फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७९
में लिखा है कि यदि तुला राशि के दशवें अंश में सूर्य हो तो सहस्त्र
राज योगों को नष्ट कर देता है। यहां भावार्थ रत्नाकर में यह बताया
है कि यदि शुक्र और बुध का योग सूर्य के साथ लग्न में हो तो
अच्छा योग है।
६. यदि तुला जन्म लग्न हो और बारहवें घर में सूर्य और बुध
हों और उन पर शनि की दृष्टि हो तो जातक का पिता भाग्यवान्
किन्तु मध्यायु होगा।
७. तुला लग्न हो और सूर्य, बुध तथा शनि का मंगल से सम्बन्ध
हो तो जातक बहुत भाग्यशाली हो।
८. तुला लग्न हो और सूय, बुध, शनि का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो
तो जातक भाग्यशाली है।
९. तुला लग्न हो बुध, शुक्र, शनि, लग्न में हों और चन्द्रमा और
मंगल सातवें घर में हों तो बुध की दशा में जातक धनवान् होता है।
१०. तुला लग्न वाली कुण्डली, में यदि बृहस्पति अष्टम, शनि
नवम, और मंगल तथा बुध लाभ स्थान में हों तो विशेष राज
योग है।
११. यदि चन्द्रमा लग्न में हो, बृहस्पति छठे या बारहवें हों तो
शनि की दशा में भाग्यवान् होता है।
१२. तुला लग्न हो, लग्न में शुक्र हो तो मारक होता है।
१३. यद्यपि मंगल दूसरे और सातवें का मालिक हुआ लेकिन
मारक नहीं होता।
ऊपर जो नं० ३ तथा ५ के योग बताये गये हैं उसमें नं० ५ के
योग पर हम अपने विचार उस प्रकरण में व्यक्त कर चुके हैं। जहाँ
तक लग्नेश शुक्र के मारक होने का प्रश्न है पाराशरी में लिखा हुआ
है लग्नाधीश भी मारक हो जाता है। साधारण तौर पर शुक्र को
अष्टमेश का दोष नहीं होना चाहिए क्योंकि वह लग्न का स्वामी
भी है परन्तु ज्योतिष के सर्व सिद्धान्त तर्कगम्य नहीं है।