फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७७
काटने से Septic हो जावे या भोजन आदि के ज़रिये विषाक्त कीटाणु
शरीर में प्रवेश कर जावें । ।। १५ ।।
(ग) (१) जन्म लग्न से आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित
हों उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें घर को जो देखते हैं वे
सभी आ गये) ।
(२) या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो उस
नवांश राशि के रोग या दोष से मृत्यु होती है ।
(घ) ऊपर कई बार राशियों के रोग/दोष का हवाला दिया
गया है। ग्रहों के रोग/दोष तो बताये हैं। किस-किस राशि के कौन
कौन से रोग स्वाभाविक हैं, अब यह बताते हैं:—
(१) मेष राशि—पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण
उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठराग्नि, (पेट में भोजन पचाने वाली जो
अग्नि है) के रोग ।
(२) वृष—त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से,
अग्नि से जलने के कारण ।
(३) मिथुन—श्वास की बीमारी, दमा, उष्णशूल (पित्त के
कारण जो तीव्र दर्द होते) हैं ।
(४) कर्कट—पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि
(भोजन में अरुचि आदि लक्षण वाले रोग—anorexia)
(५) सिंह—जंगली पशुओं के कारण मृत्यु, ज्वर, स्फोट, (फोड़ा)
शत्रुओं के कारण ।
(६) कन्या—स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय
सम्बन्धी रोग), ऊपर से गिरने से ।
(७) तुला—धीज्वर (brain fever) सन्निपात ।
(८) वृश्चिक—प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु रोग ।