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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 320 में से

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पृष्ठ 196

१५४ परशुरामकल्पसूत्रम्

प्रविष्टपञ्चदशवर्णात्मककूटत्रये एकैककूटस्थैकैकवर्णत्ववत् षण्णां
वर्णानामेकवर्णत्वम्। इत्थं चाष्टाविंशतिसङ्ख्योपपन्ना॥२०॥
सूत्र में चक्रमध्य में जो उक्ति है, उसका अन्वय आवाह्य शब्द से करना
चाहिये। इसी तरह 'उक्त्वा' शब्द को हटाकर 'श्रीमातङ्गीश्वरीमूर्त्तये नमः' इस
मन्त्रात्मक शब्द का आन्तरिक भावन करने से देवी शक्ति की मूर्त्ति का भावन
हो जाता है। दूसरी बार सूत्र में पुनः श्रीं का उल्लेख है। इस मन्त्र के बीच
में 'श्रीं उक्त्वा' शब्द आया है। उसे हटाकर एक साथ 'श्रीमातङ्गीश्वर्यमृतचैतन्य-
मावाहयामि' बोलने पर एक मन्त्र बनता है। यह देवी के आवाहन का मन्त्र
माना जाता है।
आवाहन के बाद सोलह उपचारों से देवी का पूजन होना चाहिये। सोलह
उपचारों का वर्णन द्वितीय खण्ड के नवें सूत्र में किया गया है। वहाँ से देखना
चाहिये। आशुशुक्षणि अग्नि का पर्यायवाची शब्द है। अग्निकोण के लिये इसका
प्रयोग किया गया है। त्र्यक्ष का अर्थ त्रिनेत्र या त्रिलोचन होता है। ईशानकोण
के लिये इस शब्द का प्रयोग है। रक्षः राक्षस अर्थ वाचक शब्द है। यह निर्ऋति-
कोण के लिये प्रयुक्त है, निर्ऋति राक्षस ही है। वह दक्षिण-पश्चिम के मध्य कोण
में रहता है। इस कोण को नैऋत्यकोण कहते हैं। प्रभञ्जन वायु का पर्याय
शब्द है। वायु का कोण वायव्य कहलाता है। इन दिशाओं और विदिशाओं
में सर्वत्र व्याप्त देवी के मौलि भाग, मध्य भाग और चारों ओर अङ्गमय देवियों
की पूजा करने का विधान है।
साधक अपनी उपासना शक्ति से मातृशक्ति श्रीमातङ्गीश्वरी की मूर्त्ति की
कल्पना कैसे करता है? अपने औन्मनस और सामनस स्तर से माँ को कैसे
आवाहित करता है, यह सब अन्तर्याग के क्रम में सिद्ध गुरु ही जानता है,
दिशाओं-विदिशाओं में व्याप्त अङ्गशक्तियों की समन्त्रक पूजा का इस सूत्र में
सङ्केत मात्र है। यह सब गुरुगम्य औपासनिक रहस्य रूप ही है।
षडङ्गदेवियों की पूजा के मन्त्रों का उल्लेख संस्कृत व्याख्या में किया
जा चुका है। वहीं से उसका प्रयोग करने के लिये याद कर लेना चाहिये। पूरे
मन्त्र का उल्लेख भी इसी के साथ हो गया है।
जहाँ तक मन्त्र की वर्ण-संख्या का प्रश्न है, उसमें ३३ वर्ण दृष्टिगोचर
हो रहे हैं। सूत्र में अट्ठाइस सङ्ख्याओं का उल्लेख है। यह विरोध षोडशाक्षरी