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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 684 में से

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पृष्ठ 385

३८४ फलदीपिका
(ख) ऊपर (क) में जो योग बताया है उसी के सम्बन्ध में
कहते हैं कि बृहस्पति की दशा में जब चन्द्रमा की अन्तर्दशा हो तो
ह्रस्व (थोड़ा) फल होता है ।
३. यदि पाँचवें घर में बृहस्पति हो तो कन्यायें बहुत होती हैं,
पुत्र थोड़े ।
४. यदि दूसरे घर में चन्द्रमा, पाँचवें घर में मंगल हो तो चन्द्रमा
की दशा में धनागम होता है ।
५. यदि बृहस्पति छठे हो, आठवें शुक्र हो, नवम में शनि हो और
लाभ स्थान में चन्द्र, मंगल हो तो उत्कृष्ट भाग्यवान् होता है ।
६. यदि चन्द्रमा मंगल और बुध मकर राशि के लाभ में हों तो
धन प्राप्ति, जायदाद और वाहन (सवारी) का उत्तम योग हैं ।
७. यदि चन्द्रमा और शनि लग्न में हों, मंगल ग्यारहवें हो, छठे
शुक्र हो तो शुक्र दशा में भाग्य उदय होता है ।
८. यदि चन्द्रमा, मंगल व बुध और बृहस्पति चतुर्थ स्थान में
हों तो इन ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में बहुत यश प्राप्त करता है, और
भाग्य उदय होता है किन्तु यदि तृतीयेश और अष्टमेश इन चारों ग्रहों
के साथ बैठ जावे तो यह योग भंग हो जाता है ।
९. यदि धनु राशि का बृहस्पति दशम में हो तो निश्चय योग
देने वाला होता है ।
१०. यदि चन्द्रमा वृषभ में, सूर्य सिंह में, बुध कन्या में, शुक्र तुला
में, बृहस्पति धनु में, मंगल मकर में और कुम्भ में शनि हो तो बहुत भाग्य
उदय होता है । ऊपर जो सात ग्रहों की स्थिति बताई गई उनमें सब
ग्रहों की स्थिति जैसी कही गई है वैसी न हो और ५ ग्रहों की
स्थिति भी उपर्युक्त प्रकार की हो तो भी जातक बहुत भाग्यवान्
होता है ।
भावार्थ रत्नाकर (जो फलित ज्योतिष का प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ
है) से मेष लग्न के २२, वृष लग्न के जातकों के १४, मिथुन लग्न की