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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 684 में से

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पृष्ठ 383

३८२ फलदीपिका
२. मकर लग्न हो, लग्न में बृहस्पति हो और उस बृहस्पति
पर शुक्र की दृष्टि हो और बुध आठवें घर में हो तो जातक दीर्घायु
किन्तु निर्धन होता है ।
३. मकर लग्न हो, वृष का शुक्र पंचम हो तो योगप्रद होता
है किन्तु यदि दशम में शुक्र हो तो योगप्रद नहीं होता ।
४. यदि चन्द्रमा पंचम में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि
हो और बुध, शुक्र लग्न में हों तो यह बहुत प्रबल राज योग है ।
५. बृहस्पति लग्न में हों और मंगल, शुक्र लाभ स्थान में हों
तो बृहस्पति की दशा में भाइयों के द्वारा या भाइयों का धन
प्राप्त हो ।
६. यदि मकर लग्न हो और लग्न में सूर्य, चन्द्र और बुध हों तथा
बारहवें घर में मंगल और शुक्र हों तो भाइयों के कारण भी भाग्य
उदय हो और स्वयं अपने पुरुषार्थ से भी धन उपार्जन करे अथवा
स्वयं जातक का और उसके भाइयों का भाग्योदय हो ।
७. यदि बुध और शनि भाग्य स्थान में हों तो जातक भाग्यवान्
होता है ।
८. यदि राहु और बृहस्पति बारहवें स्थान में हों तो यह उत्तम
योग है । राहु की दशा में भाग्योदय होता है
९. यदि लग्न में मकर का मंगल हो, सातवें घर में कर्क का
चन्द्रमा हो तो उत्तम योग होता है । यह राज योग हैं ।
कुम्भ लग्न विचार
अब कुंभ लग्न की कुंडलियों का विचार दिया जाता है :--
१. यदि कुंभ लग्न हो तो केवल नवमेश, दशमेश अर्थात् मंगल
और शुक्र के सम्बन्ध से कोई योग नहीं होता । अर्थात् केवल मंगल-
शुक्र सम्बन्ध राजयोग कारक नहीं है ।