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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 684 में से

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पृष्ठ 284

चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २८३
समझना चाहिये—स्त्री या पुरुष दोनोंके लिये मनुष्य का प्रयोग
किया जाता है। हमारा यह मत है कि पुरुष प्रत्येक जन्म में पुरुष ही
होता है—स्त्री प्रत्येक जन्म में स्त्री ही होती है। पुरुष प्राण और
योषा प्राण (स्त्री प्राण) की यह विशेषता है ॥२७॥
(च) (१) यदि नवमेश—उस राशि में हो जिसमें लग्नेश उच्च
का होगा या जो लग्नेश की स्व राशि है तो पूर्व जन्म में जातक
मनुष्य देह धारी था
(२) यदि पंचमेश उस राशि में हो जो लग्नेश की उच्च राशि है
अथवा लग्नेश की स्व राशि है तो जातक पुनर्जन्म के बाद मनुष्य
ही होगा।
(३) यदि नवमेश ऐसी राशि में हैं जो की लग्नेश की सम
राशि है (अर्थात् न मित्र, न शत्रु) तो पूर्व जन्म में पशु था।
(४) यदि पंचमेश ऐसी राशि में है जो लग्नेश की सम राशि है
तो पुनर्जन्म के बाद पशु होगा।
(५) यदि नवमेश ऐसी राशि में हैं जो लग्नेश की नीच राशि
या शत्रु राशि है तो पूर्व जन्म में जातक पक्षी था।
(६) यदि पंचमेश ऐसी राशि में है जो लग्नेश की नीच राशि या
शत्रु राशि है तो पुनर्जन्म 'पक्षी' योनि में होगा।
(छ) ऊपर जो २८वें श्लोक में नवमेश या पंचमेश के विचार
से फल बताये गये हैं यह नवमेश पंचमेश किस द्रेष्काण में हैं—उस
द्रेष्काण का क्या रुप है—इसके अनुसार भी विचार करना चाहिये।
॥२८॥
(१) यदि नवम और पंचम भावों के मालिक एक ही
राशि में हो तो उस ही देश में जन्म (पूर्व) था और होगा (पुन-
र्जन्म) ।