पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
व्याख्याकारः सम्पादकश्च
'शिव' ग्रन्थमाला : ग्रन्थांक-२०
पाराशरस्मृतिः
[ विस्तृतभूमिका-अनुक्रमणिका-हिन्दीटीका-
पाठान्तरादिभिः समलङ्कृता ]
व्याख्याकारः सम्पादकश्च
व्याकरणाचार्य-साहित्यवारिधि
आचार्य पं० शिवदत्तमिश्र शास्त्री
सम्पादकीय विभाग
भारतीय ज्ञानपीठ, वाराणसी
प्रकाशक :
ठाकुरप्रसाद ऐण्ड सन्स बुकसेलर
राजादरवाजा, वाराणसी
[ सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन ]
फोन : ६४६५० ] सन् १९८१ ई०
भूमिका
अष्टादश स्मृतियों में 'कलौ पाराशरा स्मृताः' के अनुसार कलियुग में
पाराशर स्मृति की ही मान्यता सर्वसम्मत है। क्योंकि युगों के अनुसार जैसे-जैसे
मनुष्यों की शक्ति का ह्रास होने लगा वैसे-वैसे त्रिकालज्ञ महर्षियों ने मनुष्यों के
सामर्थ्यानुसार धर्म और उसके अंगभूत प्रायश्चित्तादि में परिवर्तन कर दिया।
'कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां....' के अनुसार जहाँ सत्ययुग में मनुस्मृति का
प्राधान्य रहा, वहीं त्रेता में गौतम, द्वापर में शंख लिखित स्मृतियों का तथा
कलि में पाराशर स्मृति की ही मान्यता सर्वग्राह्य हुई। यतः ब्रह्महत्या और
गोवधादि के प्रायश्चित्त में मनु ने जो व्यवस्था दी थी वह कलि के मनुष्यों के
लिए सर्वथा कर्तुमशक्य हो गयी। इसीलिए पाराशर ने 'अथवा सेतुदर्शनम्'
कहकर उसे सुलभ कर दिया।
इत्थंभूत से लोकप्रिय एवं सर्वग्राह्य ग्रन्थरत्न का अब तक कोई शुद्ध संस्करण
राष्ट्रभाषा हिन्दी टीका के साथ नहीं प्राप्त था, जो सर्वजन सुलभ हो। इस अभाव
की पूर्ति के लिए बाबू ठाकुरप्रसाद ऐण्ड सन्स, कचौड़ीगली, वाराणसी के
संचालकों ने मुझसे कई बार साग्रह निवेदन किया कि पाराशर स्मृति का कोई
सर्वोत्तम शुद्ध संस्करण प्रकाशित होना चाहिए। वस्तुतः उनकी निरन्तर सत्प्रेरणा
का ही प्रतिफल है कि मैं अनेक कार्य-व्यस्त रहने पर भी प्रस्तुत पुस्तक का
सर्वांगपूर्ण संस्करण आपके हाथों प्रस्तुत कर सका हूँ।
इसमें बारह अध्याय हैं। १. प्रथम अध्याय में वेदव्यासजी से महर्षियों द्वारा
प्रश्न एवं उनके उत्तर, धर्म के सूक्ष्म निरूपण, ब्राह्मणों के लिए षट्कर्म तथा
उनसे सुख-प्राप्ति, आतिथ्य-सत्कार से शुभ फलप्राप्ति तथा महर्षि पाराशर द्वारा
चारों वर्णों के लिए आचारादि कर्म का निरूपण है। २. द्वितीय अध्याय में
ब्राह्मण, क्षत्रियादि वर्णों के साधारण धर्म कथन हैं। ३. तृतीय अध्याय में चारों
वर्णों के लिए जननाशौच तथा मरणाशौच का निरूपण है। ४. चतुर्थ अध्याय में
आत्महत्या से मृत स्त्री-पुरुषों के दाहादि करने में प्रायश्चित्त और तप्तकृच्छ्रादि
का लक्षण है । ५. पंचम अध्याय में भेड़िया, कुत्ते और शृगाल आदि जानवरों
के काटने में प्रायश्चित्त, चाण्डालादि से मारे हुए ब्राह्मणों के शरीर-स्पर्श का
विचार है । ६. षष्ठ अध्याय में प्राणियों की हिंसादि तथा क्रौंचादि वध का
प्रायश्चित्त है । ७. सप्तम अध्याय में द्रव्यादि शुद्धि-कथन, रजस्वला स्त्री से स्पर्श
का प्रायश्चित्त है । ८. अष्टम अध्याय में गोहत्या-सम्बन्धी प्रायश्चित्त और
प्राजापत्य व्रत का विधान है । ९. नवम अध्याय में ज्ञाताज्ञात अवस्था में गौ,
बैल आदि के मरने पर प्रायश्चित्त तथा कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत का विधान है ।
१०. दशम अध्याय में अगम्या स्त्री-गमन में चारों वर्णों के लिए प्रायश्चित्त कहा
गया है । ११. एकादश अध्याय में अशुद्ध वीर्य आदि पदार्थ तथा शूद्रान्न भक्षण
में प्रायश्चित्त का विवेचन है । १२. द्वादश अध्याय में दुःस्वप्न विचार, स्नान-
विधि, अशक्त का वेदाध्ययन, शूद्रान्न निषेध, विष्ठा, मूत्रादि भक्षण एवं ब्रह्म-
हत्यादि के प्रायश्चित्त का वर्णन है ।
ग्रन्थ की समाप्ति में : “एतत् पाराशरं शास्त्रं श्लोकानां शतपञ्चकम् ।
द्विनवत्या समायुक्तं धर्मशास्त्रस्य संग्रहः ।” (पारा०, श्लो० ७९, अ० १२)
के अनुसार कहा गया है कि इसमें ५९२ श्लोक हैं । आचार तथा प्रायश्चित्त ये
दो भागों में इसका विभाजन है । इसके अध्ययन से अत्यधिक पुण्य लाभ होता
है, अतः प्रत्येक स्वर्गाभिलाषी व्यक्ति को चाहिए कि वह नित्य प्रति इसका
पठन-पाठन करे ।
वस्तुतः युगधर्म के अनुसार महर्षि पाराशर ने सामयिक धर्म की व्यवस्था
दी है । यथा—
अस्मिन् मन्वन्तरे धर्माः कृत-त्रेतादिके युगे ।
सर्वे धर्माः कृते जाताः सर्वे नष्टाः कलौ युगे ॥
( पारा०, श्लो० १६, अ० १ )
अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे युगे ।
अन्ये कलियुगे नृणां युगरूपानुसारतः ॥
( पारा०, श्लो० २२, अ० १ )
[ ४ ]
युगे युगे तु सामर्थ्यं शेषं मुनिविभाषितम् ।
पराशरेण चाप्युक्तं प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
( पारा०, श्लो० ३४, अ० १ )
कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च ।
द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥
( पारा०, श्लो० २६, अ० १ )
इसमें मूल पाठ की शुद्धता प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर की
गयी है । स्थान-स्थान पर पाठान्तर भी दिया गया है । मूलानुगामी सरल,
सुललित एवं परिमार्जित हिन्दी टीका लिखी गयी है । इसमें विषयानुक्रमणिका
तथा श्लोकानुक्रमणिका भी दी गयी है जिससे इसकी उपयोगिता और भी अधिक
बढ़ गयी है ।
अब तक पाराशर स्मृति का ऐसा सर्वोत्तम संस्करण कहीं से प्रकाशित है यह
देखने में नहीं आया ।
इसकी सर्वोत्तम छपाई-सफाई एवं शुद्ध मुद्रण के लिए ठाकुरप्रसाद ऐण्ड
सन्स के अधिकारी वर्ग धन्यवाद के पात्र हैं ।
इसके सम्पादन में बन्धुवर पं० हीरालालजी मिश्र, व्याकरणाचार्य से मुझे
विशेष सहायता मिली है, इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ । इसका उद्घोषवचन
जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्रीमद्देश्वरानन्दजी सरस्वती महाराज ने लिखने
का कष्ट किया है, एतदर्थ उनका मैं हृदय से आभारी हूँ ।
यद्यपि इसके संशोधन-सम्पादन तथा हिन्दी व्याख्या का कार्य भी मैंने बड़ी
सावधानी के साथ किया है, फिर भी मानव-दोष से सम्भव त्रुटियों के लिए
‘शूर्पवद् दोषमुत्सृज्य गुणान् गृह्णन्ति साधवः’ के अनुसार क्षमा-प्रार्थी हूँ ।
निर्जला एकादशी
सी० के० ५।२६ ए०, भिखारी दास, } -शिवदत्त मिश्र शास्त्री
वाराणसी-१
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उपोद्घात वचन
धर्म का स्वरूप अत्यन्त निगूढ है । ‘धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्’
( महाभारत ) । वह वेदैक समधिगम्य है । ‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’
( मीमांसा ) । वह मीमांसा शास्त्र अति गम्भीर और विपुल विशाल है । उसमें
सहस्र अधिकरणों से धर्म की विवेचना की गयी है । ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस-
सिद्धिः स धर्मः’ ( वैशे० दर्शन ) । धर्म प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से जानने की
वस्तु नहीं है ।
‘प्रत्यक्षेणानुमानेन यस्तूपायो न बुद्ध्यते ।
एतं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥’
नास्तिक, जो वेद-निन्दक हैं, ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ ( मनु० ), अनेक
कटाक्ष धर्म पर करते हैं । उनके नैयायिक वाचस्पति मिश्र, उदयनाचार्य आदि
ने दुरूह युक्तियों से मुंहतोड़ उत्तर दिये हैं । धर्म के लिए प्रमुख प्रमाण सहस्र-
शाखाओं से परिपूर्ण मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद, तदनुयायी ऋषियों से प्रणीत मनु,
याज्ञवल्क्य, गौतम, शङ्ख, लिखित, पराशर, व्यास प्रभृति स्मृतियाँ, पुराण,
उपपुराण, महाभारत शिष्टाचार हैं । उनका अवगम सायण, उव्वट, महीधर
आदि के भाष्य, निघण्टु, निरुक्त, हेमाद्रि, कमलाकर भट्ट, कुल्लूक, मिताक्षरा
आदि निबन्ध और व्याख्याओं से होता है । व्याकरण, ज्योतिष आदि षडङ्ग,
छहों दर्शन, उनके ऊपर विरचित भगवत्पाद शंकराचार्य, रामानुजाचार्य
प्रभृति सम्मान्य आचार्यों के भाष्य हैं, जो धर्म का यथार्थ अवबोध कराते हैं ।
वचनों में सामान्य, विशेष, उत्सर्ग और अपवाद भाव, आपाततः विरोध
प्रतीत होते हैं, पर त्रिकालवेत्ता, सम्पूर्ण परिस्थितियों के अभिज्ञ, राग-द्वेष-
रहित, परमतपस्वी महायोगिराज, परम्परया अध्ययन-अध्यापन, आचरण से
सम्पन्न समस्त शास्त्रों के आलोडन-मंथन करनेवाले कुमारिल, शबर
स्वामी, पार्थसारथिमिश्र आदि महापण्डितों ने मीमांसा-परिशोधित न्यायों के
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
[ ६ ]
द्वारा पञ्चावयवों की पद्धति से एकवाक्यता कर धर्म का निर्णय किया है।
धर्म का स्वरूप सनातन है। इसमें कभी कोई परिवर्त्तन नहीं होता। सृष्टि के
प्रारम्भ में अरबों वर्ष पहले सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ने पूर्वपूर्वकल्पानुसार
मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों का उपदेश अनुग्रह शरीर के द्वारा महर्षियों को दिया।
वहाँ से यह परम्परा चली और यावत्संसार चलती रहेगी। इससे यथापूर्व जो
टकरायेगा वह चूर्ण-विचूर्ण हो जायेगा। रावण, वेन रगड़े गये। हजारों वर्ष वह
धर्म विधर्मियों से लड़ता रहा, उसका बाल बाँका नहीं हुआ। उसके साथ खेल
करना अच्छा नहीं। उसका रक्षक परमेश्वर है, उसके पास अपार बल है, सोते
सिंह को जगाना कल्याणकर नहीं।
अस्तु, पराशरस्मृति सामने है। यह कलि के लिए अन्तिम स्मृति है।
'कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः।
द्वापरे शंख-लिखिताः कलौ पाराशरा स्मृताः॥'
( पराशरस्मृति )
सत्ययुग में मनु, त्रेता में गौतम, द्वापर में शंख, लिखित और कलि में
पराशर अधिक सम्मान-भाजन हैं। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि दूसरे
महर्षि उपेक्षणीय हैं। पराशरस्मृति में सभी वेदोक्त धर्म सन्निविष्ट हैं। ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज, सभी वर्ण, उपवर्ण, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ,
संन्यासी, नर, नारी, राजा, प्रजा आदि के धर्म निरूपित हुए हैं। पातक,
उपपातक, महापातकों का यथावत् विवेचन किया गया है। उनके प्रायश्चित्त
निस्तार का उपाय कहा गया है। जननाशौच, मरणाशौच के नियम कहे गये हैं।
किस समय कौन स्पृश्य या अस्पृश्य होता है इसका स्पष्ट विधान किया गया है।
रजस्वला माता ही क्यों न हो चार दिन के लिए वह अस्पृश्य है। मेला, यात्रा,
नौका, कृषि, विवाहादि के समय अस्पृश्यता नहीं ग्राह्य है। पूजा, भोजन के
समय अनुपनीत सभी अस्पृश्य कहे गये हैं। स्वपाक की बड़ी महिमा है। स्व स्व
वर्णों के साथ ही विवाह का विधान है। अन्यथा वर्णसंकर होकर भ्रष्ट सन्तान
उत्पन्न होती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के यज्ञोपवीत संस्कार का पवित्र विधान
है। बलिष्ठ, बुद्धिमान्, दीर्घायु सन्तानोत्पत्ति की विधि कही गयी है। चारित्र्य-
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रक्षण की विधि और उसके लाभ कहे गये हैं। श्राद्ध के विधान और उसके
विशिष्ट गुण सयुक्तिक वर्णित हुए हैं। जन्म से जाति का सिद्धान्त और सत्कर्म
तप से उसके उपबृंहण का जोरदार निरूपण है। ईश्वर, वेद, धर्म की मान्यता
कही गयी है। राजा, प्रजा के सम्बन्ध का भली भाँति निरूपण है। शासन के
धर्म से विमुख होने पर उपप्लव उत्पन्न होने का गहराई से वर्णन है। सत्य,
शौर्य, तप, त्याग, धैर्य का विशेष माहात्म्य कहा गया है। समरांगण में निर्भय
देहोत्सर्ग करना, देश, धर्म की रक्षा में सर्वस्व की बलि कर देना सबसे महान् धर्म
कहा गया है। यह अपूर्व धर्म-ग्रन्थ है। इसकी बहुत बड़ी मान्यता है। इसके
ऊपर पराशरमाधव नाम का एक भाष्य कहना चाहिए। माधवाचार्य ने गम्भीर
विवेचनात्मक व्याख्यान बुक्कमहीपति के समय में ही लिख दिया है। यह ग्रन्थ
सर्वगम्य नहीं है और आज दुष्प्राप्य है।
श्री पण्डित शिवदत्तमिश्र शास्त्री, व्याकरणाचार्य ने द्वादशाध्याया-
त्मक इस महनीय स्मृति का राष्ट्रभाषा हिन्दी में व्याख्यान प्रणयन किया है।
यह व्याख्या स्पष्ट, सरल, सुललित और सटिप्पण प्रकाशित हुई है। इसमें
अन्यान्य अनुसन्धान भी दिये गये हैं जिनसे इसकी गरिमा और उदीप्त हो
उठी है। ग्रन्थकर्त्ता ने, जो अनेक ग्रन्थों के रचयिता तथा व्याख्यान-निर्माता हैं,
इस व्याख्या के साथ विषय-श्लोकानुक्रमणिका आदि देकर सर्वगम्य कर दिया
है। त्रुटि होना मनुष्य-स्वभाव-सिद्ध है।
‘मर्त्यैरसर्वविदुरैर्विहिते क्व नाम स्याद्दोषलेशविरहः सुचिरन्तनेऽपि।’
गुणग्रहणैकपक्षपाती विद्वान् इसपर ध्यान नहीं देकर इसकी उपादेयता
बढ़ायेंगे। मेरा शुभाशसन है कि यह ग्रन्थकर्त्ता और इनका व्याख्यान यशस्वी
हो और इसकी उत्तरोत्तर अभिवृद्धि तथा प्रसार हो।
धर्मसंघ, दुर्गाकुण्ड,
वाराणसी } —महेश्वरानन्द सरस्वती
वैशा. शु. ८, सं. २०२६ / [ ऊर्ध्वाम्नाय काशीपीठाधीश्वर, अनन्त-
श्रीविभूषित, जगद्गुरु शङ्कराचार्य ]
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal