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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 684 में से

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पृष्ठ 361

३६० फलदीपिका
शभ फल अधिक होगा । यदि चन्द्रमा दुर्बल है, दुःस्थान में है तो दुष्ट
फल अधिक होगा । ।। १९ ।।
(iii) जब मंगल की महादशा हो तो भूमि से, शत्रुता से, तथा
राजाओं से सुख की प्राप्ति हो और पशुओं का तथा खेतों का लाभ हो
किन्तु अपने पुत्र से या भाईयों से शत्रुता हो, दुर्जन स्त्रियों में आसक्ति
हो और रुधिर विकार, उष्णता के रोग या अग्नि से हानि, पित्त के कुपित
होने से रोग तथा धन की हानि हो । ।।२०।।
(iv) जब राहु की महादशा हो तो जातक का दुःस्वभाव हो
जाये अर्थात् जातक के स्वभाव में सुशीलता न रहे या किसी भयंकर
बीमारी के कारण पीड़ा हो । जातक की स्त्री तथा पुत्र का विनाश
हो । विष से भय हो । शत्रु से पीड़ा हो और नेत्र में या शिर में रोग
हवे । मित्रों से तथा खेती के कार्यों में विरोध तथा राजा से द्वेष अर्थात्
राजा की अकृपा हो । ।।२१।।
(v) अब बृहस्पति की महादशा का फल बताते हैं। जब बृहस्पति
की महादशा हो तो नवीन वस्त्र आदि की प्राप्ति हो; नौकर-चाकर
और परिवार के लोगों में वृद्धि हो और उसका सम्मान बहुत बढ़े ।
पुत्र प्राप्ति हो । धन और मित्रों में वृद्धि हो । लोग उसकी प्रशंसा करें
और श्रेष्ठ आदमियों से सम्मान प्राप्त हो किन्तु गुरुजनों (पिता आदि)
का वियोग हो । कान में रोग हो और कफ के कारण भी कोई
रोग हो । ।।२२।।
(vi) इस श्लोक में शनि की महादशा का फल बताया गया
है । जब शनि की महादशा हो तो देश में कोई पीड़ा हो रही हो
या देश पर कोई प्रहार हो रहा हो या लड़ाई हो रही हो, उसके
फलस्वरूप धन प्राप्ति होती है । जैसे लड़ाई के दिनों में चोर-बाजार
में कमाई होती है या दुर्भिक्ष के समय कुछ लोग अधिक पंसा कमा
लेते हैं इस प्रकार की कमाई को शनि की महादशा का
फल समझें । शनि की महादशा में नौकरों की प्राप्ति हो ।