फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवां अध्याय : भावचिन्ता २९३
भावस्योदयपाश्रितस्य कुशलं यद्भावपेनोदय-
स्वामी तिष्ठति संयुतोऽपि कलयेत्तद्भावजातं फलम् ।
दुःस्थाने विपरीतमेतदुदितं भावेश्वरे दुर्बले
दोषोऽतीव भवेद्बलेन सहिते दोषाल्पता जल्पिता ॥६॥
जिस भाव में लग्नेश बैठा हो उसकी समृद्धि होती है। लग्नेश
जिस भाव के स्वामी के साथ बैठा हो उस भाव के स्वामी के फल को
बढ़ाता है। ऊपर यह बताया गया है कि लग्नेश जिस स्थान में
बैठता है उस स्थान के फल को बढ़ाता है। इसका तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का शुभफल बढ़ावेगा। यदि किसी भाव का स्वामी दुःस्थान
में हो तो इसका उलटा फल होता है। यदि दुःस्थान में पड़ा हुआ
ग्रह निर्बल हो तो बहुत अनिष्ट फल करेगा। किन्तु यदि बलवान्
हो तो उतना खराब नहीं जावेगा ॥ ९ ॥
यद्भावेष्वशुभोऽपि वोदयपतिस्तद्भाववृद्धिं दिशे-
द्दुःस्थानाधिपतिः स चेद्यदि तनोः प्राबल्यमन्यस्य न ।
अत्रोदाहरणं कुजे सुतगते सिंहे झषे वा स्थिते
पुत्राप्तिं शुभवीक्षिते झटिति तत्प्राप्तिं वदन्त्युत्तमाः ॥१०॥
इस श्लोक में यह बताया गया है कि लग्नेश स्वयं चाहे शुभ-
ग्रह हो चाहे पाप-ग्रह हो वह जहाँ बैठ जाता है उस स्थान की वृद्धि
ही करता है। ज्योतिष शास्त्र का यह माना हुआ नियम है कि
६, ८, १२, यह दुःस्थान हैं। अब शंका यह होती है कि लग्न का
स्वामी होना तो शुभ होता है किन्तु यदि कोई ग्रह लग्न के साथ
साथ छठे वा आठवें घर का भी स्वामी हो तो वह कैसा फल करेगा।
इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि लग्न का स्वामी होने