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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 320 में से

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पृष्ठ 194

१५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
यहाँ दो पात्रों का उल्लेख है। आदिम और द्वितीय। इसका तात्पर्य यह
है कि, इसमें तीसरे, चौथे, पाँचवें आदि पात्रों की कोई आवश्यकता नहीं।
गणपतिक्रम में एक मध्य पात्र का उल्लेख है, पर यहाँ उसका अध्याहार नहीं
होता। इतनी प्रक्रिया पूरी करने के उपरान्त त्रिकोण लेखन का क्रम आता है।
त्रिकोण सबके भीतर रहता है और चतुरस्र सबसे बाहर। यह त्रिकोण रेखामय
नहीं होता अपितु अक्षर त्रिकोण होता है। इसे अकथादि त्रिरेखाङ्कित कोणत्रय
कहते हैं।
अकथ शब्द सङ्केतात्मक है। 'अ' वर्ण से विसर्ग पर्यन्त १६ स्वरवर्णों
का बोध करते हैं। अर्थात् पहली रेखा सोलह स्वर वर्णों के क्रम से त्रिभुज
की पहली रेखा होती है। दूसरी रेखा क से त पर्यन्त व्यञ्जन वर्णों से बनती
है। इसमें कवर्ग के ५, चवर्ग के ५, टवर्ग के ५ और तवर्ग का एक वर्ण
मिलाकर ५ + ५ + ५ + १ = १६ वर्ण आते हैं। तीसरी रेखा पर 'ह' वर्ण
पर्यन्त अर्थात् तवर्ग के ४, पवर्ग के ५, यवर्ग के ४ और शवर्ग के ४ वर्ण
अर्थात् कुल ४ + ५ + ४ + ४ = १७ वर्ण आते हैं। इस प्रकार यह विषमबाहु
त्रिभुज बनता है। यह त्रिकोण संरचना बनायी नहीं जाती अपितु भावना अर्थात्
हाथ द्वारा संकेत संस्कार-भावना रूप होती है। स्वर रेखा पर 'हं' प्राणात्मक
वर्ण, क त रेखा पर 'ऊ' वर्ण और 'थ स' रेखा पर 'क्ष' वर्णों का प्रकल्पन
करते हैं। इस प्रक्रिया से वहाँ वर्तमान वातावरण दिव्य बन जाता है। इस त्रिकोण
के मध्य में 'हंसः' यह मन्त्र भी भावित किया जाना चाहिये।
तदनन्तर श्यामा मूल मन्त्र से पात्र को दश बार अभिमन्त्रित करना
चाहिये। अब चन्द्रकलाओं के अर्चन का क्रम अपनाया जाता है। तदनन्तर
अग्नि, ईशान, निऋति, वायु, मध्य और दिशाओं में षडङ्ग विन्यास कर अस्त्र
मन्त्र सें संरक्षित कर कवच से अवकुण्ठित कर धेनुमुद्रा का प्रदर्शन करना
चाहिये। पुनः योनिमुद्रा प्रदर्शित कर प्रणाम अर्पित करने का विधान है।।१९।।
इत्थं पात्रासादनमुक्त्वा श्रीदेवतायाः मूर्त्तिकल्पनामन्त्रमाह
चक्रमध्ये श्रीमुक्त्वा 'मातङ्गीश्वरीमूर्त्तये नमः' इति मूर्त्तिं कल्प-
यित्वा, भूयः श्रीमुक्त्वा 'मातङ्गीश्वर्यमृतचैतन्यमावाहयामि' इत्यावाह्य
षोडशभिरुपचर्य, आशुशुक्षणित्र्यक्षरक्षःप्रभञ्जनदिक्षु देव्या मौलौ
परितश्च पूज्या अङ्गदेव्यः। तन्मन्त्राः सर्वजनादयः, अष्टौ सप्तैकादश