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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

श्यामाक्रमः १४९
इसके बाद पात्र की प्रतिष्ठा का विधान आता है। पात्र आधार पर ही
प्रतिष्ठापित होता है। इसका मन्त्र बाला के साथ इस प्रकार बोलकर प्रयोग करना
चाहिये—‘ऐं क्लीं सौः उं विद्यातत्त्वाय पद्माननाय वौषट्’। इस मन्त्र से पात्र की
प्रतिष्ठा कर उसमें सूर्य की कलाओं का अर्चन करना चाहिये। उनकी कलायें
१. तपिनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७.
सुषुम्ना, ८. भोगदा, ९. विश्वा, १०. बोधिनी, ११. धारिणी और १२. क्षमा
इस क्रम से बारह मानी जाती है। इस तरह पात्र में इन कलाओं की समन्त्रक
पूजा पूरी होती है।
अब पात्र में शुद्ध जल भर लेते हैं। उसमें रहस्यरूप से ॐकार के तृतीयाक्षर
बीज में विद्यमान शिवरूप सोमतत्त्व की पूजा बाला के साथ की जाती है। पूरा
मन्त्र बनता है—‘ऐं क्लीं सौः मं शिवतत्त्वाय सोममण्डलाय नमः’। इससे सोम
की १. अमृता, २. मानदा, ३. पूषा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति,
८. शशिनी, ९. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्री १३. प्रीति,
१४. अङ्गदा, १५. पूर्णा, १६. पूर्णामृता नामक कलाओं का अभ्यर्चन होता है।
इतनी प्रक्रिया के बाद अग्निकोण और ईशानकोण में मौलि स्थान का प्रकल्पन
कर तथा नैर्ऋत्य और वायव्य में अधोभाग का प्रकल्पन कर इसी तरह इनके मध्य
में अर्थात् १. अग्नि-ईशान के मध्य पूर्व दिशा में २. असुर और वायु के मध्य
पश्चिम दिशा में एवं ३. अग्नि, असुर मध्य दक्षिण दिशा में और ४. वायव्य और
ईशान के मध्य उत्तर दिशा में भी षडङ्गविन्यास आवश्यक है। षडङ्ग १. हृदय,
२. शिर, ३. शिखा, ४. कवच, ५. नेत्रत्रय और ६. अस्त्र हैं। इनमें बाला जोड़कर
न्यास करना चाहिये। जैसे ‘ऐं क्लीं सौः हृदयाय नमः हृदयशक्तिं (पादुकां) पूजयामि
तर्पयामि नमः’ मन्त्र हृदय अङ्ग में प्रयुक्त होता है। इसी तरह सभी अङ्गों में करना
चाहिये। इसके बाद अस्त्र मन्त्र से संरक्षण, कवच मन्त्र से अवकुण्ठन, धेनु और
योनि दोनों मुद्राओं का प्रदर्शन आवश्यक है। पुनः मूल मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित
कर सामान्य अर्घ्य के जल से याग-गृह, पूजा के उपकरण आदि का सम्प्रोक्षण
करना चाहिये।।१८।।
विशेषार्घ्यविधिः
ताभिरीकाराङ्कितत्रिकोणवृत्तचतुरस्रं मण्डलं विधाय तस्मिन्
पुष्पाणि विकीर्य पूर्ववदाधारं प्रतिष्ठाप्य अग्निकला अभ्यर्च्य पात्रं

१५० परशुरामकल्पसूत्रम्
प्रतिष्ठाप्य तस्मिन् पात्रे 'ह्रीं ऐं महालक्ष्मीश्वरि परमस्वामिनि ऊर्ध्व-
शून्यप्रवाहिनि सोमसूर्याग्निभक्षिणि परमाकाशभासुरे आगच्छागच्छ
विश विश पात्रं प्रतिगृह्ण प्रतिगृह्ण हुं फट् स्वाहा' इति पुष्पाञ्जलिं
विकीर्य सूर्यकला अभ्यर्च्य,
ब्रह्माण्डाखण्डसम्भृतमशेषरससम्भृतम्।
आपूरितं महापात्रं पीयूषरसमावह।।
इत्यादिममापूर्य द्वितीयं निक्षिप्य अकथादित्रीरेखाङ्कितकोणत्रये
हलक्षान् मध्ये हंसं च विलिख्य, मूलेन दशधा अभिमन्त्र्य चन्द्रकलाः
अभ्यर्च्य अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु षडङ्गानि विन्यस्य, अस्त्रेण
संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य धेनुयोनी प्रदर्शयेत् ॥१९॥
ताभिः सामान्यार्घ्योदकसम्बन्धिभिः अद्भिः, ईकाराङ्कितेति त्रिकोण-
विशेषणम्। त्रिकोणमध्ये ईकारं लिखेद् इति भावः। इदं न पूर्ववत् प्रवेशरीत्या
निर्माणामिप्रायकम्; किन्तु निर्गमरीत्या त्रिकोणमारभ्य चतुरस्रावसानपाठात्
त्रिकोणं सर्वान्तः चतुरस्रं सर्वस्माद् बहिरिति प्रायोदिष्टत्वात्। पूर्ववदिति
सामान्यार्घ्याधारवदित्यर्थः। अग्निकलाः धूम्रार्चिरादीः अभ्यर्च्य पात्रं प्रतिष्ठाप्य
इत्यत्रापि पूर्ववदनुवर्त्तते, योग्यत्वात्। तेन पात्रप्रतिष्ठापने पूर्वमन्त्रलाभः
आदिमद्वितीयौ प्रोक्तौ अत्र सूत्रे, तेन नात्र तृतीयचतुर्थपञ्चमाः, अनुक्तत्वात्।
गणपतिक्रम इव मध्यमं चेतिवत् चकारोऽस्ति, अग्रे मपञ्चकमुररीकृत्येति वा
लिङ्गमस्ति, येन तल्लाभो भवेत्। तस्माद् यावदुक्तम्। अश्च कश्च थश्च ते आदौ
यासां ताः त्रिरेखाः। अवर्णमारभ्य विसर्गान्ता एका वर्णमयी रेखा ततः
कादितान्ता, ततः थादिसान्तेति भावः। विशेषस्यानुक्तत्वात् स्वाग्रादि-
प्रादक्षिण्येने हलक्षान् त्रीन् वर्णान् त्रिषु विलिख्य मध्ये हंस इति उत्तरसंस्थं
लिखित्वा इदं सर्वं पात्रस्थद्रव्ये तत्संस्काररूपं लेखनम्। इत्थं च ईदृशलेखेन
द्रव्यसंस्कारं भावयेद् इति तदर्थः। दशधा—एतदनन्तरं आवर्त्तितमूलेनेत्यस्य
विशेषणम्। धेनुयोनी प्रदर्शयेद् इति धेनुमुद्रां प्रदर्श्य योनिमुद्रया प्रणमेत्।
एतदर्घ्यसंशोधनमिति क्वचित्पुस्तके पाठः ॥१९॥

श्यामाक्रमः १५१
सूत्र में ताभिः (उनके द्वारा) शब्द का प्रयोग सबसे पहले किया गया
है। यह तत् शब्द पूर्वपरामर्शक होता है। इससे पहले कहे गये सामान्य अर्घ्य
जल सम्बन्धी बिन्दुओं से यह अर्थ निकालना चाहिये।
ईकाराङ्कित शब्द त्रिकोण का विशेषण है। अर्थात् त्रिकोण रचना के
उपरान्त उसमें 'ईं' बीज लिखना चाहिये। बीजाक्षर पर अनुस्वार लगाने का
भी विधान है। इस मण्डल में त्रिकोण के बाद वृत्तनिर्माण का उल्लेख है।
त्रिकोण के बाद किन्हीं पुस्तकों में षट्कोण बनाने की भी चर्चा है। अन्त
में अर्थात् वृत्त के बाद चतुरस्र मण्डल संरचना से मण्डल विधान पूरा होता
है। वस्तुतः मण्डल में सबके भीतर त्रिकोण फिर षट्कोण वृत्त और चतुरस्र
का क्रम सर्वमान्य है।
मण्डल में फूलों को बिखेर देने से दिव्यता आ जाती है और सौन्दर्य-
मय आकर्षण बढ जाता है। इसके बाद आधार की प्रतिष्ठा का क्रम आता है।
यह क्रम पहले की तरह पूरा करना चाहिये। इसीलिये सूत्र में पूर्ववत् शब्द का
प्रयोग किया गया है। क्रमानुसार अब अग्निकलाओं की अभ्यर्चना करनी चाहिये।
पुनः पात्र की प्रतिष्ठा होनी चाहिये। उस पात्र में 'ह्रीं ऐं महालक्ष्मीश्वरि
परमस्वामिनि ऊर्ध्वशून्यप्रवाहिनि सोमसूर्याग्निभक्षिणि परमाकाशभासुरे
आगच्छागच्छ विश विश पात्रं प्रतिगृह्ण प्रतिगृह्ण स्वाहा' इस मन्त्र से अञ्जलि भरा
पुष्प डालना चाहिये।
एतदनन्तर सूर्य-कलाओं की पूजा का विधान है। अठारहवें सूत्र में सूर्य-
कलाओं और अग्निकलाओं की चर्चा की जा चुकी है। कला पूजा के बाद मूल
में दिये गये श्लोक से, पहले पात्र को भर कर दूसरे पात्र को हटा देना या
अलग कर देना चाहिये। निक्षेप में नि उपसर्ग आधार, क्षिप धात्वर्थ फेंकने हटाने
या अस्वीकृत अर्थ में ही प्रयुक्त होता है। सूत्रानुसार उस पात्र के महत्त्व का
प्रतिपादन किया गया है। कल्पना करनी चाहिये कि, यह पात्र महत्त्वपूर्ण पात्र
है। यह अखण्ड ब्रह्माण्डमण्डल से अखण्ड रूप से सम्भूत है और स्वयं समस्त
रसों से परिपूर्ण है। मेरे द्वारा पीयूष से यह आपूरित किया जा रहा है। इसी
पीयूषरसपूर्णता को हे पात्र तुम प्राप्त हो जाओ। इसी भावना से पात्र भरना
चाहिये।

१५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
यहाँ दो पात्रों का उल्लेख है। आदिम और द्वितीय। इसका तात्पर्य यह
है कि, इसमें तीसरे, चौथे, पाँचवें आदि पात्रों की कोई आवश्यकता नहीं।
गणपतिक्रम में एक मध्य पात्र का उल्लेख है, पर यहाँ उसका अध्याहार नहीं
होता। इतनी प्रक्रिया पूरी करने के उपरान्त त्रिकोण लेखन का क्रम आता है।
त्रिकोण सबके भीतर रहता है और चतुरस्र सबसे बाहर। यह त्रिकोण रेखामय
नहीं होता अपितु अक्षर त्रिकोण होता है। इसे अकथादि त्रिरेखाङ्कित कोणत्रय
कहते हैं।
अकथ शब्द सङ्केतात्मक है। 'अ' वर्ण से विसर्ग पर्यन्त १६ स्वरवर्णों
का बोध करते हैं। अर्थात् पहली रेखा सोलह स्वर वर्णों के क्रम से त्रिभुज
की पहली रेखा होती है। दूसरी रेखा क से त पर्यन्त व्यञ्जन वर्णों से बनती
है। इसमें कवर्ग के ५, चवर्ग के ५, टवर्ग के ५ और तवर्ग का एक वर्ण
मिलाकर ५ + ५ + ५ + १ = १६ वर्ण आते हैं। तीसरी रेखा पर 'ह' वर्ण
पर्यन्त अर्थात् तवर्ग के ४, पवर्ग के ५, यवर्ग के ४ और शवर्ग के ४ वर्ण
अर्थात् कुल ४ + ५ + ४ + ४ = १७ वर्ण आते हैं। इस प्रकार यह विषमबाहु
त्रिभुज बनता है। यह त्रिकोण संरचना बनायी नहीं जाती अपितु भावना अर्थात्
हाथ द्वारा संकेत संस्कार-भावना रूप होती है। स्वर रेखा पर 'हं' प्राणात्मक
वर्ण, क त रेखा पर 'ऊ' वर्ण और 'थ स' रेखा पर 'क्ष' वर्णों का प्रकल्पन
करते हैं। इस प्रक्रिया से वहाँ वर्तमान वातावरण दिव्य बन जाता है। इस त्रिकोण
के मध्य में 'हंसः' यह मन्त्र भी भावित किया जाना चाहिये।
तदनन्तर श्यामा मूल मन्त्र से पात्र को दश बार अभिमन्त्रित करना
चाहिये। अब चन्द्रकलाओं के अर्चन का क्रम अपनाया जाता है। तदनन्तर
अग्नि, ईशान, निऋति, वायु, मध्य और दिशाओं में षडङ्ग विन्यास कर अस्त्र
मन्त्र सें संरक्षित कर कवच से अवकुण्ठित कर धेनुमुद्रा का प्रदर्शन करना
चाहिये। पुनः योनिमुद्रा प्रदर्शित कर प्रणाम अर्पित करने का विधान है।।१९।।
इत्थं पात्रासादनमुक्त्वा श्रीदेवतायाः मूर्त्तिकल्पनामन्त्रमाह
चक्रमध्ये श्रीमुक्त्वा 'मातङ्गीश्वरीमूर्त्तये नमः' इति मूर्त्तिं कल्प-
यित्वा, भूयः श्रीमुक्त्वा 'मातङ्गीश्वर्यमृतचैतन्यमावाहयामि' इत्यावाह्य
षोडशभिरुपचर्य, आशुशुक्षणित्र्यक्षरक्षःप्रभञ्जनदिक्षु देव्या मौलौ
परितश्च पूज्या अङ्गदेव्यः। तन्मन्त्राः सर्वजनादयः, अष्टौ सप्तैकादश

श्यामाक्रमः १५३
पुनर्द्दशाष्टाविंशतिखण्डाः त्रितारी-कुमारी-वागादयः सजातयः
सामान्यमनुयुक्ताः ।।२०।।
चक्रमध्ये इति आवाह्येत्यनेनान्वितम्। श्रीं इत्यारभ्य प्रथमनम इत्यन्त
उत्त्वेत्यपहाय मूर्तिकल्पनमन्त्रः। द्वितीये श्रीं इत्यारभ्य आवाहयामीत्यन्त
उत्त्वावर्जम् आवाहनमन्त्रः। षोडशोपचाराः २।९ सूत्रे दर्शिताः। आशुशुक्षणिः
अग्निः। त्र्यक्षः ईशानः। रः निर्ऋतिः। प्रभञ्जनो वायुः। एषां दिक्षु उक्तक्रमेण
विदिक्ष्विति भावः। देव्या मौलौ मध्ये इत्यर्थः। प्रागादिदिक्षु अङ्गदेव्यः
षडङ्गदेव्यः पूज्याः, तासां मन्त्रान् वक्तुं प्रक्रमते—तन्मन्त्रा इति। मूलमन्त्रे
सर्वजनेत्यारभ्य षट् खण्डानि षडङ्गदेवीनां मन्त्रा बोध्याः, तत्रैकैकं कूटं
कियद्वर्णकमिति जिज्ञासायामाह—अष्टाविति। प्रथमखण्डमष्टवर्णम्। द्वितीयं
सप्तवर्णं, तृतीयम् एकादशवर्णं, चतुर्थपञ्चमौ दशवर्णौ, षष्ठम् अष्टाविंशति-
वर्णकमिति फलितम्।
न केवलं मूलमन्त्रघटकोक्तसङ्ख्याकवर्णा एव मन्त्रस्वरूपम्। अन्येऽपि
वर्णा योज्या इत्याह—त्रितारी-कुमारी-वाचः। आदौ एषां खण्डानां
जातिः हृदयाय शिरसे इत्यादि तैः सहिता सजातयः। इत्थं च मन्त्रस्वरूपम्
'ऐं ह्रीं श्रीं'—
१. ऐं क्लीं सौः ऐं सर्वजनमनोहारि हृदयाय नमः।
२. ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं सर्वसुखरञ्जनि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं सर्वराजवशङ्करि शिखायै वषट्।
४. ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः सर्वस्त्रीपुरुषवशङ्करि कवचाय हुं।
५. ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः सर्वदुष्टमृगवशङ्करि नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं सर्वसत्त्ववशङ्करि सर्वलोकवशङ्करि अमुकं मे
वशमानय स्वाहा। सौः क्लीं ऐं श्रीं ह्रीं ऐं अस्त्रायफट्—इति मन्त्रस्वरूपम्।
यद्यपि मन्त्रे त्रयस्त्रिंशद्वर्णा दृश्यन्ते सूत्रोक्ताष्टाविंशतिसङ्ख्ययाविरुद्ध्यते,
तथापि स्वाहान्ताः सप्तविंशतिवर्णा अग्रिमषड्बीजानि मिलित्वा श्रीषोडशाक्षर्यां

षष्ठ एवं सप्तम खण्ड: श्रीचक्र नवावरण पूजा एवं चक्र-विधान

१५४ परशुरामकल्पसूत्रम्

प्रविष्टपञ्चदशवर्णात्मककूटत्रये एकैककूटस्थैकैकवर्णत्ववत् षण्णां
वर्णानामेकवर्णत्वम्। इत्थं चाष्टाविंशतिसङ्ख्योपपन्ना॥२०॥
सूत्र में चक्रमध्य में जो उक्ति है, उसका अन्वय आवाह्य शब्द से करना
चाहिये। इसी तरह 'उक्त्वा' शब्द को हटाकर 'श्रीमातङ्गीश्वरीमूर्त्तये नमः' इस
मन्त्रात्मक शब्द का आन्तरिक भावन करने से देवी शक्ति की मूर्त्ति का भावन
हो जाता है। दूसरी बार सूत्र में पुनः श्रीं का उल्लेख है। इस मन्त्र के बीच
में 'श्रीं उक्त्वा' शब्द आया है। उसे हटाकर एक साथ 'श्रीमातङ्गीश्वर्यमृतचैतन्य-
मावाहयामि' बोलने पर एक मन्त्र बनता है। यह देवी के आवाहन का मन्त्र
माना जाता है।
आवाहन के बाद सोलह उपचारों से देवी का पूजन होना चाहिये। सोलह
उपचारों का वर्णन द्वितीय खण्ड के नवें सूत्र में किया गया है। वहाँ से देखना
चाहिये। आशुशुक्षणि अग्नि का पर्यायवाची शब्द है। अग्निकोण के लिये इसका
प्रयोग किया गया है। त्र्यक्ष का अर्थ त्रिनेत्र या त्रिलोचन होता है। ईशानकोण
के लिये इस शब्द का प्रयोग है। रक्षः राक्षस अर्थ वाचक शब्द है। यह निर्ऋति-
कोण के लिये प्रयुक्त है, निर्ऋति राक्षस ही है। वह दक्षिण-पश्चिम के मध्य कोण
में रहता है। इस कोण को नैऋत्यकोण कहते हैं। प्रभञ्जन वायु का पर्याय
शब्द है। वायु का कोण वायव्य कहलाता है। इन दिशाओं और विदिशाओं
में सर्वत्र व्याप्त देवी के मौलि भाग, मध्य भाग और चारों ओर अङ्गमय देवियों
की पूजा करने का विधान है।
साधक अपनी उपासना शक्ति से मातृशक्ति श्रीमातङ्गीश्वरी की मूर्त्ति की
कल्पना कैसे करता है? अपने औन्मनस और सामनस स्तर से माँ को कैसे
आवाहित करता है, यह सब अन्तर्याग के क्रम में सिद्ध गुरु ही जानता है,
दिशाओं-विदिशाओं में व्याप्त अङ्गशक्तियों की समन्त्रक पूजा का इस सूत्र में
सङ्केत मात्र है। यह सब गुरुगम्य औपासनिक रहस्य रूप ही है।
षडङ्गदेवियों की पूजा के मन्त्रों का उल्लेख संस्कृत व्याख्या में किया
जा चुका है। वहीं से उसका प्रयोग करने के लिये याद कर लेना चाहिये। पूरे
मन्त्र का उल्लेख भी इसी के साथ हो गया है।
जहाँ तक मन्त्र की वर्ण-संख्या का प्रश्न है, उसमें ३३ वर्ण दृष्टिगोचर
हो रहे हैं। सूत्र में अट्ठाइस सङ्ख्याओं का उल्लेख है। यह विरोध षोडशाक्षरी

श्यामाक्रमः १५५
में अन्तर्भूत पञ्चदशी के तीनों कूटों के एक वर्ण की तरह छः आदिवर्णों को
एक वर्ण और स्वाहान्त २७ वर्णों को मिलाकर अष्टाविंशत्यक्षर मानने पर मिट
जाता है॥२०॥
आवरणपूजा
पश्चादावरणपूजां कुर्यात् ।।२१।।
पश्चादितीदं सूत्रं व्यर्थमिव दृश्यते, तथापि तथा न मन्तव्यम्। तथा
हि— इदमावरणपूजोत्पत्तिवाक्यम्। अग्रिमवाक्यानि तदितिकर्तव्यता-
प्रपञ्चरूपाणि ।।२१।।
यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि, यह सूत्र अनावश्यक है। वस्तुतः यह
महत्त्वपूर्ण सूत्र आवरण-पूजा का मानो प्रवर्त्तन-सा करता हुआ प्रतीत हो रहा
है। यह तो एक प्रकार का 'उत्पत्तिवाक्य' ही है। आगे के एतद्विषयक सूत्र तो
मात्र इतिकर्त्तव्यता के प्रपञ्च मात्र हैं॥२१॥
अथ सर्वोपयोगिनीं काञ्चित् परिभाषामाह
सर्वचक्रदेवताऽर्चनानि वामकराङ्गुष्ठानामिकासन्दष्टद्वितीय-
शकलगृहीतश्रीपात्रप्रथमबिन्दुसहपतितैः दक्षकराक्षतपुष्पक्षेपैः
कुर्यात् ।।२२।।
सर्वचक्रदेवता गणपत्यादिपरान्ताः सामान्यपद्धत्या यक्ष्यमाणा अन्याश्च।
श्रीपात्रं विशेषार्घ्यपात्रम्। सहपतितैरित्यनेन बिन्दुपुष्पाक्षतयोः पतनम् एककाले,
इति सूचितम् ।।२२।।
‘गणपति’ से प्रारम्भ कर ‘परा’ पर्यन्त समस्त चक्र-देवता वर्ग का अर्चन
बाँयें हाथ के अँगूठे और अनामिका से दृढ़तापूर्वक गृहीत विशेषार्घ्य-पात्र से करे।
दक्ष हस्त के सहयोग से एक साथ जल-बिन्दुवों, फूलों और अक्षतों को नीचे
छोड़ने की विधि अपनाये॥२२॥
प्रथमावरणदेवतास्तत्स्थानं चाह
त्रिकोणे रतिप्रीतिमनोभवान् ।।२३।।

१५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अनुक्तत्वात् स्वाग्रादिप्रादक्षिण्यक्रमः। यद्वा आग्नेयकोणे, ततः
पश्चिमकोणे, तत ऐशाने तेनोदगपवर्गलाभः। इति प्रथमावरणम्॥२३॥
अर्चन क्रम में मन्त्र प्रयोग से सम्बन्धित नियम ध्यान में रखना चाहिये।
जब भी त्रिकोण में पूजन करना हो, तो देवता नाम के पहले त्रितारी का प्रयोग
अवश्य करें। दूसरी बात यह ध्यान देने की है कि, किस कोण से अर्चन आरम्भ
करना उचित है? सूत्र में उसका उल्लेख नहीं है। इसलिये गुरुदेव की आज्ञा
से, परम्परा से प्राप्त विधि के अनुसार ही पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। इसमें
व्याख्याकार दो बातें सामने रखते हैं—१. स्वाग्रप्रादक्षिण्य और २. अग्नि, पश्चिम
और ईशानकोण का क्रम। मन्त्र—
१. 'ऐं क्लीं सौः रतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' इति अग्निकोणे।
२. 'ऐं क्लीं सौः प्रीतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' इस मन्त्र से त्रिकोण
के अधःकोण में प्रीति देवी की पूजा करनी चाहिये।
३. 'ऐं क्लीं सौः मनोभवश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' ईशानकोण में
मनोभव की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार प्रथमावरण पूजन पूरा
होता है॥२३॥
द्वितीयावरणपूजास्थानादिकं दर्शयति
पञ्चारमूले पुर आदिक्रमेण द्रां द्रावणबाणाय द्रीं शोषणबाणाय
क्लीं बन्धनबाणाय, ब्लूं मोहनबाणाय सः उन्मादनबाणाय नम इति
तदग्रे मायाकामवाग्ब्लूं स्त्रीमुपजुष्टाः काममन्मथकन्दर्पमकरकेतन-
मनोभवाः॥२४॥
'नमः' इति सर्वमन्त्रेष्वनुसज्जते। पुरः प्राची। मूले पञ्चारकोणमूले।
तदग्रे इति, पञ्चारकोणाग्रेष्वित्यर्थः। मायादिपञ्चकैः क्रमेण युक्ताः। कामादयः
पूज्या इत्यर्थः। मन्त्रस्वरूपं तु—ह्रीं कामश्रीपादुकां पूजयामि। एवमग्रेऽपि।
पूर्ववत् चतुर्थ्यन्तनमोऽन्तरहितं ज्ञेयम्। इति द्वितीयावरणम्॥२४॥
पाँच अरों से सम्पन्न पञ्च अरों के मूल अर्थात् अग्रभाग पर पाँच बाणों
की पूजा का निर्देश इस सूत्र में दिया गया है।

श्यामाक्रमः १५७
१. द्रां बीज के द्रावणबाण का चतुर्थीरूप द्रावणबाणाय शब्द लगाकर नमः
जोड़ना चाहिये। जैसे 'द्रां द्रावणबाणाय नमः' यह इसका मूलमन्त्र होता है।
इसमें आदि में 'ऐं क्लीं सौः' और चतुर्थ्यन्त और 'नमः' बीच में 'श्रीपादुकां
पूजयामि तर्पयामि नमः' भी लगाते हैं। यह परम्परा है। यह पूर्वकोण की
पूजा है।
२. 'ऐं क्लीं सौः द्रीं शोषणबाणाय श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' यह मन्त्र
बनता है।
३. इसी तरह क्लीं बन्धनबाणाय नमः, ४. ब्लूं मोहनबाणाय नमः और
५. सः उन्मादनबाणाय नमः से ही पूजा करने पर पाँचों कोणों पर पञ्च
बाणों की पूजा सम्पन्न होती है। इसके बाद माया (ह्रीं) काम (क्लीं) वाग्
(ऐं) (ब्लूं) (स्त्रीं) से युक्त काम, मन्मथ, कन्दर्प, मकरकेतन, मनोभव इन
पाँच नामों के साथ त्रितारीयुक्त मन्त्र बनाकर पूजा करनी चाहिये।
उदाहरणरूप प्रथम मन्त्र जैसे—'ऐं क्लीं सौः ह्रीं कामश्रीपादुकां पूजयामि
तर्पयामि नमः'। इसी तरह 'क्लीं' से मन्मथ, ऐं से कन्दर्प, ब्लूं से
मकरकेतन, स्त्रीं से मनोभव के मन्त्र ऊहनपूर्वक बनाकर पूजा करनी चाहिये।
यह द्वितीय आवरण की पूजा मानी जाती है॥२४॥
तृतीयावरणपूजादेशादीनाह
अष्टदलमूले ब्राह्मी-माहेश्वरी-कौमारी-वैष्णवी-वाराही-
माहेन्द्री-चामुण्डा-चण्डिकाः सेन्दुस्वरयुग्मान्त्यादयः पूज्याः। तदग्रे
लक्ष्मी-सरस्वती-रति-प्रीति-कीर्त्ति-शान्ति-पुष्टि-तुष्टयः ॥२५॥
इन्दुना अनुस्वारेण, सहिता ये स्वरयुग्मेषु अं आं, इं ईं, उं ऊं, ऋं
ॠं, लं लूं, एं ऐं, ओं औं, अं अः, इत्यष्टसु अन्त्याः आं ईं ऊं ॠं लूं
ऐं औं अः इत्यष्टौ वर्णा आदौ एभिः क्रमेण युक्ता ब्राह्म्यादयः पूज्याः।
मन्त्रस्वरूपं यथा—आं ब्राह्मीश्रीपादुकां पूजयामि इति। तदग्रे इति अष्टदलाग्रे
इत्यर्थः। इति तृतीयावरणम् ॥२५॥
अष्टदल कमल के पूर्व दल के अग्रभाग से ब्राह्मी के क्रम से आठों दलों
पर आठ देवशक्तियों की पूजा की जाती है। सेन्दु का अर्थ अनुस्वारयुक्त होता

१५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
है। सोलह स्वरों में आठ स्वर युग्म (अर्थात् युगल या जोड़ा) होते हैं। इन
स्वरयुगलों के अन्त आठ 'आ' 'ई' 'ऊ' 'ॠ' 'लॄ' 'ऐ' 'औ' और 'अः' यदि
अनुस्वारयुक्त हो जाँय, तो 'आं' 'ईं' 'ऊं' 'ॠं' लॄं' 'ऐं' 'औं' और 'अंः' ये
आठ दीर्घ सेन्दु स्वर होते हैं। एक-एक शक्तियों के साथ लगाकर मन्त्र बनाने
का निर्देश सूत्रकार देते हैं। इसी क्रम में सूत्रनिर्दिष्ट आठों देवियों की पूजा भी
करनी चाहिये। उदाहरणरूप एक ब्राह्मी देवी का मन्त्र इस प्रकार बनाना
चाहिये—
१. 'ऐं क्लीं सौः 'आं' ब्राह्मीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। इसी तरह अन्य
सात देवियों के क्रमिक मन्त्र बनते हैं।
२. लक्ष्मी आदि उपदेवियों के लिये उदाहरणरूप एक मन्त्र इस प्रकार बनता
है—'ऐं क्लीं सौः लक्ष्मीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। गुह्य मन्त्र से
लक्ष्मी की पूजा होती है। इसी तरह क्रमशः सातों की पूजा सम्पन्न होती
है। यह तृतीयावरण पूजा है॥२५॥
चतुर्थावरणपूजास्थानान्याह
षोडशदले वामा-ज्येष्ठा-रौद्री-शान्ति-श्रद्धा-सरस्वती-क्रिया-
शक्ति-लक्ष्मी-सृष्टि-मोहिनी-प्रमथिनी-आश्वासिनी-वीची-विद्युन्-
मालिनी-सुरानन्दा-नागबुद्धिकाः ॥२६॥
अत्र क्रियाशक्तिः, विद्युन्मालिनी, सुरानन्दा इत्येकैका देवताः। शेषा
देवताः स्पष्टाः। क्रमस्यानुक्तत्वाद् देव्यग्रदलमारभ्य प्रादक्षिण्येन। इति
चतुर्थावरणम् ॥२६॥
सोलह दल वाले कमलों के दलों पर यह पूजा की जाती है। क्रम अनुक्त
होने के कारण देवी के अग्रदल से दक्षक्रम से पूजा प्रारम्भ की जाती है।
क्रियाशक्ति, विद्युन्मालिनी और सुरानन्दा एक-एक देवी के ही नाम हैं। इनकी
पूजा के लिये उदाहरणरूप एक मन्त्र इस प्रकार है—'ऐं क्लीं सौः वामा
श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। इसी तरह १६ देवियों के सोलह मन्त्रों से
चौथे आवरण की पूजा पूरी होती है॥२६॥

श्यामाक्रमः १५९
पञ्चमावरणदेशादीनाह
अष्टदले असिताङ्ग-रुरु-चण्ड-क्रोधन-उन्मत्त- कलाप-भीषण-
संहाराः सदण्डिस्वरयुग्मादिसंयुक्ता भैरवान्ताश्च भावनीयाः ॥२७॥
सदण्डीत्यत्र दण्डी अनुस्वारः 'दण्डी पञ्चदशः शून्यः' इति मेदिनी-
कोशात्। अनुस्वारेण सहिता ये पूर्वोक्तस्वरयुग्मादय आदौ तैर्युक्त्वा भैरवान्ताश्च
ये मन्त्रास्तैः पूज्या इत्यर्थः। यथा अं असिताङ्गभैरवश्रीपादुकां पूजयामि।
एवमेवाग्रिमसप्तमन्त्रा ऊह्याः। इति पञ्चमावरणम् ॥२७॥
दूसरे अष्टदल कमल के दलों पर सदण्डि अर्थात् अनुस्वारयुक्त षोडश
स्वरों के युग्म-युग्म भाग के आदि अक्षरों के साथ भैरवदेवों की पूजा का विधान
है। उदाहरण रूप प्रथम मन्त्र—'ऐं क्लीं सौः अं असिताङ्ग'भैरवश्रीपादुकां
पूजयामि तर्पयामि नमः' इस प्रकार का बनेगा। इसी प्रकार इं रुरु, उं चण्ड,
ऋं क्रोध, लूं उन्मत्त, एं कपाल, ओं भीषण, अं संहार भैरव के मन्त्रों का भी
ऊहन करना चाहिये ॥२७॥
षष्ठावरणदेवतामन्त्रादीनाह
चतुर्दलं मायूक्ततङ्गी सिद्धलक्ष्मीश्च महामायुक्ततङ्गी महासिद्ध-
लक्ष्मीश्च ॥२८॥
उभयत्रयुक्तेति ज्ञेयम्। तथा च मातङ्गी महामातङ्गीति सिद्धम्। शेषं
स्पष्टम्। मातङ्गी सिद्धलक्ष्मी, महामातङ्गी महासिद्धलक्ष्म्यश्चतस्रः पूज्या इति
विवेकः। इति षष्ठावरणम् ॥२८॥
इस आवरण-पूजन में केवल चार देवियों की पूजा त्रितारी के साथ की
जाती है। चार दलों पर चार देवियों की पूजा करनी चाहिये। उदाहरणस्वरूप
मन्त्र 'ऐं क्लीं सौः मातङ्गीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' बनता है। इसी तरह
सिद्धलक्ष्मी, महामातङ्गी, और महासिद्धलक्ष्मी पूजन का भी विधान है। यह छठें
आवरण की पूजा है। ॥२८॥
सप्तमावरणपूजामाह
गंगणपति, दुंदुर्गा, बंबटुक, क्षंक्षेत्रपालाः चतुरस्रे
सम्पूज्याः ॥२९॥

१६० परशुरामकल्पसूत्रम्
क्रमस्तु आग्नेयकोणमारभ्यैशानान्तकोणे इति सप्तमावरणम् ॥२९॥
सातवें आवरण में चतुरस्र के अग्निकोण से 'ऐं क्लीं सौः गं गणपति-
श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' ऐसे गणपति मन्त्र से गणपति की पूजा करनी
चाहिये। इसी तरह निऋति में 'दुं' बीज सहित दुर्गा की, वायव्य में बं बीज
सहित बटुक की और ईशान में 'क्षं' बीज सहित क्षेत्रपाल की पूजा करनी
चाहिये। यह सप्तमावरण की पूजा मानी जाती है॥२९॥
श्रीक्रमे तत्रान्तरे आम्नायादिदेवतावद् आवरणबहिर्भूतदेवतायजनमाह
'सां सरस्वत्यै नमः' इति प्रभृति 'वास्तुपतये ब्रह्मणे नमः'
इति-पर्यन्तं पुनस्तत्रैवाभ्यर्च्य ॥३०॥
तत्रैवेति पूर्वं यत्र न्यासोत्तरं पूजितास्तत्र तैरेव मन्त्रैः श्रीपादुकां पूजयामि
नमःसहितैः, यथा—सां सरस्वत्यै नमः सरस्वतीश्रीपादुकां पूजयामि नम इति।
एवमग्रेऽपि नमःपदान्ते श्रीपादुकामिति योगस्तु सूत्रे नमोऽन्तानुकरणेन
सूचितः ॥३०॥
इसी क्रम के सूत्र १४ में पहले सरस्वती, लक्ष्मी, शङ्खनिधि, पद्मानिधि,
इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, ब्रह्मा, विष्णु और
वास्तुपति की एकादश दिशाओं की पूजा का उल्लेख है। उसी क्रम को यहाँ
भी अपनाना चाहिये॥३०॥
श्रीश्यामाविद्याप्रवर्त्तकाचार्यपूजां तेषां स्थानान्याह
हंसमूर्त्तिपरप्रकाशपूर्णनित्यकरुणसम्प्रदायगुरूँश्चतुरस्रपूर्वरिखा-
यामभ्यर्च्य ॥३१॥
हंसमूर्त्तिश्च, परप्रकाशश्च, पूर्णश्च, नित्यश्च, करुणश्च ये ते
सम्प्रदायगुरुवस्तान् चतुरस्रपूर्वरिखायाम्। उदगपवर्गं पूजयेद् इति तदर्थः।
मन्त्रस्वरूपञ्च 'हंसमूर्त्तिसम्प्रदायगुरुश्रीपादुकां पूजयामि। एवमग्रिममन्त्रेष्वपि
सम्प्रदायगुरु इति योज्यम्, द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं प्रत्येकं सर्वत्र सम्बन्ध्यत इति
न्यायात् ॥३१॥

श्यामाक्रमः १६१
हंसमूर्त्ति, परप्रकाश, पूर्ण, नित्य और करुण गुरु सम्प्रदाय प्रवर्त्तक गुरु
हैं। द्वन्द्व समास के अन्त में सम्प्रदाय गुरु शब्द का प्रयोग सभी के साथ लगाने
का नियम है। मन्त्र का उदाहरण सूत्रानुसार 'हंसमूर्त्ति-सम्प्रदाय-गुरुश्रीपादुकां
पूजयामि नमः' इस प्रकार का होगा। इसमें भी त्रितारी और कुमारी प्रयोग किया
जा सकता है। तर्पयामि शब्द का प्रयोग भी परम्परा में है।।३१।।
एवं चक्रपूजां समाप्य गुरुपादुकापूजामाह
स्वशिरसि सामान्यविशेषपादुके अभ्यर्चयेत् ।।३२।।
सामान्यगुरुपादुकामन्त्रो दीक्षाखण्डे प्रतिपादितः। विशेषगुरुपादुकामन्त्रः
चरमखण्डे श्यामागुरुपादुके(सू.४४)त्युद्धृतः। ताभ्यां मन्त्राभ्यां स्वशिरसि
पादुकाद्वयं पूजयेत् ।।३२।।
गुरुदेव की चरणपादुकायें अभिव्यक्त रहस्यमयी शक्तियाँ मानी जाती हैं।
इन्हें अपने शिर पर रखने से और सामान्य-विशेष मन्त्रमय पूजन से शिष्य के
शरीर में दिव्यता का सञ्चार होता है। सामान्य मन्त्र का उल्लेख दीक्षा-खण्ड
के सूत्र ४१ में वर्णित है।
सामान्य पादुका मन्त्र में त्रितारी कुमारी और ऐं ग्लौं इतना जोड़कर
'हस्खफ्रें हसक्षमलवरयूं सहक्षमलवरयीं हसौः सहौः, मन्त्र बोलते हैं। विशेष पूजा
में त्रितारी 'ऐं ग्लौं' नहीं लगाते हैं। इस पर ध्यान देना चाहिये ।।३२।।
एवं गुरुपादुकार्चना-आवरणपूजामुक्तवा प्रधानदेवतापूजापुरःसरं बलिदानं
विवृणोति
पुनर्देवीमभ्यर्च्य बालया षोडशोपचारान् विधाय ।।३३।।
मूलेनेति शेषः। पुनरित्यनेन षडङ्गदेवताभ्यः प्राक् प्रधानदेव्यर्चनं
ज्ञापितम्। बालयेति स्पष्टम् ।।३३।।
आवरणपूजा और गुरुपादुका-पूजा के बाद पुनः देवी श्यामा की पूजा
करनी चाहिये। बाला मन्त्र से षोडशोपचार पूजन का क्रम अपनाना विधिविहित
है। षोडशोपचार में पाद्यार्घ्याचमनीय, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, छत्र, चामर, दर्पण, आभूषण गृहीत हैं।।३३।।

१६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
बलिदानप्रकारं दर्शयति
शुद्धजलेन त्रिकोणवृत्तचतुरस्रं विधायार्धान्नपूर्णसलिलसादि-
मोपादिममध्यमं सु(स)गन्धपुष्पं साधारं पात्रं निधाय ।।३४।।
शुद्धजलेन कलशस्थेन। अर्धान्नपूर्णं सलिलं यस्मिंस्तत्। आदिमं
प्रथमम्। उपादिमं द्वितीयं, मध्यमं तृतीयम्, एभिः सहितं सुगन्धपुष्पं यत्र,
ईदृशम् आधारसहितं बलिपात्रं निधाय स्थापयित्वा ।।३४।।
यहाँ शुद्ध जल से ही मण्डल-प्रकल्पन कर लेना चाहिये। कलशस्थित
जल ही शुद्ध जल माना जाता है। इसकी सामान्य पुष्पविकीर्णन से अर्चना करने
के उपरान्त साधार पात्र की स्थापना करे। उस पात्र को आधा अन्न और आधा
जल से आपूरित कर उस पात्र में गन्ध, पुष्प आदि का प्रक्षेप करे, जिससे
वहाँ का वातावरण आकर्षक और मनोहारी प्रतीत हो। जहाँ तक पात्र का प्रश्न
है, उसके सम्बन्ध में आदिम, उपादिम और मध्य शब्दों का पात्र के विशेषण
रूप में प्रयोग सूत्र में दिया गया है। अर्थात् तीन बलिपात्र अपेक्षित हैं।।३४।।
बलिदानमन्त्रान् तदितिकर्त्तव्यतां च दर्शयति
श्रीमातमुक्त्वा गीश्वरीमं बलिं गृह गृह हुं फट् स्वाहा।
श्रीमातमुक्त्वा गीश्वरि शरणागतं मां त्राहि त्राहि हुं फट् स्वाहा।
क्षेत्रपालनाथेमं बलिं गृह गृह फट् स्वाहा। इति मन्त्रत्रयेण
वामपाष्णिघातकरास्फोटसमुदञ्चित-वक्त्रनाराच-मुद्राभिः बलिं
प्रदाय ।।३५।।
श्रीमातमिति हुंफट् स्वाहेत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। नाराचमुद्रा प्रसिद्धा ।।३५।।
१. प्रथम मन्त्र—ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि इमं बलिं गृह गृह हुं फट् स्वाहा।
२. दूसरा मन्त्र—ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि शरणागतं मां त्राहि त्राहि हुं फट्
स्वाहा।
३. तीसरा मन्त्र—ऐं क्लीं सौः क्षेत्रपाल नाथ इमं बलिं गृह गृह हुँ फट् स्वाहा।
इन मन्त्रों का क्रमशः पाठ करते हुए देवी के दक्षिण भाग में इन तीन
बलियों को अर्पित करना चाहिये। फिर बलि को दूध से नहलाना चाहिये। फिर

श्यामाक्रमः १६३
बायीं एड़ी के घात के साथ करास्फोट करते उत्तर ओर मुँह करके नाराच मुद्रा
से बलि अर्पित कर देना चाहिये।
इसके बाद में हाथ-मुँह धोकर माँ को प्रणाम करने के बाद अन्य कार्यों
में प्रवृत्त होना चाहिये॥३५॥
एवं बलिप्रदानक्रममुक्त्वा सुवासिनीपूजादिकमुपदिशति
श्यामलां शक्तिमाहूय बालया तामभ्यर्च्य तस्या हस्त
आदिमोपादिमौ दत्त्वा तत्त्वं शोधयित्वा तच्छेषमुररीकृत्य योग्यैः सह
हविःशेषं स्वीकुर्यात्।।३६।।
अभ्यर्च्येति विशेषानुक्तेः, यथाविभवम्। तत्त्वं शोधयित्वा इत्यनेन
तत्त्वशोधनमन्त्रा अपि प्राप्ताः। ते च मन्त्राश्चत्वारः प्रसिद्धाः। तैः पात्रचतुष्टयं
ग्राहयित्वा चतुर्थपात्रं सशेषं ग्राहयित्वा तच्छेषं स्वयम् उररीकुर्यात्।
हविश्शेषप्रतिपत्तिमाह—योग्यैरिति। योग्यपदार्थः श्रीक्रमोक्तशिष्टपदेन
व्याख्यातः। इत्थं च तस्य प्रयोजनं तदितिकर्तव्यता, तत् सर्वमपि श्रीक्रमोक्त-
प्रकारेणावगन्तव्यं भवति ।।३६।।
बलिक्रिया के अनन्तर श्यामला शक्ति का आवाहन कर बाला मन्त्र से
उसकी पूजा होनी चाहिये। पूजा के लिये सूत्रकार का स्पष्ट निर्देश है कि,
बाला से पूजा की जानी चाहिये। तत्त्वशोधन मन्त्र प्रसिद्ध है। दीक्षा प्रकरण
के सूत्र ३९ में इसकी चर्चा की गयी है। उन शक्तियों को सभी पात्र समर्पित
कर चतुर्थ पात्र का शेष अंश स्वयं ग्रहण करना चाहिये। खण्ड ५।२२ सूत्र
की व्याख्या में शिष्टशब्द की व्याख्या है। श्रीक्रम के अनुसार सारा समायोजन
उचित है ।।३६।।
एवं सङ्गीतमातृकापूजा कियत्कालं कर्त्तव्या, इत्याकाङ्क्षायां तदवधिमाह
एवं नित्यसपर्यां कुर्वन् लक्षजपं जप्त्वा तद्दशांशक्रमेण होम-
तर्पण-ब्राह्मणभोजनानि विदध्यात् ।।३७।।
एवमुक्तप्रकारेण नित्यसपर्यां नित्यपूजाम्, अत्र कुर्वन्नित्यनेन पूजनस्य
जपाङ्गत्वं गमयति। अतः जपः प्रधानं, तदवधित्वस्य पूजायां कथनात्। अत

१६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एव जपसमाप्तौ पूजानिवृत्तिः। लक्षजपं जप्त्वेति लक्षसंख्याविशिष्टजपोऽनेन
विधीयते। तद्दशांशक्रमेण होमो जपदशांशं, तद्दशांशं तर्पणम्, तद्दशांशं
ब्राह्मणभोजनम् ।।३७।।
सूत्रकार का यह निर्देश है कि, सपर्या नित्य करनी चाहिये। तदनन्तर
जप का विधान है। जप की संख्या भी एक लाख होनी चाहिये। ऐसा निर्देश
है। इस सन्दर्भ में यह ध्यान देना आवश्यक है कि, पूजा प्रधान नहीं होती।
प्रधान जप होता है और पूजा उसकी अङ्ग होती है। एक लाख जप, दश हजार
होम, १ हजार तर्पण और सौ ब्राह्मण भोजन का क्रम अपनाना चाहिये। श्यामा
मन्त्र जप करने वाले के लिये विशेष आचार पालन की भी पद्धति अपनानी
चाहिये ।।३७।।
अथैतन्मनुजापिधर्मानाह
एतन्मनुजापी न कदम्बं छिन्द्यात्, गिरा कालीति न वदेत्।
वीणावेणुनर्त्तन-गायन-गाथा-गोष्ठीषु च न पराङ्मुखो गच्छेत्।
गायकं न निन्द्यात् ।।३८।।
एते धर्मा न जपसमकालिकाः किन्तु जपमारभ्य यावज्जीवम् ।।३८।।
श्यामा मन्त्र जपकर्त्ता आरम्भ काल से जीवनपर्यन्त करे। वह कदम्ब वृक्ष
न काटे। 'काली' शब्द का उच्चारण मुख से न करे। वीणा, वंशा, मूर्च्छना,
नृत्य, संगीत, गाथा, गोष्ठी में रुचि ले। गायक और गायन की कभी निन्दा
न करे।।३८।।
एवं श्यामोपासकानां धर्मानुक्त्वा प्रसङ्गात् ललितोपासकधर्मानप्याह
ललितोपासको नेक्षुखण्डं भक्षयेत्, न दिवा स्मरेद् वार्त्तालीं,
न जुगुप्सेत सिद्धद्रव्याणि, न कुर्यात् स्त्रीषु निष्ठुरतां, वीरस्त्रियं न
गच्छेत्। न तां हन्यात्, न तद्द्रव्यमपहरेत्। नात्मेच्छया मपञ्चक-
मुररीकुर्यात्, कुलभ्रष्टैः सह नासीत, न बहु प्रलपेत्, योषितं
सम्भाषमाणामप्रतिसम्भाषमाणो न गच्छेत्, कुलपुस्तकानि गोपायेत्।
इति शिवम् ।।३९।।

श्यामाक्रमः १६५
इक्षुखण्डमित्यनेन तद्विकाराणाम् गुडशर्करादीनाम् अदोषः सूचितः।
वार्त्तालीं वाराहीम्। सिद्धद्रव्याणि मपञ्चकरूपाणि न जुगुप्सेत। स्वमनसाऽपि न
निन्द्याद् निष्ठुरतां नासिकाच्छेदनादि। वीरस्त्रियमिति षष्ठीतत्पुरुषः, न
कर्मधारयः। न तं हन्याद् इत्यत्र पुंस्त्वस्यानन्वयानुपपत्तेः। तं वीरं। तद्द्रव्यं
वीरद्रव्यम्। आत्मेच्छया स्वेन्द्रियतृप्तये। उररीकुर्यात् स्वीकुर्यात्। अप्रति-
सम्भाषमाणः प्रत्युत्तरमदत्त्वा कुलपुस्तकानि कुलशास्त्रपुस्तकानि।।३९।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) श्यामाक्रमो
नाम षष्ठः खण्डः सम्पूर्णः ।।६।।
ललितोपासक के आचार—
१. ऊख (गन्ना) न चूसे। २. दिन में वाराही का स्मरण न करे। ३.
मपञ्चक द्रव्यों की निन्दा न करे। ४. स्त्रियों के प्रति निष्ठुर न बने। नाक, कान
आदि का छेदन न करे। ५. वीरों की स्त्रियों को सहतल्पभागी न बनाये। वीर-
वध न करे। वीर द्रव्यों का अपहरण न करे। ६. अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिये
मपञ्चक का उपयोग न करे। ७. कुलाचारहीन व्यक्ति के साथ कभी न रहे। ८.
बक बक न करे। ९. एक स्त्री बात करना चाहे या कर रही हो, तो उससे
स्वयं भी बातें करें। १०. कुल-पुस्तकों की रक्षा करे। ये आचार अत्यन्त
आवश्यक और अनिवार्य हैं। ललितोपासक को इन नियमों को मनोयोगपूर्वक
निभाना चाहिये।।३९।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का श्यामाक्रम नामक षष्ठ खण्ड परिपूर्ण ।।६।।
।। शुभं भूयात् ।।

वाराहीक्रमः
[ सप्तमः खण्डः ]
अथ वाराह्युपासनां वक्तुं प्रक्रमते
इत्थं साङ्गां सङ्गीतमातृकामिष्ट्वा संवित्साम्राज्ञी सिंहासना-
धिरूढाया ललिताया महाराज्ञा दण्डनायिकास्थानीयां दुष्टनिग्रह-
शिष्टानुग्रहनिर्गलाज्ञाचक्रां समयसङ्केतां कोलमुखीं विधि-
वद्वरिवस्येत् ।। १ ।।
इत्थं पूर्वोक्तप्रकारेण साङ्गां सावरणां सङ्गीतमातृकां मातङ्गीमिष्ट्वा
सम्पूज्य समुपास्य। अनेन सङ्गीतमातृकायागोत्तरकालस्य श्रीवाराह्युपासनाङ्गत्त्व-
मात्रं विधीयते। संविदः परशिवस्य वा साम्राज्ञी पट्टमहिषी तद्रूपायाः सिंहासनं
राज्ञः सदसि सर्वोत्तमत्वेनावस्थितमासनं तदधिरूढाया ललिताया महाराज्ञा
दण्डनायिकाया यत् स्थानं, तदीया स्वामिनी दुष्टनिग्रहाधिकारवती या ताम्।
दुष्टनिग्रहादौ निरर्गलम् अन्यानपेक्षं यदाज्ञाचक्रं तद्वतीम्। समयो गुप्तः सङ्केतः
शास्त्रपद्धतिर्यस्यास्तां 'समयो रहसि प्रोक्तः काले कार्यक्षमेऽपि वा' इति
त्र्यक्षरकोशः (विश्वकोषः)। कोलो वराहस्तस्य मुखमिव मुखं यस्यास्तां विधिवद्
वरिवस्येत् पूजयेत् ।।१।।
छठें खण्ड में सङ्गीतमातृका माता मातङ्गी की पूजा की चर्चा है। उस
विधान को पूरा करने के बाद ही वाराही उपासना की विधि अपनायी जानी
चाहिये। यहाँ इष्ट्वा में पूर्वकालिकक्रिया का प्रयोग है। अतः पूर्वकाल में
सङ्गीतमातृका मातङ्गी की उपासना प्रधान उपासना के रूप में पूरी कर लेने के
बाद ही अङ्गपूजा के रूप में वाराही माँ की पूजा करनी चाहिये। संवित् साम्राज्ञी

वाराहीक्रमः १६७
परशिवशक्तिमयी संविन्मयी पट्टमहिषी सिंहासनासीन राजराजेश्वरी ललिताम्बा की
दण्डनायिका माँ वाराही सर्वथा प्रणम्य और पूज्य हैं। दुष्टों को नियन्त्रित करने
और शिष्टों पर अनुग्रह करने के निरर्गल अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा
आज्ञा के अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा आज्ञा की अधिकारिणी कोल
के समान मुखवाली माँ वाराही की उपासना करनी चाहिये। यह अत्यन्त
रहस्यमयी समयसङ्केता विद्या है।।१।।
तत्र कथंभावाकाङ्क्षायामाह
तत्रायं क्रमो महारात्रे बुद्ध्वा स्वहृदयपरमाकाशे ध्वनन्त-
मनाहतध्वनिमूर्जितानन्ददायकमवमृश्य ।।२।।
तत्र वाराह्युपास्तावायं क्रमः प्रकारः। महारात्रे इति। धूर्त्तस्वामिभाष्ये
महारात्रिस्त्रिभागावशिष्टा रात्रिः। यद्वा महारात्रिः निशीथः। 'महारात्रिसमुत्पन्नः
कृष्णो गोपालनन्दनः' इति ब्रह्मवैवर्त्तात्। कृष्णजन्मार्धरात्रे इति प्रसिद्धत्वात्।
तस्मिन् समये बोधोत्तरकालीनक्रियामाह—स्वहृदयेति। स्वहृदयरूपो यः परम
उत्कृष्ट आकाशस्तस्मिन् ध्वनन्तं शब्दं कुर्वन्तम् अनाहतस्य द्वादशदल-
कमलस्य ध्वनिं कराभ्यां कर्णपिधाने श्रूयमाणे यः शब्दः सोऽनाहतशब्द
इत्युच्यते। स मध्यरात्रे कर्णपिधानाभावेऽपि अनुभूयते। कथंभूतम्? ऊर्जितः
सिद्धो य आनन्दस्तस्य दायकम्। अभिव्यञ्जकम् अवमृश्य अनुसन्धाय कञ्चित्
कालं श्रुत्वेत्यर्थः ।।२।।
वाराही की उपासना का यह निर्धारित क्रम है। 'महारात्र' एक योगरूढ
शब्द है। 'धूर्त्तस्वामी' नामक भाष्यकार ने इसके भाष्य के सन्दर्भ में 'महारात्र'
का एक विग्रह प्रस्तुत किया था। उसके अनुसार त्रिभागावशिष्ट रात्रिकाल ही
महारात्र मानना चाहिये। रात्रि की बारह घड़ी के समय को तीन भागों में बाँटने
पर और आठ घड़ी बीत जाने पर शेष चार घड़ी रात को महारात्र की संज्ञा
दी जाती है।
एक दूसरा अर्थ भी अभिप्रेत है। अर्धरात्रि को निशीथ कहते हैं। यह
निशीथ काल ही महारात्र काल है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में यह उल्लेख है कि, भगवान्
श्रीकृष्ण महारात्रिकाल में उत्पन्न हुए थे। यह लोकप्रसिद्ध सत्य है। जन्माष्टमी

१६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
की अर्धरात्रि में ही कृष्णजन्म मनाया जाता है। अर्धरात्रि का निशीथ समय चतुर्थ
सन्ध्या का पुण्यप्रद समय भी है। उपासक उस अवस्था का एकान्त सदुपयोग
करता है। उस समय श्रीविद्यासाधक को अनिवार्यतः जगे रहना चाहिये। जगकर
उस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्देश कर रहे हैं—
शरीर की संरचना की ओर साधक का ध्यान आकृष्ट करते हुए सूत्रकार
कह रहे हैं कि, मनुष्य का हृदय एक आकाश है। यह परम उत्कृष्ट आकाश
है, उस द्वादशदल कमल रूप आकाश-देश से एक स्वाभाविक शब्द ध्वनित
होता रहता है। हाथों से कान दबा लेने पर वह विचित्र शब्द सुनाई पड़ता
है। वह मध्यरात्र में बाह्य शब्दों के शान्त रहने पर कान विना बन्द किये
भी सुनाई देता है। यह श्रवण एक प्रकार का श्रवणानुभव सदृश माना जाता
है। उस अनाहत शब्द की श्रुत्यनुभूति में एक प्रकार की आनन्दमयी ऊर्जा
का उल्लास होता है। ऐसे ऊर्जस्वल आनन्द को प्रदान करने वाली यह
अनाहत ध्वनि है। इसका अनुसन्धान साधक को उस समय अवश्य करना
चाहिये॥२॥
शिवादिगुरुनमस्कारः
‘शिवादिश्रीगुरुभ्यो नमः’ इति मूर्ध्नि बध्नीयादञ्जलिम् ॥३॥
शिवादि इति स्पष्टम् ॥३॥
आदिगुरु शिव माने जाते हैं। गुरुजनों के प्रणाम करने के अवसर पर
सर्वप्रथम शिव को ही नमस्कार करना चाहिये। इसके बाद अन्य गुरुजनों का
नमस्कार विहित है। प्रणाम करते हुए शिर पर अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाने
का भी क्रम अपनाना चाहिये। इस प्रक्रिया में श्रद्धा का प्राधान्य रहना
चाहिये॥३॥
वाराहीपद्धतौ सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषस्य योगमाह
वाचमुच्चार्य ‘ग्लौं’ इति च पद्धतावस्यां सर्वे मनवो
जप्याः ॥४॥
अस्यां पद्धतौ सर्वमन्त्रादौ, ‘ऐं ग्लौं’ इति योज्यमित्यर्थः ॥४॥