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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

३५२ फलदीपिका
नीचावमाननमतिक्रमतोऽपवादं
स्थानच्युतिं पदहृतिं कृतकार्यहानिम् ॥१४॥
विधुंतुदे शुभान्विते प्रशस्तभावसंयुते
दशा शुभप्रदा तदा महीपतुल्यभूतिदा ।
अभीष्टकार्यसिद्धयो गृहे सुखस्थितिर्भवे-
दचञ्चलार्थसंचयाः क्षितौ प्रसिद्धकीर्तयः ॥१५॥
पाथोनमीनालिगतस्य राहो-
र्दशाविपाके महितं च सौख्यम् ।
देशाधिपत्यं नरवाहनाप्ति-
र्दशावसाने सकलस्य नाशः ॥१६॥
केतोर्दशायामरिचोरभूपैः
पीडा च शस्त्रक्षतमुष्णरोगः ।
मिथ्यापवादः कुलदूषितत्वं
वह्नेर्भयं प्रोषणमात्मदेशात् ॥१७॥
(i) (क) इस श्लोक में सूर्य की दशा का फल बताते हैं ।
यहाँ सूर्य का खराब फल बताया गया है । इससे अनुमान होता है कि
सूर्य अनिष्ट स्थान का स्वामी हो, अनिष्ट स्थान में पड़ा हो तब
यह फल घटित होगा । सूर्य अपनी दशा में कलह कराता है । अकस्मात्
राजा का कोप होता है । कुटुम्ब में रोग हो और परिभ्रमण करावे ।
परस्पर—आपस में बैर हो, चित्त में दुःसह कोप, और गुप्त धन तथा