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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 320 में से

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पृष्ठ 198

१५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
अनुक्तत्वात् स्वाग्रादिप्रादक्षिण्यक्रमः। यद्वा आग्नेयकोणे, ततः
पश्चिमकोणे, तत ऐशाने तेनोदगपवर्गलाभः। इति प्रथमावरणम्॥२३॥
अर्चन क्रम में मन्त्र प्रयोग से सम्बन्धित नियम ध्यान में रखना चाहिये।
जब भी त्रिकोण में पूजन करना हो, तो देवता नाम के पहले त्रितारी का प्रयोग
अवश्य करें। दूसरी बात यह ध्यान देने की है कि, किस कोण से अर्चन आरम्भ
करना उचित है? सूत्र में उसका उल्लेख नहीं है। इसलिये गुरुदेव की आज्ञा
से, परम्परा से प्राप्त विधि के अनुसार ही पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। इसमें
व्याख्याकार दो बातें सामने रखते हैं—१. स्वाग्रप्रादक्षिण्य और २. अग्नि, पश्चिम
और ईशानकोण का क्रम। मन्त्र—
१. 'ऐं क्लीं सौः रतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' इति अग्निकोणे।
२. 'ऐं क्लीं सौः प्रीतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' इस मन्त्र से त्रिकोण
के अधःकोण में प्रीति देवी की पूजा करनी चाहिये।
३. 'ऐं क्लीं सौः मनोभवश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' ईशानकोण में
मनोभव की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार प्रथमावरण पूजन पूरा
होता है॥२३॥
द्वितीयावरणपूजास्थानादिकं दर्शयति
पञ्चारमूले पुर आदिक्रमेण द्रां द्रावणबाणाय द्रीं शोषणबाणाय
क्लीं बन्धनबाणाय, ब्लूं मोहनबाणाय सः उन्मादनबाणाय नम इति
तदग्रे मायाकामवाग्ब्लूं स्त्रीमुपजुष्टाः काममन्मथकन्दर्पमकरकेतन-
मनोभवाः॥२४॥
'नमः' इति सर्वमन्त्रेष्वनुसज्जते। पुरः प्राची। मूले पञ्चारकोणमूले।
तदग्रे इति, पञ्चारकोणाग्रेष्वित्यर्थः। मायादिपञ्चकैः क्रमेण युक्ताः। कामादयः
पूज्या इत्यर्थः। मन्त्रस्वरूपं तु—ह्रीं कामश्रीपादुकां पूजयामि। एवमग्रेऽपि।
पूर्ववत् चतुर्थ्यन्तनमोऽन्तरहितं ज्ञेयम्। इति द्वितीयावरणम्॥२४॥
पाँच अरों से सम्पन्न पञ्च अरों के मूल अर्थात् अग्रभाग पर पाँच बाणों
की पूजा का निर्देश इस सूत्र में दिया गया है।