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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 684 में से

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पृष्ठ 368

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३६७

कि यह उत्तम योग है परन्तु बहुत अधिक धन दिलाने वाला
योग नहीं।
१६—यदि मेष लग्न हो और मंगल अष्टम में हो तो योग
प्रदान नहीं करता । अष्टम राशि वृश्चिक होगी। यह मंगल की अपनी
राशि है किन्तु लग्नेश दुःस्थान* में होने से योग नहीं होगा । किन्तु
यदि सूर्य और शुक्र भी मंगल के साथ अष्टम में हों तो कुछ धनयोग
बनता है ।
हमारे विचार से ऐसे मनुष्य को--सूर्य, मंगल, शुक्र, अष्टम में
होने से बवासीर, भगंदर आदि गुदा के रोग, नेत्र विकार आदि
अनेक कष्ट होंगे । मृत्यु भी सहसा होगी । यद्यपि भावार्थ रत्नाकर
ने इसे लग्नेश, धनेश, पञ्चमेश, सप्तमेश, का योग मानकर कुछ
धन योग बताया है किन्तु सप्तमेश का अष्टम में होना और तीन-
तीन ग्रहों का दुःस्थान में होना उत्तम नहीं । शुक्र के अष्टम में
होने से वीर्य विकार, प्रमेह आदि की भी सम्भावना रहती है । स्त्री
सुख में भी बाधा होगी ।
१७—यदि मेष लग्न हो और सूर्य, मंगल एवं बृहस्पति शुक्र
भी एक साथ नवम में हों तथा शनि तुला राशि का सप्तम में हो
तो विशेष योग होता है। लग्नेश, पञ्चमेश, सप्तमेश धनेश, नवमेश
के एक साथ बैठने से -- वह भी भाग्य स्थान में, तथा राज्येश
के उच्च होने से विशेष योग कहा गया है।
१८—यदि मेष लग्न हो और सूर्य, शुक्र लग्न में हों किन्तु
उनपर बृहस्पति की दृष्टि न हो तो शुक्र योगप्रद होता है ।
१९—(क) मेष लग्न हो और शुक्र पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो
शुक्र योग प्रद नहीं होता ।
*छठे, आठवें, बारहवें, स्थान को 'दुःस्थान' कहते हैं।