पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
अष्टादश स्मृतियों में 'कलौ पाराशरा स्मृताः' के अनुसार कलियुग में
पाराशर स्मृति की ही मान्यता सर्वसम्मत है। क्योंकि युगों के अनुसार जैसे-जैसे
मनुष्यों की शक्ति का ह्रास होने लगा वैसे-वैसे त्रिकालज्ञ महर्षियों ने मनुष्यों के
सामर्थ्यानुसार धर्म और उसके अंगभूत प्रायश्चित्तादि में परिवर्तन कर दिया।
'कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां....' के अनुसार जहाँ सत्ययुग में मनुस्मृति का
प्राधान्य रहा, वहीं त्रेता में गौतम, द्वापर में शंख लिखित स्मृतियों का तथा
कलि में पाराशर स्मृति की ही मान्यता सर्वग्राह्य हुई। यतः ब्रह्महत्या और
गोवधादि के प्रायश्चित्त में मनु ने जो व्यवस्था दी थी वह कलि के मनुष्यों के
लिए सर्वथा कर्तुमशक्य हो गयी। इसीलिए पाराशर ने 'अथवा सेतुदर्शनम्'
कहकर उसे सुलभ कर दिया।
इत्थंभूत से लोकप्रिय एवं सर्वग्राह्य ग्रन्थरत्न का अब तक कोई शुद्ध संस्करण
राष्ट्रभाषा हिन्दी टीका के साथ नहीं प्राप्त था, जो सर्वजन सुलभ हो। इस अभाव
की पूर्ति के लिए बाबू ठाकुरप्रसाद ऐण्ड सन्स, कचौड़ीगली, वाराणसी के
संचालकों ने मुझसे कई बार साग्रह निवेदन किया कि पाराशर स्मृति का कोई
सर्वोत्तम शुद्ध संस्करण प्रकाशित होना चाहिए। वस्तुतः उनकी निरन्तर सत्प्रेरणा
का ही प्रतिफल है कि मैं अनेक कार्य-व्यस्त रहने पर भी प्रस्तुत पुस्तक का
सर्वांगपूर्ण संस्करण आपके हाथों प्रस्तुत कर सका हूँ।
इसमें बारह अध्याय हैं। १. प्रथम अध्याय में वेदव्यासजी से महर्षियों द्वारा
प्रश्न एवं उनके उत्तर, धर्म के सूक्ष्म निरूपण, ब्राह्मणों के लिए षट्कर्म तथा
उनसे सुख-प्राप्ति, आतिथ्य-सत्कार से शुभ फलप्राप्ति तथा महर्षि पाराशर द्वारा
चारों वर्णों के लिए आचारादि कर्म का निरूपण है। २. द्वितीय अध्याय में
ब्राह्मण, क्षत्रियादि वर्णों के साधारण धर्म कथन हैं। ३. तृतीय अध्याय में चारों
वर्णों के लिए जननाशौच तथा मरणाशौच का निरूपण है। ४. चतुर्थ अध्याय में