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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 684 में से

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पृष्ठ 291

२९० फलदीपिका
कि यदि त्रिक का स्वामी होने के साथ-साथ वह ग्रह लग्न का भी
स्वामी हो तो दोष पैदा नहीं करता।
ऊपर दो स्थितियाँ बताईं। विचारणीय भाव का स्वामी दुःस्थान
में बैठे वह भी खराब और दुःस्थान का स्वामी विचारणीय भाव में
बैठे वह भी खराब, किन्तु इन दोनों नियमों का एक अपवाद है कि
जिस भाव का विचार कर रहे हैं उस पर शुभग्रहों की दृष्टि हो
तो उस भाव सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है। ॥ ५ ॥
(vi) किसी भाव सम्बन्धी सुख प्राप्ति का अभाव या उस भाव
सम्बन्धी दुःख प्राप्ति किन परिस्थितियों में होती है ? यह नीचे
बताते हैं :-
. (१) यदि भाव, भावेश और भावकारक निर्बल हों (२) यदि
भाव, भावेश, और भावकारक पापग्रहों के मध्य में हों या पापग्रह
किंवा शत्रुग्रहों से युत या वीक्षित हों और शुभ ग्रहों से युत वीक्षित
न हों (३) विचारणीय भाव से ४, ५, ८, ९ तथा १२वें स्थानों में
पापग्रह हों।
ऊपर यह बताया गया है कि भाव, भावेश और भावकारक इन
तीनों का विचार करके किसी नतीजे पर पहुँचना चाहिए । अगर
ऊपर दिये हुए दो-तीन अनिष्ट योग हों तो निश्चय ही भाव-हानि
होती है । उदाहरण के लिए, स्त्री पक्ष का विचार करना है, सप्तम
भाव भी बलहीन हो, सप्तम भाव का स्वामी भी पापग्रहों के बीच में
हो और सप्तम भाव के कारक शुक्र से चौथे, आठवें पापग्रह हों तो
निश्चय ही जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु होगी। कहने का तात्पर्य
यह है कि कई लक्षण मिलने पर पूरा योग घटित होगा। * ॥६॥

  • नीचे बारहों भावों के स्थिर कारक दिये जाते हैं ।
    (१) सूर्य, (२) बृहस्पति, (३) मंगल, (४) चन्द्र और बुध,
    (५) बृहस्पति, (६) शनि और मंगल, (७) शुक्र, (८) शनि,