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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

२७६ फलदीपिका
बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो
जावे, यक्ष्मा टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।
(३) मंगल--जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के
अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार
(जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु
करता है।
(४) बुध--पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रान्ति (स्नायु
सम्बन्धी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त
का कम बनना जिससे 'पाण्डु' आदि रोग होते हैं--यकृत की ख़राबी
से होते हैं।
(५) बृहस्पति--कफ का अधिष्ठाता है और कफ से मृत्यु करता
है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।
(६) शुक्र--जब प्राणहरण करता है तो इसमें हेतु यह होता है कि
अतिस्त्री प्रसंग के कारण वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाने से
बीमारी का शिकार हो जाता है। मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग
भी शुक्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।
(७) शनि--सन्निपात. वातजरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि
से मृत्यु करता है। ॥ १४ ॥
(८) राहु--कुष्ठ (कोढ़ से) या food-poisoning विष या जर्म्स
(रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के
काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददौड़े, फुंसिया आदि हो जावें, उससे
मृत्यु करता है।
(९) केतु--जब मृत्यु करता है तो दुर्मरण होता है। दुर्मरण का
अर्थ है अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने
से, कुचल जाने से, कोई कत्ल करदे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)।
शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों से या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु के

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७७
काटने से Septic हो जावे या भोजन आदि के ज़रिये विषाक्त कीटाणु
शरीर में प्रवेश कर जावें । ।। १५ ।।
(ग) (१) जन्म लग्न से आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित
हों उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें घर को जो देखते हैं वे
सभी आ गये) ।
(२) या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो उस
नवांश राशि के रोग या दोष से मृत्यु होती है ।
(घ) ऊपर कई बार राशियों के रोग/दोष का हवाला दिया
गया है। ग्रहों के रोग/दोष तो बताये हैं। किस-किस राशि के कौन
कौन से रोग स्वाभाविक हैं, अब यह बताते हैं:—
(१) मेष राशि—पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण
उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठराग्नि, (पेट में भोजन पचाने वाली जो
अग्नि है) के रोग ।
(२) वृष—त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से,
अग्नि से जलने के कारण ।
(३) मिथुन—श्वास की बीमारी, दमा, उष्णशूल (पित्त के
कारण जो तीव्र दर्द होते) हैं ।
(४) कर्कट—पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि
(भोजन में अरुचि आदि लक्षण वाले रोग—anorexia)
(५) सिंह—जंगली पशुओं के कारण मृत्यु, ज्वर, स्फोट, (फोड़ा)
शत्रुओं के कारण ।
(६) कन्या—स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय
सम्बन्धी रोग), ऊपर से गिरने से ।
(७) तुला—धीज्वर (brain fever) सन्निपात ।
(८) वृश्चिक—प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु रोग ।

२७८ फलदीपिका।
(९) धनु—पेड़ के कारण (कोई पेड़ गिर जाने से या किसी पेड़
को काटते समय), जल, लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या
लकड़ी की चोट से), शस्त्र से ।
(१०) मकर—शूल (पेट का दर्द-एपिण्डीसाइटिज़ आदि, पेट में
फोड़ा आदि, colic pain) अरुचि-मन्दाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस-
स्नायु मण्डल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की
शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से ।
(११) कुंभ--खाँसी, ज्वर, क्षय ।
(१२) मीन—पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से ।
(ङ) यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो और आठवें घर
में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र,
अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुए
दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो सरकार की
नाराज़गी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती
है। ॥ २० ॥
(च) यदि (१) बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि
या सौम्य ग्रह के नवांश में हो या सौम्य ग्रह के साथ बँठा हो अथवा
(२) बारहवें घर में सौम्य ग्रह बँठा हो और बारहवें घर का मालिक
भी सौम्य ग्रह हो तो मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती ।
यदि इससे उल्टा हो अर्थात् (१) बारहवें घर का मालिक क्रूर
ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह
के साथ हो अथवा (२) बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो,
बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु
होती है । ॥ २१ ॥

चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २७९
जन्म के पहिले, मृत्यु के बाद की स्थिति ।
स्वोच्चे स्वमित्रे सति सौम्यवर्गे
व्ययाधिपे चोर्ध्वगतिं ससौम्ये
विपर्ययेऽधोगतिमेव केचित्-
ऊर्ध्वास्यशीर्षोदयराशिभेदात् ॥२२॥
कैलासं रविशीतगू भृगुसुतः स्वर्गं महीजो महीं
वैकुण्ठं शशिजो यमो यमपुरं सद्ब्रह्मलोकं गुरुः ।
द्वीपान् भोगिवरः शिखी तु निरयं सम्प्रापयेत्प्राणिनः
सम्बन्धाद्व्ययनायकस्य कथयेत्तत्रान्त्यराश्यंशतः ॥२३॥
धर्मेश्वरेणैव हि पूर्वजन्म
वृत्तं भविष्यज्जननं सुतेशात् ।
तदीशजातिं तदधिष्ठितर्क्षं
दिशं हि तत्रैव तदीशदेशम् ॥२४॥
स्वोच्चे तदीशे सति देवभूमिं
द्वीपान्तरं नीचरिपुस्थलस्थे ।
स्वर्क्षे सुहृद्भे समभे स्थिते वा
सम्प्राप्नुयाद्भारतवर्षमेव ॥२५॥
आर्यावर्तं गीष्पतेः पुण्यनद्यः
काव्येन्द्रोश्च ज्ञस्य पुण्यस्थलानि ।
पङ्गोर्निन्द्या म्लेच्छभूस्तीक्ष्णभानोः
शैलारण्यं कीकटं भूमिजस्य ॥२६॥

२८० फलदीपिका
स्थिरे स्थिरांशाधिगतः सपापः
पृष्ठोदयेऽधोमुखभे च संस्थः ।
तदीश्वरो वृक्षलतादिजन्म
स्यादन्यथा जीवयुतः शरीरी ॥२७॥
लग्नेशितुः स्वोच्चसुहृत्स्वगेहान्
तदीश्वरो याति मनुष्यजन्म ।
समे मृगाः स्युर्विहगाः परस्मिन्
द्रेष्काणरूपैरपि चिन्तनीयम् ॥२८॥
तावेकराशौ जननं स्वदेशे
तौ तुल्यवीर्यौ यदि तुल्यजातौ ।
वर्णो गुणस्तस्य खगस्य तुल्यः
संज्ञोदितैरेव वदेत्समस्तम् ॥२९॥
(क) (१) यदि बारहवें घर का मालिक अपनी उच्च राशि,
मित्र की राशि में बैठा हो और सौम्य वर्ग (होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश,
नवांश, द्वादशांश, त्रिंशांश आदि) में हो या सौम्य ग्रह के साथ बैठा
हो तो उसकी (मरण के बाद) ऊर्ध्वगति (ऊपर की ओर गति अर्थात्
स्वर्ग की ओर) होती है। किन्तु यदि बारहवें घर का मालिक अपनी
नीच राशि, शत्रु की राशि या क्रूर वर्गों में बैठा हो और क्रूर ग्रह के
साथ बैठा हो तो अधोगति (नीचे की ओर अर्थात् नरक की ओर
गति) होती है।
(२) कुछ का विचार है कि बारहवें घर में ऊर्ध्वास्य राशि हो
बारहवें घर का मालिक ऊर्ध्वास्य राशि में हो तो ऊर्ध्वगति अन्यथा
अधोगति होती है।
(३) कुछ अन्य का मत है कि शीर्षोदय राशि ऊर्ध्वगति कारक

चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २८१
हैं, पृष्ठोदय राशि अधोगति कारक है । शीर्षोदय राशियाँ मिथुन,
कन्या, तुला वृश्चिक और, कुंभ हैं । पृष्ठोदय मेष, वृष, कर्क, धनु
और मकर हैं। मीन उभयोदय है ।
(ख) (१) मरण के बाद की अवस्था का विचार (i) बारहवें
घर में जो ग्रह हो या ग्रह हों उनसे (ii) बारहवाँ घर जिस नवांश
में हो उस नवांश में जो ग्रह हो उससे या जो ग्रह हों उनसे (iii)
बारहवें घर का स्वामी जिस ग्रह या जिन ग्रहों से सम्बन्ध करता
--उनसे, करना चाहिये ।
(२) यदि सूर्य या चन्द्र उपर्युक्त ग्रह हों तो जातक मरण के
बाद कैलास (शिव लोक) को जाता है; मंगल हो तो पुनः पृथ्वीपर
शीघ्र जन्म ले लेता है। बुध हो तो वैकुंठ को जायगा; बृहस्पति ब्रह्म
लोक को ले जावेगा; शुक्र स्वर्ग को; शनि यमपुरी को, राहु हो तो
दूसरे द्वीपों को केतु हो तो नरक गामी होगा ॥२३॥
आगे के जन्म का विचार बारहवें घर से बताया गया है । अब
पूर्व जन्म का विचार किस भाव से करना चाहिये यह बताते हैं ।
पूर्व जन्म का विचार नवें घर से करे। इसी प्रकार, मृत्यु के बाद क्या
अवस्था होती है—यह तो ऊपर बता चुके हैं किन्तु जिस जिस लोक
में मरने के बाद जीव जाता है—उस उस लोक में कुछ समय के बाद
“क्षीणे पुण्ये मर्त्य लोकं विशन्ति” गीता के इस कथन के अनुसार रह
कर पुनः पृथ्वी पर जन्म कहाँ होगा—कैसी अवस्था में होगा इत्यादि का
विचार पाँचवें घर से करना चाहिये ।
(४) जाति, देश आदि का विचार किस दिशा में पूर्व जन्म या
किस दिशा में भविष्य जन्म होगा—इन सब बातों का विचार नवम से,
नवमाधीश, से नवम में बैठे हुए ग्रह या ग्रहों से (पूर्व जन्म के विषय में) ।
तथा पंचम से, पंचमाधीश से, पंचम में बैठे हुए ग्रह या ग्रहों से
(पुनर्जन्म के विषय में) करना चाहिये ।२४।।

२८२ फलदीपिका
यदि ग्रह उच्च राशि का हो तो देव भूमि (स्वर्ग), नीच राशि या
शत्रु राशि का हो तो द्वीपान्तर, यदि ग्रह अपनी राशि या मित्र
राशि का हो तो भारत वर्ष में ही समझना चाहिये । २५॥
(घ) अब भारत वर्ष में किस प्रदेश का किस ग्रह से विशेष
सम्बन्ध है यह बताते हैं
(i) सूर्य— पर्वत और जंगल (ii) चन्द्रमा—पुण्य नदी (जिनमें
स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है—यथा गंगा, यमुना, नर्मदा,
गोदावरी आदि (iii) मंगल —कीकट देश, दरिद्र तथा कुत्सित देश—
आजकल जिस प्रदेश को बिहार कहते हैं—उसका एक भाग भी "कीकट"
देश माना जाता है (iv) बुध—पुण्य स्थल, जिन्हें तीर्थ कहते हैं, यथा
श्री रामेश्वरम्, श्री रंगम्, द्वारका, अयोध्या, आदि (v) बृहस्पति
आर्यावर्त—हिमालय और विन्ध्य जिसकी उत्तर और दक्षिण की सीमा
हैं तथा पूर्व और पश्चिम की सीमा समुद्र तक है (vi) शुक्र जो
स्थान चन्द्रमा के बताये गये हैं, वही (vii) शनि—निन्दनीय स्थान,
म्लेच्छ भूमि ॥२६॥
(ङ) ऊपर श्लोक २४ में पूर्व जन्म के विषय में बताया है । अब
पुनः उसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि जिन ग्रहों का ज़िक्र ऊपर श्लोक २४
में किया गया है—वे स्थिर राशि या स्थिर नवांश में हों और साथ
ही साथ पृष्ठोदय राशि में भी हों और अधो मुख राशि में भी हों तो
जन्म वृक्ष (पेड़) लता (बेल) आदि में हुआ था (नवम भाव के
विचार से) या वृक्ष, लता आदि रूप में होगा (पांचवे भाव के) विचार
से) । यदि स्थिर नवांश. पृष्ठोदय आदि में न हो तो मनुष्य योनि
(मनुष्य शरीर) समझना चाहिये । अर्थात् ऊर्ध्वास्य राशि हो, शीर्षोदय
राशि हो, चर राशि, चरनवांश का सम्बंध हो तो (नवम का ऐसा हो तो
पूर्व जन्म में) मनुष्य ही था पंचम का ऐसा सम्बन्ध हो तो भविष्य
जन्म या पुनर्जन्म मे मनुष्य ही होगा । मनुष्य का अर्थ मनुष्य योनि

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २८३
समझना चाहिये—स्त्री या पुरुष दोनोंके लिये मनुष्य का प्रयोग
किया जाता है। हमारा यह मत है कि पुरुष प्रत्येक जन्म में पुरुष ही
होता है—स्त्री प्रत्येक जन्म में स्त्री ही होती है। पुरुष प्राण और
योषा प्राण (स्त्री प्राण) की यह विशेषता है ॥२७॥
(च) (१) यदि नवमेश—उस राशि में हो जिसमें लग्नेश उच्च
का होगा या जो लग्नेश की स्व राशि है तो पूर्व जन्म में जातक
मनुष्य देह धारी था
(२) यदि पंचमेश उस राशि में हो जो लग्नेश की उच्च राशि है
अथवा लग्नेश की स्व राशि है तो जातक पुनर्जन्म के बाद मनुष्य
ही होगा।
(३) यदि नवमेश ऐसी राशि में हैं जो की लग्नेश की सम
राशि है (अर्थात् न मित्र, न शत्रु) तो पूर्व जन्म में पशु था।
(४) यदि पंचमेश ऐसी राशि में है जो लग्नेश की सम राशि है
तो पुनर्जन्म के बाद पशु होगा।
(५) यदि नवमेश ऐसी राशि में हैं जो लग्नेश की नीच राशि
या शत्रु राशि है तो पूर्व जन्म में जातक पक्षी था।
(६) यदि पंचमेश ऐसी राशि में है जो लग्नेश की नीच राशि या
शत्रु राशि है तो पुनर्जन्म 'पक्षी' योनि में होगा।
(छ) ऊपर जो २८वें श्लोक में नवमेश या पंचमेश के विचार
से फल बताये गये हैं यह नवमेश पंचमेश किस द्रेष्काण में हैं—उस
द्रेष्काण का क्या रुप है—इसके अनुसार भी विचार करना चाहिये।
॥२८॥
(१) यदि नवम और पंचम भावों के मालिक एक ही
राशि में हो तो उस ही देश में जन्म (पूर्व) था और होगा (पुन-
र्जन्म) ।

२८४ फलदीपिका
(२) यदि यह दोनों (नवम और पंचम के मालिक) समान
बली हों तो पूर्वजन्म और पुनर्जन्म एक ही जाति में था और होगा
(३) पूर्व जन्म का हाल नवमेश के वर्ण, गुण आदि जो विविध
ग्रहों के प्रथम अध्याय में बताये गये हैं उनके अनुसार बताना चाहिये,
तथा पुनर्जन्म का विवरण पंचमेश के वर्ण, गुण आदि के अनुसार
कहना चाहिये । ग्रहों के स्वरूप, जाति, प्रकृति, स्वभाव आदि पहिले
संज्ञाध्याय में बता चुके हैं। ।।२७।।
२१ श्लोक से २९ श्लोक तक पूर्व जन्म और पुनर्जन्म का हाल
जानने के सिद्धान्त दिये गये है । व्यावहारिक दृष्टि से इनकी उपयो-
गिता कुछ नहीं है । शास्त्रीय दृष्टि से यह दिलचस्प प्रकरण है ।
कर्म विपाक नामक एक ग्रंथ में पूर्व जन्म का विशेष विवरण जानने
के लिये विस्तार पूर्वक फला देश दिया गया है । परन्तु यह कहा नहीं
जा सकता कि कहाँ तक वह ठीक है क्यों कि इसका निश्चय करने
का कोई साधन नहीं कि कहाँ तक यह फल ठीक बैठते हैं ।।२९।।

पन्द्रहवां अध्याय
भावचिन्ता
भावाः सर्वे शुभपतियुता वीक्षिता वा शुभेशै-
स्तत्तद्भावाः सकलफलदाः पापदृग्योगहीनाः ।
पापाः सर्वे भवनपतयश्चेदिहाहुस्तथैव
खेटैः सर्वैः शुभफलमिदं नीचमूढारिहीनैः ॥१॥
तत्तद्भावात् त्रिकोणे स्वसुखमदनभे चास्पदे सौम्ययुक्ते ।
पापानां दृष्टिहीने भवनपसहिते पापखेटैरयुक्ते ।
भावानां पुष्टिमाहुः सकलशुभकरीमन्यथा चेत्प्रणाशं
मिश्रं मिश्रैर्ग्रहेन्द्रैः सकलमपि तथा मूर्तिभावादिकानाम् ॥
नाशस्थानगतो¹ दिवाकरकरैर्लुप्तस्तु यद्भावपो²
नीचारातिगृहं³ गतो⁴ यदि भवेत्सौम्यैरयुक्तेक्षितः⁵ ।
तद्भावस्य विनाशं वितनुते तादृग्विधोऽन्योऽस्ति चेत्
तद्भावोऽपि फलप्रदो न हि शुभश्चेन्ना

२८६ फलदीपिका
तद्भावनाशं कथयन्ति तज्ज्ञाः
शुभेक्षितस्तद्भवनस्य सौख्यम् ॥५॥
भावाधीशो च भावे सति बलरहिते च ग्रहे कारकाख्ये
पापान्तःस्थे च पापैःररिभिरपि समेतेक्षिते नान्यखेटैः ।
पापैस्तद्बन्धुमृत्युव्ययभवनगतैस्तत्त्रिकोणस्थितैर्वा
वाच्या तद्भावहानिः स्फुटमिह भवति द्वित्रिसंवादभावात् ॥
तत्तद्भावपराभवेश्वरखरद्रेष्काणपा दुर्बला
भावार्थ्यष्टमकामगा निजदशायां भावनाशप्रदाः ।
पापा भावगृहात् त्रिशत्रुभवगाः केन्द्रत्रिकोणो शुभाः
'वीर्याढ्याः खलु भावनाथसुहृदो भावस्य सिद्धिप्रदाः ॥७॥
(i) भाव का शुभाशुभ विचार इस पन्द्रहवें अध्याय में बताया
गया है। किसी भाव का विचार करना हो तो सर्वप्रथम निम्नलिखित
सिद्धांत लागू करने चाहिए। जिन भावों में शुभग्रह बैठे होते हैं,
जो भाव शुभग्रह से दृष्ट होते हैं वह उत्तम फल देते हैं।
जो भाव अपने स्वामी के सहित होता है वह शुभ फल देता
है। यदि कोई भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो तो भी शुभ
फल देगा। यहाँ पूर्ण दृष्टि का पूर्ण फल, तीन चौथाई दृष्टि का
तीन चौथाई फल, आधी दृष्टि का आधा फल और चौथाई
दृष्टि का चौथाई फल समझना चाहिए। एक टीकाकार ने यह भी
अर्थ किया है कि शुभ भवनों के स्वामी भी किसी भाव को देखें तो
उस भाव की समृद्धि करेंगे किन्तु हमारे विचार से यहां "शुभ" शब्द
का अर्थ नैसर्गिक शुभता है--भावाधिप होने के कारण शुभता नहीं।
उदाहरण के लिए नवमेश, दशमेश, शनि भावाधिप होने के कारण शुभ
हुआ, किन्तु नैसर्गिक क्रूर है। तुला लग्न वाले को नैसर्गिक रूप से

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २८७
बृहस्पति शुभ हुआ, यद्यपि तृतीय और छठे का मालिक होने के कारण
उसे शुभ नहीं कहेंगे । हमारे विचार से ग्रन्थकार का मत नैसर्गिक
शुभ और पाप का भेद बताना है। यदि पापग्रह किसी भवन का
स्वामी है और उस भवन में बैठा है तो उस भाव को बनायेगा,
बिगाड़ेगा नहीं । इसी प्रकार पापग्रह यदि अपने भाव को (जिस
राशि का वह स्वामी है) पूर्ण दृष्टि से देखे तो उस भाव की वृद्धि ही
करेगा । किन्तु ऊपर की पंक्तियों में जो शुभ फल उत्पन्न करने का
सिद्धान्त बताया गया है, वह तभी ठीक बैठता है, जब ग्रह नीच, अस्त
या शत्रुक्षेत्री न हो । यदि इन तीनों दोषों में से एक, दो, या तीनों
दोषों से युक्त हो तो शुभता प्रदान करने की शक्ति कम हो जाती है
या नहीं रहती है । ॥१॥
(ii) जिस भाव का विचार करना हो, उस भाव को थोड़ीं देर
के लिए लग्न मान लीजिए और फिर विचार कीजिए कि उस
विचारणीय भाव से प्रथम, द्वितीय, चंतुर्थ पंचम, सप्तम, नवम और
दशम में उस विचारणीय भाव का स्वामी और शुभग्रह हैं या नहीं ।
यदि इन स्थानों में शुभग्रह हैं तो उस भाव की समृद्धि होगी । यह
भी देखना चाहिए कि विचारणीय भाव से १, २, ४, ५, ७, ९, १०
पर पापग्रहों की दृष्टि तो नहीं हैं या पापग्रह बैठे तो नहीं हैं। यदि
इन निर्दिष्ट स्थानों में केवल शुभग्रह बैठे होंगे और विचारणीय
भाव का स्वामी बैठा होगा तो पूर्ण शुभ फल; यदि इन स्थानों
में पापग्रह बैठे होंगे तो पूर्ण अशुभ फल । यदि कुछ शुभग्रह,
कुछ पापग्रह मिले जुले बैठे होंगे तो मिला जुला फल होगा—कुछ
अच्छा, कुछ ख़राब । प्रत्येक भाव का विचार करने के लिए उससे भिन्न
भिन्न स्थानों पर शुभ या पाप कैसे ग्रह बैठे हैं इसका विचार कर
अन्तिम परिणाम पर पहुँचना चाहिए । ॥२॥
(iii) यदि किसी भाव का स्वामी (१) अष्टम स्थान में गया हो

२८८ फलदीपिका
या (२) सूर्य की किरणों से अस्त हो या (३) नीच राशि में हो
या (४) शत्रु क्षेत्र में गया हो और शुभग्रहों से युक्त या दृष्ट न
हो तो उस भाव का नाश होता है अर्थात् उस भाव सम्बन्धी सुख की
प्राप्ति नहीं होती प्रत्युत दुःख की प्राप्ति होती है। बहुत से लोगों
के मत से विचारणीय भाव से अष्टम में जाने से ही नहीं, लग्न से
अष्टम में जाने से भी ग्रह जिस भाव का स्वामी है उस भाव को
बिगाड़ेगा। यदि कोई शुभग्रह भी नीचक्षेत्री या शत्रुक्षेत्री या अस्तंगत
होकर किसी भाव में बैठ जाय और वहाँ पर शुभग्रह से युक्त या वीक्षित न
हो तो जिस भाव का वह स्वामी है उस भाव को बिगाड़ेगा। यदि क्रूर ग्रह
[कुंडली: १ भाव में १२ रा.; ३ भाव में २ शु. श.; ४ भाव में ३ बु. सू. चं.; ५ भाव में ४ मं; ७ भाव में ६. के.; ९ भाव में ८ बृ.] नीच, अस्तंगत या शत्रुक्षेत्री होकर
किसी भाव में बैठा हो और शुभग्रह से
युत या वीक्षित न हो तो जहाँ बैठा है
उसे और भी बिगाड़ेग। उदाहरण
के लिए साथ की कुंडली में मंगल
नीच राशि का होकर पंचम में है।
यदि यह बृहस्पति से दृष्ट नहीं
होता तो और भी अधिक पंचम भाव
को बिगाड़ता । बृहस्पति से दृष्ट है, इस कारण मंगल की क्रूरता कुछ
कम हो गई है, फिर भी नीचस्थ मंगल ने इस जातक के दो ज्येष्ठ
पुत्रों का नाश किया और इसके स्वयं के पेट में जलोदर का महारोग
किया । ॥३॥
(iv) जिस भाव का विचार करना हो उस भाव से छठे,
आठवें, बारहवें यदि पापग्रह हों तो उस भाव का नाश करते हैं।
उदाहरण के लिए आपको सप्तम भाव का विचार करना है तो
सप्तम से छठा बारहवाँ, सप्तम से आठवाँ द्वितीय तथा सप्तम से
बारहवाँ छठा, इन तीनों भावों में यदि पापग्रह हों तो सप्तम भाव
की हानि करेंगे। जिस भाव से विचार करना हो उस विचारणीय

पन्द्रहवां अध्याय : भावचिन्ता २८९
भाव से छठे, आठवें, बारहवें यदि शुभग्रह हों तो उस विचारणीय
भाव को विशेष पुष्ट करने में समर्थ नहीं होते। मान लीजिए सप्तम
भाव का विचार करना है और
उस भाव से छठे, आठवें या बारहवें
किसी भाव में बृहस्पति है तो वह
सप्तम भाव को बलवान बनाने में
उतना समर्थ नहीं होगा। क्यों ?
क्योंकि उन स्थानों में बैठकर वह
सप्तम को पूर्ण दृष्टि से नहीं देख
सकेगा। यद्यपि लग्न से बारहवें घर
में बैठकर सातवें भाव को तीन चरण दृष्टि से बृहस्पति देखता है, किन्तु
सप्तम से छठे स्थान (शत्रुस्थान) में स्थित होने के कारण वह सातवें
भाव के दृष्टिकोण से अच्छे स्थान में नहीं है। ॥४॥
(v) जिस भाव का विचार करना हो, उस भाव का स्वामी
यदि लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में बैठा हो तो उस भाव
को बिगाड़ता है। यह साधारण नियम है। उदाहरण के लिए यदि
लग्नेश अष्टम में हो तो शरीर-पक्ष निर्बल या रोगग्रस्त रहेगा। यदि
सप्तम का स्वामी अष्टम में हो तो स्त्रीसुख में कमी करेगा। किन्तु
इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं। जिसके लिए देखिये अध्याय ६,
श्लोक ५७। जिस भाव का विचार कर रहे हों उस भाव में यदि
त्रिक* का स्वामी बैठा हो तो भी जिस भाव में बैठा है उस भाव को
बिगाड़ता है। उदाहरण के लिए यदि अष्टमेश दशम में बैठा हो तो
दशम स्थान को बिगाड़ेगा। यहाँ भी एक बात ध्यान में रखनी चाहिए

  • त्रिक लग्न से छठे, आठवें, बारहवें भाव को कहते हैं।

२९० फलदीपिका
कि यदि त्रिक का स्वामी होने के साथ-साथ वह ग्रह लग्न का भी
स्वामी हो तो दोष पैदा नहीं करता।
ऊपर दो स्थितियाँ बताईं। विचारणीय भाव का स्वामी दुःस्थान
में बैठे वह भी खराब और दुःस्थान का स्वामी विचारणीय भाव में
बैठे वह भी खराब, किन्तु इन दोनों नियमों का एक अपवाद है कि
जिस भाव का विचार कर रहे हैं उस पर शुभग्रहों की दृष्टि हो
तो उस भाव सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है। ॥ ५ ॥
(vi) किसी भाव सम्बन्धी सुख प्राप्ति का अभाव या उस भाव
सम्बन्धी दुःख प्राप्ति किन परिस्थितियों में होती है ? यह नीचे
बताते हैं :-
. (१) यदि भाव, भावेश और भावकारक निर्बल हों (२) यदि
भाव, भावेश, और भावकारक पापग्रहों के मध्य में हों या पापग्रह
किंवा शत्रुग्रहों से युत या वीक्षित हों और शुभ ग्रहों से युत वीक्षित
न हों (३) विचारणीय भाव से ४, ५, ८, ९ तथा १२वें स्थानों में
पापग्रह हों।
ऊपर यह बताया गया है कि भाव, भावेश और भावकारक इन
तीनों का विचार करके किसी नतीजे पर पहुँचना चाहिए । अगर
ऊपर दिये हुए दो-तीन अनिष्ट योग हों तो निश्चय ही भाव-हानि
होती है । उदाहरण के लिए, स्त्री पक्ष का विचार करना है, सप्तम
भाव भी बलहीन हो, सप्तम भाव का स्वामी भी पापग्रहों के बीच में
हो और सप्तम भाव के कारक शुक्र से चौथे, आठवें पापग्रह हों तो
निश्चय ही जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु होगी। कहने का तात्पर्य
यह है कि कई लक्षण मिलने पर पूरा योग घटित होगा। * ॥६॥

  • नीचे बारहों भावों के स्थिर कारक दिये जाते हैं ।
    (१) सूर्य, (२) बृहस्पति, (३) मंगल, (४) चन्द्र और बुध,
    (५) बृहस्पति, (६) शनि और मंगल, (७) शुक्र, (८) शनि,

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९१
(vii) जिस भाव का विचार करना हो उसका नाश कौन-कौन
से ग्रह करते हैं और उस भाव को पुष्ट कौन-कौन से करते हैं—
यह बताते हैं।
भाव को नाश करने वाले निम्नलिखित हैं :-
(१) विचारणीय भाव से अष्टम भाव का स्वामी। (२)
विचारणीय भाव से २२वें द्रेष्काण का स्वामी। (३) विचारणीय भाव
से छठे, सातवें, आठवें भाव के स्वामी—यदि ये दुर्बल हों।
यह सब ग्रह अपनी-अपनी दशा में अन्तर्दशा में विचारणीय भाव
सम्बन्धी हानि करेंगे।
अब यह बताते हैं कि किसी भाव की पुष्टि किस-किस ग्रह की
दशा में होगी।
(१) विचारणीय भाव से यदि तीसरे, छठे, ग्यारहवें, पापग्रह
बैठे हों तो वह अपनी-अपनी दशा में विचरणीय भाव-सम्बन्धी सुख
उत्पन्न करेंगे।
(२) विचारणीय भाव से प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम
और दशम स्थान में यदि शुभग्रह बैठे हों तो वह विचारणीय भाव
सम्बन्धी वृद्धि करेंगे।
(३) जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के स्वामी के
जो शत्रु हैं—वे अपनी दशा—अन्तर्दशा में विचारणीय भाव को
बिगाड़ेंगे और जो मित्र हैं—वे यदि बलवान् हों तो विचारणीय भाव
को पुष्टि प्रदान करेंगे। इस अन्तिम सिद्धान्त का एक उदाहरण दिया
जाता है।
(९) सूर्य, बृहस्पति, (१०) सूर्य, बुध, बृहस्पति, शनि, (११)
बृहस्पति, (१२) शनि। प्रथम भाव का कारक सूर्य। धनभाव का
कारक बृहस्पति इत्यादि।

२९२ फलदीपिका

उदाहरण केलिए साथ की कुंडली
में लग्न भाव का विचार करना है
तो शनि सूर्य का शत्रु है—इस कारण
शनि की दशा-अन्तर्दशा में शरीर-कष्ट
होगा । और बृहस्पति सूर्य का
मित्र है इस कारण बृहस्पति की दशा
अन्तर्दशा में शरीर का सुख होगा ।
।।७।।

राश्तोर्जन्मविलग्नयोर्धृ'तिपतिर्मृ'त्युस्थतद्वीक्षकौ
मन्दः क्रूरदृगाणपो गुलिकपस्तैर्यु'क्तराश्यंशपा ।
राहुश्चैष सुदुर्बलः, स जनने भावानभीष्टस्थितः
पापालोकितसंयुतो निजदशायां भावनाशावहाः ॥८॥

निम्नलिखित ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा में भाव का नाश करते
हैं। (१) जन्मलग्न से तीसरे भाव का स्वामी (२) जन्म राशि से
तृतीय भवन का स्वामी (३) जो ग्रह अष्टम में बैठा हो (४) जो
ग्रह अष्टम को देखता है (५) शनि (६) २२वें द्रेष्काण का स्वामी
(७) जिस घर में मान्दि हो उसका स्वामी (८) ऊपर जो सात
ग्रह बताये गये हैं वह जिन राशि और अंशों में हों उनके स्वामी
(९) दुर्बल राहु यदि वह लग्न से ८वें या १२वें घर में बैठा
हो या पाप-ग्रह से युत या दृष्ट हो । इस श्लोक में यह नहीं बताया
गया कि किस भाव का नाश करता है। किन्तु पिछले श्लोकों में
यह बताया जा चुका है कि पाप-ग्रह जहां बैठते हैं जिसको देखते हैं
जिसके बगल में बैठते हैं उन भावों को नष्ट करते हैं। यही सिद्धांत
इस श्लोक में भी लगाने चाहियें।

पन्द्रहवां अध्याय : भावचिन्ता २९३
भावस्योदयपाश्रितस्य कुशलं यद्भावपेनोदय-
स्वामी तिष्ठति संयुतोऽपि कलयेत्तद्भावजातं फलम् ।
दुःस्थाने विपरीतमेतदुदितं भावेश्वरे दुर्बले
दोषोऽतीव भवेद्बलेन सहिते दोषाल्पता जल्पिता ॥६॥
जिस भाव में लग्नेश बैठा हो उसकी समृद्धि होती है। लग्नेश
जिस भाव के स्वामी के साथ बैठा हो उस भाव के स्वामी के फल को
बढ़ाता है। ऊपर यह बताया गया है कि लग्नेश जिस स्थान में
बैठता है उस स्थान के फल को बढ़ाता है। इसका तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का शुभफल बढ़ावेगा। यदि किसी भाव का स्वामी दुःस्थान
में हो तो इसका उलटा फल होता है। यदि दुःस्थान में पड़ा हुआ
ग्रह निर्बल हो तो बहुत अनिष्ट फल करेगा। किन्तु यदि बलवान्
हो तो उतना खराब नहीं जावेगा ॥ ९ ॥
यद्भावेष्वशुभोऽपि वोदयपतिस्तद्भाववृद्धिं दिशे-
द्दुःस्थानाधिपतिः स चेद्यदि तनोः प्राबल्यमन्यस्य न ।
अत्रोदाहरणं कुजे सुतगते सिंहे झषे वा स्थिते
पुत्राप्तिं शुभवीक्षिते झटिति तत्प्राप्तिं वदन्त्युत्तमाः ॥१०॥
इस श्लोक में यह बताया गया है कि लग्नेश स्वयं चाहे शुभ-
ग्रह हो चाहे पाप-ग्रह हो वह जहाँ बैठ जाता है उस स्थान की वृद्धि
ही करता है। ज्योतिष शास्त्र का यह माना हुआ नियम है कि
६, ८, १२, यह दुःस्थान हैं। अब शंका यह होती है कि लग्न का
स्वामी होना तो शुभ होता है किन्तु यदि कोई ग्रह लग्न के साथ
साथ छठे वा आठवें घर का भी स्वामी हो तो वह कैसा फल करेगा।
इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि लग्न का स्वामी होने

२९४ फलदीपिका
के कारण जो शुभता है वही मुख्य रहेगी । अर्थात् मान लीजिये
वृश्चिक लग्न है और मंगल लग्न और छठे घर का मालिक हुआ।
या मेष लग्न हो तो मंगल लग्न और आठवें घर का मालिक हुआ ।
अब यदि मंगल पंचम में बैठा हो तो वह षष्ठेश अथवा अष्टमेश होने
के कारण सन्तान कष्ट करेगा या लग्नेश पंचम में बैठा है इस कारण
सन्तान सम्बन्धी शुभफल दिखावेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
यदि मंगल लग्नेश षष्ठंश अथवा लग्नेश-अष्टमेश होकर पाँचवें घर में
बैठा हो और शुभ-ग्रह से देखा जाता हो तो शीघ्र ही पुत्र-प्राप्ति
करावेगा ।
द्विस्थानाधिपतित्वमस्ति यदि चेन्मुख्यं त्रिकोणर्क्षजं
तस्यार्द्धं स्वगृहेऽथ पूर्वमुभयोर्यत्तद्दशादौ वदेत् ।
पश्चाद्भावमिहापरार्द्धसमये युग्मे गृहे युग्मजं
त्वोजस्थे सति चौजंभावजफलं शंसन्ति केचिज्जनाः ॥११॥
यदि कोई ग्रह दो घरों का मालिक है तो वह अधिक फल
उस घर का दिखायेगा जो उसकी मूल त्रिकोण राशि है । किस
ग्रह की कौनसी मूल त्रिकोण राशि है यह पहले बताया जा चुका
है । (देखिये पृष्ठ २१) उदाहरण के लिये सिंह लग्न की कुण्डली में
बृहस्पति ५वें और ८वें घर का मालिक है । पंचम घर शुभ है,
अष्टम घर अशुभ है ऐसी स्थिति में बृहस्पति की मूल-त्रिकोण राशि
पंचम में होने से मुख्य फल पंचमेश होने का करेगा और अष्टमेश
होने का फल उसका आधा करेगा । अर्थात् यदि पंचमेश होने का
१६ आने शुभ फल तो अष्टमेश होने का ८ आने अशुभ फल । ऐसे
ग्रह की दशा में दोनों भावों के स्वामी होने का शुभ या अशुभ फल
होगा । अर्थात् प्रस्तुत उदाहरण में बृहस्पति पंचमेश और अष्टमेश

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९५
दोनों स्वामित्व का फल दिखावेगा । यहाँ यह भी निर्णय करते हैं
कि पहले किस राशि के स्वामित्व का फल दिखावेगा । इसके उत्तर
में कहते हैं कि लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आवे उस राशि
के स्वामित्व का प्रभाव पहले होगा और जो राशि बाद में होगी
उसका प्रभाव बाद में होगा । परन्तु मन्त्रेश्वर महाराज स्वयं लिखते
हैं कि कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि यदि विचारणीय ग्रह ऊनी
राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों में जो ऊनी राशि है उसका
फल पहले दिखावेगा और अपनी दूसरी राशि का फल बाद में ।
किन्तु यदि ग्रह किसी सम राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों
में जो समराशि है उसके स्वामित्व का फल पहले दिखावेगा और ऊनी
राशि का फल बाद में दिखावेगा । ॥११॥
यद्भावेशस्याधिशत्रुग्रहो वा
यो वा खेटो बिन्दुशून्यर्क्षयुक्तः
तत्तत्पाके मूर्तिभावादिकानां
नाशं ब्रूयाद्दैववित्प्राज्ञिकाय ॥१२॥
इस श्लोक में यह बताते हैं कि किन ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा में
किन-किन भावों का नाश होगा । इस सम्बन्ध में दो बातें बताते हैं ।
(क) जो भावेश का अधिशत्रु ग्रह हो उस अधि-शत्रु ग्रह की दशा-
अन्तर्दशा में भाव का नाश होगा । (ख) जिस ग्रह की अपने अष्टक
वर्ग में जिस भाव में शून्य-शुभ बिन्दु हो अर्थात् कोई शुभ बिन्दु न
हो उस भाव को भी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में बिगाड़ता है ।
इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये शनि की महादशा है और
शनि के अष्टक वर्ग में पंचम भाव में कोई शुभ बिन्दु नहीं है तो
शनि की दशा-अन्तर्दशा में पंचमभाव सम्बन्धी कष्ट होगा । (ग)