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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

३७० फलदीपिका
सम्बन्ध हुआ। “लाभे सर्वे प्रशस्ताः” इस सिद्धान्त के अनुसार सूर्य शनि
की लाभस्थान में उत्तम स्थिति हुई।
६. यदि वृष लग्न हो और बुध, बृहस्पति किसी भी स्थान में
एक साथ बैठें या एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखें तो धन योग होता
है। मन्त्रेश्वर महाराज ने अष्टमेश का किसी भी भाव के स्वामी से
सम्बन्ध होने से अनिष्ट योग माना है। जातकादेश मार्ग अध्याय १०
श्लोक ३४ में भी यह कहा गया है कि अष्टमेश की दृष्टि या किसी
भावेश की अष्टम स्थान स्थिति उस ग्रह को बिगाड़ती है। यह स्वा-
भाविक शंका होती है कि बृहस्पति आठवें और ग्यारहवें का मालिक होने
से बुध को देख कर या उसके साथ बैठकर धन योग कैसे उत्पन्न करेगा ?
इसका उत्तर यही है कि बृहस्पति लाभेश है और बुध द्वितीयेश है
इस कारण इन दोनों का सम्बन्ध धन योग कारक हुआ। भिन्न-भिन्न
भावों में इन दोनों के बैठने से समान फल नहीं होगा। जितना
उत्तम फल बुध के कन्या में होने से (दूसरे, पाँचवें का मालिक
उच्च राशि में ५वें बैठा हो) और बृहस्पति ११वें घर में मीन राशि का
बलवान् हो तो ऐसे बुध और गुरु की परस्पर पूर्ण दृष्टि से जो धन
योग हो सकता है अथवा बुध दूसरे घर का मालिक होकर दूसरे में
बैठे और बृहस्पति ८वें का मालिक होकर आठवें में बैठे तो जो शुभ
फल करेगा, वह—वे दोनों एक-साथ १२वें घर में बैठे हों तो कैसे कर
सकते हैं ? इसलिए इस योग में इसका भी तारतम्य कर लेना चाहिए
कि दोनों किस राशि में या किन-किन राशियों में बैठे हैं।
७. ऊपर नं० ६ में जो धन योग बताया गया है वह—यदि मंगल,
बुध, बृहस्पति से सम्बन्ध करता हो तो नष्ट हो जाता है। अर्थात् बुध
या बृहस्पति को या दोनों को मंगल चतुर्थ, सप्तम या अष्टम दृष्टि से
देखे या बुध, बृहस्पति के साथ मंगल बैठा हो तो धन योग नहीं होता।
यहाँ कारण यह है कि मंगल १२वें घर का स्वामी है। १२वें घर से
व्यय या धन के खर्च का विचार होता है। इस कारण व्यय भाव का

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७१
स्वामी धनेश (दूसरे के स्वामी) या लाभेश (ग्यारहवें के स्वामी) के
साथ बैठ कर या उनमें से एक या दोनों को देखकर धन एकत्रित होने
के योग को नष्ट कर देता है।
८-९. यदि वृष लग्न हो और मंगल, बुध, बृहस्पति, साथ हों तो
बुध की महादशा में जातक को कर्जा (ऋण) होगा।
उपर्युक्त स्थिति में मंगल की महादशा धन देने वाली होगी ।
बुध यदि केन्द्र में हो तो बुध की दशा में अच्छा योग हो अर्थात् धन
लाभ का योग उत्तम रहे। बृहस्पति की दशा का मिश्र अर्थात्
मिला-जुला फल है कभी धन लाभ कभी धन हानि। यहाँ पर मंगल
की दशा को क्यों अच्छा बताया ? मंगल तो सातवें और बारहवें का
मालिक है ऐसी हालत में, --सप्तम का मालिक होने से मंगल को
अच्छा कहा क्योंकि पराशर के मत से यदि केन्द्र का मालिक पाप
ग्रह हो तो शुभ फल करता है। यहाँ भी यह विचार कर लेना
चाहिए कि मंगल बैठा कहाँ है ? उदाहरण के लिए यदि अपनी उच्च
राशि मकर में मंगल नवम में बैठा हो तो जितना अच्छा फल करेगा
उतना अच्छा फल नीच राशि का नहीं करेगा। अथवा अपनी राशि
का होकर भी यदि १२वें घर में बैठा हो तो वैसा शुभफल नहीं कर
सकता। यदि अष्टम में बैठा होगा तो चाहे पति की (लाइफ़ इन्शयोरन्स)
जीवन बीमा से रुपया दिला दे परन्तु पति के स्वास्थ्य के लिए अच्छा
नहीं होगा। यदि सातवें घर का मालिक होकर छठे में बैठे तो पति से
कलह करावेगा। इन सब बातों का विचार कर लेना चाहिए। यदि
पुरुष की कुण्डली में ७वें घर का मालिक होकर छठे में बैठा हो तो
अपनी स्त्री से कलह हो।
१०. यदि बुध, शुक्र लग्न में हों और सातवें घर में बृहस्पति
हों तो बुध की महादशा प्रबल योग कारक होती है। यहाँ पर हेतु यह
है कि लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश का योग हो गया। शुक्र षष्ठेश भी है।

३७२ फलदीपिका
किन्तु एक ही ग्रह लग्नेश, षष्ठेश हो तो षष्ठेश होने का दोष नहीं
होता ।
११. यदि वृष लग्न में मंगल और शुक्र हों और नवम में मकर का
बृहस्पति हो तो बुध तथा बृहस्पति की दशा में भाग्य उदय होगा ।
१२. यदि मंगल, बुध, शनि नवम में हों और दशम में कुंभ
का राहु हो तो मंगल तथा राहु की दशा में गंगा स्नान हो ।
१३. वृष लग्न वाले को शुक्र दशा अच्छी जाती है यह सामान्य
नियम है । कारण यह है कि शुक्र पहले और छठे घर का मालिक
हुआ । लग्न का स्वामी होने से छठे के स्वामी होने का दोष नहीं
होता । पराशर ने भी लिखा है कि मेष लग्न वाले जातक को
मंगल अष्टम स्थान का स्वामी होने पर भी शुभ फल करता है और
वृष लग्न वाले जातक को शुक्र छठे स्थान का स्वामी होने पर भी
शुभ फल करता है । शुक्र की दशा में धनागम होता है । भाग्योदय
कारक है ।
१४. यदि वृष लग्न में चन्द्रमा हो तो जातक को विशेष धन
योग नहीं होता । यदि किसी और लग्न में चन्द्रमा प्रथम भाव
से हो तो चन्द्रमा भाग्य उदय करता है ।
मिथुन लग्न
१. यदि मिथुन लग्न हो और सूर्य, बुध सिंह राशि में तीसरे
घर में बैठे हों तो बुध योग फल देने वाला होता है और उसकी
दशा अच्छी जाती है । होरासार अध्याय २३ श्लोक ३ के मतानुसार
सूर्य, बुध का योग उत्तम होता है । इस सम्बन्ध में देखिये इस पुस्तक का
अध्याय १६ श्लोक ७ जहाँ लग्नेश और तृतीयेश का सम्बन्ध अच्छा
बताया गया है ।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७३
२. मिथुन लग्न वाले जातक की कुण्डली में चन्द्र, मंगल और
शुक्र दूसरे घर में बैठे हों तो शुक्र की दशा में धन प्राप्त होता है।
३. यदि मिथुन लग्न हो, कर्क में दूसरे स्थान में मंगल हो और
चन्द्रमा और शनि मकर राशि में अष्टम में हों तो शनि की दशा
में मिश्रफल (मिला जुला) फल होता है अर्थात् इष्टफल भी और
अनिष्ट फल भी। मंगल की दशा में धनागम होता है यह निस्संशय
कहा जा सकता है।
४. मिथुन लग्न हो, मंगल और शनि दूसरे हों, चन्द्रमा अष्टम
में हो तो शनि और मंगल की दशा में धन नाश होता है, जायदाद
नष्ट होती है। किन्तु थोड़ा साधन रह जाता है।
५. मिथुन लग्न वाले जातक को, यद्यपि दूसरे घर का मालिक,
होने के कारण चन्द्रमा मारक होना चाहिये किन्तु मारक नहीं
होता।
६. मिथुन लग्न हो, चन्द्रमा और मंगल लाभ में हों अर्थात्
ग्यारहवें भाव में बैठे हों अथवा नवमेश शनि कुम्भ का नवम में
बैठा हो तो विशेष धन योग होता है।
७. मिथुन लग्न हो, गुरु और शनि नवम स्थान में हों तो
उनकी दशा और अन्तर्दशा में गंगा स्नान हो। गुरु तो धर्मकारक
ग्रह है, इस कारण उसकी दशा और अन्तर्दशा में धार्मिक कार्य होना,
गंगास्नान आदि स्वाभाविक ही है। किन्तु शनि भी ऐसा करता है।
इसका सिद्धान्त यह है कि मिथुन लग्न की कुण्डली में नवें घर
में कुम्भ राशि पड़ेगी और शनि नवम होने से कुम्भ राशि का होगा
अर्थात् स्वगृही। ज्योतिष का सिद्धांत है कि यदि पाप ग्रह किसी स्थान
पर बैठे तो उस स्थान को बिगाड़ता है लेकिन पापी ग्रह यदि अपनी
राशि में बैठे तो उसे—अपने उस भाव को—बिगाड़ता नहीं है बल्कि
उस भाव की वृद्धि करता है।

३७४ फलदीपिका
“पापोऽपि स्वगृहस्थश्चेद् भाववृद्धिं करोत्यलम्' इसी सिद्धान्त के
अनुसार नवम यद्यपि पापी शनि हुआ किन्तु कुम्भ अपना घर होने के
कारण उसे बिगाड़ता नहीं है बल्कि बढ़ाता है। नवम धर्म-स्थान है इस
कारण शनि का गंगा स्नान आदि शुभ धार्मिक फल कहा गया है।
८. यदि मेष का बुध ग्यारहवें हो तो बड़े भाई से विरोध
कराता है।
कर्क लग्न विचार
१. कर्क लग्न वाली कुण्डली में गुरु कोई विशेष योग देने वाला
नहीं होता।
२. कर्क लग्न वाले को मंगल योग कारक होता है। यदि मंगल
मेष राशि का दशम अथवा वृश्चिक राशि का पंचम में बैठा हो तो
निश्चय ही बहुत योग देने वाला होता है अर्थात् विशेष उन्नति कराने
वाला योग है।
३. यदि शुक्र दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो तो योग देने
वाला होता है; और स्थानों में शुक्र योगप्रद नहीं होता।
४. यदि चन्द्र, मंगल और बृहस्पति द्वितीय स्थान में हों और
सूर्य, शुक्र पंचम स्थान में हो तो जातक धनवान् और भाग्यवान् हो।
५. यदि शुक्र और बुध पंचम में हों तो बुध की दशा योग
देने वाली होती है। पिछले पृष्ठों में जहाँ भावार्थ रत्नाकर के योग
दिये हैं और जहाँ योग देने वाला लिखा है—इसका अर्थ समझना
चाहिए कि यह शुभ योग है अर्थात् पदोन्नति, सम्मान-वृद्धि, धनागम
सफलता आदि फल होते हैं।
६. कर्क लग्न हो, चन्द्र, बुध, शुक्र ग्यारहवें हों, लग्न में बृहस्पति,
दशम में सूर्य हों तो ये बहुत उत्तम योग होता है। जातक साहसी
गुणवान् यशस्वी राजा होते हैं।

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७५
७. यदि सूर्य और मंगल दशम में हों तो जातक धनी होता
है किन्तु बृहस्पति की दशा मारक होती है ।
८. यदि बुध और शुक्र १२वें भाव में हों तो शुक्र दशा में
राजयोग होता है ।
९. यदि चन्द्रमा और बृहस्पति लग्न में हों तो जातक भाग्यवान्
और प्रसिद्ध हो; यह विशेष राज योग है ।
१०. यदि कर्क राशि का चन्द्रमा लग्न में हो और सप्तम में
मकर का मंगल हो तो राज योग होता है ।
११. कर्क का चन्द्रमा लग्न में और चतुर्थ में तुला राशि का
शनि हो तो राज योग है ।
१२. कर्क लग्न हो, लग्न में चन्द्रमा और दशम में मेष का
सूर्य हो तो राज योगकारक है ।
१३. यदि बुध और वृहस्पति ग्यारहवें हों, शनि राहु, पंचम में हों
तो राहु की महादशा में गंगा स्नान आदि शुभ फल होते हैं ।
सिंह लग्न
अब नीचे सिंह लग्न वाली जन्म कुंडलियों के योग दिये जाते हैं ।
१. यदि सिंह लग्न हो और सूर्य, मंगल और बुध एक साथ बैठे हों
तो जातक बहुत धनी होता है ।
यहाँ लग्नेश, द्वितीयेश, लग्नेश लाभेश को युति से धनयोग हुआ
और सिंह लग्न वाले जातक को मंगल केन्द्र और त्रिकोण का मालिक
होने के कारण योग कारक हुआ । इस कारण सूर्य, मंगल, बुध के योग को
*कर्क लग्न के जितने योग दिये हैं—उनमें प्रत्येक जगह यह
नहीं लिखा है कि यदि कर्क लग्न हो—परन्तु कर्क लग्न सम्बन्धी यह
योग हैं ऐसा समझना चाहिये ।

३७६ फलदीपिका
बहुत धन कारक योग कहा है। सूर्य, मंगल का योग लग्नेश, चतुर्थेश,
भाग्येश का योग हुआ।
२. यदि सूर्य, बुध, वृहस्पति साथ हों तो भी बहुत धन कारक
होता है। सूर्य, बुध का योग तो धन कारक योग हुआ ही (जिसका हेतु
ऊपर बताया जा चुका है) वृहस्पति पंचमेश होने से लग्नेश, द्वितीयेश,
पंचमेश, लाभेश का योग हो गया। यह योग धन कारक होना ही
चाहिए।
३. यदि केवल सूर्य-बुध एक साथ हों तो स्वल्प (थोड़ा) भाग्य
करते हैं।
४. यदि वृहस्पति और शुक्र एक साथ हों तो योग उत्पन्न नहीं
करते बल्कि योग भंग करते हैं ऐसा ज्योतिषियों का मत है।
५. यदि सिंह लग्न हो और तुला का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो
शुक्र शुभ होता है किन्तु यदि शुक्र दशम में हो तो ऐसा शुक्र पापी होगा
और जातक को योग प्राप्त नहीं होता। ऐसा भावार्थ रत्नाकर ग्रंथकार
ने क्यों लिखा यह समझ में नहीं आता क्योंकि अपने घर में बैठा
हुआ ग्रह तो घर को बिगाड़ता नहीं। यह अवश्य है कि केन्द्र का स्वामी
शुभ ग्रह शुभ फल नहीं करता और केन्द्र का स्वामी क्रूर ग्रह शुभ फल
करता है परन्तु चाहे शुभ, चाहे क्रूर ग्रह केन्द्र में यदि अपनी राशि का
बैठा हो तो उसे अपने भाव की वृद्धि ही करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त
अपने घर का शुक्र दशम में मालव्य योग उत्पन्न करेगा जो बहुत उत्तम
योग है। इस कारण भावार्था रत्नाकर के इस मत से हम पूर्ण सहमत
नहीं हैं। हमारे विचार में ऐसी स्थिति में शुक्र के बल, सम्बन्ध, और
उस पर अन्य ग्रहों की दृष्टि आदि का विचार कर लेना चाहिये।
६. यदि सिंह लग्न हो तो केवल नवमेश और दशमेश अर्थात् मंगल
और शुक्र के सम्बन्ध से कोई योग नहीं होता।
७. यदि सिंह लग्न हो, सूर्य, मंगल और बुध लग्न में हों तो बुध
की दशा के समय धन और भाग्य की वृद्धि होती है।

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३७७
८. सिंह लग्न हो और कर्क के मंगल और शनि बैठे हों तो शनि
की दशा में योग होता है ।
कन्या लग्न
अब कन्या लग्न के जातकों के योग बताये जाते हैं :—
१. यदि कन्या लग्न हो और सूर्य का शुक्र या चन्द्रमा से सम्बन्ध
हो तो सूर्य की दशा में धन प्राप्ति होती है ।
२. यदि सूर्य शुक्र का सम्बन्ध हो तो शुक्र की दशा में जातक
धनहीन हो जाय । सम्भवतः शुक्र धनेश होकर अस्त हो जाने से या
धनेश व्ययेश के सम्बन्ध हो जाने से यह कहा है ।
३. यदि सूर्य, चन्द्र का सम्बन्ध हो तो चन्द्रमा की दशा मिश्र फल
देने वाली होती है अर्थात् मिला-जुला फल; कभी अच्छा, कभी खराब,
कुछ अच्छा, कुछ खराब ।
४. यदि चन्द्रमा और शुक्र सप्तम में हों, बृहस्पति ११वें हो,
सूर्य मेष का हो तो बृहस्पति और शुक्र की दशा में ४ या ५ जीवित
पत्नियां हों । ऐसा व्यक्ति राजा के तुल्य ऐश्वर्य-युक्त और भोगी
होता है । प्राचीन समय में जब अनेक पत्नियां होना सुख और भोग
का लक्षण माना गया था यह योग लिखा गया था परन्तु अब जिन
देशों या जातियों में कानून द्वारा बहु-विवाह प्रथा बन्द हो गई है
यह योग घटित नहीं होगा । परन्तु सप्तम में शुक्र और चन्द्रमा के
मीन राशि में होने से (शुक्र मीन में उच्च का होता है) और
सप्तमेश बृहस्पति के कर्क (लाभ स्थान) में—अपनी उच्च राशि
में बैठ कर सप्तम को पूर्ण दृष्टि से देखने के कारण ऐसी कुण्डली
वाले पुरुष को बहुत सौन्दर्ययुक्त शुभ लक्षणा पत्नी प्राप्त होगी
और वह उच्च कुल की भी होगी (क्योंकि सप्तमेश उच्च राशि का
हुआ) और उसको विवाह के द्वारा एवं विवाह के बाद अच्छा लाभ

३७८ फलदीपिका
होगा। क्योंकि सातवें का स्वामी लाभ में बैठा और लाभ का स्वामी
सातवें में बैठा। इस प्रकार एक दूसरे की राशि में बैठने से सातवें
और ग्यारहवें के मालिक का परस्पर स्थान परिवर्तन हुआ ।
५. कन्या लग्न हो और बृहस्पति और शुक्र चौथे हों तो
बृहस्पति और शुक्र की दशा में योग होता है।
६. यदि कन्या लग्न हो, लाभ में शनि हों तो शनि की दशा
योग (अर्थात् शुभ फल) देने वाली होती है।
तुला लग्न विचार
अब तुला लग्न के योग दिये जाते हैं :—
१. तुला लग्न वाले जातक को शनि योग कारक होता है।
२. तुला लग्न होने पर बृहस्पति तीसरे और छठे घर का मालिक
होने पर भी योग उत्पन्न करता है।
३. मंगल दूसरे, सातवें घर का मालिक हुआ, इसलिए मंगल पापी
हुआ परन्तु मारता नहीं है। हमारे विचार से अन्य योगों को देखने
पर ही यह कहा जा सकता है कि मंगल की दशा मारक होगी
अथवा नहीं।
४. तुला लग्न हो और बृहस्पति और शुक्र (१) एक साथ हों
(२) या एक-दूसरे को देखते हों या (३) मंगल और शनि से
दृष्ट हों अथवा (४) मंगल और शनि की राशियों में हों तो
गुरु की दशा में जब शुक्र की अन्तर्दशा होगी अथवा शुक्र की महादशा
में जब बृहस्पति की अन्तर्दशा होगी तो शीतला, व्रण, स्फोट आदि का
रोग होवेगा ।
५. तुला लग्न हो, सूर्य, बुध, शुक्र लग्न में हों तो जातक धनवान्
और भाग्यवान् होता है । साधारण तौर पर तुला का सूर्य बहुत निकृष्ट
फलदाता समझा जाता है । पृथुयशस् ने अपनी पुस्तक होरा सार

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७९
में लिखा है कि यदि तुला राशि के दशवें अंश में सूर्य हो तो सहस्त्र
राज योगों को नष्ट कर देता है। यहां भावार्थ रत्नाकर में यह बताया
है कि यदि शुक्र और बुध का योग सूर्य के साथ लग्न में हो तो
अच्छा योग है।
६. यदि तुला जन्म लग्न हो और बारहवें घर में सूर्य और बुध
हों और उन पर शनि की दृष्टि हो तो जातक का पिता भाग्यवान्
किन्तु मध्यायु होगा।
७. तुला लग्न हो और सूर्य, बुध तथा शनि का मंगल से सम्बन्ध
हो तो जातक बहुत भाग्यशाली हो।
८. तुला लग्न हो और सूय, बुध, शनि का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो
तो जातक भाग्यशाली है।
९. तुला लग्न हो बुध, शुक्र, शनि, लग्न में हों और चन्द्रमा और
मंगल सातवें घर में हों तो बुध की दशा में जातक धनवान् होता है।
१०. तुला लग्न वाली कुण्डली, में यदि बृहस्पति अष्टम, शनि
नवम, और मंगल तथा बुध लाभ स्थान में हों तो विशेष राज
योग है।
११. यदि चन्द्रमा लग्न में हो, बृहस्पति छठे या बारहवें हों तो
शनि की दशा में भाग्यवान् होता है।
१२. तुला लग्न हो, लग्न में शुक्र हो तो मारक होता है।
१३. यद्यपि मंगल दूसरे और सातवें का मालिक हुआ लेकिन
मारक नहीं होता।
ऊपर जो नं० ३ तथा ५ के योग बताये गये हैं उसमें नं० ५ के
योग पर हम अपने विचार उस प्रकरण में व्यक्त कर चुके हैं। जहाँ
तक लग्नेश शुक्र के मारक होने का प्रश्न है पाराशरी में लिखा हुआ
है लग्नाधीश भी मारक हो जाता है। साधारण तौर पर शुक्र को
अष्टमेश का दोष नहीं होना चाहिए क्योंकि वह लग्न का स्वामी
भी है परन्तु ज्योतिष के सर्व सिद्धान्त तर्कगम्य नहीं है।

३८० फलदीपिका
१४. यदि शनि लग्न में हो और दशम में चन्द्रमा हो तो राज योग
होता है।
१५. यदि मंगल, बुध, बृहस्पति और शनि तुला में और राहु
दशम में हों तो राहु की दशा में तीर्थ-स्नान आदि शुभ फल
होता है।*
वृश्चिक लग्न
अब वृश्चिक लग्न के कुछ योग दिये जाते हैं :—
१. वृश्चिक लग्न की कुण्डली में बुध और बृहस्पति का योग हो
तो विशेष धन कारक कहा गया है।
२. वृश्चिक लग्न हो, बृहस्पति तृतीय हो तो जातक विशेष
उदार होता है।
३. यदि सूर्य, बुध शुक्र सप्तम में हों तो बुध की महादशा में
राज योग होता है और जातक का बहुत यश विस्तार होता है।
४. यदि बृहस्पति और बुध पाचवें घर में हो (मीन राशि में)
और कन्या राशि का चन्द्रमा लाभ स्थान में हो तो मनुष्य बहुत
धनिक और भाग्यशाली होता है।
५. यदि कर्क राशि के चन्द्र, बृहस्पति केतु नवम में हों तो
केतु दशा साधारण होती है किन्तु बृहस्पति की दशा बहुत योग देने
वाली होती है।
*संस्कृत में 'घट' छपा है। इसका अर्थ हुआ कुंभ में मंगल, बुध,
बृहस्पति तथा शनि हों और राहु दशम में हो तो तीर्थ स्नानादि
शुभ फल होता है। अगर इसे 'घट' न मान कर 'धट' अर्थात् तुला
मानें तो ऊपर जो अर्थ दिया है वह ठीक है।

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३८१
धनु लग्न विचार
अब धनु लग्न जातक के कुछ योग दिये जाते हैं :-
१. धनु लग्न हो, पाँचवें घर में शनि हो तो शनि की दशा योग
देने वाली होती है अर्थात् अच्छा फल करती है ।
२. धनु लग्न हो, तुला का शनि लाभ स्थान में हो तो शनि
योग देने वाला होता है, अन्य किसी भी लग्न की कुण्डली में
शनि ११वें योग कारक नहीं होता । हम इस विचार से सहमत
नहीं हैं क्योंकि सारावली अध्याय ६ श्लोक ४ के अनुसार कुछ का
मत है कि एकादश स्थान में बैठे हुये सभी ग्रह शुभ कारक होते हैं
और धन लाभ कराते हैं। कहा भी है 'लाभे सर्वे प्रशस्ताः' अर्थात् लाभ
स्थान में चाहे शुभ ग्रह हो चाहे क्रूर ग्रह हों सभी प्रशस्त हैं अर्थात्
उनको अच्छे बैठे हुये समझना चाहिये । ऐसी स्थिति में भावार्थ
रत्नाकरकार का यह कहना कि केवल तुला राशि का शनि एका-
दश में योग फल देने वाला होता है अन्य राशियों का नहीं थोड़ा
सा प्रचलित विचार के विरुद्ध है ।
३. धनु लग्न हो और सूर्य और शुक्र नवम सिंह के, शनि
कुम्भ राशि का तृतीय हो तो शनि की दशा में धनागम हो और
भाग्य योग हो ।
४. धनु लग्न में हो, मंगल और सूर्य कुम्भ के तृतीय में हो,
राहु नवम स्थान हो तो राहु की दशा में तीर्थ स्नान हो ।
मकर लग्न विचार
अब मकर लग्न वाली कुण्डलियों का विचार देते हैं :-
१. यदि मकर लग्न हो तो बुध योगप्रद होता है, अर्थात् बुध
की दशा, अन्तर्दशा अच्छा फल करेगी ।

३८२ फलदीपिका
२. मकर लग्न हो, लग्न में बृहस्पति हो और उस बृहस्पति
पर शुक्र की दृष्टि हो और बुध आठवें घर में हो तो जातक दीर्घायु
किन्तु निर्धन होता है ।
३. मकर लग्न हो, वृष का शुक्र पंचम हो तो योगप्रद होता
है किन्तु यदि दशम में शुक्र हो तो योगप्रद नहीं होता ।
४. यदि चन्द्रमा पंचम में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि
हो और बुध, शुक्र लग्न में हों तो यह बहुत प्रबल राज योग है ।
५. बृहस्पति लग्न में हों और मंगल, शुक्र लाभ स्थान में हों
तो बृहस्पति की दशा में भाइयों के द्वारा या भाइयों का धन
प्राप्त हो ।
६. यदि मकर लग्न हो और लग्न में सूर्य, चन्द्र और बुध हों तथा
बारहवें घर में मंगल और शुक्र हों तो भाइयों के कारण भी भाग्य
उदय हो और स्वयं अपने पुरुषार्थ से भी धन उपार्जन करे अथवा
स्वयं जातक का और उसके भाइयों का भाग्योदय हो ।
७. यदि बुध और शनि भाग्य स्थान में हों तो जातक भाग्यवान्
होता है ।
८. यदि राहु और बृहस्पति बारहवें स्थान में हों तो यह उत्तम
योग है । राहु की दशा में भाग्योदय होता है
९. यदि लग्न में मकर का मंगल हो, सातवें घर में कर्क का
चन्द्रमा हो तो उत्तम योग होता है । यह राज योग हैं ।
कुम्भ लग्न विचार
अब कुंभ लग्न की कुंडलियों का विचार दिया जाता है :--
१. यदि कुंभ लग्न हो तो केवल नवमेश, दशमेश अर्थात् मंगल
और शुक्र के सम्बन्ध से कोई योग नहीं होता । अर्थात् केवल मंगल-
शुक्र सम्बन्ध राजयोग कारक नहीं है ।

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३८३
२. यदि शुक्र बारहवें घर में हो तो योग देने वाला नहीं
होता ।
३. यदि लग्न में सूर्य और शुक्र हों और दशम में राहु हो, तो
राहु और बृहस्पति की दशा में योग होता है।
४. यदि सूर्य और मंगल अष्टम में हों तो उनकी दशा में दुःख
होगा । बुध की दशा योग देने वाली होती है ।
५-६. यदि वृहस्पति लग्न में हो और शनि दूसरे घर में हो तो
बृहस्पति की दशा में मिश्र फल होगा यानी मिला-जुला फल होगा
यानी कभी अच्छा कभी ख़राब; कुछ अच्छा; कुछ ख़राब । शनि की
दशा योग देने वाली होगी।
७. यदि शनि और शुक्र धनु राशि के लाभ स्थान में हों तो
शुक्र की दशा योग देने वाली होगी ।
८. यदि सूर्य, बुध और बृहस्पति तृतीय में हो तो सूर्य की दशा
शुभ-राज योग कारक होती है ।
मीन लग्न विचार
अब मीन लग्न वाले जातकों का विचार दिया जाता है :--
१. यदि जन्म लग्न मीन या कुंभ हो और शुक्र १२वें घर में हो
तो शुक्र योग देने वाला नहीं होता । यदि कोई अन्य लग्न जन्म कुण्डली
में हो तो बारहवें घर में शुक्र अच्छा फल करता है ।
२. (क)* बारहवें घर में शनि हो तो योग देने वाला होता
है । यदि चन्द्रमा बारहवें घर में हो तो जातक धनहीन होता है ।
नोट-*यहाँ पर यह अर्थ समझना चाहिये कि मीन लग्न वाली कुण्डली
में शनि बारहवें घर में योग देने वाला होता है। बहुत सी जगह यह
पुनरावृत्ति नहीं की गई है । कि "यदि अमुक लग्न हो" किन्तु यह
देखना चाहिये कि किस लग्न के अन्तर्गत यह योग दिया गया है । उसी
लग्न में ऊपर लिखे हुये योग घटाने चाहियें । सब लग्नों में नहीं ।

३८४ फलदीपिका
(ख) ऊपर (क) में जो योग बताया है उसी के सम्बन्ध में
कहते हैं कि बृहस्पति की दशा में जब चन्द्रमा की अन्तर्दशा हो तो
ह्रस्व (थोड़ा) फल होता है ।
३. यदि पाँचवें घर में बृहस्पति हो तो कन्यायें बहुत होती हैं,
पुत्र थोड़े ।
४. यदि दूसरे घर में चन्द्रमा, पाँचवें घर में मंगल हो तो चन्द्रमा
की दशा में धनागम होता है ।
५. यदि बृहस्पति छठे हो, आठवें शुक्र हो, नवम में शनि हो और
लाभ स्थान में चन्द्र, मंगल हो तो उत्कृष्ट भाग्यवान् होता है ।
६. यदि चन्द्रमा मंगल और बुध मकर राशि के लाभ में हों तो
धन प्राप्ति, जायदाद और वाहन (सवारी) का उत्तम योग हैं ।
७. यदि चन्द्रमा और शनि लग्न में हों, मंगल ग्यारहवें हो, छठे
शुक्र हो तो शुक्र दशा में भाग्य उदय होता है ।
८. यदि चन्द्रमा, मंगल व बुध और बृहस्पति चतुर्थ स्थान में
हों तो इन ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में बहुत यश प्राप्त करता है, और
भाग्य उदय होता है किन्तु यदि तृतीयेश और अष्टमेश इन चारों ग्रहों
के साथ बैठ जावे तो यह योग भंग हो जाता है ।
९. यदि धनु राशि का बृहस्पति दशम में हो तो निश्चय योग
देने वाला होता है ।
१०. यदि चन्द्रमा वृषभ में, सूर्य सिंह में, बुध कन्या में, शुक्र तुला
में, बृहस्पति धनु में, मंगल मकर में और कुम्भ में शनि हो तो बहुत भाग्य
उदय होता है । ऊपर जो सात ग्रहों की स्थिति बताई गई उनमें सब
ग्रहों की स्थिति जैसी कही गई है वैसी न हो और ५ ग्रहों की
स्थिति भी उपर्युक्त प्रकार की हो तो भी जातक बहुत भाग्यवान्
होता है ।
भावार्थ रत्नाकर (जो फलित ज्योतिष का प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ
है) से मेष लग्न के २२, वृष लग्न के जातकों के १४, मिथुन लग्न की

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३८५
कुण्डली के ८, कर्क लग्न के १३, सिंह लग्न के ८, कन्या लग्न वाली जन्म
कुण्डलियों के ६, तुला लग्न वाले जातकों के १५, वृश्चिक लग्न के
५, धनु लग्न वाली कुण्डलियों के ४, मकर लग्न के ९, कुम्भ लग्न वाले
जातकों के ८ और मीन लग्न के १०—इस प्रकार १२२ योग इस विचार
से दिये गये हैं कि पाठकों को फलदीपिका में दिये गये सिद्धान्तों के
अतिरिक्त इन नियमों को भी ध्यान में रखने से, फल निर्णय करने में
सहायता मिलेगी ।

बीसवाँ अध्याय
अन्तर्दशाफल
दशा और अन्तर्दशा का विशेष फल
इस अध्याय में जो भावेश के सबल होने के कारण शुभ फल या
अशुभ फल बताये गये हैं—वह महादशा तथा अन्तर्दशा—दोनों का
विचार करते समय लागू करने चाहिये।
भावेश्वरेण प्रबलेन येन यद्यत्फलं हीनबलेन येन ।
यदानुभोक्तव्यमनन्यसम्यक्संसूचयिष्यत्यथ संग्रहेण ॥१॥
जब किसी भाव का स्वामी प्रवल अर्थात् बलवान् होता है तब
क्या फल होता है और जब वह ही निर्बल अर्थात् बलहीन होता है
तब क्या फल होता है और इनका फल किस समय भोगा जावेगा यह
संक्षेप में बताते हैं ॥ १ ॥
लग्ने बलिष्ठे जगति प्रभुत्वं सुखस्थितिं देहबलं सुवर्चः ।
उपर्युपर्यभ्युदयाभिवृद्धिं प्राप्नोति बालेन्दुवदेष जातः ॥२॥
पाकेऽर्थनाथस्य कुटुम्बसिद्धिं
सत्पुत्रिकाप्तिं सुखभोजनं च
प्राप्नोति वाग्जीविकया धनानि
वक्ता सदुक्तिं सदसि प्रशस्ताम् ॥३॥

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३८७
शौर्ये सवीर्ये सहजानुकूल्यं
सन्तोषवार्ताश्रवणं च शौर्यम् ।
सेनापतित्वं लभतेऽभिमानं
जनाश्रयं सद्गुणभाजनत्वम् ॥४॥
बन्धूपकारं कृषिकर्मसिद्धि स्त्रीसङ्गमं वाहनलाभमेति ।
क्षेत्रं गृहं नूतनमर्थसिद्धि स्थानंप्रशस्तं च सुखेशदाये ॥५॥
पुत्रप्राप्तिं बन्धुविलासं नृपतीनां
साचिव्यं वा धीशदशायां बहुमानम् ।
प्राज्यैर्भोज्यैर्मृष्टमिहाश्नाति ददाति
श्रेयस्कार्यं सज्जनशस्तं स विदध्यात् ॥६॥
रिपून्निहन्ति साहसैररीश्वरस्य वत्सरे ।
अरोगतामुदारतामधृष्यतामतिश्रियम् ॥७॥
सम्पाद्य वस्त्राभरणानि शय्यां
प्रीतो रमण्या रमतेऽतिवीर्यः ।
करोति कल्याणमहोत्सवादीन्
सन्तोषयात्रां च मदेशदाये ॥८॥
ऋणविमोचनमुच्छ्रितिमात्मनः
कलहकृत्यनिवृत्तिमुपैति सः ।
महिषपश्वजभृत्यजनागमं
वयसि रन्ध्रपतेर्बलशालिनः ॥९॥
स्त्रीपुत्रपौत्रैः सहबन्धुवर्गै-
र्भाग्यंश्रियं चानुभवत्यजस्रम् ।

३८८ फलदीपिका
श्रेयांसि कार्याण्यवनीशपूजां
भाग्येशदाये द्विजदेवभक्तिम् ॥१०॥
यत्कार्यमारब्धमुपैत्यनेन
तस्यैव सिद्धिं सुखजीवनं च ।
कीर्ति प्रतिष्ठां कुशलप्रवृत्तिं
मानोन्नतिं कर्मपतेर्दशायाम् ॥११॥
ऐश्वर्यमव्याहतमिष्टबन्धु-
समागमं भृत्यजनांश्च दासान् ।
संसारसौभाग्यमहोदयं च
लभेत लाभाधिपतेर्दशायाम् ॥१२॥
व्ययेशितुर्वयस्यतिव्ययं करोति सज्जने ।
अघौघनाशिनीं शुभक्रियां महीशमान्यताम् ॥१३॥
(i) यदि लग्न बलवान् हो तो लग्नेश की दशा में जातक का
प्रभुत्व जगत् में बढ़ता है, वह सुख पूर्वक रहता है; शरीर बलवान्
रहता है (अर्थात् लग्नेश की दशा के समय रोग आदि नहीं होते)
और चेहरे पर कान्ति रहती है। चेहरे पर कान्ति होना यह प्रकट करता
है कि मन और शरीर दोनों प्रसन्न हैं। जिस प्रकार शुक्ल पक्ष की
द्वितीया का चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धि और अभ्युदय को प्राप्त होता है
उसी प्रकार बलवान् लग्नेश की दशा में जातक की निरन्तर उन्नति
होती रहती है ॥ २ ॥
(ii) यदि द्वितीयेश बलवान् हो तो क्या फल होता है यह बताते

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३८९
हैं। द्वितीयेश की दशा में कुटुम्ब वृद्धि हो; उत्तम बेटियाँ* प्राप्त हों ।
सुख पूर्वक भोजन मिले; वाणी या वाक् शक्ति के कारण धन उपार्जन करे ।
अर्थात् ऐसी आजीविका से धन प्राप्त हो जिसमें जातक की वाक्शक्ति
की प्रधानता हो और जातक जो उत्तम वाणी बोले उसकी सब लोग
सभा में प्रशंसा करें। संक्षेप में यह कि द्वितीय स्थान वाणी, धन
और कुटुम्ब का है अतः इन तीनों बात सम्बन्धी सफलता मिले ॥ ३ ॥
(iii) यदि तृतीय स्थान बलवान् हो तो तृतीयेश की दशा में
भाई-बहिनों से प्रेम रहता है खुश-खबरियाँ सुनने को मिलती हैं, परा-
क्रम की वृद्धि होती है, जातक किसी सेना या समुदाय का नेता होता है,
अन्य लोग उसे सहायता देते हैं । उसमें अनेक गुणों का विकास
होता है तथा जातक के मान सम्मान और अभिमान की वृद्धि होती,
है ॥ ४ ॥
(iv) यदि चतुर्थ स्थान और उसका स्वामी बलवान् हो तो चतुर्थेश
की दशा में जातक बन्धुओं का उपकार करतां है, खेती के काम में सफलता
होती है, स्त्री के साथ सुखपूर्वक सहवास होता है और सवारी का
लाभ भी होता है। खेत, मकान, धन, सिद्धि और प्रशस्त स्थान की
प्राप्ति होती है। अर्थात् उसकी पदवृद्धि हो या नवीन मकान अथवा
ज़मीन की प्राप्ति हो ॥ ५ ॥
(v) यदि पंचमेश बलवान् हो तो उसकी महादशा में पुत्र
की प्राप्ति हो, बन्धुओं के साथ हँसी-खुशी जीवन व्यतीत हो, राजाओं
*मूल श्लोक में शब्द आया है “सत्पुत्रिकाप्तिम्” किंतु द्वितीय
स्थान से पुत्री का विचार कहीं नहीं लिखा है । कुटुम्ब का विचार
होता है। संभवतः सत्पुत्रिकाप्तिम् की बजाय मूल में “सत्पत्रिकाप्तिं”
उत्तम शुभ चिट्ठियां प्राप्त हों यह पाठ होना चाहिये । आगे श्लोक
१५ में जहाँ द्वितीयेश का विचार किया गया है—“पत्रिका” का विचार
द्वितीय स्थान से किया गया है—पुत्रिका का नहीं ।