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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 684 में से

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पृष्ठ 295

२९४ फलदीपिका
के कारण जो शुभता है वही मुख्य रहेगी । अर्थात् मान लीजिये
वृश्चिक लग्न है और मंगल लग्न और छठे घर का मालिक हुआ।
या मेष लग्न हो तो मंगल लग्न और आठवें घर का मालिक हुआ ।
अब यदि मंगल पंचम में बैठा हो तो वह षष्ठेश अथवा अष्टमेश होने
के कारण सन्तान कष्ट करेगा या लग्नेश पंचम में बैठा है इस कारण
सन्तान सम्बन्धी शुभफल दिखावेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
यदि मंगल लग्नेश षष्ठंश अथवा लग्नेश-अष्टमेश होकर पाँचवें घर में
बैठा हो और शुभ-ग्रह से देखा जाता हो तो शीघ्र ही पुत्र-प्राप्ति
करावेगा ।
द्विस्थानाधिपतित्वमस्ति यदि चेन्मुख्यं त्रिकोणर्क्षजं
तस्यार्द्धं स्वगृहेऽथ पूर्वमुभयोर्यत्तद्दशादौ वदेत् ।
पश्चाद्भावमिहापरार्द्धसमये युग्मे गृहे युग्मजं
त्वोजस्थे सति चौजंभावजफलं शंसन्ति केचिज्जनाः ॥११॥
यदि कोई ग्रह दो घरों का मालिक है तो वह अधिक फल
उस घर का दिखायेगा जो उसकी मूल त्रिकोण राशि है । किस
ग्रह की कौनसी मूल त्रिकोण राशि है यह पहले बताया जा चुका
है । (देखिये पृष्ठ २१) उदाहरण के लिये सिंह लग्न की कुण्डली में
बृहस्पति ५वें और ८वें घर का मालिक है । पंचम घर शुभ है,
अष्टम घर अशुभ है ऐसी स्थिति में बृहस्पति की मूल-त्रिकोण राशि
पंचम में होने से मुख्य फल पंचमेश होने का करेगा और अष्टमेश
होने का फल उसका आधा करेगा । अर्थात् यदि पंचमेश होने का
१६ आने शुभ फल तो अष्टमेश होने का ८ आने अशुभ फल । ऐसे
ग्रह की दशा में दोनों भावों के स्वामी होने का शुभ या अशुभ फल
होगा । अर्थात् प्रस्तुत उदाहरण में बृहस्पति पंचमेश और अष्टमेश