पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
४२ पाराशरस्मृतिः [ अष्टमो-
शास्त्रीय प्रमाणों को अनुसंधान कर धर्मज्ञ लोग जो व्यवस्था देते
हैं वही व्यवस्था माननीय है। क्योंकि ऐसे ही प्रमाणज्ञ धर्मवेत्ताओं से
पाप डरता है ॥१६॥
यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतार्केण शुद्धयति ।
एवं परिषदादेशान् नाशयेत्तस्य दुष्कृतम् ॥१७॥
जिस प्रकार पत्थर का जल हवा तथा सूर्यरश्मि से विनष्ट हो जाता
है उसी प्रकार वेदज्ञ तीन अथवा चार ब्राह्मणों की परिषद् के आदेश
से भी पाप का नाश हो जाता है ॥१७॥
नैव गच्छति कर्तारं नैव गच्छति पर्षदम् ।
मारुतार्कादि-संयोगात् पापं नश्यति तोयवत् ॥१८॥
धर्मात्माओं के आदेश से प्रायश्चित्त करनेवाले पुरुष का पाप न तो
व्यवस्था देनेवाली परिषद को लगता है और न तो प्रायश्चित्त करने-
वालों को ही। किन्तु जिस प्रकार सूर्य और हवा के संयोग से जल
का विनाश हो जाता है उसी प्रकार वह पाप भी विनष्ट हो जाता
है ॥ १८ ॥
चत्वारो वा त्रयो वाऽपि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः ।
ब्राह्मणानां समर्था ये परिषत् साऽभिधीयते ॥१९॥
ब्राह्मणों में विद्या आदि सद्गुणों से समर्थ, वेदज्ञ तीन अथवा चार
अग्निहोत्री ब्राह्मणों को ही परिषद् कहते हैं ॥१९॥
अनाहिताग्नयो येऽन्ये वेद-वेदाङ्गपारगाः ।
पञ्च त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२०॥
वेद, वेदाङ्ग में पारंगत धर्मशास्त्रों को जाननेवाले पाँच या तीन
ब्राह्मण यदि अग्निहोत्र न भी करते हों तो उसे भी 'परिषद्' कहते
हैं ॥ २० ॥
१. 'तत्र' इति । २. 'विधीयते' इति ।
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४३
मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानां यज्ञयाजिनाम् ।
वेदव्रतेषु स्नातानामेकाऽपि परिषद् भवेत् ॥२१॥
आत्मविद्या के जाननेवाले मुनि, यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तथा
वेदज्ञ स्नातक इनमें से किसी एक को भी 'परिषद्' कहते हैं ॥२१॥
पञ्च पूर्वं मया प्रोक्तास्तेषां चाऽसम्भवे त्रयः ।
स्ववृत्तिपरितुष्टा ये परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२२॥
मैंने पाँच प्रकार की परिषद् कही : १. उन्नीसवें श्लोक में, २. बीसवें
श्लोक में तथा तीन प्रकार की इक्कीसवें श्लोक में। यदि पाँचों प्रकार
की परिषद् असम्भव हो तो अपनी वृत्ति (सदाचार) से सन्तुष्ट रहने-
वाले ब्राह्मणों को भी 'परिषद्' कहते हैं ॥२२॥
अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः ।
परिषत्त्वं न १तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥२३॥
इसके अनन्तर जो श्रुत तथा तप से विहीन योनिमात्र से केवल
नाममात्र के ब्राह्मण हैं उनके हजारगुना की संख्या से भी परिषद् नहीं
होती ॥२३॥
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥२४॥
जिस प्रकार काठ का हाथी एवं चमड़े का मृग नाम मात्र से हाथी
और मृग है, उनमें हाथी और मृग के गुण तथा क्रिया नहीं
होती उसी प्रकार अध्ययन से शून्य भी ब्राह्मण नाम मात्र का
ब्राह्मण है ॥२४॥
ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपस्तु निर्जलः ।
यथा हुतमनग्नौ च अमन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥२५॥
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१. 'तेषां वै' इति । २. 'दन्ती' इति ।
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८४ पाराशरस्मृतिः [ अष्टमो-
जिस प्रकार निर्जन (सूना) ग्राम, जलरहित कूप तथा अग्नि के बिना
होम व्यर्थ है उसी प्रकार मन्त्ररहित ब्राह्मण भी व्यर्थ ही है ॥२५॥
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौरूषराऽफला ।
यथा चाऽज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥२६॥
जिस प्रकार स्त्रियों के लिए नपुंसक निष्फल है, बीज के लिए ऊसर
भूमि निष्फल है तथा मूर्ख में दान निष्फल है, उसी प्रकार वेदरहित
ब्राह्मण भी निष्फल है ॥२६॥
चित्रकर्म यथाऽनेकैरङ्गैरुन्मील्यते शनैः ।
ब्राह्मण्यमपि तद्वद्धि संस्कारैर्मन्त्रपूर्वकैः ॥२७॥
जिस प्रकार अनेक रंगों से निर्मित चित्रकर्म ( चित्रकारी ) उद्दीप्त
होता है उसी प्रकार अनेक संस्कारों से ब्राह्मणत्व ( ब्राह्मणोचित गुण,
कर्म तथा स्वभाव ) भी प्रस्फुटित होता है ॥२७॥
प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये द्विजा नामधारकाः ।
ते द्विजाः पापकर्मणः समेता नरकं ययुः ॥२८॥
नाममात्र ( विद्या और तप से विहीन केवल योनिमात्र ) के ब्राह्मण
जो भी प्रायश्चित्त की व्यवस्था देते हैं वे पापी कहे जाते हैं ! ऐसे सभी
लोग नरक में गिरते हैं ॥२८॥
ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये ।
त्रैलोक्यं तारयन्त्येते पञ्चेन्द्रियरता अपि ॥२९॥
जो ब्राह्मण वेदों का स्वाध्याय करते हैं और पञ्चयज्ञ करते हैं वे
ज्ञानकर्मा पञ्चेन्द्रियों में रत होने पर भी तीनों लोकों को तारने में
समर्थ होते हैं। २९॥
सम्प्रणीतः श्मशानेषु दीप्तोऽग्निः सर्वभक्षकः ।
तथा च वेदविद्विप्रः सर्वभक्षोऽपि दैवतम् ॥३०॥
१ 'तद्विद्धि' इति ।
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८५
जिस प्रकार श्मशान में भी जलती हुई अग्नि समस्त वस्तुओं को
जला देने में समर्थ होती है तथा उसके देवत्व का नाश नहीं होता
उसी प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मण सर्वभक्षी होते हुए भी देवता ही है ॥३०॥
अमेध्यानि तु सर्वाणि प्रक्षिप्यन्ते यथोदके ।
तथैव किल्बिषं सर्वं प्रक्षिपेच्च द्विजानले ॥३१॥
जिस प्रकार अपवित्र वस्तु जल में डालने से पवित्र हो जाती है,
उसी प्रकार ब्राह्मणरूपी अग्नि में भी शुद्धि के लिए अपना पाप प्रकट
कर देना चाहिए ॥३१॥
गायत्रीरहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् ।
गायत्रीब्रह्मतत्त्वज्ञाः सम्पूज्यन्ते जनैर्द्विजाः ॥३२॥
जो ब्राह्मण गायत्री को नहीं जानता वह शूद्र से भी अपवित्र होता
है । परन्तु जो गायत्री और ब्रह्म तत्त्व को जाननेवाला है वह संसार
में लोगों से पूजित होता है ॥३२॥
दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो न तु शूद्रो जितेन्द्रियः।
कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ? ॥३३॥
शीलरहित भी ब्राह्मण पूजा के योग्य होता है । पर शूद्र कितना
भी जितेन्द्रिय हो, तो वह पूजा के योग्य नहीं होता । जिस प्रकार
लोग शीलरहित गौ को दुहते हैं, पर सीधी गदही को कोई नहीं
दुहता ॥३३।
धर्मशास्त्ररथाऽऽरूढा वेदखड्गधरा द्विजाः ।
क्रीडार्थमपि यद् ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥३४॥
धर्मशास्त्ररूपी रथ पर बैठे हुए वेदरूपी तलवार को धारण किये
हुए ब्राह्मण विनोद के लिए भी जो कुछ कहते हैं, वह भी उत्कृष्ट धर्म
समझना चाहिए ॥३४॥
चातुर्विद्याऽविकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकाः ।
त्रयश्चाश्रमिणो मुख्याः पर्षदेषा दशावरा ॥३५॥
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चारों वेदों को जाननेवाले अविकल्पी अर्थात् शास्त्र में सन्देह न
करनेवाले, वेदांग एवं धर्मशास्त्र के पढ़ने-पढ़ानेवाले, इनके एक की
भी परिषद् कही जाती है। मुख्य रूप से क्रमशः तीनों आश्रमों में
निवास करनेवाले दश अथवा उससे अधिक संख्या की भी परिषद् हो सकती है ॥३५॥
राज्ञश्चाऽनुमते स्थित्वा प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।
स्वयमेव न कर्तव्यं कर्तव्या स्वल्पनिष्कृतिः ॥३६॥
ब्राह्मण राजा के आज्ञानुसार ही प्रायश्चित्त की व्यवस्था दे। स्वयं
इच्छानुसार कुछ भी न बतलावे। यदि छोटा प्रायश्चित्त हो तो उसे स्वयं
इच्छानुसार भी बता सकता है ॥३६॥
ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजा कर्तुं १यदिच्छति ।
तत्पापं शतधा भूत्वा राजानमनुगच्छति ॥३७॥
यदि राजा धर्मशास्त्रज्ञ ब्राह्मणों का अपमान कर स्वयं प्रायश्चित्त
कराना चाहता है, तो पापी पुरुष का पाप सौगुना होकर स्वयं राजा
को लगता है। ३७॥
प्रायश्चित्तं सदा दद्याद् देवतायतनाग्रतः ।
आत्मकृच्छ्रं ततः कृत्वा जपेद् वै वेदमातरम् ॥३८॥
ब्राह्मण किसी वेद-मन्दिर के सामने प्रायश्चित्त की व्यवस्था दे।
तदनन्तर प्रायश्चित्त देने के कारण आत्मकृच्छ्र कर वेदमाता गायत्री का
यथाशक्ति जप करे ॥३८॥
स-शिखं वपनं कृत्वा त्रिसन्ध्यमवगाहनम् ।
गवां मध्ये वसेद् रात्रौ दिवा गाश्चाऽप्यनुव्रजेत् ॥३९॥
गोहत्यारों को क्या करना चाहिए ? इसको कहते हैं—हत्यारा
शिखा सहित शिर को मुण्डन करावे, तीनों काल स्नान करे। रात्रि में
१. 'यदीच्छति' इति पा० ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८७
गौशाला में शयन करे, फिर दिन में गौओं के पीछे-पीछे चले ॥३९॥
उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् ।
न कुर्वीताऽऽत्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥४०॥
गरमी, वर्षा, शीत अथवा वेग से वायु के बहने पर भी शक्ति के
अनुसार जब तक गौओं की रक्षा का प्रबन्ध न कर ले तब तक स्वयं
भी अपनी रक्षा के लिए कोई उपाय न करे ॥४०॥
आत्मनो यदि वाऽन्येषाम् गृहे क्षेत्रे खलेऽथवा ।
भक्षयन्तीं न कथयेत् पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥४१॥
गौ यदि अपने घर, खेत अथवा खलिहान में अन्नादि खा रही हो
अथवा किसी दूसरे के घर, खेत-खलिहान में खा रही हो। या अपने
बछड़े को दूध पिलाती हो, फिर भी किसी से न कहे ॥४१॥
पिबन्तीषु पिबेत्तोयं संविशन्तीषु संविशेत् ।
पतितां पङ्कमग्नां वा सर्वप्राणैः समुद्धरेत् ॥४२॥
जब गाय जल पीये तो स्वयं भी जल पीये। गाय यदि सोवे तो
स्वयं भी सोवे या बैठे। यदि गाय कहीं गिर पड़ी हो अथवा कीचड़ में
फँस गयी हो, तो प्राणों की बाजी लगाकर उसका उद्धार करे ॥४२॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ।
मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता ²गोब्राह्मणस्य च । ४३॥
ब्राह्मण अथवा गौ की रक्षा के लिए जो अपने प्राणों का त्याग
करता है वह ब्रह्महत्या के भी पाप से छूट जाता है तथा गौ और
ब्राह्मण की रक्षा कर जो जीवित भी रहता है वह भी ब्रह्महत्या के पाप
से मुक्त हो जाता है ॥४३॥
१ 'पङ्कलग्ना' इति पा० । २. 'गोब्राह्मणस्य' इत्यपि पाठः ।
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८८ पराशरस्मृतिः [ अष्टमो-
गोवधस्याऽनुरूपेण प्राजापत्यं विनिर्दिशेत् ।
प्राजापत्यं ततः कृच्छ्रं १विभजेत् तच्चतुर्विधम् ॥४४॥
गोवध के अनुरूप ही प्राजापत्य व्रत की व्यवस्था देनी चाहिए। इस
प्रकार प्राजापत्य तथा कृच्छ्र का चार भाग करना चाहिए ॥४४॥
एकाहमेकभक्ताशी एकाहं नक्तभोजनः ।
अयाचितस्यैकमहरेकाहं मारुताशनः ॥४५॥
एक दिन एक समय केवल दिन में, दूसरे दिन केवल रात्रि में
भोजन करे। तीसरे दिन अयाचित ( बिना मांगे हुए, जो स्वयं अपने
पास आ जाये ) अन्न एक बार खाये, पुनः चौथे दिन केवल वायु पीकर
रहे। यह प्राजापत्य कृच्छ्र का प्रथम पाद कहा जाता है ॥४५॥
दिनद्वयं चैकभक्तो द्विदिनं नक्तभोजनः ।
दिनद्वयमयाची स्याद् द्विदिनं मारुताशनः ॥४६॥
दो दिन तक केवल दिन में एक बार, फिर दो दिन तक केवल
रात्रि में एक बार, फिर दो दिन तक अयाचित अर्थात् एक बार भोजन
करे। तदनन्तर दो दिन तक केवल वायु के सहारे रहे। यह प्राजापत्य
का दो पाद कहा जाता है ॥४६॥
त्रिदिनं चैकभक्ताशी त्रिदिनं नक्तभोजनः ।
दिनत्रयमयाची स्यात् त्रिदिनं मारुताशनः ॥४७॥
तीन दिन तक केवल दिन में एक बार, फिर तीन दिन तक केवल
रात्रि में एक बार, फिर तीन दिन तक अयाचित अन्न केवल एक बार
भोजन करे, फिर तीन दिन तक केवल वायु के सहारे रहे। यह प्राजा-
पत्य कृच्छ्र का तीन पाद कहा जाता है ॥४७॥
चतुरहं त्वेकभक्ताशी चतुरहं नक्तभोजनः ।
चतुर्दिनमयाची स्याच्चतुरहं मारुताशनः ॥४८॥
१. 'विभजेत चतुर्विधम्' इति ।
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कृच्छ्र का चारों पाद (सम्पूर्ण रूप) कहा जाता है ॥४८॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८९
चार दिन केवल दिन में एक बार, फिर चार दिन तक रात्रि में
केवल एक बार, फिर चार दिन तक अयाचित अन्न केवल एक बार
भोजन करे। फिर चार दिन तक वायु के सहारे रहे। यह प्राजापत्य
कृच्छ्र का चारों पाद (सम्पूर्ण रूप) कहा जाता है ॥४८॥
प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ।
विप्राणां दक्षिणां दद्यात् पवित्राणि जपेद् द्विजः ॥४९॥
प्रायश्चित्त कर लेने पर, ब्राह्मणों को भोजन करावे। उन्हें दक्षिणा
देवे, फिर पवित्र मन्त्रों एवं पवमान सूक्तों का जप करे ॥४९॥
ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु गोघ्नः १शुद्धो न संशयः ॥५०॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥८॥
ब्राह्मणों को भोजन कराने मात्र से ही गोहत्या करनेवाला व्यक्ति
शुद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥५०॥
इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीकासहित पाराशरीय
धर्मशास्त्र में अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
*
९. नवमोऽध्यायः
गवां संरक्षणार्थाय न दुष्येद् रोध-बन्धयोः ।
तद्वधं तु न तं विद्यात् कामाऽकामकृतं तथा ॥ १ ॥
यदि गायों की रक्षा के उद्देश्य से कोई व्यक्ति उसे किसी घेरे या
अहाते में रोककर बांध ले और इस कारण गाय की मृत्यु हो
जाय तो वह मनुष्य गोवध का भागी नहीं होता। इसके अतिरिक्त
कामाकामकृत अर्थात् भूलवश या धोखे से होनेवाली हत्या को वध
कहते हैं ॥१॥
१. 'शुद्ध्येन्न' इति ।
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९० पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
दण्डादूर्ध्वं यदन्येन प्रहाराद् यदि पातयेत् ।
प्रायश्चित्तं तदा प्रोक्तं द्विगुणं गोवधे चरेत् ॥ २ ॥
हाथ के अँगूठे-जैसे मोटे दण्ड या लाठी आदि के आघात से गोवध
हो जाने पर दुगुना प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२॥
रोध-बन्धन-योक्त्राणि घातश्चेति चतुर्विधम् ।
एकपादं चरेद् रोधे द्वौ पादौ बन्धने चरेत् ॥ ३ ॥
किसी गाय को रोक रखने, बाँध लेने, जोतने और मारने से गोवध
होता है। रोक लेने मात्र से ही यदि गाय की मृत्यु हो जाय तो चौथाई
व्रत करने का विधान है और बन्धन के कारण होनेवाले गोवध में
आधा व्रत करना उचित है ॥३॥
योक्त्रेषु तु त्रिपादं स्याच्चरेत् सर्वं निपातने ।
१गोव्राटे वा गृहे वाऽपि दुर्गे वाऽप्यसमस्थले ॥ ४ ॥
जोतने के समय गोवध होने से तीन चौथाई और मार डालने पर
सम्पूर्ण रूप से प्रायश्चित्त करना चाहिए। गोशाला, घर, किला और
असमतल भूमि, ॥४॥
नदीष्वथ समुद्रेषु त्वन्येषु च नदीमुखे ।
दग्धदेशे मृता गावः स्तम्भनाद्रोध उच्यते ॥ ५ ॥
नदी, समुद्र, नदियों के उद्गम स्थल या अग्नि से घिरे हुए स्थान
में रोक लेने से गाय की मृत्यु हो जाय तो उसे 'रोध' की संज्ञा दी
जाती है ॥५॥
योक्त्र-दामक-दोरैश्च कण्ठाभरण-भूषणैः ।
गृहे वाऽपि वने वाऽपि बद्धा स्याद् गौर्मृता यदि ॥६॥
हल जोतने की लकड़ी, गाड़ी के जुए, रस्सी, गले में पड़े हुए
आभूषण अर्थात् कण्ठी, माला आदि से बँधी हुई गौ का मरण हो जाय
१. 'गोचरे' इति पा० ।
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९ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९१
तो वह स्थान घर में हो या घर के बाहर वनादि में हो ॥६॥
तदेव बन्धनं विद्यात् कामाऽकामंकृतं च यत् ।
हले वा शकटे पंक्तौ पृष्ठे वा पीडितो नरैः ॥ ७ ॥
तो इसी को 'बन्धन' और 'कामाकामकृत' कहते हैं। हल, सग्गड़,
गाड़ी और कतार में बँधे अथवा पीठ पर लदे हुए भार के कारण मनुष्य
से पीड़ित होकर, ॥७॥
गोपतिर्मृत्युमाप्नोति योक्त्रो भवति तद्वधः ।
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तश्चेतनो वाऽप्यचेतनः ॥ ८ ॥
बैल की मृत्यु हो जाय तो उस बन्धन को शास्त्रों में 'योक्त्र' कहा
गया है। मत्त (धन से), प्रमत्त (सुरापान आदि से) और उन्मत्त
(भूत-प्रेतादि की बाधा), यदि चेतन या अचेतन अवस्था में, ॥८॥
कामाऽकामकृतक्रोधो दण्डैर्हन्यादथोपलैः ।
प्रहृता वा मृता वाऽपि तद्धि हेतुर्निपातने ॥ ९ ॥
इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक, क्रोध के वशीभूत होकर, दण्डे या
पत्थर से मार डाले तो इसी को 'निपातन' और वध करना
कहते हैं ॥९॥
अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रः प्रमाणतः ।
आर्द्रस्तु स-पलाशश्च दण्ड इत्यभिधीयते ॥१०॥
अँगूठे के बराबर मोटी, हाथ के बराबर लम्बी, पत्तीदार गीली
लकड़ी को 'दण्ड' कहते हैं ॥१०॥
मूर्च्छितः पतितो वाऽपि दण्डेनाऽभिहतः स तु ।
उत्थितस्तु यदा गच्छेत् पञ्च सप्त दशैव वा ॥११॥
दण्ड के प्रहार से आहत पशु मूर्च्छित हो जाय अथवा भूमि पर गिर
पड़े या फिर से उठकर पाँच, सात या दस पग चल पड़े ॥११॥
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९२ पराशरस्मृतिः [ नवमो-
ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वाऽपि पिबेद् यदि ।
पूर्वं व्याध्युपसृष्टश्चेत् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१२॥
अथवा तृणादि का भक्षण कर ले या पानी पी ले और पहले से ही
रोगग्रस्त हो तो उस पशु के मरने पर किसी प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं
करना पड़ता है ॥१२॥
पिण्डस्थे पादमेकं तु द्वौ पादौ गर्भसम्मते ।
पादोनं व्रतमुद्दिष्टं हत्वा गर्भमचेतनम् ॥१३॥
गाय का पन्द्रह दिन का गर्भपात हो जाने से सम्पूर्ण व्रत का
चतुर्थांश, एक मास का गर्भ गिराने में आधा और सात मास से पूर्व
का गर्भ गिराने पर तीन चौथाई व्रत करने का विधान है ॥१३॥
पादेऽङ्गरोमवपनं द्विपादे श्मश्रुणोऽपि च ।
त्रिपादे तु शिखावर्जं स-शिखं तु निपातने ॥१४॥
चौथाई व्रत करने में शरीर के रोम, अर्ध व्रत में रोम, मूँछ और
दाढ़ी, तीन चौथाई में शिखा के अतिरिक्त सम्पूर्ण शरीर का मुण्डन
और निपातन अर्थात् वध करने पर शिखा के सहित समस्त शरीर का
मुण्डन कराना चाहिए ॥१४॥
पादे वस्त्रयुगं चैव द्विपादे कांस्यभाजनम् ।
त्रिपादे गोवृषं दद्याच्चतुर्थे गोद्वयं स्मृतम् ॥१५॥
चतुर्थांश व्रत करने पर ब्राह्मण को दक्षिणा-स्वरूप जोड़ा वस्त्र,
आधा व्रत करने पर काँसे को धातु का निर्मित पात्र, तीन चौथाई व्रत
में बैल और सम्पूर्ण व्रत में दो गौ का दान करना चाहिए ॥१५॥
निष्पन्नसर्वगात्रस्तु दृश्यते वा स-चेतनः ।
अङ्ग-प्रत्यङ्ग-सम्पूर्णो द्विगुणं गोव्रतं चरेत् ॥१६॥
जब गर्भस्थ पशु में प्राण का संचार हो गया हो और उसके सम्पूर्ण
अंगों का गठन हो गया हो तो उस समय गौ का घात करने से दुगुनी
गोहत्या का व्रत करना उचित है ॥१६॥
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शृङ्गभङ्गे चरेत् पादं द्वौ पादौ नेत्रघातने ॥१७॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९३
पाषाणेनार्थ दण्डेन गावो येताऽभिघातिताः ।
शृङ्गभङ्गे चरेत् पादं द्वौ पादौ नेत्रघातने ॥१७॥
किसी व्यक्ति के द्वारा पत्थर या डण्डे से आघात करने पर यदि
गाय का सींग टूटकर गिर जाय, या उसकी आँखें फूट जायें, तो सींग
गिरने पर चौथाई व्रत और नेत्र-भंग होने पर आधा व्रत करना
चाहिए ॥१७॥
लाङ्गूले पादकृच्छ्रं तु द्वौ पादावस्थिभञ्जने ।
त्रिपादं चैव कर्णे तु चरेत् सर्वं निपातने ॥१८॥
पूँछ टूट जाने पर पादकृच्छ्र व्रत करे, हड्डी टूटने पर आधा कृच्छ्र,
कान टूटने पर तीन चौथाई व्रत और मरण होने पर सम्पूर्ण व्रत करना
उचित है ॥१८॥
शृङ्गभङ्गेऽस्थिभङ्गे च कटिभङ्गे तथैव च ।
यदि जीवति षण्मासान् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१९॥
किसी गाय का सींग टूटने, हड्डी टूटने या कमर टूटने पर भी यदि
वह छः मास तक जीवित रह जाय तो उसके लिए किसी प्रकार का
प्रायश्चित्त आवश्यक नहीं है ॥१९॥
व्रण-भङ्गे च कर्त्तव्यः स्नेहाभ्यङ्गस्तु पाणिना ।
यवसश्चोपहर्त्तव्यो * यावद् दृढबलो भवेत् ॥२०॥
यदि अपने हाथ से गाय का फोड़ा फूट जाय तो उसमें जब तक
गाय स्वाभाविक अवस्था में न हो जाय तब तक घी या तेल लगाते
रहना चाहिए और भोजन के लिए हरा चारा या घास देते रहना
चाहिए ॥२०॥
यावत्सम्पूर्ण-सर्वाङ्गस्तावत् तं पोषयेन्नरः ।
गोरूपं ब्राह्मणस्याऽग्रे नमस्कृत्या विसर्जयेत् ॥२१॥
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१. 'नैव' इति क्वचित्पुस्तके ।
९४ पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
जब तक उस गाय का सम्पूर्ण अंग पूरा न हो जाय, तब तक
उसकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए । तत्पश्चात् किसी ब्राह्मण को नम-
स्कार करके उसे अर्पित कर देना उचित है ॥२१॥
यद्यसम्पूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहो भवेत् तदा ।
गोघातकस्य तस्याऽर्द्ध प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२२॥
सम्पूर्ण अंग ठीक होने से पहले ही यदि उस गाय की मृत्यु हो जाय
तो हत्यारे को आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२२॥
काष्ठ-लोष्ठ-पाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतो बलात् ।
व्यापादयति यो गां तु तस्य शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥२३॥
काठ, ईंट, पत्थर या शस्त्र से सज्जित मनुष्य जब बलात् गाय का
वध करे, तो उसकी शुद्धि इस प्रकार कही गयी है—॥२३॥
चरेत् सान्तपनं काष्ठे प्राजापत्यं तु लोष्टके ।
तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चैवाऽतिकृच्छ्रकम् ॥२४॥
काठ से मारने पर सान्तपन नामक व्रत, ईंट से प्राजापत्य, पत्थर से
तप्तकृच्छ्र और शस्त्रों द्वारा आघात करने में अतिकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान
करना चाहिए ॥२४॥
पञ्च सान्तपने गावः प्राजापत्ये तथा त्रयः ।
तप्तकृच्छ्रे भवन्त्यष्टावतिकृच्छ्रे त्रयोदश ॥२५॥
सान्तपन नामक व्रत में पाँच, प्राजापत्य में तीन, तप्तकृच्छ्र में
आठ और अतिकृच्छ्र में तेरह गोदान करने का विधान बतलाया
गया है ।२५।।
प्रमापणे प्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिरूपकम् ।
तस्याऽनुरूपं मूल्यं वा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः ॥२६॥
महर्षि मनु ने कहा है कि जिस प्रकार के पशु का हनन किया
गया हो, पशुपालक को बदले में वैसा ही पशु देना चाहिए अथवा
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९५
किन्हीं दो मनुष्यों द्वारा मृत पशु के किये गये मूल्यांकन का मूल्य चुका
देना चाहिए ॥२६॥
अन्यत्राङ्कन-लक्ष्मभ्यां वाहने मोचने तथा ।
सायं सङ्गोपनार्थं च न दुष्येद् रोध-बन्धयोः ॥२७॥
वृषोत्सर्ग आदि के समय शङ्ख द्वारा अंकन करने तथा उस अंकन
के लिए गोमय के चिह्न बनाने, बोझ लादने, बोझ उतारने और
सायंकाल पशु के रक्षण के निमित्त रोध और बन्ध करने पर मरनेवाली
गाय का कोई दोष नहीं माना जाता ॥२७॥
अतिदाहेऽतिवाहे च नासिकाभेदने तथा ।
नदी-पर्वतसञ्चारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२८॥
पशु को बहुत अधिक दागने, लादने, जोतने, नाक छेदने अथवा
नदी या पर्वतस्थल में चराने पर, गाय का मरण होने पर प्रायश्चित्त
करना चाहिए ॥२८॥
अतिदाहे चरेत् पादं द्वौ पादौ वाहने चरेत् ।
नासिक्ये पादहीनं तु चरेत् सर्वं निपातने ॥२९॥
अत्यधिक दागने के कारण होनेवाली मृत्यु में चतुर्थांश, बहुत
अधिक भार लादने से होनेवाली मृत्यु में आधा, नाथने में तीन चौथाई
और वध में पूरा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२९॥
दहनात्तु विपद्येत अनड्वान् योक्त्रयन्त्रितः ।
उक्तं पराशरेणैव ह्येकं पादं यथाविधि ॥३०॥
घर में आग लगने पर जुए में जुता हुआ बैल यदि मर जाय तो
उसके प्रायश्चित्त में महर्षि पराशर ने चौथाई व्रत करने का विधान
किया है ॥३०॥
रोधनं बन्धनं चैव भारप्रहरणं तथा ।
दुर्गप्रेरण-योक्त्रं च निमित्तानि वधेषु¹ षट् ॥३१॥
१. 'वधस्य' इति ।
९६ पराशरस्मृतिः [ नवमो-
अवरोध (रोकना), बन्धन, भार, आघात, बीहड़ स्थान में ले
जाना और जुए में जोतना—ये छः कर्म वध के कारण होते हैं ॥३१॥
बन्ध-पाश-सुगुप्ताङ्गो म्रियते यदि गोपशुः ।
भवने तस्य पापी स्यात् प्रायश्चित्तार्द्धमर्हति ॥३२॥
यदि किसी के घर में गाय या बैल बन्धन या फन्दे में बँधा हुआ
ही मर जाय तो वह भी पाप का भागी होता है । उसे दोष निवारण के
लिए आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३२॥
न नारिकेलैर्न च शाणवालै-
र्न चाऽपि मौञ्जैर्र्न च वल्कशृङ्खलैः ।
एतैस्तु गावो न निबन्धनीया
बन्ध्त्वाऽपि तिष्ठेत् परशुं गृहीत्वा ॥३३॥
किसी गाय को नारियल की बनी रस्सी, सन, बाल, मूँज और वृक्ष
की छाल के रस्से से अथवा लोहे की जंजीर से नहीं बांधना चाहिए ।
यदि उपर्युक्त वस्तुओं से बांधना आवश्यक ही हो तो उसे काटने का
शस्त्र लेकर तत्पर रहना चाहिए ॥३३॥
कुशैः काशैश्च बध्नीयाद् गोपशुं दक्षिणामुखम् ।
पाशलग्नाग्निदग्धासु२ प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३४॥
कुश और कास की रस्सी से गाय को दक्षिण मुख बाँधने पर यदि
वह जल मरे या फन्दा लगा ही रह जाय तो भी किसी प्रकार का दोष
नहीं लगता है ॥३४॥
यदि तत्र भवेत् काष्ठं प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ।
जपित्वा पावनीं देवीं मुच्यते तत्र किल्बिषात् ॥३५॥
कुश या कास की रस्सियों में लकड़ी पिरोकर यदि गाय को
बाँधा गया हो तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इसमें गायत्री
१. 'बद्ध्वा तु' इति । २. 'दग्धेषु' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९७
देवी का एक सौ आठ बार जप करने से मनुष्य के पाप का मोचन
होता है ॥३५॥
प्रेरयन् कूप-वापीषु वृक्षच्छेदेषु पातयन् ।
गवाशनेषु विक्रीर्णस्ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥३६॥
जब किसी कुएँ, तालाब और बड़े-बड़े वृक्ष काटने के स्थान में
गाय को ले जाय अथवा किसी कसाई के हाथ उसे विक्रय कर दे तो
गोवध करने का प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३६॥
आराधितस्तु यः कश्चिद् भिन्नकक्षो यदा भवेत् ।
श्रवणं हृदयं भिन्नं भग्नो वा कूपसङ्कटे ॥३७॥
यत्नपूर्वक बलवान् बनाकर किसी बैल को दौड़ाने पर जब वह
कक्षहीन हो जाय अथवा किसी कुएँ आदि में गिरने से उसके कान
और हृदय विदीर्ण हो जायें, ॥३७॥
कूपादुत्क्रमणे चैव भग्नो वा ग्रीव-पादयोः ।
स एव म्रियते तत्र त्रीन् पादांस्तु समाचरेत् ॥३८॥
कुएँ से निकालने के समय यदि गरदन या पैर टूट जाय तो उस
बैल के मरने पर तीन चौथाई प्राजापत्य नामक व्रत करने का विधान
बतलाया गया है ॥३८॥
कूपखाते तटाबन्धे नदीबन्धे प्रपासु च ।
पानीयेषु विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३९॥
यदि कोई बैल पुराने कुएँ के गड्ढे, बाँध, पुल, पौसरे और पानी
के गड्ढे में डूबकर मर जाय तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं
करना पड़ता ॥३९॥
कूपखाते तटाखाते १दीर्घीखाते तथैव च ।
स्वल्पेषु धर्मखातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४०॥
१. 'दीर्घखाते' इति पा० ।
७
९८ पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
कूपखात, तटाखात, दीर्घखात और घर्मखात-इन गड्डों में
गिरकर मृत्यु को प्राप्त होने पर कोई प्रायश्चित्त नहीं करना
पड़ता ॥४०॥
वेश्मद्वारे निवासेषु यो नरः खातमिच्छति ।
स्वकार्यगृहखातेषु प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४१॥
घर के दरवाजे पर, गोशाला में अथवा गृहनिर्माण के लिए किये
गये गड्ढे में गिरकर पशु के मरने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥४१॥
निशि बन्धनिरुद्धेषु सर्पव्याघ्रहतेषु च ।
अग्नि-विद्युद्विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४२॥
रात में रोकने या बाँधने से, सर्प या सिंह आदि हिंसक जन्तुओं के
द्वारा मारे जाने पर, अग्निकाण्ड होने अथवा बिजली गिरने से मृत
पशुओं के निमित्त किसी प्रायश्चित्त का विधान नहीं है ॥४२॥
ग्रामघाते शरौघेण वेश्मभाङ्गनिपातने ।
अतिवृष्टिहतानां च प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४३॥
शत्रु द्वारा ग्राम के घेरने, शत्रु द्वारा चलाये हुए बाणों से बिंधने,
मकान के ध्वस्त होने अथवा मूसलधार वृष्टि के कारण पशुमरण होने
पर प्रायश्चित्त नहीं किया जाता है ॥४३॥
संग्रामे प्रहतानां च ये दग्धा वेश्मकेषु च ।
दावाग्नि ग्रामघातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४४॥
युद्धस्थल में, दावानल की लपेट में आये हुए, घर में जलने और
सम्पूर्ण गांव के विध्वंस होने पर मृत गाय के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं
किया जाना चाहिए ॥४४॥
यन्त्रिता गौश्चिकित्सार्थं मूढगर्भविमोचने ।
यत्ने कृते विपद्येत प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४५॥
१. '-ऽपहृताना' इति पा० ।
अध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९९
अध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९९
औषध पिलाने के निमित्त अथवा उदरस्थ मृत बछड़े को निकालने
के लिए बँधी हुई गाय के मरने पर कोई दोष नहीं लगता है ॥४५॥
व्यापन्नानां बहूनां च बन्धने रोधनेऽपि वा ।
भिषङ्मिथ्योपचारे१ च प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४६॥
बाँधने या रोकने से अथवा पशु-चिकित्सक के गलत उपचार के
द्वारा यदि बहुत सी गायों का निधन हो जाय तो प्रायश्चित्त करना
आवश्यक होता है ॥४६॥
गो-वृषाणां विपत्तौ च यावन्तः प्रेक्षका जनाः ।
अनिवारयतां तेषां सर्वेषां पातकं भवेत् ॥४७॥
यदि गाय या बैल किसी कुएँ आदि में या और किसी प्रकार मर
जायें और दर्शकों द्वारा उनको बचाने का प्रयास न किया जाय तो
उसका प्रायश्चित्त लगता है ॥४७॥
एको हतो यैर्बहुभिः समेतैर्न ज्ञायते यस्य हतोऽभिघातात् ।
दिव्येन तेषामुपलभ्य हन्ता निवर्तनीयो नृपसन्नियुक्तः ॥४८॥
जब कई व्यक्तियों ने एक साथ मिलकर सम्मिलित वध किया हो
और इस बात का निश्चय न हो सके कि किसके प्रहार से गोहत्या हुई
है, तो राज-द्वारा नियुक्त मनुष्य को चाहिए कि हत्यारों को शपथ
दिलाकर मारनेवाले का निर्णय करे और सबके समक्ष उसे अलग
करके सब लोगों को दिखला दे ॥४८॥
एका चेद् बहुभिः काचिद् दैवाद् व्यापादिता भवेत्२ ।
पादं पादं तु हत्यायाश्चरेयुक्ते पृथक् पृथक् ॥४९॥
यदि एक गाय को किसी मनुष्य ने मारा हो तो उन सब व्यक्तियों
को अलग-अलग सम्पूर्ण व्रत का चतुर्थांश प्रायश्चित्त के रूप में करना
चाहिए ॥४९॥
१. ‘-मिथ्यापचारेण’ इति पा० । ‘-मिथ्यापचारे’ इति । २. ‘क्वचित्’ इति ।
१७० पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
हते तु रुधिरं दृश्यं व्याधिग्रस्तः कृशो भवेत् ।
लाला भवति १दष्टेषु एवमन्वेषणं भवेत् ॥५०॥
गाय की मृत्यु के कारण का निश्चय इस प्रकार करना चाहिए—
यदि रक्त दिखाई पड़े तो वध द्वारा, दुर्बलता के कारण मृत्यु होने से
बीमारी द्वारा और मुंह से झाग या फेन निकलने पर सर्पदंशन द्वारा
मृत्यु का कारण समझना चाहिए । ५०॥
ग्रासार्थं चोदितो वाऽपि अध्वानं नैव गच्छति ।
मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता ॥५१॥
खाने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी यदि गाय अपने स्थान से
न हिले तो उसे क्लेशित समझना चाहिए। ऐसा सर्वशास्त्रवेत्ता मनु
ने बतलाया है ॥५१॥
प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् ।
केशानां रक्षणार्थाय द्विगुणं व्रतमाचरेत् ॥५२॥
उन्होंने गोहत्या को प्रायश्चित्त के रूप में चान्द्रायण नामक व्रत का
अनुष्ठान करने का निर्देश किया है और केशों का मुण्डन न कराने
पर दुगुने व्रत का विधान बतलाया है ॥५२॥
द्विगुणे व्रत आदिष्टे द्विगुणा दक्षिणा भवेत् ।
राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥५३॥
दुगुना व्रत करने में दक्षिणा भी दुगुनी देनी पड़ती है। राजा,
राजपुत्र अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण ॥५३।
अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।
यस्य न द्विगुणं दानं केशश्च परिरक्षितः ॥५४॥
यदि गोहत्या में हत्यारे का सिर मुड़ाये बिना दुगुना प्रायश्चित्त
न करे ॥५४॥
१. 'दंष्ट्रेषु' इति ।
ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १०१
तत्पापं तस्य तिष्ठेत १वक्ता च नरकं व्रजेत् ।
यत्किञ्चित् क्रियते पापं सर्वं केशेषु तिष्ठति ॥५५॥
तो वह स्वयं पातकी होता है और बतलानेवाला नरकगामी होता
है, क्योंकि सभी प्रकार के किये हुए पाप केशों में विद्यमान
रहते हैं ॥५५॥
सर्वान् केशान् समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् ।
एवं नारी-कुमारीणां शिरसो मुण्डनं स्मृतम् ॥५६॥
विवाहिता अथवा अविवाहिता स्त्री के मुण्डन में केश के ऊपरी
सिरे को पकड़कर दो-दो अंगुल बाल काट लेना चाहिए ॥५६॥
न स्त्रियाः केशवपनं न दूरे शयनाऽऽसनम् ।
न च गोष्ठे वसेद् रात्रौ न दिवा गा अनुव्रजेत् ॥५७॥
स्त्रियों के समस्त केशों को मूंडना, अलग होकर सोना, बैठना,
गोशाले में रहकर रात बिताना और दिन में गायों के झुण्ड के पीछे-
पीछे घूमना—ये सब कार्य वर्जित होते हैं। ५७॥
नदीषु सङ्गमे चैव अरण्येषु विशेषतः ।
न स्त्रीणामजिनं वासो व्रतमेवं समाचरेत् ॥५८॥
नदियों के संगमस्थान, विशेषतः वनों में वास तथा मृगछाला
आदि को धारण न कराकर व्रत का अनुष्ठान कराना चाहिए ॥५८॥
त्रिसन्ध्यं स्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनं तथा ।
बन्धुमध्ये व्रतं तासां कृच्छ्र-चान्द्रायणादिकम् ॥५९॥
त्रिकाल स्नान, देवताओं की अर्चना और अपने बन्धुवर्गों में निवास
करना ही स्त्रियों का कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रत माना गया है ॥५९॥
गृहेषु सततं तिष्ठेच्छुचिर्नियममाचरेत् ।
इह यो गोवधं कृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति ॥६०॥
१. 'त्यक्त्वा' इति पा० । २. 'शयनाऽशनम्' इति ।