पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ पराशरस्मृतिः [ नवमो-
अवरोध (रोकना), बन्धन, भार, आघात, बीहड़ स्थान में ले
जाना और जुए में जोतना—ये छः कर्म वध के कारण होते हैं ॥३१॥
बन्ध-पाश-सुगुप्ताङ्गो म्रियते यदि गोपशुः ।
भवने तस्य पापी स्यात् प्रायश्चित्तार्द्धमर्हति ॥३२॥
यदि किसी के घर में गाय या बैल बन्धन या फन्दे में बँधा हुआ
ही मर जाय तो वह भी पाप का भागी होता है । उसे दोष निवारण के
लिए आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३२॥
न नारिकेलैर्न च शाणवालै-
र्न चाऽपि मौञ्जैर्र्न च वल्कशृङ्खलैः ।
एतैस्तु गावो न निबन्धनीया
बन्ध्त्वाऽपि तिष्ठेत् परशुं गृहीत्वा ॥३३॥
किसी गाय को नारियल की बनी रस्सी, सन, बाल, मूँज और वृक्ष
की छाल के रस्से से अथवा लोहे की जंजीर से नहीं बांधना चाहिए ।
यदि उपर्युक्त वस्तुओं से बांधना आवश्यक ही हो तो उसे काटने का
शस्त्र लेकर तत्पर रहना चाहिए ॥३३॥
कुशैः काशैश्च बध्नीयाद् गोपशुं दक्षिणामुखम् ।
पाशलग्नाग्निदग्धासु२ प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३४॥
कुश और कास की रस्सी से गाय को दक्षिण मुख बाँधने पर यदि
वह जल मरे या फन्दा लगा ही रह जाय तो भी किसी प्रकार का दोष
नहीं लगता है ॥३४॥
यदि तत्र भवेत् काष्ठं प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ।
जपित्वा पावनीं देवीं मुच्यते तत्र किल्बिषात् ॥३५॥
कुश या कास की रस्सियों में लकड़ी पिरोकर यदि गाय को
बाँधा गया हो तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इसमें गायत्री
१. 'बद्ध्वा तु' इति । २. 'दग्धेषु' इति ।