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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 684 में से

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पृष्ठ 372

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७१
स्वामी धनेश (दूसरे के स्वामी) या लाभेश (ग्यारहवें के स्वामी) के
साथ बैठ कर या उनमें से एक या दोनों को देखकर धन एकत्रित होने
के योग को नष्ट कर देता है।
८-९. यदि वृष लग्न हो और मंगल, बुध, बृहस्पति, साथ हों तो
बुध की महादशा में जातक को कर्जा (ऋण) होगा।
उपर्युक्त स्थिति में मंगल की महादशा धन देने वाली होगी ।
बुध यदि केन्द्र में हो तो बुध की दशा में अच्छा योग हो अर्थात् धन
लाभ का योग उत्तम रहे। बृहस्पति की दशा का मिश्र अर्थात्
मिला-जुला फल है कभी धन लाभ कभी धन हानि। यहाँ पर मंगल
की दशा को क्यों अच्छा बताया ? मंगल तो सातवें और बारहवें का
मालिक है ऐसी हालत में, --सप्तम का मालिक होने से मंगल को
अच्छा कहा क्योंकि पराशर के मत से यदि केन्द्र का मालिक पाप
ग्रह हो तो शुभ फल करता है। यहाँ भी यह विचार कर लेना
चाहिए कि मंगल बैठा कहाँ है ? उदाहरण के लिए यदि अपनी उच्च
राशि मकर में मंगल नवम में बैठा हो तो जितना अच्छा फल करेगा
उतना अच्छा फल नीच राशि का नहीं करेगा। अथवा अपनी राशि
का होकर भी यदि १२वें घर में बैठा हो तो वैसा शुभफल नहीं कर
सकता। यदि अष्टम में बैठा होगा तो चाहे पति की (लाइफ़ इन्शयोरन्स)
जीवन बीमा से रुपया दिला दे परन्तु पति के स्वास्थ्य के लिए अच्छा
नहीं होगा। यदि सातवें घर का मालिक होकर छठे में बैठे तो पति से
कलह करावेगा। इन सब बातों का विचार कर लेना चाहिए। यदि
पुरुष की कुण्डली में ७वें घर का मालिक होकर छठे में बैठा हो तो
अपनी स्त्री से कलह हो।
१०. यदि बुध, शुक्र लग्न में हों और सातवें घर में बृहस्पति
हों तो बुध की महादशा प्रबल योग कारक होती है। यहाँ पर हेतु यह
है कि लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश का योग हो गया। शुक्र षष्ठेश भी है।