परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 193, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्यामाक्रमः १५१
सूत्र में ताभिः (उनके द्वारा) शब्द का प्रयोग सबसे पहले किया गया
है। यह तत् शब्द पूर्वपरामर्शक होता है। इससे पहले कहे गये सामान्य अर्घ्य
जल सम्बन्धी बिन्दुओं से यह अर्थ निकालना चाहिये।
ईकाराङ्कित शब्द त्रिकोण का विशेषण है। अर्थात् त्रिकोण रचना के
उपरान्त उसमें 'ईं' बीज लिखना चाहिये। बीजाक्षर पर अनुस्वार लगाने का
भी विधान है। इस मण्डल में त्रिकोण के बाद वृत्तनिर्माण का उल्लेख है।
त्रिकोण के बाद किन्हीं पुस्तकों में षट्कोण बनाने की भी चर्चा है। अन्त
में अर्थात् वृत्त के बाद चतुरस्र मण्डल संरचना से मण्डल विधान पूरा होता
है। वस्तुतः मण्डल में सबके भीतर त्रिकोण फिर षट्कोण वृत्त और चतुरस्र
का क्रम सर्वमान्य है।
मण्डल में फूलों को बिखेर देने से दिव्यता आ जाती है और सौन्दर्य-
मय आकर्षण बढ जाता है। इसके बाद आधार की प्रतिष्ठा का क्रम आता है।
यह क्रम पहले की तरह पूरा करना चाहिये। इसीलिये सूत्र में पूर्ववत् शब्द का
प्रयोग किया गया है। क्रमानुसार अब अग्निकलाओं की अभ्यर्चना करनी चाहिये।
पुनः पात्र की प्रतिष्ठा होनी चाहिये। उस पात्र में 'ह्रीं ऐं महालक्ष्मीश्वरि
परमस्वामिनि ऊर्ध्वशून्यप्रवाहिनि सोमसूर्याग्निभक्षिणि परमाकाशभासुरे
आगच्छागच्छ विश विश पात्रं प्रतिगृह्ण प्रतिगृह्ण स्वाहा' इस मन्त्र से अञ्जलि भरा
पुष्प डालना चाहिये।
एतदनन्तर सूर्य-कलाओं की पूजा का विधान है। अठारहवें सूत्र में सूर्य-
कलाओं और अग्निकलाओं की चर्चा की जा चुकी है। कला पूजा के बाद मूल
में दिये गये श्लोक से, पहले पात्र को भर कर दूसरे पात्र को हटा देना या
अलग कर देना चाहिये। निक्षेप में नि उपसर्ग आधार, क्षिप धात्वर्थ फेंकने हटाने
या अस्वीकृत अर्थ में ही प्रयुक्त होता है। सूत्रानुसार उस पात्र के महत्त्व का
प्रतिपादन किया गया है। कल्पना करनी चाहिये कि, यह पात्र महत्त्वपूर्ण पात्र
है। यह अखण्ड ब्रह्माण्डमण्डल से अखण्ड रूप से सम्भूत है और स्वयं समस्त
रसों से परिपूर्ण है। मेरे द्वारा पीयूष से यह आपूरित किया जा रहा है। इसी
पीयूषरसपूर्णता को हे पात्र तुम प्राप्त हो जाओ। इसी भावना से पात्र भरना
चाहिये।