फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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क्रयकृषिजलयानप्राप्तवित्तागमो वा ।
भवति गुरुवियोगो बान्धवार्तिर्मनोरुक् ॥२६॥
श्लोक ५ से १७ तक सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि
राहु तथा केतु यह जो ग्रहों का साधारण क्रम है—इस क्रम से प्रत्येक
ग्रह की अपनी महादशा में फल देने की प्रवृत्ति बतलाई है।
अब श्लोक १८ से २६ तक—विंशोत्तरी महादशा में ग्रहों का जो
क्रम है अर्थात् सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, बृहस्पति, शनि, बुध, केतु
और शुक्र उस क्रम से प्रत्येक ग्रह की अपनी-अपनी महादशा में
फल देने की प्रवृत्ति बताते हैं ।
इस एक ही १९वें अध्याय में जो ग्रहों के महादशा फल दो बार
बताये गये हैं, इसमें हमारे विचार से रहस्य निम्नलिखित है ।
(i) ५ से १७ श्लोक तक जो फलादेश है वह ग्रहों की
साधारण प्रवृत्ति बताई है—जैसा योगिनी दशा में होता है कि
शुभग्रहों की योगिनी दशा शुभ, पापग्रहों की अशुभ । अन्य मतों के
अनुसार अष्टोत्तरी आदि में भी श्लोक ५ से १७ तक दिये गये
सिद्धान्तों के अनुसार फलादेश बैठाना चाहिये ।
(ii) श्लोक १८ से २६ तक ग्रहों का क्रम वही रक्खा है जो
विंशोत्तरी दशा में बतलाया गया है । विंशोत्तरी दशा में कुछ
विशेषताएँ हैं। यथा एकादश जैसे सुन्दर 'लाभ' के स्वामी को पापी
कहा गया। केवल पापी ही नहीं तीसरे, छठे, ग्यारहवें के मालिक तीनों
पापी-इनमें भी क्रमशः तीसरे से अधिक पापी छठे का मालिक, छठे
के मालिक से अधिक पापी ग्यारहवें का मालिक । दूसरी विशेषता
यह है कि केन्द्र का स्वामी शुभ ग्रह हो तो शुभ फल नहीं करता, केन्द्र
का स्वामी-क्रूर ग्रह हो तो अशुभ फल नहीं करता । अर्थात् साधारण
नियम लागू नहीं करना चाहिये कि शुभ ग्रह है तो शुभ फल करेगा
क्रूर ग्रह है तो दुष्ट फल करेगा । इसी कारण श्लोक ५ से १७ तक