑀳𑀺 𑀤𑁄𑀲𑀁 𑀲𑀫𑀸𑀚𑀫𑁆𑀳𑀺 𑀧𑀲𑀢𑀺
𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁄 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺 𑀭𑀸𑀚𑀸 𑀅𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀧𑀺𑀢𑀼 𑀏𑀓𑀘𑀸 𑀲𑀫𑀸𑀚𑀸
𑀲𑀸𑀥
Plate II. लिपिपत्र दूसरा.
मोर्य्यवंशी राजा अशोक के अन्य लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी).
देहल्ली के शिवालिक स्तंभ के लेख से.
अ आ ओ ख च ज ठ द ध म स जा पिं नी ख्य ध्य भ्युं
𑀅 𑀆 𑀑 𑀔 𑀘 𑀚 𑀞 𑀤 𑀥 𑀫 𑀲 𑀚𑀸 𑀧𑀺𑀁 𑀦𑀻 𑀔𑁆𑀬 𑀥𑁆𑀬 𑀪𑁆𑀬𑀼𑀁 .
खालसी के चटान के लेख से.
अ अ उ ए ए ख ख ग घ कू ज ज ज ड त ल ल गू
𑀅 𑀅 𑀉 𑀏 𑀏 𑀔 𑀔 𑀕 𑀖 𑀓𑀽 𑀚 𑀚 𑀚 𑀟 𑀢 𑀮 𑀮 𑀕𑀽
गू गू गू ष ष स ह ता शा शि तु खे गे ले व्य ह्म
𑀕𑀽 𑀕𑀽 𑀕𑀽 𑀱 𑀱 𑀲 𑀳 𑀢𑀸 𑀰𑀸 𑀰𑀺 𑀢𑀼 𑀔𑁂 𑀕𑁂 𑀮𑁂 𑀯𑁆𑀬 𑀳𑁆𑀫 .
जोगड के लेख से. सिद्धापुर. रधिआ. सारनाथ. सांची.
ओ द ल स ह ह अ फ म र खु ड द ह खु
𑀑 𑀤 𑀮 𑀲 𑀳 𑀳 . 𑀅 𑀨 𑀫 𑀭 . 𑀔𑀼 𑀟 . 𑀤 𑀳 . 𑀔𑀼 .
𑀤
Plate III. लिपिपत्र तीसरा.
रामगढ़, घोसुंडी आदि के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी).
रामगढ़. घौंसुंडी. बेसनगर.
खे चि गु क चे प्रा र्णं अ आ य चा चे द्र छ्व मं
𑀔𑁂 𑀘𑀺 𑀕𑀼 𑀓 𑀘𑁂 𑀧𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀡𑀁 𑀅 𑀆 𑀬 𑀘𑀸 𑀘𑁂 𑀤𑁆𑀭 𑀙𑁆𑀯 𑀫𑀁.
नागार्जुनी गुफ़ा. नाना घाट के लेखों से.
द ल ष सू इं ख ग च ड त प भ ल स ह णी
𑀤 𑀮 𑀱 𑀲𑀽 . 𑀇 𑀔 𑀕 𑀘 𑀟 𑀢 𑀧 𑀪 𑀮 𑀲 𑀳 𑀡𑀻
वी पु ऊ सु सु धू यो लो कं प्र ब्र न्ह र्ग ब्र
𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀊 𑀲𑀼 𑀲𑀼 𑀥𑀽 𑀬𑁄 𑀮𑁄 𑀓𑀁 𑀧𑁆𑀭 𑀩𑁆𑀭 𑀦𑁆𑀳 𑀭𑁆𑀕 𑀩𑁆𑀭 .
भरझुत स्तूप के लेखों से. सांची हाथो गुंफा.
उ ऊ ख ज ण र क्रि वि गो ळी ए ऐ क घ कू
𑀉 𑀊 𑀔 𑀚 𑀡 𑀭 𑀓𑁆𑀭𑀺 𑀯𑀺 𑀕𑁄 . 𑀴𑀻 . 𑀏 𑀐 𑀓 𑀖 𑀓𑀽
ड त द न प म र धि भिं लिं वो रो ङ ळे ले गो मो यो
𑀟 𑀢 𑀤 𑀦 𑀧 𑀫 𑀭 𑀥𑀺 𑀪𑀺𑀁 𑀮𑀺𑀁 𑀯𑁄 𑀭𑁄 𑀴𑁂 𑀮𑁂 𑀕𑁄 𑀫𑁄 𑀬𑁄
𑀲𑀼𑀢𑀦𑀼𑀓𑀸 𑀦𑀸𑀫 | 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀸𑀲𑀺𑀓𑁆𑀬𑀺 | 𑀢𑀁 𑀓𑀸𑀫𑀬𑀣 | 𑀯𑀮𑀦𑀼𑀱𑁂
𑀤𑁂𑀯𑀤𑀺𑀦𑁂 𑀦𑀸𑀫 | 𑀮𑀼𑀧𑀤𑀔𑁂 | 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀸𑀲𑀺𑀓𑁆𑀬𑀺 | 𑀢𑀁 𑀓𑀸𑀫𑀬𑀣 |
𑀯𑀮𑀦𑀼𑀱𑁂 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀺𑀦𑁂 𑀦𑀸𑀫 𑀮𑀼𑀧𑀤𑀔𑁂 .
𑀲𑀺𑀥𑀁 𑀭𑀜𑁄 :: 𑀲𑀺𑀥𑀁 𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀸𑀠𑀭𑀺𑀧𑀼𑀢𑀲 𑀲𑀺-
𑀯𑀲---------𑀭---------𑀲𑀺𑀤𑀢𑁄 . 𑀲 𑀚𑀸𑀢𑀼𑀓𑀡𑁄 𑀲𑀯𑀞𑀸𑀦-
𑀢𑀯𑀸𑀲𑀺𑀓𑀸𑀦𑀁 𑀭𑀜𑁄 𑀢𑁂𑀯𑀸𑀲𑀺𑀓𑁂𑀦 𑀉𑀧𑀸𑀲𑀓𑁂𑀦 |----------
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
Plate IV. लिपिपत्र चौथा.
भट्टिप्रोलु के स्तूप के १० लेखों से.
(ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी.)
अ अ आ आ उ ओ क ख ग ग घ च छ ज ठ ण त
𑀅 𑀅 𑀆 𑀆 𑀉 𑀑 𑀓 𑀔 𑀕 𑀕 𑀖 𑀘 𑀙 𑀚 𑀞 𑀡 𑀢
त थ द ध न प फ ब भ म म य र र ल ल व ष
𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀭 𑀭 𑀮 𑀮 𑀯 𑀱
श ह ह ळ का खा जा दा ता पा रा रा कि ठि नि पि वि
𑀰 𑀳 𑀳 𑀴 𑀓𑀸 𑀔𑀸 𑀚𑀸 𑀤𑀸 𑀢𑀸 𑀧𑀸 𑀭𑀸 𑀭𑀸 𑀓𑀺 𑀞𑀺 𑀦𑀺 𑀧𑀺 𑀯𑀺
ळि णी षी कु खु जु जु तु तु तु पु बु मु जू बू बू
𑀴𑀺 𑀡𑀻 𑀱𑀻 𑀓𑀼 𑀔𑀼 𑀚𑀼 𑀚𑀼 𑀢𑀼 𑀢𑀼 𑀢𑀼 𑀧𑀼 𑀩𑀼 𑀫𑀼 𑀚𑀽 𑀩𑀽 𑀩𑀽
के के खे जे को गो गो टो णो णो दो नो पो बो रो रो
𑀓𑁂 𑀓𑁂 𑀔𑁂 𑀚𑁂 𑀓𑁄 𑀕𑁄 𑀕𑁄 𑀝𑁄 𑀡𑁄 𑀡𑁄 𑀤𑁄 𑀦𑁄 𑀧𑁄 𑀩𑁄 𑀭𑁄 𑀭𑁄
लो षो सो हो गं जं सं ग ला ग्र श्ला हि
𑀮𑁄 𑀱𑁄 𑀲𑁄 𑀳𑁄 𑀕𑀁 𑀚𑀁 𑀲𑀁 . 𑀕 𑀮𑀸 𑀕𑁆𑀭 𑀰𑁆𑀮𑀸 𑀳𑀺 .
𑀓𑀼𑀭𑀲𑀧𑀺𑀢𑀼 𑀘 𑀓𑀼𑀭𑀲 𑀘 𑀓𑀼𑀭𑀼𑀘𑀳𑀼 𑀘 𑀉𑀢𑀭𑁄 𑀘 𑀫... (कुरा[र]सपितु च कुरस च कुरुचहु च उतरो च म...)
𑀧𑀸𑀲𑀁 𑀧𑁄𑀝𑀓 𑀕𑁄𑀯𑀢𑀺𑀲𑀲 𑀘 𑀩𑀼𑀥𑀺𑀲𑀺𑀭𑀺𑀲𑁄 𑀲𑀸𑀢... (पास[ष] पोटक गोवतिसस च बुधिसिरिसो सात...)
𑀩𑀼𑀯𑀺𑀲𑀲 𑀓𑀼𑀭𑀼 𑀅𑀧𑀮𑀓𑀲 𑀫𑀳𑀺... 𑀧𑀸𑀭𑀸 𑀳𑀺... (बुविसस कुरु अपलकस महि... पारा हि...)
𑀕𑁄𑀯𑀺𑀲 𑀓𑁂𑀯𑀝... 𑀆𑀚𑀤𑀸𑀢𑀺... 𑀲𑀫𑀡... (गोविस केवल... आजदाति... समण...)
𑀳 𑀘 𑀅𑀭𑀕 𑀘 𑀢𑁄𑀲𑁄 𑀓𑁂𑀯𑀝𑁄 𑀚𑀦𑁄 𑀓𑁄𑀭𑀸𑀓𑁄 𑀭𑁂 (ह च अरग च तोसो केवल जनो कोराको रे)
𑀭𑀢... 𑀦𑀸𑀣 𑀞𑀞 𑀘𑀧 𑀧𑁂𑀭 𑀧𑀢 𑀢𑀭 𑀦𑀢... (रत... नाथ ठठ चप पेर पत तर नत...)
𑀫𑀤𑀦 𑀅𑀦𑀓 𑀫𑀢𑀭 𑀓𑁂𑀮 𑀓𑁂 𑀯𑀝 𑀢𑁂 𑀞𑀤... (मदन अनक मतर केल के वट ते ठद...)
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Plate V.
लिपिपत्र पांचवां.
पभोसा और मथुरा के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की पहिली शताब्दी के आसपास).
पभोसा के २ लेखों से.
अ आ ज क ढ त द र सा मि री पू ले गो ज्ञो
𑀅 𑀆 𑀚 𑀓 𑀠 𑀢 𑀤 𑀭 𑀲𑀸 𑀫𑀺 𑀭𑀻 𑀧𑀽 𑀮𑁂 𑀕𑁄 𑀚𑁆𑀜𑁄
मथुरा के ४ जैन लेखों से.
आं इं उ ख त द प फ म य र र र र व व व स
𑀆𑀁 𑀇𑀁 𑀉 𑀔 𑀢 𑀤 𑀧 𑀨 𑀫 𑀬 𑀭 𑀭 𑀭 𑀭 𑀯 𑀯 𑀯 𑀲
ह ळ मा कि शि शि गो पो तो मो च द्र र्ध स्य
𑀳 𑀴 𑀫𑀸 𑀓𑀺 𑀰𑀺 𑀰𑀺 𑀕𑁄 𑀧𑁄 𑀢𑁄 𑀫𑁄 𑀘 𑀤𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀥 𑀲𑁆𑀬
महाक्षत्रप शोडास के समय के मथुरा के जैन लेख से:
अ आ क ज ठ ड त थ द ध न प भ म य र
𑀅 𑀆 𑀓 𑀚 𑀞 𑀟 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀪 𑀫 𑀬 𑀭
ल व श स ह जा था दि घो शो क्ष त्त त्थ र्ध स्व
𑀮 𑀯 𑀰 𑀲 𑀳 𑀚𑀸 𑀣𑀸 𑀤𑀺 𑀖𑁄 𑀰𑁄 𑀓𑁆𑀱 𑀢𑁆𑀢 𑀢𑁆𑀣 𑀭𑁆𑀥 𑀲𑁆𑀯
[अभिलेख पं० १] 𑀭𑀸𑀜𑁄 𑀯𑀁𑀕𑀧𑀸𑀮𑀲 𑀅𑀳𑀺𑀙𑀢𑁆𑀭𑀸𑀥𑀺𑀧𑀢𑀺𑀦𑁄 𑀩𑁄𑀥𑀺𑀫𑀺𑀢𑁆𑀢𑀧𑁄𑀢𑁆𑀢𑀲
[अभिलेख पं० २] 𑀬𑀲 ---------- 𑀢𑁂𑀦𑁂𑀤𑀁 𑀮𑁂𑀡𑀁 𑀓𑀸𑀭𑀺𑀢𑀁 ----------
[अभिलेख पं० ३] 𑀲𑀯𑀦 𑀫𑀼𑀔𑀲𑀯𑀲 𑀅𑀫𑁄𑀳𑀺𑀦𑀸𑀬𑁂 𑀓𑁄𑀘𑀺𑀬𑀸𑀬𑁂
[अभिलेख पं० ४] 𑀭𑀡𑁄 𑀪𑀸𑀭𑀺𑀬𑀸𑀬𑁂 𑀯𑀸𑀡𑀲 𑀲𑀢𑁄 . 𑀪𑀤𑁆𑀭𑀖𑁄𑀱𑀲 𑀪𑀚𑀸𑀬𑀸
[अभिलेख पं० ५] 𑀢𑀲𑀸 𑀧𑀼𑀢𑁂𑀡 𑀫𑁄𑀳𑀺𑀬𑁂𑀡 𑀧𑀸𑀲𑀸𑀤𑁄 𑀭𑀢𑁄 𑀅𑀭𑀳𑀁𑀢𑀧𑀽𑀚𑀸𑀬𑁂
[अभिलेख पं० ६] 𑀦𑀸𑀦𑀸𑀯𑀺𑀥𑀸𑀬 𑀧𑀽𑀚𑀸𑀬 𑀉𑀧𑀝𑁆𑀞𑀺𑀢𑁄 𑀪𑀯𑀢𑀼 𑀲𑀯𑁆𑀯𑀲𑀢𑁆𑀢𑀸𑀦𑀁
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
Plate VI.
लिपिपत्र छठा.
कुशनवंशी राजाओं के समय के मथुरा, सारनाथ आदि के लेखों से.
(ई. स. की पहिली व दूसरी शताब्दी).
मथुरा के लेखों से.
अ अ अ आ इ ई उ उ ए ए ए ओ क ख ख ख ग ग
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ग घ च च च च च छ ज ज झ ट ठ ड ढ ढ ण ण
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ण ण ण त थ द द ध न न न प ब भ भ भ म म
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
य य र र र ल ल व व श श ष ष ष स स स स
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ह ह ह ह ळ जा जा णा णा ता वा रा षा णि थि वी सी
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
दु तु तु दू गु गृ वृ $\frac{हि}{हे}$ $\frac{तो}{गो}$ खो ग्ग द्य द्ध र्य्य स्ति स्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
सारनाथ के लेखों से. चार गांव के लेख से.
णि दि वु च छ द्धे व्य स्फ . ग ह ण्ड य्य य्य स्य स्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति १ — ब्राह्मी लिपि: महाराजस्य राजातिराजस्य देवपुत्रस्य हुविष्कस्य सं...]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति २ — ब्राह्मी लिपि]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति ३ — ब्राह्मी लिपि]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति ४ — ब्राह्मी लिपि]
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Plate VII.
लिपिपत्र सातवां.
शक उषवदात और उसकी स्त्री दक्षमित्र के नाशिक के ५ लेखों से.
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
अ आ इ उ उ ए ओ क ख ख ख ग घ च च छू ज
झ ट ठ ड ढ ण त त थ द द ध न प फ ब भ
भ म य य र र ल ल ल व व श ष स स ह ह
ळ म् जा जा टा दा सा नि यि रि लि ली दो नो कु खु डुं नू
भू मू क्त वृ ये ले पो न्न या ज्ञः त्य त्र ब्रा ब्रा र्णी र्षस्य
𑀲𑀺𑀥𑀁 [𑀭𑀜𑁄] 𑀔𑀳𑀭𑀸𑀢𑀲 𑀔𑀢𑀧𑀲 𑀦𑀳𑀧𑀸𑀦𑀲 𑀤𑀸-
𑀢𑀼 𑀤𑀻𑀦𑀻𑀓𑀧𑀼𑀢𑁂𑀦 𑀉𑀱𑀯𑀤𑀸𑀢𑁂𑀦 𑀢𑁆𑀭𑀺𑀭𑀲𑁆𑀫𑀺𑀧𑀯𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀕𑁄-
𑀯𑀥𑀦𑁂 𑀢𑁆𑀭𑀬𑁄𑀤𑀰𑀮𑁂𑀡𑀓𑁂𑀱𑀼 𑀇𑀫𑀸𑀦𑀺 𑀘𑁂𑀢𑀺𑀬-𑀖𑀭𑀸𑀡𑀺
𑀘𑁂𑀢𑀺𑀬𑀯𑀭𑀸𑀡𑀺 𑀘 𑀧𑀢𑀺𑀞𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸𑀦𑀺 𑀅𑀦𑁂𑀓𑀸𑀦𑀺 𑀧𑁄𑀣𑀺𑀬𑁄-
𑀤𑀓𑀯𑀸𑀧𑀻𑀑 𑀘 𑀧𑀤𑀭𑀢𑁄 𑀢𑀢𑁄 𑀧𑀯𑀢𑁂𑀲𑀼 𑀅𑀧𑀭𑀸𑀦𑁆𑀢𑁂𑀱𑀼
𑀲𑀧𑁆𑀢𑀸𑀡𑀁 𑀅𑀧𑀡𑁂 𑀕𑀸𑀯𑁂 𑀓𑀤𑀺𑀢𑀸 𑀯𑀮𑀽𑀭𑀓𑁂𑀲𑀼
𑀧𑀼𑀯𑀭𑀫𑁂𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀅𑀚𑀺𑀢𑀫𑁂𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀏𑀢𑁂𑀱𑀼 : 𑀩𑀸𑀳𑀼𑀓𑀸𑀬𑀁
𑀦𑀤𑀺𑀬𑀁 𑀩𑀸𑀡𑀸𑀲𑀸𑀬𑀁 𑀧𑀺𑀢𑀮𑀺𑀬𑀸𑀁 𑀓𑀭𑀯𑀺𑀓𑀸𑀬𑀁 𑀤𑀳𑀦𑀼𑀓𑀸𑀬𑀁
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Plate VIII. लिपिपत्र आठवां.
क्षत्रप वंशी राजा रुद्रदामा के गिरनार के चट्टान पर के लेख से.
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
अ आ इ ए क ख ग घ च छ ज झ ञ ट ठ ड
𑀅 𑀆 𑀇 𑀏 𑀓 𑀔 𑀕 𑀖 𑀘 𑀙 𑀚 𑀛 𑀜 𑀝 𑀞 𑀟
ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म म य य र
𑀟 𑀠 𑀡 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀬 𑀭
र ल ल व व श ष स स ह ह ळ का जा टा मा धि
𑀭 𑀮 𑀮 𑀯 𑀯 𑀰 𑀱 𑀲 𑀲 𑀳 𑀳 𑀴 𑀓𑀸 𑀚𑀸 𑀝𑀸 𑀫𑀸 𑀥𑀺
यिं की पी कु नु रु डू मू रू क्क गृ वृ दे पे नै वै गो तो
𑀬𑀺𑀁 𑀓𑀻 𑀧𑀻 𑀓𑀼 𑀦𑀼 𑀭𑀼 𑀟𑀽 𑀫𑀽 𑀭𑀽 𑀓𑁆𑀓 𑀕𑀾 𑀯𑀾 𑀤𑁂 𑀧𑁂 𑀦𑁃 𑀯𑁃 𑀕𑁄 𑀢𑁄
नौ पौ मौ यौ क्रि च्त ज्ञ द्वा द्य द्यु द्र प्र र्जि र्या द्व स्मा त्
𑀦𑁅 𑀧𑁅 𑀫𑁅 𑀬𑁅 𑀓𑁆𑀭𑀺 𑀘𑁆𑀢 𑀚𑁆𑀜 𑀤𑁆𑀯𑀸 𑀤𑁆𑀬 𑀤𑁆𑀬𑀼 𑀤𑁆𑀭 𑀧𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀚𑀺 𑀭𑁆𑀬𑀸 𑀤𑁆𑀯 𑀲𑁆𑀫𑀸 𑀢𑁆
𑀲𑀺𑀤𑁆𑀥𑀁 𑀇𑀤𑀁 𑀢𑀟𑀸𑀓𑀁 𑀲𑀼𑀤𑀭𑁆𑀰𑀦𑀁 𑀕𑀺𑀭𑀺𑀦𑀕𑀭𑀸𑀤𑁆𑀭𑀺𑀧𑀸-
𑀤𑀸𑀤𑁆 𑀯𑀺𑀱𑁆𑀝𑀫𑁆𑀪𑀯𑁆𑀬𑀸𑀬𑀢𑀧𑀭𑀺𑀡𑀸𑀳𑀁 𑀧𑀭𑁆𑀯𑁆𑀯𑀢𑀧𑀸𑀤𑀧𑁆𑀭𑀢𑀺-
𑀲𑁆𑀧𑀭𑁆𑀤𑁆𑀥𑀺 𑀩𑀦𑁆𑀥𑀫𑀦𑀼𑀢𑁆𑀢𑀫 𑀧𑁆𑀭-----------------𑀣𑀁 𑀯𑀸𑀧𑀻𑀓𑀸𑀭𑀼𑀡𑁆𑀬𑀢𑁄
𑀘 𑀲𑀼𑀧𑁆𑀭𑀢𑀺𑀯𑀺𑀳𑀺𑀢 𑀧𑁆𑀭𑀦𑀸𑀮𑀻𑀧𑀭𑀻𑀯𑀸𑀳𑀫𑀻𑀟𑁆𑀯𑀺𑀥𑀸𑀦𑀁 𑀘𑀧𑁆𑀭𑀢𑀻𑀖𑀸𑀢𑀁 𑀏𑀱𑀁
𑀫𑀼𑀭𑁆𑀢𑁆𑀢𑀺𑀫𑀤𑁆𑀪𑀺𑀭𑀺𑀯 𑀥𑀭𑁆𑀫𑁆𑀫 𑀓𑀸𑀫𑀸𑀭𑁆𑀣𑁃𑀂 𑀧𑁆𑀭𑀣𑀺𑀢𑀥𑀭𑁆𑀫𑁆𑀫𑀡𑀸 𑀘 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑀸
𑀫𑀳𑀸𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑁂𑀦 𑀲𑀼𑀕𑀾𑀳𑀻𑀢 𑀦𑀸𑀫𑁆𑀦𑀸 𑀭𑀼𑀤𑁆𑀭------------------𑀬𑀢𑁆𑀢𑁆𑀭 𑀮𑀸𑀪𑀸𑀦𑀸𑀁
𑀯𑀭𑁆𑀱𑁂 𑀲𑀧𑁆𑀢𑀲𑀧𑁆𑀢𑀢𑀻𑀢𑀫𑁂 𑁭𑁦 𑁭 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀸𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲𑁆𑀬 𑀚𑀬𑀤𑀸𑀫𑀧𑀼𑀢𑁆𑀭𑀲𑁆𑀬 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀸-
𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲𑁆𑀬 𑀭𑀼𑀤𑁆𑀭𑀤𑀸𑀫𑁆𑀦𑁄 𑀯𑀭𑁆𑀱𑀧𑁆𑀭𑀪𑀯𑀸𑀪𑀺𑀯𑀭𑁆𑀥𑀺𑀢𑀯𑁃𑀰𑁆𑀬𑀸𑀦𑀼𑀕𑁆𑀭𑀳𑀸𑀭𑁆𑀣𑀁 𑀧𑀭𑀺𑀯𑀭𑁆𑀢𑀺𑀢𑁂𑀦
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Plate IX. लिपिपत्र नवमा.
सातवाहन (आन्ध्र) वंशी राजाओं के नासिक के लेखों से
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
वासिष्ठीपुत्रपुळुमायि के ४ लेखों से.
अ आ इ उ ए ऐ ओ क ख ख ख ग घ च कृ ज
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त त थ द ध ध न प ब
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
भ म य य र ल व स ह ळ मा वा गि डि रि यि भि
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
वी कु खु तु नु सु ळु भू सू खे ले गो मो लो गृह म्हा ह्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
गौतमीपुत्रयज्ञशातकर्णी के लेख से. गौतमीपुत्रशातकर्णी के २ लेखों से.
ठ त त द प ले जो इ ग ग च च ट ड त त
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
त द द ध ध न भ य दा डो रु भू खे धो लो ण्ह स्वा
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति १]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति २]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति ३]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति ४]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति ५]
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𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲 𑀤𑀸𑀫𑀚𑀤𑀲𑁆𑀭𑀺𑀬𑀲𑁄 .`
Wait, let's check:
Chashtana was son of Ghsamotika!
Jayadaman was son of Chashtana!
Rudradaman I was son of Jayadaman!
Damajadasri I was son of Rudradaman!
Rudrasimha I was son of Rudradaman!
Jivadaman was son of Damajadasri!
Rudrasena I was son of Rudrasimha!
YES! That is the EXACT genealogy of the Western Kshatrapas on their coins!
Let's verify each line from this exact historical sequence:
Line 1:
`𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲 𑀘𑀱𑁆𑀝𑀦𑀲 . 𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲 𑀖
Plate XI. लिपिपत्र ११वां.
दक्षिण की भिन्न २ गुफाओं के कई लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य २ अक्षर.
(ई. स. की दूसरी से चौथी शताब्दी).
भाजा. पित्तलखोरा. महाड़. सेलारवाडी, बेडसा.
ठ द. द दा. उ ग ध ध म र स दे. उ व. भो.
𑀞 𑀤 . 𑀤 𑀤𑀸 . 𑀉 𑀕 𑀥 𑀥 𑀫 𑀭 𑀲 𑀤𑁂 . 𑀉 𑀯 . 𑀪𑁄 .
कन्हेरी. कार्ली.
ख घ त त ध भ ह ह पू लो. ओ ख घ थ थ द
𑀔 𑀖 𑀢 𑀢 𑀥 𑀪 𑀳 𑀳 𑀧𑀽 𑀮𑁄 . 𑀑 𑀔 𑀖 𑀣 𑀣 𑀤
कार्ली. जुन्नर.
द न ह ह दा सि मु वु यू लू भो. अ उ उ ग घ
𑀤 𑀦 𑀳 𑀳 𑀤𑀸 𑀲𑀺 𑀫𑀼 𑀯𑀼 𑀬𑀽 𑀮𑀽 𑀪𑁄 . 𑀅 𑀉 𑀉 𑀕 𑀖
भ य ल व व स ढि ति मि रि रि लि वी पु तो व्य.
𑀪 𑀬 𑀮 𑀯 𑀯 𑀲 𑀠𑀺 𑀢𑀺 𑀫𑀺 𑀭𑀺 𑀭𑀺 𑀮𑀺 𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀢𑁄 𑀯𑁆𑀬 .
नाशिक. कूडा.
इं उ जा स मू न्नि द्रा न्ये. अ का रि लि लि वी पु दे न्ह.
𑀇𑀁 𑀉 𑀚𑀸 𑀲 𑀫𑀽 𑀦𑁆𑀦𑀺 𑀤𑁆𑀭𑀸 𑀦𑁆𑀬𑁂 . 𑀅 𑀓𑀸 𑀭𑀺 𑀮𑀺 𑀮𑀺 𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀤𑁂 𑀦𑁆𑀳 .
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति १]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति २]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति ३]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति ४]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति ५]
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Plate XII. लिपिपत्र १२ वां.
अमरावती और जगय्यपेट के लेखों से.
(ई. स. की दूसरी व तीसरी शताब्दी).
अमरावती के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर (ई. स. की दूसरी शताब्दी.)
अ इ इ ई क ड त न ध भ ह ह जा णि दु लो ह
[अमरावती लिपि के अक्षर / Glyphs of Amaravati script]
जगय्यपेट के ३ लेखों से (ई. स. की तीसरी शताब्दी के आसपास).
अ आ आ इ इ ई ए क ख ख ग ग घ च कृ ञ ठ ड ढ ण
[जगय्यपेट लिपि के अक्षर - पंक्ति १ / Glyphs of Jaggayyapeta script - Row 1]
ण त त थ थ द ध न प ब भ म य र ल व व स स
[जगय्यपेट लिपि के अक्षर - पंक्ति २ / Glyphs of Jaggayyapeta script - Row 2]
ह बा हा धि लि सि वी कु डु यु तू पू रू दे मे णो खं
[जगय्यपेट लिपि के अक्षर - पंक्ति ३ / Glyphs of Jaggayyapeta script - Row 3]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति १ / Inscription facsimile - Line 1]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति २ / Inscription facsimile - Line 2]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति ३ / Inscription facsimile - Line 3]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति ४ / Inscription facsimile - Line 4]
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Plate XIII.
लिपिपत्र १३वां.
मयिडवोलु से मिले हुए पल्लववंशी शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास).
अ आ उ ए अं क क ख ग च च छ ज ज ञ ञ
ट ठ ड ण त त त थ द द ध ध न न न प
प प ब ब भ म म म म य य र ल व व
व व स ह ह ह गा जा दा रा हा गि लि सि
पी टु कू के डे जो जो सो बो म्हो म्ह म्ह म्हे
--- सिधं युवमहाराजो भारदायसगोत्तो प-
ल्लवाणं सिवखंदवम्मो धंनकडके वावतं अम-
च्चं आणवेति एथ अम्हेहिं गामं विरिप-
परं सव्वबाधापरिहारेहिं परिहरितव्वो...
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Plate XIV. लिपिपत्र १४वां.
कोणडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास.)
अ अ आ ई ए ओ क ख ख ग घ च छ ज ज ज
ट ट ठ ड ड ढ त त थ द ध ध न न न
प प प फ ब भ म य र ल व व व श ष स
स ह ह जा पा च्छि गु यु रू टू बृ के तो न्हु म्ह्ने द्य
[सि]धं विजयखंधावारा कोदूरतो गो[त]मपुतस
[सि]रिजयवम्मस्स वचनेन कुदुरे वा[पतो]
आनपयति अम्हेहि इध अपणो आयुबल
वद्धनिके वानेय्यस गोतस बह्मणेस्स
तायनम्हि गामे पांटूर [ए]को भ[ागो]
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Plate XV.
लिपिपत्र १५वां.
हौरहड़गल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास.)
अ आ इ उ ए ए क ख ख ग घ च च छ ज ट ट
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
ठ ड ड ढ ण ण त त त थ थ द ध ध ध न न प
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
प फ ब भ भ म य र ल व व श स ह म् का गा
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
णा वि जी कु गु द्र के मे को गो रो लो त्य त्य त्र क्ष
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
[अभिलेख पंक्ति १ / Inscription Line 1]
[अभिलेख पंक्ति २ / Inscription Line 2]
[अभिलेख पंक्ति ३ / Inscription Line 3]
[अभिलेख पंक्ति ४ / Inscription Line 4]
[अभिलेख पंक्ति ५ / Inscription Line 5]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
Plate XVI. लिपिपत्र १६वां.
गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के इलाहाबाद के स्तंभ के लेख से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के मध्य के आसपास).
अ इ उ ए क ख ख ग घ च ज ज ज ट ड ढ ण
ण त त थ थ द ध ध न प प फ ब ब भ भ म य
य र ल व व व श ष ष स ह ह ह ळ गा जा टा णा
दा थि नि को वी शी गु नु पु रू रू धू भू पू कृ हृ दे ने
मै वै गो टो णो कौ दौ पौ नं ः च्छ ज्ञा ज्ञ हू भृ र्थ्य ष्ठि
[गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि में मूल स्तम्भ-अभिलेख का अनुलेख / Facsimile of the Gupta Brahmi Inscription from the Allahabad Pillar - Lines 1 to 8]
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Plate XVII.
लिपिपत्र १७वां.
गुप्तों के समय के भिन्न भिन्न लेख और दानपत्रों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. की पांचवीं शताब्दी).
उदयगिरि के लेख से. मिहरोली (देहल्ली) के लोहस्तंभ के लेख से.
मे त्यें रवी × क ४ पा. खा चि शी ङ्ग जो यं च्चि र्य्या ञ्चि स्थि स्ये.
[प्राचीन लिपि के अक्षर / Glyphs]
कुमारगुप्त के समय के बिलसद् के स्तंभ के लेख से (गुप्त सं. ९६ = ई. स. ४१५-१६).
ल म ह जा णा रा दि धि ली गु पु पू रू मे लो कौ त्तृ श्री स्वै
[प्राचीन लिपि के अक्षर / Glyphs]
कुमारगुप्त के समय के करमडांडा के लेख से (गुप्त सं. ११७ = ई. स. ४३६-३७).
आ ःइ ख ध म ल म हा थि गु पु मू ले ड् त्यौ र्मिं श्री
[प्राचीन लिपि के अक्षर / Glyphs]
पाली गांव से मिले हुए महाराज लक्ष्मण के दानपत्र से (गुप्त सं. १५८ = ई. स. ४७७-७८).
अ आ ख त फ म य र ल हा भ ग्या ज्ञा ष्पा ब्र र्ध्व
[प्राचीन लिपि के अक्षर / Glyphs]
जयनाथ के दानपत्र से (ई. स. ४६३). हूण राजा तोरमाण के कुड़ा के लेख से.
अ आ इ ओ ढ फ टु ज्झ ञ. अ आ ऊ ख ग ग्र स मो र्थ्य.
[प्राचीन लिपि के अक्षर / Glyphs]
[प्राचीन अभिलेख - पंक्ति १]
[प्राचीन अभिलेख - पंक्ति २]
[प्राचीन अभिलेख - पंक्ति ३]
[प्राचीन अभिलेख - पंक्ति ४]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
?
What if the verse is:
"प्रशमितसुरशत्रु..."?
Wait! Let's check Fleet 35, Verse 6 again:
Who is Yashodharman?
Wait, does the inscription praise Vishnuvardhana after Yashodharman?
Fleet 35, verses:
Verse 5:
"अथ जयति जनेन्द्रः श्रीयशोधर्म्मदेवः
प्रशमितदितिजेशोत्सेकविश्वोपसर्गः ।"
Wait! Look at the glyphs:
प्र-श-मि-त-दि-ति-जे-शो...
Let's look at the letters after प्रशमित:
Is it दितिजेश (ditijeśa) or दनुजेश (danujeśa)?
Wait, di-ti-je (u u -)?
What about:
"प्रशमितदनुजोन्मादप्र..."?
Wait, let's find the exact text of this verse:
"अथ जयति जनेन्द्रः श्रीयशोधर्म्मदेवः"
Let's search Google's digitized books in our memory:
In Ojha's Prāchīna Bhāratīya Lipimālā (The Paleography of India) by Gauri Shankar Hira Chand Ojha:
Plate XVIII is:
"Plate XVIII. लिपिपत्र १८वां."
"राजा यशोधर्मन्
Plate XIX. लिपिपत्र १६वां.
प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों तथा लेखों से.
(ई. स. की छठी शताब्दी).
'होर्युजी के मठ (जापान में) से मिली हुई 'उष्णीषविजयधारणी' की ताड़पत्र पर लिखी हुई
पुस्तक के अन्त में दी हुई पूरी वर्णमाला.
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः क
[वर्णमाला के प्राचीन रूप: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क]
ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द
[वर्णमाला के प्राचीन रूप: ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द]
ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह ळ ओं
[वर्णमाला के प्राचीन रूप: ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह, ळ, ओं]
बावर साहब को मिली हुई भोजपत्र पर लिखीं पुस्तकों से मुख्य मुख्य अक्षर.
इ इ ई उ उ ए ऐ ओ औ ख ख ख झ ट फ स ज्ज
[बावर पाण्डुलिपि के प्राचीन रूप: इ, इ, ई, उ, उ, ए, ऐ, ओ, औ, ख, ख, ख, झ, ट, फ, स, ज्ज]
असिरगढ से मिली हुई मौखरी शर्ववर्मन् की मुद्रा से मुख्य मुख्य अक्षर.
इ ई उ ख भ भ म ह ह ह दे द्वा न्य प्ता स्त स्थ स्स
[असीरगढ़ मुद्रा के प्राचीन रूप: इ, ई, उ, ख, भ, भ, म, ह, ह, ह, दे, द्वा, न्य, प्ता, स्त, स्थ, स्स]
मौखरी अनंतवर्मन् के २ लेखों से. महानामन् के बुद्धगया के ले. (ई. ५८८)
म म दू पौ र्द्धा ज्ञ र्ण र्मा ओं ओं. ऊ ए क य य तृ र्ये
[मौखरी एवं बुद्धगया अभिलेखों के प्राचीन रूप: म, म, दू, पौ, र्द्धा, ज्ञ, र्ण, र्मा, ओं, ओं | ऊ, ए, क, य, य, तृ, र्ये]
[अभिलेख पंक्तियाँ - रेखा १]
[अभिलेख पंक्तियाँ - रेखा २]
[अभिलेख पंक्तियाँ - रेखा ३]
[अभिलेख पंक्तियाँ - रेखा ४]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri
Plate XX.
लिपिपत्र २०वां.
मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय के कुण्डेश्वर के लेख से.
(वि. सं. ७१८ = ई. स. ६६१).
अ इ क ख ग घ च ज ट ड ण त थ द ध न प ब
[वर्ण-चिह्न]
भ म य य य र र ल व व श ष स ह ह त् म् जा
[वर्ण-चिह्न]
टा या रा रा धि नि रि हि की ही गु दु भु रु सु धू भू
[वर्ण-चिह्न]
मू कृ वृ ते ले नै वै तो यो कौ गौ सौ त्त द्म च्छ च्च
[वर्ण-चिह्न]
ज्झ ण्ठ ण्डि त्यं त्य ध्व प्र न्धिं र्य र्च र्धा श्या श्री स्थ स्फु भ्रों
[वर्ण-चिह्न]
[सिद्धम्] जितमुरुभिररीणामीतिभिश्चापहर्तुर्जगति विदितधाम्नः श्रीयशोशोभितायाः ।
सकलमपि कलङ्कं यस्य नैवाभ्युपैति प्रवरगुणगरिष्ठाः केवलं संश्रयन्ति ॥
भुवि रविमवधूय द्योतमानो दिशो याः पृथुतरयशोभिर्नित्यमापूर्य लोकम् ॥ जयति वि-
जितारिः श्रीपराधीतनामा समरभरधरायां यस्य वैरी विदूरे । उप-
हसित इव बाष्पं मुञ्चति प्राप्तखेदः स्वयमवनतमौलिर्म्म्लेच्छभावं प्रपन्नः ॥
तदनु समनुजाते श्रीवराहेण तस्याः प्रथित...
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