फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९५
दोनों स्वामित्व का फल दिखावेगा । यहाँ यह भी निर्णय करते हैं
कि पहले किस राशि के स्वामित्व का फल दिखावेगा । इसके उत्तर
में कहते हैं कि लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आवे उस राशि
के स्वामित्व का प्रभाव पहले होगा और जो राशि बाद में होगी
उसका प्रभाव बाद में होगा । परन्तु मन्त्रेश्वर महाराज स्वयं लिखते
हैं कि कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि यदि विचारणीय ग्रह ऊनी
राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों में जो ऊनी राशि है उसका
फल पहले दिखावेगा और अपनी दूसरी राशि का फल बाद में ।
किन्तु यदि ग्रह किसी सम राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों
में जो समराशि है उसके स्वामित्व का फल पहले दिखावेगा और ऊनी
राशि का फल बाद में दिखावेगा । ॥११॥
यद्भावेशस्याधिशत्रुग्रहो वा
यो वा खेटो बिन्दुशून्यर्क्षयुक्तः
तत्तत्पाके मूर्तिभावादिकानां
नाशं ब्रूयाद्दैववित्प्राज्ञिकाय ॥१२॥
इस श्लोक में यह बताते हैं कि किन ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा में
किन-किन भावों का नाश होगा । इस सम्बन्ध में दो बातें बताते हैं ।
(क) जो भावेश का अधिशत्रु ग्रह हो उस अधि-शत्रु ग्रह की दशा-
अन्तर्दशा में भाव का नाश होगा । (ख) जिस ग्रह की अपने अष्टक
वर्ग में जिस भाव में शून्य-शुभ बिन्दु हो अर्थात् कोई शुभ बिन्दु न
हो उस भाव को भी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में बिगाड़ता है ।
इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये शनि की महादशा है और
शनि के अष्टक वर्ग में पंचम भाव में कोई शुभ बिन्दु नहीं है तो
शनि की दशा-अन्तर्दशा में पंचमभाव सम्बन्धी कष्ट होगा । (ग)