फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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(ix) शुक्र की महादशा में स्त्री, रत्न, वस्त्र, कान्ति, निधि (गड़ा
हुआ द्रव्य), धन, भूषा, घोड़ा, शय्या और आसन की प्राप्ति हो । माल
खरीदने से, खेती से या पानी के जहाज से आने जाने वाली चीजों
से धन का आगम हो । शुक्र की महादशा के यह सब शुभ फल बताये
हैं किन्तु शुक्र की महादशा में किसी गुरुजन का (माता-पिता आदि का)
वियोग होता है, मन में चिन्ता रहती है और बन्धुओं को कष्ट होता
है । ॥ २६ ॥
इस उन्नीसवें अध्याय में जो शुभफल या अशुभफल बताये हैं उनसे
यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि शुभफल किस प्रकार का होगा और
अशुभफल किस प्रकार का होगा । केवल यह निर्देश करने के लिये इन
श्लोकों को काम में लेना चाहिये । यदि जन्म कुण्डली में ग्रह शुभ है तो
वह शुभ फल ही अधिक देगा, अशुभ फल सामान्य । और यदि ग्रह अशुभ
है तो वह अशुभ फल ही अधिक देगा, शुभ फल कम देगा । शुभता या
अशुभता निम्नलिखित कारणों से होती है । (१) नैसर्गिक शुभत्व या
पापत्व । (२) किस भवन का स्वामी है। (३) किस भाव में बैठा है।
(४) किन ग्रहों के साथ है। (५) किन ग्रहों से दृष्ट है। (६) जिस
ग्रह का विचार किया जा रहा है वह दशवर्ग में, अष्टकवर्ग में बलवान्
है या नहीं। (७) अस्त तो नहीं है । इन सबका विचार कर यह नतीजा
निकालना चाहिये कि ग्रह शुभफल दिखावेगा वा अशुभफल या मिला
जुला फल । अब भावार्थ रत्नाकर के जन्मकुण्डली विचार से सम्बन्धित
कुछ सिद्धान्त दिये जाते हैं ।
भावार्थ रत्नाकर नामक ग्रन्थ श्री रामानुजाचार्य प्रणीत है । इस
ग्रंथ के प्रारम्भ में जो मंगलाचरण दिया गया है उससे यही प्रकट होता
है कि वैष्णव सम्प्रदाय के महाप्रवर्तक श्री रामानुजाचार्य और इस
ज्योतिष ग्रंथ भावार्थ रत्नाकर के निर्माता एक ही रामानुजाचार्य हैं ।
यदि कदाचित् यह दो भिन्न रामानुजाचार्य हों, तो भी इस ग्रंथ के
महत्व में कोई अन्तर नहीं आता क्योंकि भावार्थ रत्नाकर में कुछ ऐसी