पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९५
किन्हीं दो मनुष्यों द्वारा मृत पशु के किये गये मूल्यांकन का मूल्य चुका
देना चाहिए ॥२६॥
अन्यत्राङ्कन-लक्ष्मभ्यां वाहने मोचने तथा ।
सायं सङ्गोपनार्थं च न दुष्येद् रोध-बन्धयोः ॥२७॥
वृषोत्सर्ग आदि के समय शङ्ख द्वारा अंकन करने तथा उस अंकन
के लिए गोमय के चिह्न बनाने, बोझ लादने, बोझ उतारने और
सायंकाल पशु के रक्षण के निमित्त रोध और बन्ध करने पर मरनेवाली
गाय का कोई दोष नहीं माना जाता ॥२७॥
अतिदाहेऽतिवाहे च नासिकाभेदने तथा ।
नदी-पर्वतसञ्चारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२८॥
पशु को बहुत अधिक दागने, लादने, जोतने, नाक छेदने अथवा
नदी या पर्वतस्थल में चराने पर, गाय का मरण होने पर प्रायश्चित्त
करना चाहिए ॥२८॥
अतिदाहे चरेत् पादं द्वौ पादौ वाहने चरेत् ।
नासिक्ये पादहीनं तु चरेत् सर्वं निपातने ॥२९॥
अत्यधिक दागने के कारण होनेवाली मृत्यु में चतुर्थांश, बहुत
अधिक भार लादने से होनेवाली मृत्यु में आधा, नाथने में तीन चौथाई
और वध में पूरा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२९॥
दहनात्तु विपद्येत अनड्वान् योक्त्रयन्त्रितः ।
उक्तं पराशरेणैव ह्येकं पादं यथाविधि ॥३०॥
घर में आग लगने पर जुए में जुता हुआ बैल यदि मर जाय तो
उसके प्रायश्चित्त में महर्षि पराशर ने चौथाई व्रत करने का विधान
किया है ॥३०॥
रोधनं बन्धनं चैव भारप्रहरणं तथा ।
दुर्गप्रेरण-योक्त्रं च निमित्तानि वधेषु¹ षट् ॥३१॥
१. 'वधस्य' इति ।