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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 170 में से

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पृष्ठ 94

४२ पाराशरस्मृतिः [ अष्टमो-
शास्त्रीय प्रमाणों को अनुसंधान कर धर्मज्ञ लोग जो व्यवस्था देते
हैं वही व्यवस्था माननीय है। क्योंकि ऐसे ही प्रमाणज्ञ धर्मवेत्ताओं से
पाप डरता है ॥१६॥
यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतार्केण शुद्धयति ।
एवं परिषदादेशान् नाशयेत्तस्य दुष्कृतम् ॥१७॥
जिस प्रकार पत्थर का जल हवा तथा सूर्यरश्मि से विनष्ट हो जाता
है उसी प्रकार वेदज्ञ तीन अथवा चार ब्राह्मणों की परिषद् के आदेश
से भी पाप का नाश हो जाता है ॥१७॥
नैव गच्छति कर्तारं नैव गच्छति पर्षदम् ।
मारुतार्कादि-संयोगात् पापं नश्यति तोयवत् ॥१८॥
धर्मात्माओं के आदेश से प्रायश्चित्त करनेवाले पुरुष का पाप न तो
व्यवस्था देनेवाली परिषद को लगता है और न तो प्रायश्चित्त करने-
वालों को ही। किन्तु जिस प्रकार सूर्य और हवा के संयोग से जल
का विनाश हो जाता है उसी प्रकार वह पाप भी विनष्ट हो जाता
है ॥ १८ ॥
चत्वारो वा त्रयो वाऽपि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः ।
ब्राह्मणानां समर्था ये परिषत् साऽभिधीयते ॥१९॥
ब्राह्मणों में विद्या आदि सद्गुणों से समर्थ, वेदज्ञ तीन अथवा चार
अग्निहोत्री ब्राह्मणों को ही परिषद् कहते हैं ॥१९॥
अनाहिताग्नयो येऽन्ये वेद-वेदाङ्गपारगाः ।
पञ्च त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२०॥
वेद, वेदाङ्ग में पारंगत धर्मशास्त्रों को जाननेवाले पाँच या तीन
ब्राह्मण यदि अग्निहोत्र न भी करते हों तो उसे भी 'परिषद्' कहते
हैं ॥ २० ॥
१. 'तत्र' इति । २. 'विधीयते' इति ।