फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
३५० फलदीपिका
भारत में कई स्थलों में, विशेष कर केरल में, ३६० दिन का चांद्र वर्ष
लेते हैं किन्तु उपर्युक्त श्लोक के अनुसार जन्म के समय सूर्य जिस
राशि, अंश, कला, विकला पर था उसी राशि, अंश कला, विकला पर
जब लौट कर आवे तब एक वर्ष मानना और इसी वर्ष मान से महादशा
निकालना। इसी सौर वर्ष का बारहवाँ भाग मास और इस मास का
तीसवाँ भाग दिन समझना चाहिये ।
दशाफल
भानुः करोति कलहं क्षितिपालकोप-
माकस्मिकं स्वजनरोगपरिभ्रमं च ।
अन्योन्यवैरमतिदुःसहचित्तकोपं
गुप्त्यर्थधान्यसुतदारकृशानुपीड़ाम् ॥५॥
क्रौर्याध्वभूपैः कलहैर्धनार्त्तिं
वनाद्रिसंचारमतिप्रसिद्धिम् ।
करोति सुस्थो विजयं दिनेश-
स्तैक्ष्ण्यं सदोद्योगरतिं सुखं च ॥६॥
मनःप्रसादं प्रकरोति चन्द्रः
सर्वार्थसिद्धिं सुखभोजनं च ।
स्त्रीपुत्रभूषाम्बररत्नसिद्धिं
गोक्षेत्रलाभं द्विजपूजनं च ॥७॥
बलेन सर्वं शशिनस्तु वाच्यं
पूर्वे दशाहे फलमत्र मध्यम् ।
मध्ये दशाहे परिपूर्णवीर्यं
तृतीयभागेऽल्पफलं क्रमेण ॥८॥
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३५१
भौमस्य स्वदशाफलानि हुतभुग्भूपाहवाद्यैर्धनं
भैषज्यानृतवञ्चनैश्च विविधैः क्रौर्यैर्धनस्यागमः ।
पित्तासृग्ज्वरबाधितश्च सततं नीचाङ्गनासेवनं
विद्वेषः सुतदारबन्धुगुरुभिः कष्टोऽन्यभाग्ये रतः ॥९॥
सौम्यः करोति सुहृदागममात्मसौख्यं
विद्वत्प्रशंसितयशश्च गुरुप्रसादम् ।
प्रागल्भ्यमुक्तिविषयेऽपि परोपकारं
जायात्मजादिसुहृदां कुशलं महत्त्वम् ॥१०॥
धर्मक्रियाप्तिममरेन्द्रगुरुर्विधत्ते
संतानसिद्धिमवनीपतिपूजनं च ।
श्लाघ्यत्वमुन्नतजनेषु गजाश्वयान-
प्राप्तिं वधूसुतसुहृद्युतिमिष्टसिद्धिम् ॥११॥
क्रीडासुखोपकरणानि सुवाहनाप्तिं
गोरत्नभूषणनिधिप्रमदाप्रमोदम् ।
ज्ञानक्रियां सलिलयानमुपैति शौक्र्यां
कल्याणकर्मबहुमानमिलाधिनाथात् ॥१२॥
पाकेऽर्कजस्य निजदारसुतातिरोगान्-
वातोत्तरान्कृषिविनाशमसत्प्रलापम् ।
कुस्त्रीरतिं परिजनैर्वियुतिं प्रवास-
माकस्मिकं स्वजनभूमिसुखार्थनाशम् ॥१३॥
कुर्यादहिः क्षितिपचोरविषाग्निशस्त्र-
भीतिं सुतार्तिमतिविभ्रमबन्धुनाशम् ।
३५२ फलदीपिका
नीचावमाननमतिक्रमतोऽपवादं
स्थानच्युतिं पदहृतिं कृतकार्यहानिम् ॥१४॥
विधुंतुदे शुभान्विते प्रशस्तभावसंयुते
दशा शुभप्रदा तदा महीपतुल्यभूतिदा ।
अभीष्टकार्यसिद्धयो गृहे सुखस्थितिर्भवे-
दचञ्चलार्थसंचयाः क्षितौ प्रसिद्धकीर्तयः ॥१५॥
पाथोनमीनालिगतस्य राहो-
र्दशाविपाके महितं च सौख्यम् ।
देशाधिपत्यं नरवाहनाप्ति-
र्दशावसाने सकलस्य नाशः ॥१६॥
केतोर्दशायामरिचोरभूपैः
पीडा च शस्त्रक्षतमुष्णरोगः ।
मिथ्यापवादः कुलदूषितत्वं
वह्नेर्भयं प्रोषणमात्मदेशात् ॥१७॥
(i) (क) इस श्लोक में सूर्य की दशा का फल बताते हैं ।
यहाँ सूर्य का खराब फल बताया गया है । इससे अनुमान होता है कि
सूर्य अनिष्ट स्थान का स्वामी हो, अनिष्ट स्थान में पड़ा हो तब
यह फल घटित होगा । सूर्य अपनी दशा में कलह कराता है । अकस्मात्
राजा का कोप होता है । कुटुम्ब में रोग हो और परिभ्रमण करावे ।
परस्पर—आपस में बैर हो, चित्त में दुःसह कोप, और गुप्त धन तथा
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३५३
अन्न को अग्नि से भय हो तथा पुत्र और स्त्री को भी कष्ट
हो । ॥ ५ ॥
(ख) यदि सूर्य उत्तम स्थान में हो तो क्रूरता से, सफ़र (यात्रा)
से, राजाओं द्वारा एवम् कलह से धन-प्राप्ति कराता है । मनुष्य
वनों में और पहाड़ों में घूमता है, अति प्रसिद्धि प्राप्त हो, जातक
सदैव उद्योगशील हो । उसके स्वभाव और कार्य में तीक्ष्णता हो और
विजय और सुख प्राप्त हो । ॥ ६ ॥
(ii) (क) चन्द्रमा की महादशा में मन प्रसन्न रहता है ।
सब प्रकार की कार्य सिद्धि, धन सिद्धि होती है । सुख पूर्वक भोजन
प्राप्त होता है । स्त्री, पुत्र आभूषण, वस्त्र, रत्न, गौ और कृषि
की भूमि का लाभ हो । जातक ब्राह्मणों का पूजन (सम्मान)
करे । ॥ ७ ॥
(ख) उपर्युक्त फल पूर्ण रूप से तब घटित होगा जब चन्द्रमा
पूर्ण बली हो । शुक्ल पक्ष की प्रतिपद् से दशमी तक—इन दस दिनों में
चन्द्रमा मध्यम बली होता है इस कारण चन्द्रमा के इन दस दिनों में
मध्यम फल होगा। बीच के दस दिन में अर्थात शुक्ल पक्ष की एका-
दशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा पूर्ण बली होता है। इस
कारण ऐसा चन्द्रमा पूर्ण शुभ फल देगा और अन्तिम दस दिन में—
कृष्ण पक्ष की षष्ठी से अमावस्या तक चन्द्रमा क्रमशः निर्बल होता
जाता है । इस कारण ऐसा चन्द्रमा थोड़ा शुभ फल देता
है । एक अन्य मत से ५ कला तक क्षीण बली, ६ से १० कला तक
मध्यम बली, १० से १५ कला तक पूर्ण बली । ॥ ८ ॥
(iii) (क) यदि मंगल की दशा हो तो अग्नि, राजा, युद्ध आदि
से धन प्राप्त होता है। जातक को झूठ बोलने से, धोखा देने से, औषधि
से तथा विविध प्रकार के क्रूर कर्मों से भी धन लाभ होता है ।
३५४ फलदीपिका
मंगल की महादशा के समय पित्त-प्रकोप, रक्त-प्रकोप, ज्वर, आदि
की पीड़ा होती है । वह नीच स्त्री का सेवन करेगा । अपने पुत्र,
स्त्री, बन्धु और गुरुओं से विद्वेष होगा और वह दूसरों के भाग्य में
लगा हुआ रहेगा। अर्थात् उसके उद्योग से अन्य लोगों का भाग्योदय
होगा । ॥ ९ ॥
(iv) जब बुध की महादशा होती है तब मित्रों से समागम
होता है । स्वयं को सुख प्राप्त होता है, विद्वान् लोग प्रशंसा करते
हैं । यश प्राप्त होता है और गुरुओं की कृपा होती है । मनुष्य की
वाणी में प्रगल्भता(अपने आशय को शक्तिपूर्ण शब्दों में व्यक्त करने
की क्षमता) होती है । बुध की महादशा में मनुष्य परोपकार करता
है और उसको स्वयं की स्त्री, पुत्र, मित्र सम्बन्धी हर्ष तथा महत्व
प्राप्त होता है । ॥ १० ॥
(v) बृहस्पति की दशा में मनुष्य धार्मिक कार्य करता है, उसे
संतान प्राप्ति या संतान संबंधी हर्ष प्राप्त होता है। राजा उस मनुष्य
की प्रतिष्ठा करे अर्थात् उसका सम्मान करे । अन्य विशिष्ट व्यक्ति
भी उसकी प्रशंसा करें; हाथी, घोड़े तथा सवारी की प्राप्ति हो ।
हृदय की आकांक्षाएँ पूर्ण हों । अपनी स्त्री, पुत्र, मित्रों से समागम और
सौहार्द हो ॥ ११ ॥
(vi) शुक्र की महादशा में जातक को क्रीड़ा और सुख के साधन,
उत्तम सवारी, गौ, रत्न, भूषण, निधि (द्रव्य) स्त्रियों से आनन्द,
ज्ञान क्रिया (जिन बातों से ज्ञान वृद्धि हो), जल यात्रा राजा या
सरकार से सम्मान प्राप्त हों । शुक्र की महादशा में घर में शुभ कार्य
होते हैं ।
(vii) शनि की महादशा में जातक की स्त्री या पुत्र को रोग
हो, स्वयं को भी वात आदि की पीड़ा हो, खेती नष्ट हो-दुष्ट वाणी
३. अध्याय १५-२१: भाव-विपाक, विविध महापुरुष योग, संन्यास योग एवं दशा-फल
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३५५
बोले ।* खराब स्त्री में आसक्ति हो—अपने परिवार के लोगों से
वियोग हो और अकस्मात् स्वजन (अपने इष्टजन) का, भूमि का, सुख का
तथा धन का नाश हो। हमारे ख़्याल से शनि की महादशा का यह फल
तभी घटित होगा जब शनि जन्मकुण्डली में बहुत बिगड़ा हो ॥ १३ ॥
(vii) राहु की महादशा में राजा से, चोर से, विष से, अग्नि से
तथा शस्त्र से भय हो; सन्तान को कष्ट हो, मन में घोर अशान्ति
और उद्वेग रहे; बन्धुओं का नाश हो, नीच लोगों से अपमान प्राप्त
हो, बदनामी हो। कोई ऐसा दुष्कर्म हो जाये जिसके कारण बदनामी हो;
अपना स्थान (मकान या नौकरी) छूट जाये। जो कार्य करे उसमें
असफलता और हानि हो तथा अपने पद से गिर जावे** । ॥१४॥
(ख) ऊपर १४वें श्लोक में राहु की महादशा का अशुभ फल
बताया गया है। इस श्लोक में कहते हैं कि राहु यदि शुभग्रह के
साथ हो और प्रशस्त (उत्तम) भाव में हो तो राहु की महादशा बहुत
शुभ फल देने वाली होती है। जातक का वैभव राजा के समान हो।
जातक के सब अभीष्ट कार्य सिद्ध हों और वह अपने घर में सुखपूर्वक
रहे। उसके पास दृढ़ता से धन संचय हो और पृथ्वी में उसकी कीर्ति
प्रसिद्ध हो । ॥१५॥
(ग) यदि कन्या, वृश्चिक या मीन राशि का राहु हो तो राहु
की दशा के सम्बन्ध में कुछ विशेष विचार बताते हैं। यदि इन तीनों
राशियों में से किसी में राहु हो तो देशाधिपत्य अर्थात् उच्च हुकूमत
- जब जैसे ग्रह की महादशा होती है तब उसी ग्रह की छाया
मनुष्य के शरीर पर रहती है। शुभ ग्रह की महादशा में मनुष्य शुभ
वाणी बोलता है। अशुभ ग्रह की दशा में दुष्ट वाणी, अनर्गल,
वाहियात, अर्थहीन भाषण करता है ॥
** मूल संस्कृत श्लोक में शब्द है "पदहति" जिसके दो अर्थ
हैं। (१) अपने पद (ओहदे) से गिर जाना (२) पैर में चोट लगना।
३५६ फलदीपिका
प्राप्त हो और बहुत अधिक सुख मिले; पालकी की सवारी मिले।
यह सुख वैभव राहु की दशा में प्राप्त हो किन्तु दशा के अन्तिम काल
में यह सब नष्ट हो जाये ॥१६॥
(ix) केतु की महादशा में शत्रुओं से, चोरों से, तथा राजा से
पीड़ा हो। शस्त्र से आघात का डर हो और उष्णता के रोग हों।
जिन रोगों में अधिक गर्मी मालूम होती है—यथा फोड़े, फुंसी, आत-
शक, मूर्च्छा आदि को उष्णता के रोग कहते हैं। केतु की महादशा में
जातक के कुल को दोष लगे अर्थात् कोई बात ऐसी हो जिससे कुटुम्ब
की बदनामी हो। अग्नि का भय हो, स्वयं को झूठा इलज़ाम लगे
और अपना देश छोड़ना पड़े। इस प्रकार सूर्य आदि नौ ग्रहों की
महादशा का फल बता चुकने पर अब पुनः नौ ग्रहों की दशा का
फल बताते हैं। ॥१७॥
अथ तरणिदशायां क्रौर्यभूपालयुद्धै-
र्धनमनलचतुष्पात्पीडनं नेत्रतापः ।
उदरदशनरोगः पुत्रदारार्तिरुच्चै-
र्गुरुजनविरहः स्याद्भृत्यनाशोऽर्थहानिः ॥१८॥
शिशिरकरदशायां मन्त्रदेवद्विजोर्वी-
पतिजनितविभूतिः स्त्रीधनक्षेत्रसिद्धिः ।
कुसुमवसनभूषागन्धनानारसाप्ति-
र्भवति खलविरोधः स्वक्षयो वातरोगः ॥१९॥
क्षितितनयदशायां क्षेत्रवैरक्षितीश-
प्रतिजनितविभूतिः स्यात्पशुक्षेत्रलाभः ।
सहजतनयवैरं दुर्जनस्त्रीषुसक्ति-
र्दहनरुधिरपित्तव्याधिरर्थोपहानिः ॥२०॥
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३५७
असुरवरदशायां दुःस्वभावोऽथवा स्या-
दतिगहनगदार्तिः सूनुनार्योर्विनाशः ।
विषभयमरिपीडावीक्षणोर्ध्वाङ्गरोगः
सुहृदि कृषिविरोधो भूपतेर्द्वेषलाभः ॥२१॥
अमरगुरुदशायामम्बराद्यर्थसिद्धिः
परिजनपरिवारप्रौढिरत्यर्थमानः ।
सुतधनसुहृदाप्तिः साधुवादाप्तपूजा
भवति गुरुवियोगः कर्णरोगः कफार्तिः ॥२२॥
रवितनयदशायां राष्ट्रपीडाप्रहार-
प्रतिजनितविभूतिः प्रेष्यवृद्धाङ्गनाप्तिः ।
पशुमहिषवृषाप्तिः पुत्रदारप्रपीडा
पवनकफगुदार्तिः पादहस्ताङ्गतापः ॥२३॥
शशितनयदशायां शश्वदाचार्यसिद्धि-
र्द्विजजनितधनाप्तिः क्षेत्रगोवाजिलाभः ।
मनुवरसुरपूजा वित्तसंघातसिद्धिः
प्रभवति मरुदुष्णश्लेष्मरोगप्रपीडा ॥२४॥
शिखिजनितदशायां शोकमोहोऽङ्गनाभिः
प्रभुजनपरिपीडा वित्तनाशोऽपराधः ।
प्रभवति तनुभाजां प्रोषणं स्वीयदेशा-
द्दशनचरणरोगः श्लेष्मसन्तापनं च ॥२५॥
भृगुतनयदशायामङ्गनारत्नवस्त्र-
द्युतिनिधिधनभूषावाजिशय्यासनाप्तिः ।
३५८ फलदीपिका
क्रयकृषिजलयानप्राप्तवित्तागमो वा ।
भवति गुरुवियोगो बान्धवार्तिर्मनोरुक् ॥२६॥
श्लोक ५ से १७ तक सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि
राहु तथा केतु यह जो ग्रहों का साधारण क्रम है—इस क्रम से प्रत्येक
ग्रह की अपनी महादशा में फल देने की प्रवृत्ति बतलाई है।
अब श्लोक १८ से २६ तक—विंशोत्तरी महादशा में ग्रहों का जो
क्रम है अर्थात् सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, बृहस्पति, शनि, बुध, केतु
और शुक्र उस क्रम से प्रत्येक ग्रह की अपनी-अपनी महादशा में
फल देने की प्रवृत्ति बताते हैं ।
इस एक ही १९वें अध्याय में जो ग्रहों के महादशा फल दो बार
बताये गये हैं, इसमें हमारे विचार से रहस्य निम्नलिखित है ।
(i) ५ से १७ श्लोक तक जो फलादेश है वह ग्रहों की
साधारण प्रवृत्ति बताई है—जैसा योगिनी दशा में होता है कि
शुभग्रहों की योगिनी दशा शुभ, पापग्रहों की अशुभ । अन्य मतों के
अनुसार अष्टोत्तरी आदि में भी श्लोक ५ से १७ तक दिये गये
सिद्धान्तों के अनुसार फलादेश बैठाना चाहिये ।
(ii) श्लोक १८ से २६ तक ग्रहों का क्रम वही रक्खा है जो
विंशोत्तरी दशा में बतलाया गया है । विंशोत्तरी दशा में कुछ
विशेषताएँ हैं। यथा एकादश जैसे सुन्दर 'लाभ' के स्वामी को पापी
कहा गया। केवल पापी ही नहीं तीसरे, छठे, ग्यारहवें के मालिक तीनों
पापी-इनमें भी क्रमशः तीसरे से अधिक पापी छठे का मालिक, छठे
के मालिक से अधिक पापी ग्यारहवें का मालिक । दूसरी विशेषता
यह है कि केन्द्र का स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फल नहीं करता, केन्द्र
का स्वामी-क्रूर ग्रह हो तो अशुभ फल नहीं करता । अर्थात् साधारण
नियम लागू नहीं करना चाहिये कि शुभ ग्रह है तो शुभ फल करेगा
क्रूर ग्रह है तो दुष्ट फल करेगा । इसी कारण श्लोक ५ से १७ तक
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३५९
ग्रहों का फल विविध दशाओं में (यथा अष्टोत्तरी, योगिनी, काल चक्र)
घटाना चाहिये—जहाँ सिद्धान्त यह है कि क्रूर ग्रह की दशा है तो क्रूर
फल और शुभ ग्रह की दशा है तो शुभ फल ।
और जब विंशोत्तरी दशावश ग्रहों की महादशा कैसी जावेगी
यह विचार करना हो तो श्लोक १८ से २६ तक वर्णित सिद्धान्त लागू
करना चाहिये ।
(i) जब सूर्य की दशा हो तो क्रूरता से राजाओं से या युद्ध
से धन प्राप्ति हो । अग्नि से और चौपायों से पीड़ा हो । आँखों में
ताप (जलन) हो । पेट के तथा दांत के रोग हों । पुत्र और स्त्री को
बीमारी हो या अन्य प्रकार का कष्ट हो । नौकरों का नाश हो, धन
की हानि हो और गुरुजन (पिता, चाचा आदि) का वियोग या विरह
हो । इस श्लोक में सूर्य की दशा का अनिष्ट फल बताया गया है । यह
तभी घटित होगा जब सूर्य बिगड़ा हुआ हो । प्रत्येक ग्रह सम्बन्धी
कुछ विशेष बातें हैं। जब ग्रह बिगड़ा हुआ होता है तो जिन वस्तुओं
का वह अधिष्ठाता है उनसे सम्बन्धी अनिष्ट फल दिवाता है और जब
ग्रह सुधरा हुआ होता है तो अपने से सम्बन्धित वस्तुओं का लाभ
कराता है । ॥१८॥
(ii) चन्द्रमा की महादशा में मन्त्रों से, देवताओं से, ब्राह्मणों
से तथा राजा से ऐश्वर्य प्राप्त होगा । मन्त्रों से ऐश्वर्य कैसे प्राप्त
हो सकता है ? या तो स्वयं मन्त्रों का अनुष्ठान करे जिससे धन प्राप्ति
हो या अनुष्ठान करने से दक्षिणा प्राप्त हो । चन्द्रमा की महादशा में
स्त्री, धन और कृषि की भूमि प्राप्त होती है । पुष्प, वस्त्र, आभूषण,
सुगन्धित पदार्थ तथा विविध प्रकार के रस प्राप्त हों । दुष्टों से विरोध
हो, शरीर का या धन का क्षय हो और वातरोग हो । इस श्लोक में
चन्द्रमा की महादशा के शुभाशुभ दोनों फल बताये हैं। यदि चन्द्रमा
बलवान् होगा, शुभ स्थान में होगा, शुभ भवन का स्वामी होगा तो
३६० फलदीपिका
शभ फल अधिक होगा । यदि चन्द्रमा दुर्बल है, दुःस्थान में है तो दुष्ट
फल अधिक होगा । ।। १९ ।।
(iii) जब मंगल की महादशा हो तो भूमि से, शत्रुता से, तथा
राजाओं से सुख की प्राप्ति हो और पशुओं का तथा खेतों का लाभ हो
किन्तु अपने पुत्र से या भाईयों से शत्रुता हो, दुर्जन स्त्रियों में आसक्ति
हो और रुधिर विकार, उष्णता के रोग या अग्नि से हानि, पित्त के कुपित
होने से रोग तथा धन की हानि हो । ।।२०।।
(iv) जब राहु की महादशा हो तो जातक का दुःस्वभाव हो
जाये अर्थात् जातक के स्वभाव में सुशीलता न रहे या किसी भयंकर
बीमारी के कारण पीड़ा हो । जातक की स्त्री तथा पुत्र का विनाश
हो । विष से भय हो । शत्रु से पीड़ा हो और नेत्र में या शिर में रोग
हवे । मित्रों से तथा खेती के कार्यों में विरोध तथा राजा से द्वेष अर्थात्
राजा की अकृपा हो । ।।२१।।
(v) अब बृहस्पति की महादशा का फल बताते हैं। जब बृहस्पति
की महादशा हो तो नवीन वस्त्र आदि की प्राप्ति हो; नौकर-चाकर
और परिवार के लोगों में वृद्धि हो और उसका सम्मान बहुत बढ़े ।
पुत्र प्राप्ति हो । धन और मित्रों में वृद्धि हो । लोग उसकी प्रशंसा करें
और श्रेष्ठ आदमियों से सम्मान प्राप्त हो किन्तु गुरुजनों (पिता आदि)
का वियोग हो । कान में रोग हो और कफ के कारण भी कोई
रोग हो । ।।२२।।
(vi) इस श्लोक में शनि की महादशा का फल बताया गया
है । जब शनि की महादशा हो तो देश में कोई पीड़ा हो रही हो
या देश पर कोई प्रहार हो रहा हो या लड़ाई हो रही हो, उसके
फलस्वरूप धन प्राप्ति होती है । जैसे लड़ाई के दिनों में चोर-बाजार
में कमाई होती है या दुर्भिक्ष के समय कुछ लोग अधिक पंसा कमा
लेते हैं इस प्रकार की कमाई को शनि की महादशा का
फल समझें । शनि की महादशा में नौकरों की प्राप्ति हो ।
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३६१
वृद्ध स्त्री (अर्थात् जवानी जिसकी बीत चुकी है) की प्राप्ति भी हो।
शनि की महादशा तो लाखों व्यक्तियों को हो जाती है किन्तु वृद्ध स्त्री
की प्राप्ति तो सबको नहीं होती। यहाँ पर वृद्ध का अर्थ लेना
चाहिये अधिक अवस्था वाली और जन्मकुण्डली में यदि शनि ऐसा
योग करता है जिसके कारण अन्य स्त्री से संसर्ग होने की संभावना
हो तभी शनि की दशा में यह योग घटित होगा। शनि की महादशा
में पशु, भैंस और बैल की प्राप्ति भी होती है किन्तु जातक की स्त्री
और पुत्र को पीड़ा होती है और जातक स्वयं को वातरोग (गठिया,
बाय आदि), कफ रोग, गुदा रोग (बवासीर आदि) होते हैं तथा हाथ
पैरों में जलन रहती है। ॥२३॥
(vii) बुध की महादशा में सदैव आचार्य सिद्धि प्राप्त हो।
आचार्य सिद्धि के दो अर्थ हैं, जातक को अपने गुरुओं से सिद्धि मिले
या जातक स्वयं अन्य लोगों का गुरु हो, इसप्रकार उसे सिद्धि मिले।
बुध की महादशा में भी, खेत और घोड़ों का लाभ होता है और
ब्राह्मणों से धन की प्राप्ति होती है। जातक को श्रेष्ठ मनुष्यों से
सम्पर्क का अवसर मिले। वह देवताओं का पूजन करे और पूर्ण धन
प्राप्ति हो। बुध वात, पित्त, कफ इन तीनों का ही अधिष्ठाता है,
इसलिये इन त्रिदोषों में से किसी के कुपित होने से या किन्हीं दो के
कारण या तीनों ही के कारण रोग हो। ॥२४॥
(viii) केतु की महादशा में बड़ा अनिष्ट फल होता है। स्त्रियों
के कारण बहुत शोक और मोह हो। हृदय में बहुत दुःख का नाम
शोक है। बुद्धि में विभ्रम होने का नाम मोह है। स्त्रियों तथा धनिकों
के कारण जातक को पीड़ा हो या उसके अफ़सरों या मालिक से उसे
पीड़ा पहुँचे। जातक से अपराध बने और उसके धन का नाश हो।
अपना देश छोड़ना पड़े। कफ जनित रोगों के कारण पीड़ा हो और
पैर तथा दांत में रोग हो। ॥२५॥
३६२ फलदीपिका
(ix) शुक्र की महादशा में स्त्री, रत्न, वस्त्र, कान्ति, निधि (गड़ा
हुआ द्रव्य), धन, भूषा, घोड़ा, शय्या और आसन की प्राप्ति हो । माल
खरीदने से, खेती से या पानी के जहाज से आने जाने वाली चीजों
से धन का आगम हो । शुक्र की महादशा के यह सब शुभ फल बताये
हैं किन्तु शुक्र की महादशा में किसी गुरुजन का (माता-पिता आदि का)
वियोग होता है, मन में चिन्ता रहती है और बन्धुओं को कष्ट होता
है । ॥ २६ ॥
इस उन्नीसवें अध्याय में जो शुभफल या अशुभफल बताये हैं उनसे
यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि शुभफल किस प्रकार का होगा और
अशुभफल किस प्रकार का होगा । केवल यह निर्देश करने के लिये इन
श्लोकों को काम में लेना चाहिये । यदि जन्म कुण्डली में ग्रह शुभ है तो
वह शुभ फल ही अधिक देगा, अशुभ फल सामान्य । और यदि ग्रह अशुभ
है तो वह अशुभ फल ही अधिक देगा, शुभ फल कम देगा । शुभता या
अशुभता निम्नलिखित कारणों से होती है । (१) नैसर्गिक शुभत्व या
पापत्व । (२) किस भवन का स्वामी है। (३) किस भाव में बैठा है।
(४) किन ग्रहों के साथ है। (५) किन ग्रहों से दृष्ट है। (६) जिस
ग्रह का विचार किया जा रहा है वह दशवर्ग में, अष्टकवर्ग में बलवान्
है या नहीं। (७) अस्त तो नहीं है । इन सबका विचार कर यह नतीजा
निकालना चाहिये कि ग्रह शुभफल दिखावेगा वा अशुभफल या मिला
जुला फल । अब भावार्थ रत्नाकर के जन्मकुण्डली विचार से सम्बन्धित
कुछ सिद्धान्त दिये जाते हैं ।
भावार्थ रत्नाकर नामक ग्रन्थ श्री रामानुजाचार्य प्रणीत है । इस
ग्रंथ के प्रारम्भ में जो मंगलाचरण दिया गया है उससे यही प्रकट होता
है कि वैष्णव सम्प्रदाय के महाप्रवर्तक श्री रामानुजाचार्य और इस
ज्योतिष ग्रंथ भावार्थ रत्नाकर के निर्माता एक ही रामानुजाचार्य हैं ।
यदि कदाचित् यह दो भिन्न रामानुजाचार्य हों, तो भी इस ग्रंथ के
महत्व में कोई अन्तर नहीं आता क्योंकि भावार्थ रत्नाकर में कुछ ऐसी
विशेष बातें हैं जो अन्य ग्रंथों में उपलब्ध नहीं होतीं । यह पाठक स्वयं
देखेंगे । इस पुस्तक का नाम भावार्थ रत्नाकर है; रत्नाकर के दो
अर्थ हैं--रत्नों का आकर और समुद्र ।
इसमें फलित ज्योतिष सम्बन्धी अनेक बहुमूल्य रत्न हैं, इस कारण
इसका 'रत्नाकर' नाम सार्थक है । क्योंकि रत्नाकर का अर्थ 'समुद्र'
भी होता है और समुद्र में तरंगें होती हैं; इस कारण इस ग्रन्थ को
अध्यायों में न बांटकर तरंगो में बांटा है; प्रथम तरंग, द्वितीय तरंग
आदि । इसमें कुल १४ तरंग हैं । यदि संस्कृत का मूल और उसका
हिन्दी में भावार्थ, दोनों दिये जावें तो ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो
जावेगा, इस कारण यहां केवल भावार्थ ही दिया जा रहा है ।
मेषलग्न विचार
१. यदि किसी व्यक्ति का मेष लग्न हो और चतुर्थेश तथा पंचमेश
का सम्बन्ध हो, तो राजयोग होता है । चतुर्थ का स्वामी चन्द्रमा और
पंचम का स्वामी सूर्य होने के कारण-सूर्य और चन्द्रमा का सम्बन्ध
राजयोग कारक होगा । यदि दोनों एक-दूसरे से सप्तम हों तो
पूर्णिमा के आसपास चन्द्रमा होने के कारण विशेष सुन्दर योग
होगा क्योंकि अमावस्या के करीब सूर्य चन्द्रमा एक राशि में रहते
हैं किन्तु क्षीण चन्द्र होने के कारण चन्द्रमा बलवान् नहीं होता ।
एक अन्य ज्योतिष ग्रन्थ का मत है कि चाहे कोई भी लग्न हो
यदि सूर्य चन्द्रमा दोनों सिंह राशि में हों या दोनों कर्क राशि
में हों या सूर्य कर्क में चन्द्रमा सिंह में हो तो मनुष्य का शरीर
कृश होता है । पाप दृष्ट तथा अन्य दुर्योग होने से यक्ष्मा भी हो
जाता है ।
२. मेष लग्न की कुंडली में दूसरे और सातवें घर का मालिक
शुक्र होने के कारण मारक होता है । किन्तु सदैव यह नहीं समझ लेना
चाहिए कि शुक्र मार ही डालेगा । पहले यह निश्चय करना चाहिये
कि जातक की आयु अल्प है या मध्य या दीर्घ । जिस आयु में
३६४ फलदीपिका
मारक की सम्भावना हो उस आयु में शुक्र की महादशा में शनि की
अन्तर्दशा या अन्य पापी ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है ।
जहाँ जहाँ मारक का प्रसंग आवे वहाँ यह अवश्य विचार कर लेना
चाहिये कि जातक की आयु अल्प है, मध्य या दीर्घ ।
३—मेष लग्न वाले व्यक्ति की कुंडली में बृहस्पति नवें और
बारहवें घर का मालिक होता है । यदि ऐसा बृहस्पति दशम स्थान में
हो तो मारक हो सकता है ।
४—मेष लग्न हो और यदि शनि और बृहस्पति का योग हो तो
केवल इस योग मात्र से राजयोग नही होता । यहाँ कहना
यह है कि शनि दशमेश होता है और बृहस्पति नवमेश होता
है—दोनो के स्वामियों का योग प्रबल राजयोग माना गया है तब
शनि और बृहस्पति का योग क्यों नहीं बहुत अच्छा माना गया ?
इसका कारण यह है कि शनि दसवें के साथ-साथ ग्यारहवें का भी
मालिक होता है और बृहस्पति नवें के साथ-साथ बारहवें का भी
मालिक होता है । इस कारण नवमेश दशमेश के योग में एकादशेश
द्वादशेश का योग हो जाने से उत्कृष्टता जाती रही ।
५—जिस व्यक्ति का मेष लग्न में जन्म होता है उसे माता
(शीतला) चेचक, फोड़े, फुन्सी, घाव, चोट, शस्त्र से आघात आदि
का भय रहता है । मेष का स्वामी मंगल है इस कारण उपर्युक्त का
भय रहता है ।
६—यदि मंगल छठे या आठवें घर के मालिक के साथ हो तो
उसकी महादशा या अन्तर्दशा में सिर में चोट लगने से या ब्लड
प्रेशर (जिस रोग में खून सिर में चढ़ जाता है) या सिर के अन्य
रोग से मृत्यु* हो सकती है ।
*जहां मृत्यु शब्द आवे वहाँ मृत्यु हो जावेगी बिलकुल ऐसा ही
नहीं समझना चाहिए । अत्यन्त कष्ट को भी मृत्यु कहते हैं ।
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३६५
७—मेष लग्न की ज-मपत्रिका में धन (दूसरे) स्थान का
स्वामी शुक्र यदि बारहवें घर में भी हो तो भी शुभ होता है ।
इसका कारण यह है कि मेष लग्न की कुण्डली में द्वादश में शुक्र
उच्च राशि का हो जाता है । इसके अतिरिक्त बारहवां घर शयन
सुख भोग आदि का है जहाँ स्थित होने से शुक्र को विशेष प्रसन्नता होती
है और विशेष भोग प्रदान करता है । इस कारण मेष लग्न की कुण्डली
में द्वादश में स्थित शुक्र अच्छा माना गया है । किन्तु यह साधारण
नियम का अपवाद है । साधारण नियम यह है कि धन स्थान का
स्वामी यदि व्यय (बारहवें) स्थान में बैठे तो धननाश करता है ।
इसीलिए कहा है ।
मेषे जातस्य धनपो व्ययस्थोपि कविश्शुभः ।
इतरर्क्षेषु जातस्य व्ययस्थः धनपोऽशुभः ॥७॥
८—यदि मेष लग्न हो और मंगल और शुक्र का योग हो अर्थात्
दोनों एक साथ हों तो यह योग अच्छा भी है और खराब भी। अच्छा
इसलिए है कि लग्नेश और धनेश का योग उत्तम माना गया है
इस कारण धन के लिये यह योग उत्तम रहेगा और इसका कारक
प्रभाव होगा किन्तु साथ ही सप्तमेश और अष्टमेश का सम्बन्ध
होने से इसका मारक फल भी होगा ।
९—मेष लग्न हो और यदि मंगल, बृहस्पति तथा शुक्र के साथ
द्वितीय स्थान में हो तो निश्चय ही योग* देने वाला होता है ।
१०—यदि जन्म लग्न मेष हो और लग्न का स्वामी मंगल
तीसरे घर में बृहस्पति और शुक्र के साथ हो तो योगप्रद नहीं होता ।
११—मेष लग्न हो और मंगल और बृहस्पति दोनों एक साथ चौथे
*जो ग्रह पूर्ण शुभ प्रभाव दिखाता है—चाहे अच्छे भवनों का
स्वामी होने के कारण, चाहे अन्य ग्रह से शुभ योग होने के कारण,
वह योग देने वाला होता है।
३६६ फलदीपिका
घर में बैठे हों तो निश्चय योग देने वाला होता है। यहां यह बात
ध्यान में रखनी चाहिये कि चतुर्थ में कर्क राशि होने के कारण यद्यपि
मंगल नीच राशि का हो जावेगा किन्तु उच्च बृहस्पति के साथ बैठने से
नीचत्व का दोष जाता रहेगा। और लग्नेश नवमेश दोनों एक साथ
बैठकर दशम को देखेंगे, इस कारण केन्द्र में दोनो के स्थित होने से
योगकारकता हुई।
१२-यदि जन्म लग्न मेष हो और मंगल पांचवें घर में हो
तो मंगल की महादशा में निश्चय ही योग (राज योग, अभ्युदय आदि)
होता है।
मेषे जातस्यहि कुजः पञ्चमस्थो भवेद्यदि।
कुजदायेचसंप्राप्ते योगदश्चभवेद्ध्रुवम् ॥२॥
१३--यदि मेष लग्न हो और बृहस्पति एकादश भाव में हो
तो बृहस्पति की महादशा में "अवयोग" होता है अर्थात् बृहस्पति
की महादशा में विशेष उन्नति नहीं होती। बल्कि अवनति हो
सकती है।
१४--मेष लग्न हो और मंगल और बुध दोनों छठे घर में पड़े
हों तो उनकी महादशा में फोड़े, फुन्सी, चोट, रक्त विकार आदि
दोष होते हैं। यद्यपि बुध कन्या का उच्च में होगा, किन्तु लग्न
और छठे घर के स्वामी का छठ घर में योग उत्तम नहीं माना
गया है।
१५-यदि मेष लग्न हो और मंगल तथा शुक्र तुला राशि में
सातवें घर में हों तो मनुष्य अपने बाहुबल से अपनी भाग्य वृद्धि
करता है और कुछ धन भी कमाता है। कहने का तात्पर्य यह है
'योग' के विरुद्ध "अवयोग" होता है। योग का अर्थ है अच्छा
फल करने वाला। अवयोग का अर्थ है अच्छा फल नहीं करने वाला।
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३६७
कि यह उत्तम योग है परन्तु बहुत अधिक धन दिलाने वाला
योग नहीं।
१६—यदि मेष लग्न हो और मंगल अष्टम में हो तो योग
प्रदान नहीं करता । अष्टम राशि वृश्चिक होगी। यह मंगल की अपनी
राशि है किन्तु लग्नेश दुःस्थान* में होने से योग नहीं होगा । किन्तु
यदि सूर्य और शुक्र भी मंगल के साथ अष्टम में हों तो कुछ धनयोग
बनता है ।
हमारे विचार से ऐसे मनुष्य को--सूर्य, मंगल, शुक्र, अष्टम में
होने से बवासीर, भगंदर आदि गुदा के रोग, नेत्र विकार आदि
अनेक कष्ट होंगे । मृत्यु भी सहसा होगी । यद्यपि भावार्थ रत्नाकर
ने इसे लग्नेश, धनेश, पञ्चमेश, सप्तमेश, का योग मानकर कुछ
धन योग बताया है किन्तु सप्तमेश का अष्टम में होना और तीन-
तीन ग्रहों का दुःस्थान में होना उत्तम नहीं । शुक्र के अष्टम में
होने से वीर्य विकार, प्रमेह आदि की भी सम्भावना रहती है । स्त्री
सुख में भी बाधा होगी ।
१७—यदि मेष लग्न हो और सूर्य, मंगल एवं बृहस्पति शुक्र
भी एक साथ नवम में हों तथा शनि तुला राशि का सप्तम में हो
तो विशेष योग होता है। लग्नेश, पञ्चमेश, सप्तमेश धनेश, नवमेश
के एक साथ बैठने से -- वह भी भाग्य स्थान में, तथा राज्येश
के उच्च होने से विशेष योग कहा गया है।
१८—यदि मेष लग्न हो और सूर्य, शुक्र लग्न में हों किन्तु
उनपर बृहस्पति की दृष्टि न हो तो शुक्र योगप्रद होता है ।
१९—(क) मेष लग्न हो और शुक्र पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो
शुक्र योग प्रद नहीं होता ।
*छठे, आठवें, बारहवें, स्थान को 'दुःस्थान' कहते हैं।
३६८ फलदीपिका
(ख) मेष लग्न हो और सूर्य पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो
निश्चय योगप्रद होता है,
ऊपर जो बृहस्पति की दृष्टि के दो भिन्न-भिन्न फल बताये गये
हैं उसका कारण यह प्रतीत होता है कि बृहस्पति और सूर्य मित्र हैं।
इस कारण सूर्य पर बृहस्पति की दृष्टि का अच्छा फल बताया गया
है किन्तु शुक्र और बृहस्पति शत्रु हैं इस कारण शुक्र पर बृहस्पति
की दृष्टि का उत्तम फल नहीं होता ।
२०--मेष लग्न हो और सूर्य, बुध, शुक्र तीनों ग्यारहवें घर में
बैठे हों तो उनकी दशा भाग्य को बढ़ाने वाली होगी
२१—यदि मेष लग्न हो और मेष राशि का सूर्य लग्न मे हो
तथा कर्क राशि का चन्द्रमा चौथे घर में हो तो निश्चय राजयोग
होता है ।
२२—यदि किसी व्यक्ति का मेष लग्न हो और सूर्य, बृहस्पति,
तथा शुक्र दशम स्थान में हों तो उनकी दशा में गंगास्नान होगा ।
टिप्पणीः—ऊपर जो मेष लग्न के विशेष योगायोग बताये गये हैं वे
प्रायः अन्य ग्रन्थों में प्राप्त नहीं होते । उदाहरण के लिए शुक्र और
बृहस्पति की परस्पर दृष्टि पराशर के मत से केन्द्रेश, त्रिकोणेश का
सम्बन्ध होने के कारण अच्छी मानी जाती है किन्तु ऊपर १९वें
योग में इसका फल अच्छा नहीं बताया गया है । भावार्थ रत्नाकर
में विशेष योग हैं। यही इस ग्रन्थ की विशेषता और उपयोगिता है।
वृषभलग्न विचार
१—यदि वृष लग्न हो तो नवें और दशवें घर के मालिक
होने के बावजूद भी शनि योगकारक नहीं होता । न शनि, सूर्य और
बुध के योग के बिना राजयोग बनाता है । संस्कृत का श्लोक निम्न-
लिखित है ।
वृषभजातस्यच शनिः भाग्यकर्मेश्वरोऽपिवा ।
सूर्यसोमसुताभ्याम् वा न युक्तो नैव योगदः ॥१॥
सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३६९
एक टीकाकार ने अर्थ किया है कि यदि वृष लग्न हो तो नवें और
दसवें घर का स्वामी होने पर भी शनि योग-कारक नहीं होता ।
और सूर्य और बुध लग्न में होने पर भी राजयोग उत्पन्न नहीं
करते ।
हमारे विचार से द्वितीय पंक्ति का शुद्ध अर्थ यह है कि शनि
सूर्य और बुध से युक्त न हो तो योगप्रद नहीं होता ।
२. यदि वृष लग्न हो, दशम में राहु हो या मकर में नवम
में मंगल बृहस्पति हों तो गंगा स्नान की प्राप्ति होती है ।
३. यदि वृष लग्न हो, चौथे चन्द्रमा हो और उस चन्द्रमा को
बृहस्पति और बुध पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो ऐसा चन्द्रमा योग देता है
अर्थात् शुभ फल देता है । वृष लग्न वाले को चन्द्रमा तीसरे घर का
स्वामी होगा । साधारण तौर पर तीसरे घर का स्वामी पापी गिना
जाता है । इस लग्न में बृहस्पति ८वें और ११वें का मालिक हुआ इस
कारण बृहस्पति भी पापी हुआ । साधारण तौर पर पापी को पापी देखे तो
विशेष पाप योग होता है परन्तु षड् बल में बुध और बृहस्पति की सदैव
शुभ दृष्टि ही मानी गई है । इसी सिद्धान्त पर बृहस्पति दृष्ट चन्द्रमा को
शुभ माना है । बुध द्वितीय-पंचमेश होने से यद्यपि वृष लग्न वाले को
मारक हुआ किन्तु पंचमेश होने से उसमें शुभता भी आ गई । इस
कारण बुध से दृष्ट चतुर्थ स्थित चन्द्रमा को शुभ माना है । चतुर्थ
में चन्द्रमा होने से उसे एक रूप केन्द्र बल प्राप्त हुआ और एक
रूप दिग्बल भी प्राप्त हुआ । इसी कारण ऐसे चन्द्रमा को शुभ मान
लिया है ।
४. वृष लग्न हो, सप्तम में वृश्चिक राशि में मंगल हो तो ऐसा
मंगल शुभ होता है ।
५. यदि मीन राशि में सूर्य, शनि, पड़े हों तो जातक दीर्घायु और
भाग्यवान् हो । यहाँ शनि नवम और दशम का स्वामी होने से और
सूर्य चतुर्थ का स्वामी होने से चतुर्थेश नवमेश तथा चतुर्थेश दशमेश का