फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३५३
अन्न को अग्नि से भय हो तथा पुत्र और स्त्री को भी कष्ट
हो । ॥ ५ ॥
(ख) यदि सूर्य उत्तम स्थान में हो तो क्रूरता से, सफ़र (यात्रा)
से, राजाओं द्वारा एवम् कलह से धन-प्राप्ति कराता है । मनुष्य
वनों में और पहाड़ों में घूमता है, अति प्रसिद्धि प्राप्त हो, जातक
सदैव उद्योगशील हो । उसके स्वभाव और कार्य में तीक्ष्णता हो और
विजय और सुख प्राप्त हो । ॥ ६ ॥
(ii) (क) चन्द्रमा की महादशा में मन प्रसन्न रहता है ।
सब प्रकार की कार्य सिद्धि, धन सिद्धि होती है । सुख पूर्वक भोजन
प्राप्त होता है । स्त्री, पुत्र आभूषण, वस्त्र, रत्न, गौ और कृषि
की भूमि का लाभ हो । जातक ब्राह्मणों का पूजन (सम्मान)
करे । ॥ ७ ॥
(ख) उपर्युक्त फल पूर्ण रूप से तब घटित होगा जब चन्द्रमा
पूर्ण बली हो । शुक्ल पक्ष की प्रतिपद् से दशमी तक—इन दस दिनों में
चन्द्रमा मध्यम बली होता है इस कारण चन्द्रमा के इन दस दिनों में
मध्यम फल होगा। बीच के दस दिन में अर्थात शुक्ल पक्ष की एका-
दशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा पूर्ण बली होता है। इस
कारण ऐसा चन्द्रमा पूर्ण शुभ फल देगा और अन्तिम दस दिन में—
कृष्ण पक्ष की षष्ठी से अमावस्या तक चन्द्रमा क्रमशः निर्बल होता
जाता है । इस कारण ऐसा चन्द्रमा थोड़ा शुभ फल देता
है । एक अन्य मत से ५ कला तक क्षीण बली, ६ से १० कला तक
मध्यम बली, १० से १५ कला तक पूर्ण बली । ॥ ८ ॥
(iii) (क) यदि मंगल की दशा हो तो अग्नि, राजा, युद्ध आदि
से धन प्राप्त होता है। जातक को झूठ बोलने से, धोखा देने से, औषधि
से तथा विविध प्रकार के क्रूर कर्मों से भी धन लाभ होता है ।